शनिवार, 19 मई 2012

फ़ुरसत में ...103 महानतम बनने का फॉर्मूला!


फ़ुरसत में ...103

 महानतम बनने का फॉर्मूला!

मनोज कुमार




सुनने में आया है कि महान लोग आत्मकथा लिख ही डालते हैं। ऐसा भी कहा जा सकता है कि आत्मकथा लिखी जाने के बाद व्यक्ति महानता को उपलब्ध हो जाता है. अब यह सच है या ग़लत, कहना थोड़ा कठिन है। हां, कुछ लोगों को तो मैं यक़ीनी तौर पर जनता हूं, जो पत्र लिख-लिख कर महान बन गए। .. और उनसे भी महानतम वे बने जो उन पत्रों को चुन-चुन कर इकट्ठा करते गए, उसका संकलन किया, उसकी समीक्षा  की, और उसका प्रकाशन करवा डाला – “इनका पत्र उनके नामशीर्षक से! उस व्यक्ति की प्रवृत्ति महानतम जासूसों से भी ज़्यादा तेज़ रही होगी, जिसने न जाने कहां-कहां से ढूंढ़-ढूंढ़ कर अनाम पत्र, गुमनाम पत्र, बेनाम पत्र, सुनाम पत्र, श्वेत पत्र, श्याम पत्र, जारी पत्र, बे-जारी पत्र, घोषित पत्र, अ-घोषित पत्र, प्रेषित पत्र, पोशित पत्र, यहां तक कि जो पत्र प्रेषित भी नहीं हुए थे, उनका भी अता-पता ढूंढ निकाला, और उन्हें भी अपने संकलन में डाल कर महानतम पत्र प्रकाशक होने का तमगा पाया।

कुछ महान हस्तियों के बारे में तो यह भी मशहूर है कि वे दिन में सैंकड़ों पत्र लिख डालते थे। उसको प्रेषित करने के लिए उनके पास पूरा दल-बल होता था। दुनिया के कोने-कोने में उनका पत्र चला जाता था। मगर उस खोजी का हौसला (महानता) देखिए कि उसने उन सारी जगहों से उन पत्रों बरामद कर इकट्ठा कर लिया।

आज जहां सक्रिय हूं, वह जगत जब चिट्ठा जगत कहलाता है, तो यहां की लिखी गई चीज़ें चिट्ठी टाइप ही कहलाएंगीं। चिट्ठी यानी पत्र। बस! मैंने सोचा कि मैं भी महान बन ही जाऊं। इसके लिए मैंने एक कार्य-योजना बनाई - पहले पत्रों की खोज करूँगा, फिर उनका संकलन करूंगा, और अंत में उन्हें प्रकाशित करवाकर महान भी बन ही जाऊंगा।

ऐसा नहीं है कि मैंने आज के से पहले महान बनने की कोशिश नहीं की या फिर महान घोषित नहीं किया गया था। बचपन से ही मेरी यह कोशिश ब-दस्तूर ज़ारी है। अपने छुटपन में जब मैं सोलर क्रिकेट क्लब से स्कूली क्रिकेट खेला करता था और उस समय जब कोई शानदार शॉर्ट मारा करता था, तो मेरी टीम का कोच मेरे उस प्रयास को ग्रेट! कह कर मेरी तारीफ़ किया करता था। और उसके हर इस शब्द पर जो वो केवल मेरे लिए कहता था मैं गावस्कर, सोबर्स और कन्हाई की पंक्ति में खुद को खडा पाता था।

 एम.एससी. की पढ़ाई के दौरान जब मैंने लाइट प्रोडक्शन इन इन्सेक्ट्स पर नोट्स बनाकर अपने प्रोफ़ेसर को दिखाया था, तो अभिभूत होकर उन्होंने मेरी उस कोशिश पर मुझे ग्रेट! कहा था। तब भी मैंने ख़ुद को डार्विन, खुराना और मेंडल के मार्ग पर चलने वालों में सबसे आगे पाया था। पिछले ढाई-तीन सालों की चिट्ठा जगत की अपनी सक्रियता में अपने चिट्ठों के कारण कई ऐसी टिप्पणियां हमने पाई हैं, जिन्होंने मुझे फिर से ग्रेट, या ग्रेट साहित्यकार ठहराने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है।

