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गुरुवार, 7 जुलाई 2011

आँच-76 :: अर्थान्वेषण – 4

आँच-76

अर्थान्वेषण – 4

एकार्थी शब्दों के अर्थ-नियमन के साधन

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में अनेकार्थी शब्दों के अर्थ-निर्णय पर एक अर्थवैज्ञानिक चर्चा की गयी थी। अब इस अंक में एकार्थी शब्दों के अर्थ-निर्णय के साधनों पर अर्थवैज्ञनिक चर्चा प्रस्तुत है। यहाँ द्रष्टव्य यह है कि भारतीय शास्त्रों में भी वे ही तत्त्व आए हैं जिनकी चर्चा आधुनिक भाषाविज्ञान में अर्थविज्ञान के अन्तर्गत की गयी है। यदि पाठकों को याद हो, तो आज जिस विषय को अर्थवैज्ञानिक चर्चा के लिए लिया गया है इसकी चर्चा भारतीय काव्यशास्त्र शृंखला के अन्तर्गत ध्वनि चर्चा के आरम्भिक अंकों में की जा चुकी है। जो भाषाविज्ञान के छात्र हैं, वे जानते हैं कि भाषाविज्ञान में अर्थविज्ञान की चर्चा महर्षि यास्क, आचार्य भर्तृहरि, मम्मट, विश्वनाथ कविराज आदि के बिना शुरु ही नहीं होती। मैंने जितनी भाषाविज्ञान की पुस्तकें पढ़ीं, यही पाया। भाषा के प्रति भारतीय उपलब्धियों की चर्चा विदेशी भाषावैज्ञानिकों ने जितनी की है यदि उनको केवल उद्धृत किया जाय, तो कई पुस्तकें आकार ले सकती हैं। यहाँ केवल नमूने के तौर पर एल.ब्लूमफियोड (L.Bloomfieod) द्वारा लिखित पुस्तक Language से एक उद्धरण लेते हैं-

It was in India, however, that there arose a body of knowledge which was destined to revolutionize European ideas about language …………. Round the beginning of the nineteenth century, the knowledge of Sanskrit became part of equipment of European scholors…….. The Hindu grammer taught Europeans to analyse speech forms; ………….

कहने का तात्पर्य यह है कि जिसका जो सम्मान है, उसे मिलना चाहिए। यह सोचना कि सभी ज्ञान का उत्स भारत में ही है, ऐसा भी नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि भारतीय मनीषियों ने जो दिया है, वह अद्वितीय है। इसपर अधिक चर्चा न कर फिलहाल चर्चा प्रस्तुत है एकार्थी शब्दों के अर्थ-निर्णय के साधनों के अर्थवैज्ञानिक दृष्टि पर।

यहाँ भी भाषावैज्ञानिकों द्वारा उद्धृत की गयीं आचार्य मम्मट और आचार्य विश्वनाथ कविराज की कारिकाओं को यहाँ उद्धृत किया जा रहा है, जिनमें कथ्य एक है, केवल कहने में अन्तर है-

वस्तुबोधव्यकाकूनां वाक्यवाच्यान्यसंन्निधेः।। (काव्य प्रकाश 2.21 का उत्तरार्ध)

प्रस्तावदेशकालादेर्वैशिष्ट्यात् प्रतिभाजुषाम्।

योSर्थस्यान्यार्थधीर्हेतुर्व्यापारो व्यक्तिरेव सा।। (काव्यप्रकाश 2.22)

अर्थात् वक्ता, बोद्धा (श्रोता), काकु, वाक्य, वाच्य, अन्यसन्निधि, प्रस्ताव (प्रकरण), देश, काल और चेष्टा-वैशिष्ट्य से सहृदयों को अन्य अर्थ की प्रतीति कराने का जो व्यापार होता है उसे व्यंजना (आर्थी) कहते हैं।

