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गुरुवार, 23 जून 2011

आलोचना और आलोचना-धर्मिता

आँच – 74

आलोचना और आलोचना-धर्मिता

अर्थान्वेषण-2

आचार्य परशुराम राय

आँच के पिछले अंक में अर्थान्वेषण पर एक परिचयात्मक चर्चा हुई थी। इस अंक में इसी विषय पर थोड़ी और विस्तार से चर्चा करना अभीष्ट है। वैसे भारतीय काव्यशास्त्र शृंखला के अन्तर्गत काफी विस्तृत रूप से इसपर चर्चा की जा रही है, लेकिन वहाँ संस्कृत-मूलक चर्चा होने के कारण उन लोगों के लिए वह शृंखला थोड़ी जटिल हो जाती है, जिनका काव्यशास्त्र से परिचय नहीं है। अतएव यहाँ अर्थवैज्ञानिक (भाषाविज्ञान की एक शाखा) दृष्टि से विचार करते हैं। वैसे भारतीय परम्परा में शब्द-बोध का विवेचन व्याकरण, न्याय और मीमांसा में विशेष रूप से किया गया है। व्याकरण में शब्द या पद का विवेचन किया गया है। इसलिए इसे पदशास्त्र या शब्दशास्त्र कहा जाता है। न्याय में प्रमाणों का विशेषरूप से विवेचन किया गया है। यही कारण है कि इसे प्रमाणशास्त्र भी कहा जाता है। वाक्यार्थ शैली का विवेचन मीमांसा में किया गया है और इसीलिए इसे वाक्य-शास्त्र भी कहा जाता है।

अर्थ की प्रतीति के दो मार्ग माने जाते हैं- आत्मानुभव (अपने अनुभव) से और पर-अनुभव अर्थात् दूसरों के अनुभव से। जैसे हम जिस स्थान, देश या समाज में रहते हैं, उसके अनेक सरोकारों को हम स्वयं अनुभव करते हैं। इसमें निश्चित रूप से हमारे अपने दृष्टिकोण का प्रभाव रहता है। मिठाई के मिठास को हम अपने अनुभव से ही हृदयंगम करते हैं। या कोई कहता है- आम खट्टा है, तो खट्टा का अर्थ हम अपने अनुभव से ही होता है। इसी प्रकार किसी ऐसे देश के रीति-रिवाज, खान-पान आदि के विषय में, जहाँ हमने जाकर नहीं देखा है, दूसरों के अनुभव से समझते हैं। ऐसे ही मिसाइल सभी ने नहीं देखा है, अतएव इस शब्द का अर्थ हम दूसरों के अनुभव से प्राप्त करते हैं।

अर्थ-बोध के कई साधन हैं। यहाँ प्रमुख साधनों को लेकर चर्चा की जा रही है- व्यवहार, कोश, व्याकरण, प्रकरण या वाक्य-शेष, विवृति या व्याख्या, उपमान, आप्तवाक्य, ज्ञात का सान्निध्य, बलाघात, सुरलहर, अनुवाद आदि। इसे संकेतग्रह या शक्तिग्रह कहा जाता है। इसका तात्पर्य शब्द के अर्थ का ग्रहण करना है-

शक्तिग्रहं व्याकरणोपमानकोशाप्तवाक्याद् व्यवहारतश्च।

वाक्यस्य शेषाद् विवृतेर्वदन्ति सान्निध्यतः सिद्धपदस्य वृद्धाः।।

इस कारिका में उल्लिखित अर्थ-ग्रहण के साधन उपर्युक्त अनुच्छेद (पैराग्राफ) में बताए प्रथम आठ हैं। आधुनिक भाषाविज्ञान आज के बदलते सन्दर्भों में इन आठ के अतिरिक्त अर्थ ग्रहण के कुछ अन्य साधन भी मानते हैं, जिनका उल्लेख किया जा चुका है, यथा- बलाघात, सुरलहर, अनुवाद आदि।