इतनी बात सुनने के बाद आपके मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि आज अचानक फिर से यह महान बनने का फितूर मुझ पर क्यों सवार हुआ है? दरअसल किसी महान व्यक्ति ने कहा है कि महान कोई एक दिन में नहीं बन जाता और महान कोई एक बार में नहीं बन पाता। उसे बार-बार बनना पड़ता है, बहुत बार बनना पड़ता है। बहुत-बहुत बार बनना पड़ता है।

मैंने अकसर देखा है कि जो महान होते हैं, उनको उनकी महानता के लिए कई पुरस्कार भी उन्हें मिलते हैं। वे महान लोग अपनी आत्मकथा में बताते है कि पुरस्कार मिलने की उनकी राह आसान नहीं रही है। कुछ ने तो इसे खुलासा करते हुए यह भी बताया है कि इस ग़ैर-आसान राह पर पहले टॉप 32, फिर टॉप 16, फिर टॉप 10 में शामिल होना पड़ता है। आज कल के कई रियालिटी शो में भी ऐसा ही होता है, चाहे वह लिटिल की महानता वाला शो हो या फिर ग़ैर लिटिल की। टॉप 10 से टॉप का सफ़र और भी मुश्किलों भरा होता है। टॉप टेन तक तो महान-मास्टर (ग्रेट मास्टर्स) उन्हें चुन देते हैं, उसके बाद उन्हें जनता की वोटिंग के भाग्य-भरोसे छोड़ दिया जाता है।

आज तक तो काग़ज़ और क़लम थे मेरे पास। उसी पर मुझे भरोसा था। लेकिन अब तो माँ है.. क्षमा करें से माउस, मेल और मेसेज हैं. आज क्लिक और टच-पैड का ज़माना है। अपुन तो पत्र वाले ज़माने के हैं (आउट डेटेड)। अब आज के ज़माने में पत्रों का संकलन निकालने की सोचते रहे हैं, जब ढूंढ़ने से भी कोई पत्र मिलने से रहा। इस ज़माने में तो संकलन का शीर्षक होना चाहिए इसका मेल उसके नाम, या प्रेमी-प्रेमिका की एस.एम.एस., या ट्विटर पर धुरंधर के धमाल, या फलां के सौ अपडेट्स सोशल साइट्स पर, या महान मोहन के सौ चैट्स। चैट्स से याद आया कल ही अपने एक परम-मित्र से चैट कर रहा था, तो उसने मुझसे कहा था, आज कल तुम्हारी महानता की धार कम होती जा रही है। मुझे उसकी बात सुनकर अजीब सा लगा। मैं ऐसा न तो सोच ही रहा था और न ही सोच सकता था। मेरे मन में प्रश्न कुलबुलाने लगा, ‘मेरे परम मित्र को मेरी महानता पर शंका क्यूं?’ मेरी शंका का निवारण करने हेतु उसने ही बताया, “तुम सलेक्टेड टॉप टेन महानतम की लिस्ट  में नहीं हो।यह सुनकर तो मेरे ऊपर दुनिया के टॉप टेन पहाड़ गिर पड़े। मुझे लगा मेरे सारे अरमान, मेरी सारी मेहनत, अब तक की अरज़ी मेरी सारी महानता पर दुनिया के टॉप टेन समुद्र का खारा पानी फिर गया।