आचार्य विश्वनाथ कविराज भी इसी बात को अपने ढंग से कहते है-

वक्तृ-बोद्धव्य-वाक्यानामन्यसन्निधि-वाच्यचोः।

प्रस्ताव-देश-कालानां काकोश्चेष्टादिकस्य च।। साहित्यदर्पण-2.16।।

वैशिष्ट्यादन्यमर्थं या वोधयेत् सार्थसम्भवा। साहित्यदर्पण 2.17 का पूर्वार्ध।

इन पंक्तियों में भी वे ही बातें कही गयी हैं, जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। इसलिए दुबारा अर्थ नहीं दिया जा रहा है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि प्रस्तुत सन्दर्भ में इन्हीं बिन्दुओं पर आधुनिक भाषाविज्ञान में भी चर्चा की गयी है। अतएव उक्त दस साधनों, अर्थात् वक्ता, बोद्धा (श्रोता), काकु, वाक्य, वाच्य, अन्यसन्निधि, प्रस्ताव (प्रकरण), देश, काल और चेष्टा पर एक-एक कर चर्चा नीचे दी जा रही है।

1. वक्ता - एक ही उक्ति का वक्ता के भेद से अर्थ बदल जाता है। जैसे सबेरा हो गया इस वाक्य का वक्ता भेद से अर्थ-भेद हो जाएगा। यदि माँ बच्चे से बोलती है, तो अर्थ होगा कि जागो, विस्तर छोड़ो। यदि किसान अपने बेटे से या हलवाहे से कहता है, तो अर्थ होगा कि बैलों को लेकर खेत पर जाना है या उन्हें चारा डालना है आदि। इसी प्रकार घंटी हो गयी या घंटी बज गयी का अर्थ परीक्षार्थी के लिए अलग, विद्यालय जानेवाले छात्र के लिए अलग, रेलवे स्टेशन पर यात्री के लिए अलग होगा। यहाँ सबेरा और घंटी के अर्थ वक्ता भेद से अलग-अलग होंगे।

2. बोद्धा (श्रोता) – जिस प्रकार वक्ता भेद से किसी शब्द या उक्ति का अर्थ भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार श्रोता के भेद से शब्द या उक्ति का अर्थ भी अलग हो जाता है। यहाँ बिहारी कवि का एक दोहा है जो महाराज जयसिंह को लक्ष्य करके उस समय कहा गया जब वे नवोढ़ा रानी के प्रेम-जाल में फँस कर राज-काज के प्रति उदासीन हो गये थे-

नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल।

अली कली ही सौं बध्यो, आगे कवन हवाल।।

जब यह दोहा महाराज जयसिंह के पास भेजा गया तो उन्होंने अली और कली का अर्थ क्रमशः खुद और नयी रानी समझा और सुना जाता है कि इस दोहे से प्रेरित होकर उन्होंने अपना रवैया बदल दिया था। लेकिन यदि इसे स्वामी दयानन्द सरस्वती के पास या हुमायूँ के पास भेजा जाता तो वे इसका अर्थ वही नहीं समझते, जो महाराज जयसिंह ने समझा। इस प्रकार श्रोता भेद से भी अर्थ भेद होता है।

3. काकु – यहाँ काकु का अर्थ स्वर को विकृत कर अभीष्ट अर्थ प्रकट करना। दूसरे शब्दों में स्वराघात और बलाघात या स्वर के आरोह और अवरोह द्वारा अभीष्ट अर्थ को व्यक्त करना काकु है। उदाहरण के तौर पर यदि एक वाक्य लिया जाय- आप वहाँ गए थे। यदि हम स्वर के बल का प्रयोग अलग-अलग शब्दों पर करें तो इसके कई अर्थ प्रश्नात्मक, निषेधात्मक, विस्मयात्मक आदि हो सकते हैं। इस प्रकार काकु अर्थ-निर्धारण का एक साधन है।