व्यवहार निस्सन्देह अर्थबोध का प्रमुख साधन है। समाज में प्रयुक्त भाषा के शब्दों का अर्थ-बोध हमें व्यवहार से ही होता है। यहाँ तक कि अनपढ़ व्यक्ति भी भाषा का प्रयोग व्यवहार से ही सीखता है। अर्थ-बोध का दूसरा साधन शब्दकोश (Dictionary) है। कोश से हम अज्ञात शब्द का अर्थबोध उसमें दिए ज्ञात शब्दों से होता है। इसके बाद तीसरा अर्थबोध का साधन व्याकरण है। व्याकरण अर्थबोध में किस प्रकार सहायक होता है, यह विचारणीय प्रश्न है। किसी भी भाषा में वर्णों, शब्दों आदि के वर्गीकरण विभिन्न शब्दों का रूप निर्धारण, उनके प्रयोग का विधान आदि व्याकरण के क्षेत्र में आते हैं। एक ही शब्द विभिन्न प्रत्ययों, उपसर्गों आदि के लगने के बाद उसके अर्थ की दिशा में परिवर्तन हो जाता है। जैसे- वह् धातु (मूल क्रिया) से कई शब्द निष्पन्न होते हैं- वहन, वाहन, वाहक, वाहिका, प्रवाह, प्रवाहित, विवाह आदि। इस प्रकार व्याकरण अर्थबोध में हमारा सहायक होता है।

अगला साधन प्रकरण या वाक्य-शेष है। हम सभी इस बात से सहमत हैं कि एक शब्द के कई अर्थ होते हैं। लेकिन जब वाक्य में उसका प्रयोग होता है, तो उसके केवल एक अर्थ का ही ग्रहण होता है और वह एक वाक्य में प्रयोग होने के कारण सन्दर्भ से आता है। जैसे- धातु शब्द के कई अर्थ हैं- आयुर्वेद में शरीर के नियामक तत्त्व वात, पित्त और कफ; इसके अतिरिक्त रस, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा आदि; सोना, चाँदी, लोहा आदि खनिज; व्याकरण में मूल क्रिया शब्द आदि। लेकिन जब इनका प्रयोग होता है, तो सन्दर्भ से इस शब्द का अर्थ किसी एक अर्थ में नियत हो जाता है। यह साधन हमें इस प्रकार शब्द के अर्थ-बोध में सहायक होता है।

इसके बाद व्याख्या या विवृति भी शब्दार्थ-बोध का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। जैसे व्याकरण के अन्तर्गत वर्णों के वर्गीकरण करने वाले शब्द- स्वर, व्यंजन, प्राण, महाप्राण, घोष, अघोष आदि, दर्शन में प्रयुक्त- द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि, काव्यशास्त्र मे ध्वनि आदि। इसी प्रकार विज्ञान के विभिन्न पारिभाषिक शब्दों को भी समझने के लिए व्याख्या अपेक्षित है।

उपमान को भी शब्दार्थ-बोध का साधन बताया गया है। जैसे यदि हम कहें कि भेड़िया कुत्ते के समान होता है, तो यहाँ उपमान कुत्ते के द्वारा भेड़िया शब्द का अर्थबोध होता है कि भेड़िया कुत्ते की तरह कोई जानवर है। इसी प्रकार घोड़े और गधे से खच्चर आदि का अर्थबोध कराया जा सकता है।

ऋषियों, महात्माओं, सिद्धों, विद्वानों, महापुरुषों आदि के वाक्यों या वचन से भी अर्थबोध होता है, जिसे आधुनिक अर्थविज्ञान या प्राचीन भारतीय परम्परा में आप्तवाक्य के नाम से जाना जाता हैं। इस परम्परा में धार्मिक, दार्शनिक, यौगिक आदि ग्रन्थ मुख्य स्रोत माने जाते हैं। वैसे आप्तवाक्य या आप्तवचन का अर्थ विश्वसनीय वचन भी होता है और आस्थावान लोगों के लिए इस प्रकार के ग्रंथ प्रमाण के रूप हैं। स्वर्ग, नरक, धर्म, अधर्म, आत्मा, पुनर्जन्म आदि शब्दों का ज्ञान हमें ऐसे ही ग्रंथों से होता है।

ज्ञात शब्दों के साथ अज्ञात शब्दों के प्रयोग होने पर ज्ञात शब्दों सन्निधि के कारण भी कभी-कभी हमें अज्ञात शब्दों के अर्थ का बोध होता है। जैसे कहा जाय बगुले की गरदन से हंस की गरदन लम्बी होती है। बगुला को जानने वाला समझ जाता है कि हंस बगुला की तरह ही कोई पक्षी है। ज्ञात के सान्निध्य से भी अर्थ का बोध होता है।

