मंगलवार, 3 नवंबर 2009

शिखण्डी चुन लिया है...

5 फरबरी 1954 को उत्तर प्रदेश मेंजन्मे श्री परशुराम राय ने सम्पूर्नानद संस्कृत विश्वविद्यालय से साहित्याचार्य की उपाधि प्राप्त की! तदुपरांत बी।एड। और फिर रूसी भाषा में स्नातकोत्तर डिप्लोमा! मन की उड़ान को विराम तब लगा जब 5 जनवरी 1984 को जनाब पहुँच गए भारत सरकार की सेवा में ! सम्प्रति आयुध उपस्कर निर्माणी, कानपुर में 'कनिष्ठ कार्यशाला प्रबंधक' पद को सुशोभित कर रहे हैं। पर हाय रे अभिरुचि ! बन्दूक बनाने वाले के हाथ मे कलम पकडा दिया ! यह इस ब्लॉग पर परशुराम जी की पहली रचना है !

-- करण समस्तीपुरी


-- परशुराम राय

असहाय हो जाती
प्रजा की चेतना जब
भीष्म के भीषण भयानक बाण से
बनकर शिखण्डी
मोड़ देती रुख हवा का
वरदान के इतिहास का।वादों के बाणों से तेरे
बिंधा आज फिर भारत
हे पितामह !
अब शिखण्डी चुन लिया है।

दुर्योधन की रक्षा की
तेरी एक भूल ने
अपने मतों की चोट से
जांघें उसकी तोड़ दीं।

चलती रहें सांसें तुम्हारी
जनतंत्र के मैदान में
उत्तरायण की किरण तक


इसलिए तेरे मतों की
राह हमने छोड़ दी।

कुरु क्षेत्र के मैदान में
एक शिखण्डी की किरण
निगल जाएगी तमस
आज कुरूराज का।

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सोमवार, 2 नवंबर 2009

लघुकथा सब प्रायोजित है

“प्रफुल्ल बाबू वो मेरिट लिस्ट में नहीं आ पाई।” प्रफुल्ल
बाबू का चेहरा जो अब तक प्रफुल्लित था, थोड़ा मुरझाया, फिर तमतमाया और तैश में वे
बोले, “॥ तो ... तो.. मैंने ही कौन मेरिट के आधार पर आपकी कविताएं रिकॉर्ड की थी
..?” अब मुझे जूस का स्वाद कड़वा लग रहा था और पकौड़े विषैले