4. वाक्य- वाक्य को भाषा की इकाई कहा जाता है। क्योंकि एक वाक्य से ही पूरा अर्थ निकलता है। वाक्य में शब्द का अर्थ प्रयोग के अनुसार भिन्न हो सकता है। जैसे- आइए न। बैठिए न। जल्दी कीजिए न। इन वाक्यों में किया गया का प्रयोग वाक्य के अर्थ का निषेध (Negative) नहीं करता, जबकि एक स्वतन्त्र शब्द के रूप में निषेधात्मक अर्थ देता है। इसी प्रकार देखता हूँ तुम कैसे अपना काम करवा लेते हो? यह वाक्य प्रश्न-सूचक तो है, पर इसका अर्थ निषेधात्मक है। तात्पर्य यह है कि वाक्य भी एकार्थक शब्दों का अर्थ निश्चित करने में सहायक होता है।

5. वाच्य – यहाँ वाच्य का अर्थ वक्तव्य है, व्याकरण का वाच्य (Voice) नहीं। इसके लिए बिहारी कवि का एक दोहा उदाहरण के लिए लेते हैं-

घाम घरीक निवारिए, कलित-ललित अलिपुंज।

जमुना तीर तमाल-तरु, मिलति मालती-कुंज।।

यह रमण के लिए उत्सुक एक नायिका की उक्ति है, जिसमें नायिका द्वारा नायक से कहा गया है कि यमुना के किनारे तमाल के पेड़ के पास मालती कुंज में भौंरे मधुर गुंजार कर रहे हैं, वहाँ थोड़ी देर बैठकर और धूप से बचकर आराम कर लो।

इस वक्तव्य से अर्थ निकलता है कि उक्त स्थान पर चलकर रमण करते हैं। जबकि ऐसा कोई भी शब्द इस वक्तव्य में नहीं आया है, जो इस प्रकार का अर्थ दे सके। लेकिन इस पूरे वक्तव्य से यह अर्थ वाच्य वैशिष्ट्य के कारण उद्भासित होता है।

6. अन्यसन्निधि – भाषावैज्ञानिकों के अनुसार वक्ता और श्रोता के अलावा किसी तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी के कारण यदि किसी वक्तव्य का अलग अर्थ हो, तो वह अर्थ का वह अन्तर अन्यसन्निधि के कारण माना जाता है। लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि किसी व्यक्ति की सन्निधि ही हो, किसी की भी सन्निधि से अर्थ अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए यदि चोरों का एक दल चोरी करने के लिए कहीं छिप कर लोगों के सोने का इंतजार कर रहा है। यदि उनमें से कोई कहता है- अभी कुत्ते भौंक रहे हैं तो इस वाक्य का अर्थ होगा कि अभी लोग आ-जा रहे हैं और अभी चोरी का उपयुक्त समय नहीं हुआ है। यह अर्थ कुत्ते के सान्निध्य से आ रहा है। वैसे बिहारी कवि के उक्त दोहे- घाम घरीक ........... मिलति मालती-कुंज- को इसका भी उदाहरण माना जा सकता है और इसका जो अर्थ ऊपर बताया गया है, वह घाम और मालती-कुंज के सान्निध्य से आएगा। इसी प्रकार फूल मुस्करा रहे हैं वाक्य में फूल की सन्निधि अर्थात् सान्निध्य के कारण मुस्कराना का अर्थ खिलना होगा।