इसी प्रकार बलाघात और स्वराघात से भी अर्थबोध होता है। बलाघात और स्वराघात में बहुत ही सूक्ष्म अन्तर है। अंग्रेजी में इन्हें क्रमशः stress और accent कहते हैं। बलाघात के द्वारा अर्थ-बोध के लिए एक उदाहरण लेते हैं- तुम कोलकाता जा रहे हो। तुम कोलकाता जा रहे हो। पहले में तुम पर बलाघात होने के कारण इसका अर्थ हुआ कि केवल तुम कोलकाता जा रहे हो, दूसरा नहीं। जबकि दूसरे में कोलकाता पर बलाघात होने के कारण इसका अर्थ हुआ कि तुम कोलकाता जा रहे हो, कहीं और नहीं। आप कानपुर आ गए? आप कानपुर आ गए! इन दोनों वाक्यों स्वराघात के कारण एक प्रश्न-सूचक वाक्य बन गया, तो दूसरा विस्मय-सूचक।

कुछ भाषावैज्ञानिक अनुवाद को अर्थबोध का साधन मानते हैं। यह केवल भाषान्तर के कारण तो कहा जा सकता है। लेकिन जब हम एक स्वतन्त्र भाषा की बात करते हैं, तो इसे स्वीकार करना अनुचित लगता है।

आज इसे यहीं समाप्त किया जा रहा है। यदि अवसर मिला तो भविष्य में इस विषय पर और चर्चा की जाएगी।

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गुरुवार, 26 मई 2011

आंच-70 :: आलोचना और आलोचना-धर्मिता

आलोचना और आलोचना-धर्मिता

आचार्य परशुराम राय

गत शनिवार को फुरसत में मेरे परमप्रिय मित्र श्री मनोज कुमार जी ने एक बहुत ही सशक्त प्रश्न उठाया था कि क्या पाठक का विकल्प आलोचक है। काफी पाठकों ने इस लेख को सराहा था। मुझे भी बहुत अच्छा लगा था। लेकिन इंटरनेट देवता के अप्रसन्न होने के कारण मैं सम्भवतः कोई टिप्पणी नहीं कर पाया। लेकिन लेख को पढ़कर लगा कि इस विषय पर अपनी थाती और विद्वज्जनों से समय-समय पर हुई चर्चाओं के आधार पर पुनः एकबार कुछ कहा-सुना जाए। इस ब्लाग पर आज समीक्षा के लिए नियत दिन भी है, हमारे बॉस की अनुमति भी है। इसलिए आज आलोचना और आलोचना धर्मिता पर मैंने चर्चा करने का मन बनाया है। देखता हूँ कि जो मैं कहना चाहता हूँ, वह उसी तरह कह पाता हूँ कि नहीं।