मैं तो, ख़ुद को नेट पर लिखने वाला, लिखने से ज़्यादा उचित शब्द प्रतीत होता है योगदान देने वाला महानतम चिट्ठाकार समझ रहा था। अपने लेखन को साहित्य का अद्वितीय नमूना, धारदार, क्रान्तिकारी, आदि समझता था। हमारे पाठक मित्र (टिप्पाकार) भी आजतक हमें ऐसा ही बताते आए हैं। फिर क्या समस्या है? क्या कमी है मुझमें? कौन सी ग़लती की है  मैंने कि महान मास्टर ने मेरे चिट्ठा (ब्लॉग) को सलेक्टेड टॉप टेन की लिस्ट में शामिल करने लायक़ नहीं समझा। हमने अपनी इस समस्या की एक क़ाबिल और विश्वासपात्र मित्र से चर्चा की, तो उसने कहा, तेरे साथ तो ना-इंसाफ़ी हुई है।मेरी आदत है कि मैं एक के कहे पर विश्वास नहीं करता, खास कर तब जब वह बात मुझसे ही संबंधित हो। मैंने अपने एक विद्वान चिट्ठाकार (ब्लॉगर) से जानना चाहा कि ऐसी कौन सी समस्या है, ऐसा कौन सा दोष है जिसके कारण न तो मुझे और न ही मेरे चिट्ठा (ब्लॉग) को टॉप टेन के लायक़ समझा गया? उन्होंने विद्वतापूर्ण राय व्यक्त की, “तेरा लैपटॉप जहां रहता है, दोष वहां है। इसे वास्तु दोष कहते हैं। इसी कारण ऐसा हुआ है।मैंने पूछा, “इसका निवारण क्या है?” निवारण बताया, “तुम अपने लैपटॉप को पूरब और उत्तर के बीच की दिशा में रख दो, फिर ऐसे बैठो कि तुम्हारा मुंह पूरब की तरफ़ और हाथ उत्तर की तरफ़ हो, और तब ही टाइप करो। इस विधि का इस्तेमाल करने से तुम शर्तिया सलेक्टेड टॉप टेन मे शामिल हो जाओगे।

मैंने अपने वास्तुकार-शास्त्रज्ञ ज्योतिष चिट्ठाकार (ब्लॉगर) मित्र की सलाह पर न सिर्फ़ अपने और अपने लैपटॉप का वास्तु दोष दूर किया बल्कि उसके बताए इलेक्ट्रोनिक मंत्र के लिंक को भी ग्यारह बार क्लिक किया। उसके बाद उसके द्वारा चुने गए दस ब्लॉग पर एक सौ एक टिप्पणियों का दान देने के बाद ही अपने चिट्ठे (ब्लॉग) पर चिट्ठागिरी (ब्लॉगिंग) की। पर मामला वही ढाक के तीन पात वाला ही रहा। चौबीस घंटे बीत चुके थे। पहला परिणाम भी आ चुका था। मैं अब भी सलेक्टेड टॉप टेन की सूची से बाहर ही था। मेरा चिट्ठा (ब्लॉग) भी।

मैंने सोचा पहले मेरा चिट्ठा (ब्लॉग) सलेक्टेड टॉप टेन की सूची में आ जाए तो मैं भी तो आ ही जाऊंगा। इस दिशा में मुझे कुछ नया करना चाहिए। समय कम है। सबसे पहले मेरा ध्यान चिट्ठा (ब्लॉग) के शीर्षक पर गया। मुझे लगा हो-न-हो दोष इसी में है। हो भी क्यों नहीं, जब कोई अपने चिट्ठे (ब्लॉग) का नाम अपने नाम पर रख ले, तो उसके भाग्य का सारा दोष उसके चिट्ठे (ब्लॉग) पर तो चला ही जाएगा। मैंने सलेक्टेड टॉप टेन के नामों का ठीक से अध्ययन किया। तब मुझे लगा कि यदि चिट्ठे (ब्लॉग) का नाम महान हो तो चिट्ठा (ब्लॉग) अपने आप महान हो जाता है। मैंने भी चिट्ठा (ब्लॉग) के नामों के विकल्प पर ग़ौर करना शुरू कर दिया। फूटा प्लेट’, ‘जूठा पत्ता’, ‘कटी पतंग’, ‘उडती रेलगाड़ी’, ‘तोप का बारूद’, ‘ठंडी राख की चिंगारीआदि-आदि नाम ज़ेहन में आए। इतने से भी तसल्ली न हुई। मन में नामों का घमासान चल रहा था। एक ज़ोरदार शीर्षक रखने के चक्कर में हिंदी-अंगरेज़ी-उर्दू कोश के साथ-साथ विश्व कोश तक छान मारा। निर्णय नहीं ले पा रहा था कि चिट्ठा (ब्लॉग) का नाम व्यक्तिवाचक हो, या जातिवाचक, स्त्रीलिंग में हो या पुलिंग में या फिर उभय लिंगी ही हो। संज्ञा हो, सर्वनाम हो या क्रिया। तरह-तरह से छान-बीन की, जांच-पड़ताल की, कोई नतीज़ा सामने नहीं आ रहा था।