7. प्रस्ताव (प्रकरण/context)- प्रकरण या प्रसंग अर्थ-निर्धारण का प्रमुख साधन है। वैसे इसका सर्वप्रथम उल्लेख महर्षि यास्क के निरुक्त में मिलता है- न तु पृथक्त्वेन मन्त्रा निर्वक्तव्याः, प्रकरणश एव तु निर्वक्तव्याः, अर्थात् मंत्रों का अर्थ पृथक-पृथक् न कर प्रकरण के अनुसार करना चाहिए। यों तो उन्होंने यह वेद मंत्रों के सन्दर्भ में कहा है, पर काव्यशास्त्रियों ने इसे शब्दार्थ के साधन में लिया है, चाहे अनेकार्थी शब्दों के अर्थ-निर्णय की बात हो या एकार्थी शब्दों के। प्रकरण के अनुसार एक ही वाक्य के अर्थ अलग-अलग हो सकते हैं। इसके लिए एक वाक्य लें- आठ बज गए। यदि माँ बच्चे से कहती है, तो अर्थ होगा जल्दी तैयार हो जा, स्कूल का समय हो गया। यदि पति पत्नी से कहता है, तो अर्थ होगा कि कार्यालय जाने का समय हो रहा है, जलपान कराओ, लंच के लिए भोजन पैक करो। इस प्रकार सन्दर्भ के अनुसार आठ बजने का अर्थ अलग-अलग हो जाता है। यहाँ वक्ता और बोद्धा के भेद से भी अर्थ-भेद देखा जा सकता है।

8. देश- देश का यहाँ अर्थ स्थान है, अर्थात स्थान विशेष के कारण भी एकार्थी शब्दों का अर्थ निर्णय होता है। जैसे- घंटी हो गयी वाक्य का अर्थ रेलवे स्टेशन पर गाड़ी आनेवाली है होगा। पर स्कूल में इस वाक्य का अर्थ अलग होगा। इस प्रकार स्थान विशेष के कारण घंटी बजने का अर्थ अलग-अलग निश्चित होता है।

9. काल- काल-भेद के अनुसार भी अर्थ-भेद होता है। उदाहरण के लिए पहले लिया गया उदाहरण ही ले लेते हैं- आठ बज गए। यदि यह वाक्य माँ प्रातःकाल अपने बच्चे से कहती है, तो इसका अर्थ होगा जल्दी तैयार हो जाओ, स्कूल जाने का समय हो रहा है आदि। पर यदि शाम को कहती है, तो अर्थ हो सकता है कि खाना खाकर जल्दी सो जाओ, सबेरे जल्दी उठना होगा आदि। इस प्रकार कालभेद से भी एक वाक्य या शब्द का अर्थ भिन्न हो सकता है। इस प्रकार काल भी अर्थ निर्णय में सहायक होता है।

10. चेष्टा वैशिष्ट्य- चेष्टा वैशिष्ट्य के द्वारा या इशारे से अपने भाव को दूसरे तक पहुँचाया जा सकता है। जैसे- बहुत से लोग बैठे हों और नायक यदि हाथ में लिए कमल के फूल को दोनों हाथों से बन्दकर नायिका को यह संकेत दे सकता है कि जब कमल बन्द होंगे, अर्थात रात होने पर मिलेंगे। क्योंकि दिन में कमल खिलता है और रात में पुनः अपनी पंखुड़ियों को समेट लेता है। एक दूसरा उदाहरण एक दोहा लेते हैं-

लखि गुरुजन बिच कमल सों, सीस छुवायो स्याम।

हरि सनमुख करि आरसी, हिये लगाई बाम।।

यहाँ केवल चेष्टा के द्वारा ही गुरुजन की उपस्थिति में भगवान कृष्ण और गोपी एक दूसरे के प्रति अपने अनुराग को व्यक्त कर रहे हैं। इस प्रकार चेष्टा वैशिष्ट्य से भाषा के अन्दर अभिव्यंजना की जाती है और उसी प्रकार पाठक द्वारा उसका ग्रहण भी होता है।