मिश्र-बन्धुओं से लेकर आजतक समय-समय पर हिन्दी आलोचना के कई मानदंड आए और उसमें से काफी तिरोहित हो गए। यदि यह कहा जाय कि अबतक हिन्दी आलोचना का कोई निश्चित मानदंड नहीं है, तो गलत नहीं होगा। आज की आलोचना पद्धति पाश्चात्य आलोचना की लगभग अनुकृति है। चाहे हम कितना भी दम्भ भरें, लेकिन इस सत्य से मुख नहीं मोड़ सकते। मेरा कहना यह कदापि नहीं है कि आधुनिक पाश्चात्य आलोचना पद्धति का अनुकरण करना गलत है। क्योंकि पाश्चात्य आलोचना के जो मानदंड सुकरात और अरस्तू ने निर्धारित किए थे, उन्हें पाश्चात्य जगत कब का नकार चुका है। आज उनके यहाँ भी आलोचना के निर्धारित मानदंड नहीं हैं। पर यह भी नहीं है कि वे बिलकुल निरंकुश हैं। भाषा और व्याकरण जैसा कुछ सम्बन्ध साहित्य और आलोचना का है। जैसे पहले भाषा अस्तित्व में आयी और उसमें अन्तर्निहित शब्द, पद, वाक्य आदि के अनुशासन को भाषाविदों ने निरीक्षण करके उन्हें संग्रहीत किया, जिसे हम व्याकरण के नाम से जानते हैं। कालान्तर में भाषा के प्रयोग में परिवर्तन होते रहे, जिसे हम भाषा-विज्ञान में भाषा का विकास कहते हैं। प्रयोग में प्रचलित होने के कारण भाषाविदों द्वारा उन्हें व्याकरण के अन्दर समाविष्ट किया गया। जैसे यदि हम द्विवेदी युग को देखें, तो देवता शब्द का विभिन्न विभक्तियों में बहुवचन देवतों लिखा जाता था। पर आज हम देवताओं प्रयोग करते हैं। इसी प्रकार भारतीय साहित्य और पाश्चात्य साहित्य में समय-समय पर लिखे जानेवाले साहित्य को समझने के लिए मानदंड बदलते रहे हैं। यही कारण है कि भारतीय काव्यशास्त्र में कई सम्प्रदायों और सिद्धान्तों का जन्म हुआ, यथा- अलंकार सम्प्रदाय, रीति सम्प्रदाय, रस सम्प्रदाय, ध्वनि सम्प्रदाय, वक्रोक्ति सम्प्रदाय और औचित्य सम्प्रदाय। इन सम्प्रदायों के अन्तर्गत प्रतिपादित सिद्धांतों की सीमा रेखा परवर्ती आचार्य खींचते रहे। इनपर चर्चा भारतीय काव्यशास्त्र स्तम्भ में की जा चुकी है। अतएव उन्हें संदर्भ के कारण संक्षेप में यहाँ लिया गया है। ये ही सिद्धांत संस्कृत साहित्य और हिन्दी साहित्य को परखने के लिए या उनका मूल्यांकन करने के लिए प्रयोग में आते रहे। किन्तु विदेशी संस्कृति के समागम के कारण अन्य विचार-धाराओं की तरह वहाँ के साहित्य और आलोचना के मानदंडों का भी आयात हुआ और भारतीय साहित्यिक मूल्यांकन की दृष्टि में बदलाव आया।

इसी प्रकार पाश्चात्य देशों में भी साहित्य को परखने के लिए समय-समय पर विभिन्न वादों और सिद्धांतों का अस्तित्व देखने में आता है, यथा- बिम्बवाद, प्रतीकवाद, अभिव्यंजनावाद, व्यावहारिक समीक्षा-सिद्धांत, वस्तुवादी मानदंड और भाववादी मानदंड। इनपर भी आँच के अंक-55 में चर्चा की जा चुकी है। वैसे बहुत से विदेशी समालोचकों को भारतीय काव्यशास्त्र ने भी आकर्षित किया और लगभग सभी प्रमुख काव्यशास्त्र के ग्रंथों पर अंग्रेजी भाषा में कमेंट्री लिखी गयी। कुल मिलाकर जिस प्रकार अन्य ज्ञान-विज्ञान, वाणिज्य आदि क्षेत्रों में आयात-निर्यात होता रहा है, उसी प्रकार साहित्यिक विचार-धाराओं का भी आयात-निर्यात हुआ। इसके प्रति असहिष्णु होने की आवश्यकता नहीं है। किसी विचार-धारा में यदि कोई उत्तम विचार-धारा है, तो उसे स्वीकार करने में किसी को असुविधा नहीं होनी चाहिए। इसका एक उदाहरण महाकवि कालिदास द्वारा विरचित कुमारसम्भव के एक आधे श्लोक पर एक अज्ञात कवि की आलोचना को देखें-

एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः

इस श्लोकार्ध का अर्थ है- एक दोष गुण के समूह में उसी प्रकार डूब जाता है जैसे चन्द्रमा की किरणों में उसकी कालिमा छिप जाती है। यह हिमालय के सन्दर्भ में कहा गया है कि हिमालय में शीतलता की अधिकता एक दोष है, पर उसमें इतने अधिक गुण हैं कि शीतलताधिक्य का एक अवगुण वैसे ही तिरोहित हो जाता है, जैसे चन्द्रमा की किरणों में उसकी कालिमा। पर एक अज्ञात कवि ने उलटकर ऐसी बात कही कि पाठक चमत्कृत हुए बिना नहीं रह सकता-

एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोरिति यो बभाषे।

न तेन दृष्टं कविना समस्तं दारिद्र्यदोषो गुणराशिहारी।।

अर्थात् एक दोष गुण के समूह में उसी प्रकार डूब जाता है जैसे चन्द्रमा की किरणों में उसकी कालिमा, ऐसा जिस कवि ने कहा उसने ठीक से देखा नहीं। क्योंकि दरिद्रता एक ऐसा दोष है जो गुणों के समूह को निगल जाता है। और मैं समझता हूँ कि महाकवि कालिदास भले ही कविकुल-गुरु हों, महान हों, लेकिन प्रस्तुत सन्दर्भ में बिना किसी पूर्वाग्रह के इस अज्ञात कवि की बात स्वीकार करने में किसी को कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