--- मनोज कुमार

मैं, अपनी भावनाएं, कविताओं में उकेरता रहता हूं। यह जानने के लिए कि वे अच्छी हैं या नहीं, कोई श्रोता वर्ग मिले-या-ना मिले, मेरे मातहत काम करने वाले मेरा पहला निशाना होते हैं। मेरे लिये यह निर्णय करना कठिन हो गया है कि सचमुच मैं अच्छा रचता हूं या मेरे कर्मचारी बॉस और मातहत रिश्ते का धर्म निभाते हुए, उसे अच्छी ही नहीं बहुत अच्छी बताते और बनाते रहते हैं। इधर कुछ दिनों से तो शिवकुमार मेरी रचनाओं का ऐसा फैन हो गया है कि सिर्फ राष्ट्र कवि की उपाधि देना शेष रह गया है वरना हर विशेषणों से तो वह मुझे नवाज़ ही चुका है। साथ ही यह भी घोषणा कर चुका है कि आकाशवाणी पर मेरी कविता प्रसारित हो, यह उसकी दिली तमन्ना है। उसका मानना है कि जिसकी कविता ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित हो गई, वह अखिल भारतीय कवि तो हो ही गया। एक दिन वह धमक आया मेरे दफ्तर में और बोलने लगा, “सर, सब फिक्स हो गया है। प्रफुल्ल बाबू से मेरी बात हो गई है। उन्हें आपकी कविताएं पसंद आ गई हैं। रविवार को आप मेरे साथ चलें, रिकॉर्डिंग है।” मेरे लिए तो शिवकुमार ख़ुशी का पैग़ाम बैठे-बिठाए ही ले आया। रविवार को तय कार्यक्रम के अनुसार रिकार्डिंग भी हुई। स्टुडियो से चलते वक़्त प्रफुल्ल बाबू ने जानकारी दी कि मेरी इस रिकार्डिंग का शुक्रवार को कवि और कविता कार्यक्रम में शाम आठ बजे प्रसारण होगा। शुक्रवार की शाम अपनी कविताओं का प्रसारण सुनकर अभी अपनी पीठ मैं ठोक ही रहा था कि फोन की घंटी बजी। मैं थोड़े इस मुग़ालते में कि अभी-अभी तो प्रसारण समाप्त हुआ है, अभी से बधाई ... ... फोन उठाया। दूसरी तरफ से फोन पर फ्रफुल्ल बाबू की चहकती आवाज़ आई, “सर, सुना। कैसा लगा हमारा प्रसारण?” ... “बेहद अच्छा।” ... ... “... और जो आपकी कविताओं की प्रस्तुत कर्ता थी, ... उसकी आवाज़ कैसी लगी?” ... “जी .. बहुत अच्छी।” ... “सर, उसे आप ले लीजिए। बड़े काम आएगी। आपके यहां जो चार कनिष्ठ अनुवादक के पदों की भर्ती की प्रक्रिया चल रही है, ... वह भी एक कैंडिडेट है। संगीता नाम है उसका, संगीता शर्मा।” मैंने कहा, “देखता हूं, मैं क्या कर सकता।” मैंने फोन रख दिया। पर तभी पड़ोस के कुछ मित्र आए और बधाइयां देकर मेरे फ्रिज की मिठाई आदि चट कर गए। हालाकि इन्हें हमने पहले से ही कह रखा था कि शाम आठ बजे रेडियो ज़रूर ऑन रखिएगा, वरना न-जाने कोई सुनेगा भी या नहीं। कुछेक हफ्ते यूं ही बीत गए। शिवकुमार फिर मेरे पीछे पड़ गया, “सर, आपने पिछले दिनों कुछ सुनाया नहीं?” मैंने मन-ही-मन सोचा मेरे श्रोताओं का वर्ग तो अब काफी विस्तृत हो गया है। मैं तो अब अपने बायो-डेटा में भी लिखने लगा हूं – आकाशवाणी पर प्रसारित ... हुं-ह तुम्हें ही क्यों सुनाऊं। जब रेडियो पर आएगा तो सुन लेना। पर प्रत्यक्ष में कुछ बोलता उससे पहले ही शिवकुमार का दूसरा प्रश्न सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ा था मेरे समक्ष, “क्या कुछ नया नहीं लिखा?” ... “नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं है, छह-सात तो लिख ही चुका हूं।” ... “तो फिर चलते क्यों नहीं? प्रफुल्ल बाबू से मिल आते हैं। चर्चा भी हो जाएगी और रिकार्डिंग का प्रोग्राम भी तय कर आएंगे।” ... बात मुझे उसकी जंची। बांक़ी का इंतजाम उसने ही किया। मैं तो बस शनिवार के दिन तयशुदा रेस्तरां में समय पर हाजिर हो गया। वे दोनों पहले से ही उपस्थित थे। जूस और पकौड़ों के बीच प्रफुल्ल बाबू ने कविता की चर्चा के पहले ही अपना इरादा ज़ाहिर किया, “सर, आपके यहां जो कनिष्ठ हिन्दी अनुवादक की नियुक्ति का टेस्ट हुआ था उसका परिणाम नहीं आया अभी तक?” ... “बस आज ही उसकी मेरिट लिस्ट फाइनल की है, कल परिणाम प्रकाशित हो जाएगा।” ... “सर, वो संगीता का तो ... ?” ... “प्रफुल्ल बाबू वो मेरिट लिस्ट में नहीं आ पाई।” प्रफुल्ल बाबू का चेहरा जो अब तक प्रफुल्लित था, थोड़ा मुरझाया, फिर तमतमाया और तैश में वे बोले, “.. तो ... तो.. मैंने ही कौन मेरिट के आधार पर आपकी कविताएं रिकॉर्ड की थी ..?” अब मुझे जूस का स्वाद कड़वा लग रहा था और पकौड़े विषैले ... ... ! !
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