अर्थान्वेषण के अन्तर्गत इन विषयों को चर्चा के लिए इसलिए आवश्यक समझा गया, क्योंकि रचनाकार लिखते समय अपनी भावाभिव्यक्ति जिन शब्दों के माध्यम से करता है, उसे उनका अर्थ-ग्रहण व्यवहार एवं अध्ययन आदि द्वारा इन्हीं साधनों से होता है और पाठक या समीक्षक के लिए भी शब्दार्थ के ग्रहण के साधन ये ही हैं। इन साधनों के प्रति लेखक, पाठक या समीक्षक जितना सजग होगा, उतना ही उसके लेखन और उसकी समझ में उत्कर्ष देखने को मिलेगा। क्योंकि भाषा के प्रति उसकी समझ उत्तम होगी।

यह लेख कुछ लम्बा जरूर हो गया है। पर आशा करता हूँ कि यह पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। सभी पाठकों को आभार सहित ये विचार समर्पित हैं।

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गुरुवार, 30 जून 2011

अर्थान्वेषण-3 - अनेकार्थी शब्दों का अर्थ-निर्णय

आँच-75

अर्थान्वेषण-3

अनेकार्थी शब्दों का अर्थ-निर्णय

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में संकेतग्रह या शब्दों के अर्थ-ग्रहण के साधनों पर चर्चा की गयी थी। यह हम सभी जानते हैं कि ऐसे शब्दों की संख्या काफी अधिक है जिनके कई अर्थ होते हैं, यथा- राम शब्द के अर्थः सुहावना, सुन्दर, प्रिय, काला, श्वेत, परशुराम, बलराम, दशरथ पुत्र राम आदि। इसी प्रकार हरि शब्द के अनेक अर्थ हैं- यम, अनिल, चन्द्रमा, सूर्य, विष्णु, कृष्ण, सिंह, रश्मि, घोड़ा, तोता, सर्प, बन्दर, मेढक। ऐसी स्थिति में इन शब्दों का एक अर्थ में निर्णय कैसे किया जाय, इसी प्रश्न पर इस अंक में भारतीय दृष्टि या अर्थविज्ञान की दृष्टि से विचार करना अभीष्ट है।

वैसे यह बात अवश्य है कि इस सम्बन्ध में जो भारतीय दृष्टिकोण है उससे आधुनिक भाषाविज्ञान लगभग पूरी तरह से सहमत है और इसके लिए आचार्य भर्तृहरि द्वारा प्रणीत वाक्यपदीय (जो एक व्याकरण का ग्रंथ है, पर इसे व्याकरण दर्शन (philosophy of grammar) भी कह सकते हैं) से दो कारिकाएँ दी जा रही हैं, जिनमें यह बताया गया है कि अनेकार्थक शब्दों का एक अर्थ या अभीष्ट अर्थ में निर्णय कैसे किया जाता है, अर्थात् इसके साधन क्या हैं-

संयोगो विप्रयोगश्च साहचर्यं विरोधिता।

अर्थः प्रकरणं लिङ्गं शब्दस्यान्यस्य सन्निधिः।।

सामर्थ्यमौचिती देशः कालो व्यक्तिः स्वरादयः।

शब्दार्थस्यानवच्छेदे विशेषस्मृतिहेतवः।।

अर्थात् अनेकार्थक शब्दों के अर्थ का निर्णय न होने पर संयोग, विप्रयोग (वियोग), साहचर्य, विरोध, अर्थ, प्रकरण, लिंग, अन्य शब्द की सन्निधि (सान्निध्य), सामर्थ्य, औचित्य, देश, काल, व्यक्ति और स्वर आदि की सहायता से अनेकार्थी शब्दों का अर्थ-निर्णय किया जाता है। इन सभी बिन्दुओं पर एक-एक कर चर्चा करते हैं-

1. संयोग –किसी सम्बन्ध विशेष के आधार पर अनेकार्थक शब्दों के अर्थ का निर्णय किया जाता है। जैसे- नेहरू जी भारत के प्रधानमंत्री थे। यहाँ प्रधानमंत्री पद के संयोग से नेहरू शब्द का अर्थ पं. जवाहरलाल नेहरू लिया जाएगा, अरुण नेहरू या अन्य नहीं।