यदि हम थोड़ा प्राचीन ग्रंथों पर ध्यान देते हैं तो पाते हैं कि बहुत से अर्वाचीन कवियों ने कथानक में परिवर्तन किया है। जैसे महाकवि तुलसीदास जी ने रामकथा के अपने वर्णन मे कई परिवर्तन किए हैं, यथा सीता-हरण के सन्दर्भ में लक्ष्मण जी रेखा खींचकर कहते हैं कि वे किसी भी हालत में उस रेखा को लाँघकर बाहर न जायँ। जबकि महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं कि रावण के आने पर माता सीता रावण का आतिथ्य-सत्कार करती हैं और कहती हैं कि आप विश्राम करें, मेरे स्वामी और भी बहुत से खाद्य पदार्थ लेकर आ रहे होंगे।

यहाँ यह द्रष्टव्य है कि महाकवि तुलसीदास जी द्वारा किए गए परिवर्तन के कई कारण हो सकते हैं। साधनागत आध्यात्मिक कारण भी हो सकते हैं या सामाजिक कारण, यथा साधुवेश में ठगी का प्रचलन अधिक बढ़ जाने के कारण लोगों को सजग होने की ओर संकेत के उद्देश्य से परिवर्तन करने की आवश्यकता महसूस की गयी हो। इसी प्रकार रश्मिरथी में “दिनकर” ने भी महाभारत के मूल कथानक में परिवर्तन किया है। महाकवि कालिदास ने अपने नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् में भी इसी प्रकार का परिवर्तन किया है। यहाँ इन बातों का उल्लेख करने का उद्देश्य यह है कि चाहे पाठक हो या समीक्षक हो, किसी रचना का अध्ययन करते समय बहुत सारे तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए। समीक्षक या आलोचक किसी पाठक का विकल्प नहीं है। लेकिन आलोचक यदि समर्थ और तटस्थ है तो पाठक को एक रचना को समझने में सहायक अवश्य हो सकता हैरामचरितमानस के जितने पाठक हैं, उनमें से कितने ऐसे हैं जो तुलसीदास जी द्वारा कथित मानस के रहस्यों को समझ पाते हैं। अनेक व्यास उसपर प्रवचन करते आ रहे हैं। लोग उन्हें सुनते हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि व्यासों के अभाव में भी जनगण मानस का पाठ करता है और अपनी समझ के अनुसार उसे समझता है। रामचरितमानस का उदाहरण इसलिए लिया गया है कि हिन्दी साहित्य का ऐसा कोई भी दूसरा ग्रंथ नहीं है कि जिसे पढ़नेवालों की संख्या इतनी बड़ी हो।

आलोचना और आलोचना-धर्मिता पर कुछ कहने के पहले यह जानना आवश्यक है कि कवि के लिए क्या आवश्यक है। कवि की रचना उत्तम कैसे बनती है। इस सन्दर्भ में महादेवी जी की एक बात याद आती है- जिस रचना में यथार्थ और आदर्श की दूरी को जितनी कम हो वह उतनी ही महान रचना होगी और उसका रचयिता महान रचनाकार। एक रचनाकार के लिए क्या जानना आवश्यक है, इस पर संक्षेप में चर्चा कर लेते हैं। महान काव्यशास्त्री आचार्य मम्मट द्वारा उल्लेख किए गए तथ्य इस सन्दर्भ में काफी प्रासंगिक हैं-

कवि में अन्तर्निहित प्रतिभा (शक्ति), लोक-व्यवहार का ज्ञान, शास्त्र तथा काव्य आदि के पर्यालोचन से उत्पन्न निपुणता और काव्यज्ञ गुरु की शिक्षा के अनुसार काव्य-रचना का अभ्यास ये तीनों मिलकर काव्य के विकास का एक कारण है