दिमाग पर और ज़ोर डाला, और विचारों को विस्तीर्ण करके सोचा... शीर्षक मार्क्सवाद से लूं, या प्रगतिशीलवाद से। गांधीवाद तो पुराना और आउट ऑफ फैशन हो चला है। ऐसे ही ऊहापोह में की स्थिति तब बनी थी जब मैंने अपनी पहली कविता लिखी थी। उस कविता से ही महान कवि हो जाऊं, इस मंशा से बहुत सोच-विचार और मंथन के बाद अपना कवि नाम/उपनाम/तखल्लुस मैंने - मनोज मनहूसरख डाला था। आज फिर वही संकट सामने था, और मुझे अपने चिट्ठा (ब्लॉग) का नाम बदलना था। बहुत सोच-विचार कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि इसका नाम महान मनोज की महानता कर डालता हूं।

चिट्ठा (ब्लॉग) के शीर्षक बदलने में ख़ुद की उर्ध्वासन से शीर्षासन वाली स्थिति हो गई थी, पर अपनी क़िस्मत की अल्टी-पल्टी नहीं हुई। 36 घंटे बाद जो परिणामों की घोषणा ज़ारी की गई है उसके टॉप टेन के नामों में मेरा  दूर-दूर तक अता-पता नहीं था। अब? मैंने सोचा बहुत हो गया! अब मुझे एक धांसू पोस्ट लिख डालनी चाहिए। ज़रा हट के। ये प्रेरक कथा, ये ज्ञान के दर्शन, ये साहित्य की बातें, ये पुस्तकों का सारांश, ये चिंता में डालती कहानियां, ये चिंतन से उपजी कविताएं, ये काव्य समीक्षाएँ...  सब बेकार की चीज़ें हैं। मैंने अपना शातिर दिमाग़ दौड़ाया, तो पाया कि धरती पर चलने वाला सबसे ऊंचा जीव तो ऊंट है और उसकी टांग न सिर्फ़ इतनी लंबी होती है कि वह सबके फटे में अड़ाते हुए पाया जाता है, बल्कि उसमें इतनी ताक़त होती है कि वह रेगिस्तान की जलती रेत में भी दौड़ लगाता है, तो मैंने सोचा क्यों न कुछ ऐसा ही अर्थात “ऊंट-पटांग” चीज़ लिखी जाए। यह ख़्याल मन में आते ही मैंने पाया कि मेरे पास न तो विकल्पों की कमी है और न ही विषयों की। और इस विचार मात्र से ही मेरा विश्वास ऊंट सा ऊंचा हो गया। मैं लोगों की टांग खींचने को और अपनी कलम की टांग तोड़ने को तैयार था। इस बार तो मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास हो गया था कि मैं यह करिश्मा (सलेक्टेड टॉप टेन के नामों में आने का) कर सकता हूं।