2. विप्रयोग (वियोग)- संयोग और विप्रयोग दोनों में बड़ा ही सूक्ष्म अन्तर है। अर्थात् सम्बन्ध विशेष के अभाव में या उसके विप्रयोग (वियोग) से अनेकार्थक शब्दों के अर्थ का निर्णय करने में सहायक होता है। यदि उक्त वाक्य को ही थोड़ा परिवर्तन के साथ उदाहरण के रूप में लें- नेहरू जी प्रधानमंत्री नहीं रहे, तो यहाँ प्रधानमंत्री शब्द के विप्रयोग या वियोग के कारण ही नेहरू शब्द का अर्थ पं.जवाहरलाल नेहरू लिया जाएगा।

3. साहचर्य- विख्यात साहचर्य के कारण भी अनेकार्थी शब्दों के अर्थ का निर्णय होता है, यथा- राम और लक्ष्मण में लक्ष्मण के साहचर्य के कारण राम शब्द का अर्थ दशरथ पुत्र राम होगा, बलराम, परशुराम अथवा अन्य नहीं और लक्ष्मण शब्द का अर्थ दशरथ पुत्र लक्ष्मण होगा, दुर्योधन का पुत्र लक्ष्मण नहीं। इसी प्रकार अन्य अनेकार्थी शब्दों के अर्थ-निर्णय की बात भी समझनी चाहिए।

4. विरोध- साहचर्य और विरोध दोनों लगभग एक से हैं। साहचर्य में प्रसिद्ध सकारात्मक सम्बन्ध को आधार माना गया है। जबकि विरोध में विरोधी सम्बन्ध के कारण अनेकार्थी शब्द के अर्थ का नियमन होता है, यथा राम और रावण में राम और रावण के बीच विरोधात्मक सम्बन्ध होने के कारण राम शब्द का अर्थ दशरथ-पुत्र राम के अर्थ में नियमित होता है। जबकि राम और लक्ष्मण में भ्रातृ-साहचर्य के कारण।

5. अर्थ- यहाँ अर्थ शब्द प्रयोजन के लिए प्रयुक्त हुआ है। कहने का तात्पर्य यह कि अनेकार्थी शब्द के जिस अर्थ से प्रयोजन की सिद्धि हो वह अर्थ अभीष्ट माना जाता है। जैसे- मोक्ष के लिए हरि का भजन करना चाहिए। यहाँ हरि का अर्थ मेढक, सर्प, बन्दर, घोड़ा, सूर्य, चन्द्रमा आदि न लेकर विष्णु लेने से ही मोक्ष का प्रयोजन सिद्ध होता है।

6. प्रकरण- यहाँ प्रकरण शब्द प्रसंग का वाचक है। प्रकरण या प्रसंग अनेकार्थी शब्द का अर्थ नियमन का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। यथा- प्रसंगानुसार घंटी शब्द के अर्थ लिए जा सकते हैं। उसके दिमाग की घंटी अब बजी है। यहाँ प्रसंग के कारम घंटी का अर्थ समझ हुआ। किन्तु- लंच की घंटी हो गयी। यहाँ घंटी का अर्थ प्रसंग के अनुसार समय होगा।

7. लिंग- इसका अर्थ स्त्रीलिंग या पुलिंग न लेकर चिह्न लिया जाता है। जैसे- गरजि तरजि बरसे घनश्याम। यहाँ गर्जन-तर्जन चिह्न के कारण का अर्थ बादल होगा, कृष्ण नहीं।

8. अन्य शब्द का सान्निध्य- किसी शब्द विशेष की सन्निधि के कारण भी अनेकार्थी शब्द एक अर्थ में नियंत्रित होता है। जैसे- चाचा नेहरू में चाचा शब्द की सन्निधि के कारण नेहरू शब्द पं. जवाहरलाल नेहरू का ही वाचक होगा किसी अन्य नेहरू के लिए नहीं।