लोक-व्यवहार का यहाँ तात्पर्य है स्थावर, जंगम जगत के व्यवहार का ज्ञान, शास्त्र का अर्थ- छन्द, व्याकरण, शब्दकोश (अमरकोश आदि), कला (चौंसठ कलाएँ), चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) को प्रतिपादित करनेवाले ग्रंथों, शालिहोत्र आदि द्वारा विरचित पशु-पक्षियों के लक्षणों को प्रतिपादित करनेवाले ग्रंथों, पुराणेतिहास आदि ग्रंथों का समुचित अध्ययन या उन विषयों का ज्ञान। तो यह निश्चित है कि आलोचक या समीक्षक को भी इन विषयों का ज्ञान होना आवश्यक है। तभी वह काव्य की वास्तविक भावभूमि पर जाकर काव्य को हृदयंगम कर सकता है, उसके मर्म को जान सकता है तथा उसपर उचित और तटस्थ विचार दे सकता है, चाहे समीक्षा के रूप में या किसी अन्य रूप में।

ब्लाग-जगत में लिखी जाने वाली अधिकांश ललित रचनाओं में यह देखने को मिलता है कि लोग उतने सजग नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर यहाँ एक बात कहना चाहूँगा- एक ब्लाग पर एक कविता कभी पढ़ी थी। कविता बहुत अच्छी थी। कवि का नाम और कविता का शीर्षक मुझे याद नहीं है। उसमें उन्होंने टेबुल पर पड़ी फाइलों से चेहरे पर उदासी (कुछ और भी हो सकता है) टपकने का उल्लेख किया था। अब ध्यान देने की बात है कि टपकना ऊपर से नीचे की ओर होता है, न कि नीचे से ऊपर की ओर। दूसरी बात ध्यान देने की है कि उदासी टपकती नहीं है, बल्कि पसरती है। इसी प्रकार एक ब्लाग पर एक कविता में कवि ने विहग शब्द प्रयोग किया है। उस पर एक अत्यन्त सजग पाठक ने तमाम व्याकरणगत दोषों (टंकणगत त्रुटियों) की ओर संकेत करते हुए टिप्पणी की है कि विहग के स्थान पर विहंग होना चाहिए। जबकि विहग और विहंग दोनों तत्सम शब्द हैं और सही हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि चाहे रचनाकार हो, पाठक हो या आलोचक हो, उनके अध्ययन का विस्तार निरन्तर होना चाहिए। तभी रचनाकार उत्तम रचना कर सकता है और आलोचक रचना की सर्वांगीण समीक्षा कर सकता है। एक पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति न तो अच्छा रचनाकार बन सकता है और न ही आलोचक।

इस निबन्ध में ब्लाग-जगत के जिन रचनाकारों और टिप्पणीकारों का उल्लेख किया गया है, इस अनुरोध के साथ मैं उनसे हृदय से आभार सहित क्षमा-याचना करता हूँ कि वे इसे अन्यथा न लें ।

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शनिवार, 21 मई 2011

फ़ुरसत में … क्या पाठक का विकल्प आलोचक है?

फ़ुरसत में

क्या पाठक का विकल्प आलोचक है?

IMG_0130_thumb[1]मनोज कुमार

आज के “फ़ुरसत में ...” स्तम्भ में हमें ऊटी भ्रमण को आगे ले जाना था। किन्तु कुछ रुककर हमने इस विषय को उठाना बेहतर समझा। कुछ दिनों पूर्व मैंने एक कविता की समीक्षा इस ब्लॉग पर की थी तो हमारे एक ब्लॉगर मित्र ने कहा कि समीक्षा में गुण दोष की चर्चा ज़रूरी है, सिर्फ़ बड़ाई कर देने से समीक्षा पूरी नहीं होती। फिर एक वाकया हुआ, एक समीक्षा पढ़ी। दोष, ही दोष गिनाए गए थे। मुझे वह कुछ एक पक्षीय लगा। इसी सप्ताह हमारे मित्र हरीश जी ने अपनी एक समीक्षा का समापन इन शब्दों के साथ किया “.. कवि की कलम से एक सुघढ़ नवगीत का रसास्वादन करने को मिला है जिसमें दोष-दर्शन अति दुष्कर कार्य है”।