सबसे पहले मैंने अपने गणित के गुरु का स्मरण किया और उनके बताए सारे जोड़, घटा, गुणा, भाग के सूत्रों का पुनर्स्मरण किया। इसके बाद मैंने अपने सारे समीपस्थ-दूरस्थ दोस्तों के साथ अपने संबंधों की ऐसे गणितीय सूत्रों की मदद से व्याख्या करते हुए इस चिट्ठा जगत को अपना अनुपम मानसिक योगदान दिया, जिसका जवाब किसी के पास होने की संभावना नहीं थी। इस क्रम में  मैंने जो सूत्र पाया वह इस प्रकार का था :-

क+क-क×÷क =

क्या महान सूत्र मेरे हाथ लग गया है! अब मुझे लगने लगा था कि ब्लॉग बोधि-वृक्ष के तले मुझे यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि मुझमें महान बनने की अनंत संभावनाएं हैं और महानता के क्षेत्र  में चल रही अराजकता है बस बीते दिनों की बात होगी। मेरे इस सूत्र के आगे सारे महान पिट जाएंगे और मेरा सूत्र हिट हो जाएगा। मैं सोचता हूं इस सूत्र का कॉपी राइट अपने नाम कराके एक चिट्ठी (पोस्ट) डाल ही दूं इस शीर्षक के साथ फ़ुरसत के 72 घंटे में महानतम बनने का फॉर्मूला!

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अब चैन-ओ-फ़ुरसत में हूं। खुद अपनी पीठ ठोकता हूं और मेरे मुंह से निकलता है मनोज द ग्रेट!