9. सामर्थ्य- जब किसी कार्य के निष्पादन में किसी की सामर्थ्य का प्रयोग हो, तो अनेकार्थी शब्द का एक अर्थ में नियमन हो जाता है। यथा- चरन कमल बंदौं हरि राई। जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै अंधे को सब कछु दरसाई। यहाँ हरि शब्द कृष्ण (विष्णु) के अर्थ में नियंत्रित होता है, क्योंकि उन्हीं की कृपा में लंगड़े को पर्वत पार कराने और अंधे को देखने की क्षमता प्रदान करने की सामर्थ्य है।

10. औचित्य- यहाँ औचित्य का अर्थ योग्यता समझना चाहिए। औचित्य या योग्यता से भी अनेकार्थी शब्द का अर्थ-नियमन होता है। जैसे- संस्कार से व्यक्ति द्विज बनता है। यहाँ द्विज का अर्थ न तो दाँत होगा और न ही पक्षी, क्योंकि संस्कार से द्विज बनने की योग्यता इनमें नहीं है। अतएव यहाँ द्विज का अर्थ ब्राह्मण होगा। क्योंकि उसमें संस्कार ग्रहण करने की योग्यता है।

11. देश- किसी स्थान विशेष के कारण अनेकार्थक शब्द के अर्थ का निर्णय किया जाता है। जैसे- खेलन हरि निकसे ब्रजखोरी। यहाँ ब्रजखोरी (ब्रज की गलियाँ) स्थान विशेष के कारण हरि शब्द का अर्थ कृष्ण में निर्णीत होता है।

12. काल- समय से भी अनेकार्थक शब्द का अर्थ-नियमन होता है। जैसे- कोयल मधु से मत्त हो रहा है। यहाँ मधु शब्द का अर्थ वसन्त होगा, क्योंकि कोयल का मत्त होना वसन्त में ही पाया जाता है।

13. व्यक्ति- यहाँ व्यक्ति का अर्थ स्त्रीलिंग, पुलिंग समझना चाहिए। स्त्रीलिंग, पुलिंग से भी अनेकार्थी शब्द का नियमन होता है। जैसे- मेरे पास रामायण की हिन्दी टीका उपलब्ध है। यहाँ पर टीका शब्द का स्त्रीलिंग में प्रयोग होने के कारण इसका अर्थ व्याख्या (commentary) होगा। इसी प्रकार माथे पर कुंकुम का टीका अच्छा लग रहा है में टीका शब्द पुलिंग में प्रयुक्त होने से इसका अर्थ तिलक होगा।

14. स्वर- स्वर के आरोह-अवरोह से भी अनेकार्थक शब्द का अर्थ निर्णय किया जाता है। वैसे प्राचीन विद्वान वेदों में ही स्वरों के उदात्त, अनुदात्त आदि के प्रयोग भेद को अर्थनियामक मानते हैं। लेकिन इसका प्रभाव प्रायः सभी भाषाओं में देखा जाता है। जैसे- तुम आ गये। इस वाक्य में स्वर-भेद (आरोह-अवरोह/stress or/and accent) के प्रयोग द्वारा आश्चर्य, घृणा, भय, क्रोध, निराशा आदि अर्थ की प्रतीति होती है। पर किसी विशेष ढंग से स्वर के आरोहण-अवरोहण के प्रयोग द्वारा किसी एक अर्थ में इसका नियमन किया जा सकता है।

अनेकार्थी शब्दों के नियामक (साधन) उक्त साधनों के अतिरिक्त और भी हो सकते हैं, ऐसा आचार्य पुण्यराज का मानना है। इन कारिकाओं की टीका करते समय वे लिखते हैं कि समझाने के लिए आचार्य भर्तृहरि ने केवल इन चौदह साधनों को दिया है। इनके अलावा अन्य साधनों को भी आचार्य पुण्यराज ने दिया है। कभी अवसर मिलने पर उनकी चर्चा होगी।

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