कई बार देखता हूं कि समीक्षक प्रशंसा-निंदा के आगे कम ही बढते हैं। इसलिए विश्वसनीयता कम होती जा रही है। कुछ हद तक सनसनीख़ेज़ पत्रकारिता के समान! दलबंदी और गुटबंदी आम बात है। ये एक पक्ष है। एक और पक्ष है जिसे मैं देखता हूं। वह यह कि आज कविताओं, पुस्तकों, संग्रहों आदि को पढ़ने वाले पाठकों की कमी होती जा रही है। इसलिए आलोचक या समीक्षक का, मुझे लगता है, यह प्रयास हो कि वे पाठकों को पुस्तक या कृति पढ़ने के लिए आकर्षित करे, न कि उसे बिदका ही दे।

एक उदाहरण देकर मूल विषय पर आऊँगा। आपने सैकड़ों तस्वीरें देखी होंगी, किस्से सुने होंगे कलकत्ते के, हावड़ा स्टेशन के। हो सकता है उन्होंने आपको ज़्यादा प्रोत्साहित न किया हो इस शहर, इस स्टेशन को देखने के लिए। आइए, इस कैमरे की आँख से देखिए इस स्टेशन को। जी, हावड़ा स्टेशन को … मन करेगा अभी पहुँच जाएं इसे देखने .. सजीव, अपनी आँखों से। मैं समीक्षा में इसी कैमरे की आँख से देखता हूँ, देखना चाहता हूँ (शायद मैं ग़लत हो‍ऊँ, शायद न भी)।

image009image008

image010 (1)हावड़ा पुल कैमरे की आँख से देखना अच्छा लग सकता है। प्रत्यक्ष आँखों से देखने में लोहे के भारी-भारी स्तम्भ, धूल, भीड़, यातायात का शोर-शराबा उबाऊ हो और रूक्ष हो सकता है। एक इंजीनियर के लिए यह चमत्कार पूर्ण है। सभी अपनी दृष्टि से सही हैं। पर, सबसे आश्चर्यजनक यह है कि यह पुल मात्र दो स्तम्भों पर सैकड़ों वर्षों से टिका है।

काव्‍य शास्‍त्र की परम्परा काफी पहले से चली आ रही है। पर, आलोचना का एक शास्‍त्र के रूप में उद्भव और विकास काफी बाद में हुआ। बल्कि यूँ कहें कि आलोचना साहित्‍य का शास्‍त्र न होकर साहित्‍य सृजन का वह जीवन है जो बार बार सृजित किया जाता है - ज्‍यादा उपयुक्‍त होगा।

काव्‍यशास्‍त्र में तो सिद्धांतों और प्रतिमानों का निरूपण होता है। आलोचना में उन्‍हीं सिद्धांतों के प्रकाश में रचना की परख की जाती है और उसका मूल्‍यांकन किया जाता है। कुछ सृजन, जिसे “नया” भी कह सकते हैं, आलोचना के स्‍थापित या स्‍वीकृत प्रतिमानों को चुनौती देते हैं। तब आलोचना करने वाले इस नए सृजन के मूल्‍यांकन के लिए नए प्रतिमानों की तलाश करते हैं। यह एक व्‍यावहारिक प्रक्रिया है, जो चलती रहती है - सिद्धांतों और सृजन के बीच। यही प्रक्रिया सिद्धांतों और सृजन के संबंधों में बदलाव के चक्र को गतिमान भी रखती है।

संस्‍कृत काव्‍यशास्‍त्र, रीतिशास्‍त्र और पश्चिमी काव्‍यशास्‍त्र का विवेचन प्रधानतः सिद्धांत परक है। आलोचना की टकराहट शास्‍त्र से कम, नवीन सृजन, नवीन विचारधाराओं से और वैचारिक सरोकारों से अधिक रही है। हिंदी आलोचना को वैचारिक स्‍वरूप आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल ने दिया। वे हिंदी के प्रथम व्यवस्थित आलोचक थे। वे आलोचना को सिद्धांत, इतिहास, दर्शन, व्यवहार सब में आचरित करते हैं।

साहित्‍य की अनेक विधाएं है। विधाएं तो नाड़ियों की तरह हैं। इनके भीतर विचारों का रक्‍त प्रवाहित होता है। साहित्य की विधाओं पर विचार करने का विशेष काम आलोचना करती है। जहां पद्य में भाव की प्रधानता होती है वहीं गद्य की विधाओं में विचार की प्रधानता होती है।

परिवेश और युग की प्रेरणा से सृजनात्‍मक मानसिकता में परिवर्तन आते हैं। इसका प्रभाव साहित्य की विधाओं पर भी पड़ता है। हर युग की मानसिकता विभिन्‍न विधाओं में प्रकट होती है। सभी विधाएं लोकमानस के विचारों को प्रतिबिम्‍बित करती हैं।