गुरुवार, 17 मई 2012

आँच- 109 – नेह भर सींचो


आँच- 109
 नेह भर सींचो कि मैं अविराम जीवन-राग दूँगा
-    हरीश प्रकाश गुप्त

प्रतिभा सक्सेना जी कैलीफोर्निया में रहती हैं। अध्ययन में रुचि रखती हैं, अध्यापन उनका व्यवसाय है और लेखन उनका संस्कार है। उनका एक ब्लाग है शिप्रा की लहरें जिसमें वह नियमित रूप से अपनी कविताएं प्रकाशित करती रहती हैं। पिछले सप्ताह उन्होंने अपने ब्लाग पर एक गीत नेह भर सींचो पोस्ट किया था। यह गीत एक प्रकार से प्रकृति, पर्यावरण को समर्पित है जिसमें एक वृक्ष को प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर उसकी अन्तरात्मा को अभिव्यक्ति प्रदान की है। सुन्दर शब्द योजना में पिरोया उनका यह गीत आज की आँच की चर्चा की विषयवस्तु है।
       वृक्ष का जीवन सर्वस्व त्याग और तपस्या का पूरक है। उसका सम्पूर्ण जीवन परोपकार हेतु समर्पित है। वह स्वयं तो अनेकानेक कठिनाईयों का सामना करता है, भिन्न-भिन्न मौसमों में शीत और ताप बर्दाश्त करता है, प्राकृतिक आपदाओं को सहता है, फिर भी वह अपने उद्देश्य से विचलित नहीं होता है। परहित उसका धर्म है। दूसरों के सुख के लिए उनके हिस्से के कष्ट अंगीकार कर लेना उसका व्रत है, जिसका वह आजन्म पालन करता है, भले ही इस हेतु उसके अपने प्राणों को संकट ही क्यों न उत्पन्न हो जाए। वृक्ष केवल पशु-पक्षियों और अन्य वन्य जीवों के ही शरणस्थल मात्र नहीं हैं बल्कि मनुष्यों के भी नीड़-निर्माण के अपरिहार्य तत्व हैं। एक तरफ बड़े आकार और स्थूल प्रकार के वृक्ष हैं जो अपनी विशालता से अचम्भित करते हैं तो वहीं छोटे-छोटे विविध प्रकार के पौधे और बलखाती तन्वी लताएँ आकर्षित करते हैं। अपने नाना प्रकार के रंगबिरंगे रूपों में प्रकट होकर वे न केवल प्रकृति पटल पर सुन्दर दृश्य उपस्थित करते हैं बल्कि यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि उन्होंने इस भू-लोक को समस्त रंगों से सराबोर किया है। पक्षियों के कलरव और पवन के साथ मिलकर उनका रचा संगीत जीवन की नीरसता को भंगकर उसे सरस और आनन्दमय बनाता है। पृथ्वी पर रहने वाले समस्त जीवों को फल-फूल-अन्न के रूप में भोजनादि के साथ-साथ प्राणवायु और अमूल्य औषधियाँ प्रदानकर उनके जीवन का आधार बने हैं। इसी प्रकार वे स्वयं की पूर्णाहुति भी देते रहते है।
     इस गीत में जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण है वह है मूक वृक्ष का मानवीकरण और उसकी संवेदना जिसे कवयित्री ने बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति दी है। वृक्ष की आकांक्षा मानवजाति के जीवन को सुखद तथा शान्ति से परिपूर्ण अर्थात स्वर्ग बनाने की है और वह इसके लिए प्राणपण से प्रतिबद्ध भी है - स्वर्ग सम वसुधा बने, सुख-शान्ति-श्री से पूर दूँगा। इस हेतु उसकी चाहत मानवजाति से प्रेम पाने की है। जब वह कहता है कि - नेह भर सींचो कि मैं अविराम जीवन-राग दूँगा या स्वयं गरल पीकर प्राणवायु देने को उद्दत होने में त्याग का उत्कर्ष - मैं प्रदूषण का गरल पी, स्वच्छ कर वातावरण को / कलुष पी पल्लवकरों से प्राण वायु बिखेर दूँगा या शिथिल पड़ रहे जीवन बन्धनों या अवरोधों को रोक लेने की अटूट आस्था  - मूल के दृढ़ बाँधनों में खंडनों को कर विफल इन टूट गिरते पर्वतों को रोक कर फिर जोड़ लूँगा या जीवन को सुगम बनाने के लिए बाधाओं को दूर करने का अटल विश्वास - पास आते मरुथलों को और दूर सकेल दूँगा - तो उसकी प्रतिबद्धता में विश्वास भी प्रकट होता है और आश्वस्त करने का भाव भी और इसकी गूँज पंक्ति-दर-पंक्ति पूरे गीत में ध्वनित होती है। गीत का यह उदात्त भाव मोहक है और अत्यंत हदयस्पर्शी भी है। वृक्ष के माध्यम से कवयित्री द्वारा अभिव्यक्त असीम विश्वास के साथ प्रतिबद्धता और स्पृहा बहुत ही प्रेरणास्पद है। 
     मनोहारी भावभूमि पर प्रतिभा जी द्वारा रचित इस गीत का भाव पक्ष बहुत सशक्त है और प्रतिभा जी ने इसे अपनी समर्थ कलम-तूलिका से शब्द रूप देने का भरसक प्रयास किया है। उनका शब्दकोश इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। अधिकांश स्थानों पर उनकी शब्द-योजना बहुत ही आकर्षक बन गई है और वहाँ निर्दोष प्रांजलता ने गीत के सौन्दर्य में वृद्धि की है या इसे यों कहें कि यह सम्मोहक बन गई है तो अतिशयोक्ति न होगा। जैसे - 
रूप नटवर धार करते कुंज-वन में वेणु-वादन  
जल प्रलय वट- पत्र पर विश्राम रत हो सृष्टि-शिशु बन
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हरित-वसना धरा को कर, पुष्प फल मधुपर्क धर कर
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लताओं को बाहुओँ में साधकर गलहार डाले,
पुष्पिता रोमांचिता तनु देह जतनों से सँभाले,
रंग  दीर्घाएँ करूँ जीवंत  अंकित कूँचियाँ  भर,
स्वर्ग सम वसुधा बने, सुख-शान्ति-श्री से पूर दूँगा
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तंतु के शत कर पसारे, उर्वरा के कण सँवारे,
 नेह भीगे  बाहुओं से थाम कर तृणमूल सारे
***  
            स्वाभाविक सौन्दर्य से परिपूर्ण इस गीत की रचना निसन्देह है तथापि एकाधिक स्थानों पर प्रवाह में अवरोध उत्पन्न हुए हैं। जलद-मालायें खिंचें, आ मंद्र मेघ-मल्हार गायें में खिंचे से स्वतंत्र प्रवाह में रुकावट आती है, बदलते इन मौसमों का शीत-ताप स्वयं वहन कर में बदलते का ते अवरोधक है, “ वृक्ष हूँ मैं व्रती, पर-हित देह भी अर्पण करूँगा में भी नाहक है,  “प्राण के पन से भरूँगा जो कि माटी से लिया ऋण  में जो कि से,  मैं कृती हूँ, नेह से भर,  सदा आशिर्वाद दूँगा! में आशिर्वाद  की वर्तनी भी दोषपूर्ण है और इससे प्रवाह में बाधा भी उत्पन्न हुई है। यदि यह पंक्ति कुछ इस तरह - कृती हूँ, निज नेह से भर  मैं सदा आशीष दूँगा ! - होती तो बेहतर विकल्प हो सकता था। इसी प्रकार अन्य स्थानों पर भी संशोधन की आवश्यकता है। गीत में कई स्थानों पर सर्वनाम प्रयोग में आए हैं। गीत में अव्ययों की भी अधिकता है। कि’, जो’, ‘भी’, ‘जोकि’, का’, ‘को’, ‘में, मैं’, ‘तुम्हारा आदि का प्रयोग गीत की पहली ही पंक्ति से है। श्रेष्ठ काव्य में अव्ययों और सर्वनाम के प्रयोग से प्रायः बचा जाना चाहिए। इनसे उत्पन्न रिक्त स्थानों पर सार्थक पदों का प्रयोग उत्तम काव्य की रचना में सहायक होता है। गीत में प्रयुक्त सकेल शब्द की उपयुक्तता पर काफी चर्चा हुई है। ढकेल का भी सुझाव आया है। जहाँ तक सकेल के प्रयोग की बात है तो यह कोमल और श्रुति-मधुर अवश्य है परन्तु यह नितांत देशज शब्द शेष गीत की शब्द-योजना में सुसंगत नहीं बैठता। इसी तरह ढकेल अधिक कर्णकटु है। धकेल में शक्ति का आगम भी है और ढकेल की अपेक्षा कम कर्णकटु, अतः यहाँ धकेल की तुलना में अधिक उपयुक्त हो सकता था। वैसे भी, इस गीत में रेफ, ण, भ, ध व घ आदि वर्ण कई बार प्रयोग में आए हैं जो कठोर ध्वनियाँ मानी जाती हैं। इसके अतिरिक्त गीत की तीसरी, 8वीं, 16वीं, 17वीं, 18वीं, और 25वीं पंक्ति में मात्राएँ असमान अर्थात क्रमशः 29, 30, 26, 30, 29, तथा 29 हैं जबकि शेष गीत में 28-28 बराबर मात्राएँ हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये वही पंक्तियाँ हैं जिनमें प्रांजलता में दोष उत्पन्न हुआ है। यदि चौथी पंक्ति में पंक्षियों की कर दिया जाए तो मात्रा दोष भी समाप्त हो जाता है और प्रवाह भी उत्तम बन जाता है। आठवीं पंक्ति में का दो बार प्रयोग हुआ है। यह टंकण त्रुटि है। इस गीत में ये दोष कवयित्री की शिल्प के प्रति शिथिलता को दर्शाते हैं। अतः स्पष्ट है कि कवयित्री द्वारा यदि यहाँ सजगता बरती जाती तो यह गीत पूर्णतया निर्दोष हो सकता था। यहाँ प्रस्तुत सुझाव मेरे मात्र निजी विचार हैं, अतएव प्रत्येक पाठक का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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