भारतेन्दु युग में हिंदी आलोचना का सूत्रपात पत्र-पत्रिकाओं में छपी व्यावहारिक समीक्षाओं से हुआ। सर्जक-चिंतक के रूप में भारतेन्दु जी ने आलोचना को दिशा प्रदान की। भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग में आलोचना के सरोकार सामाजिक होते गए। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिंदी आलोचना को दिशा और दृष्टि प्रदान की। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा है, कविता का उद्देश्य हृदय को लोक-सामान्य की भावभूमि पर पहुंचा देना है। यानी व्यक्ति धर्म के स्थान के पर लोक-धर्म श्रेयस्कर है। अर्थात्, साहित्य में जीवन और जीवन में साहित्य प्रतिष्ठित हो। इस तरह से जो समीक्षा होती है वह व्यावहारिक समीक्षा है। भाव मन की वेगयुक्त अवस्था-विशेष है। भाव में बोध, अनुभूति और प्रवृत्ति तीनों मौज़ूद हैं। यही वह आधार है जिस पर आचार्य शुक्ल काव्य में लोक-मंगल के आदर्श की प्रतिष्ठा करते हैं। इस प्रकार सृजन सामाजिक चेतना के उत्तरदायित्व से युक्त होना चाहिए।

शुक्लजी ने समीक्षा-सिद्धांत रचनाओं के आधार पर स्थापित किए हैं। अतः उनकी सैद्धांतिक और व्यावहारिक समीक्षा में संगति है। वे व्यवहार से सिद्धांत पर पहुंचते हैं। वे आधुनिक और वैज्ञानिक समीक्षक हैं।

समीक्षक के लिए सहृदय होना बहुत ज़रूरी है। समीक्षक को आलोच्य रचना या कृति के उत्कृष्ट स्थल की पहचान कर उसको प्रमुखता देना चाहिए। साथ ही वह रचना की युगानुकूल भी व्याख्या करे।

आचार्य शुक्ल ने हिंदी आलोचना को जो प्रौढता प्रदान की थी, उसे आगे ले जाने और दिशा परिवर्तन का चुनौती पूर्ण कार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, हजारी प्रसाद द्विवेदी और डॉ. नगेन्द्र ने किया। शुक्ल जी की नैतिक और बौद्धिक दृष्टि की अपेक्षा नये समीक्षकों ने सौंदर्य-अनुभूति और कला-प्रधान दृष्टि को अपनाया। उन्होंने काव्य सौष्ठव को सर्वोपरि महत्त्व दिया। वे साहित्य से अलग किसी मूल्य को मूल्यांकन के लिए निर्णायक स्थिति में रखने के पक्षधर नहीं थे।

द्विवेदी जी का मानना था कि मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है। वे सांस्कृतिक निरंतरता और अखंडता के समर्थक थे। उनका दृष्टिकोण मानवतावादी था। उन्होंने सामयिक आधुनिक प्रश्नों पर पूरा ध्यान दिया।

डॉ. नगेन्द्र का दृष्टिकोण व्यक्तिवादी था। डॉ. नगेन्द्र ने शुरु में व्यवाहारिक आलोचना की। बाद में वे भी सिद्धांत-विवेचन करने लगे। उनकी आलोचनाओं में खंडन-मंडन नहीं बल्कि व्याख्या-विश्लेषण और अनुशंसा ही अधिक है।

1936 से हिंदी साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन की शुरुआत हो गई थी। कुछ समय बाद रचनात्मक प्रयोगशीलता के उदाहरण भी दिखाई देने लगे। शुरु में आलोचना की शब्दावलि मूल्य केन्द्रित रही। मार्क्सवाद के आयात करने पर साम्यवादी दृष्टिकोण की बात प्रमुख हो गई।

शुक्‍लोत्तर आलोचना के प्रमुख और महत्‍वपूर्ण स्‍तम्‍भ हैं डॉ. रामविलास शर्मा। रामविलास शर्मा तक आते-आते प्रगतिशील आलोचना का जातीय चरित्र निर्मित हो गया। उनका मानना था, साहित्य भी शुद्ध विचारधारा का रूप नहीं है, उसका भावों और इन्द्रिय-बोध से घनिष्ठ संबंध है। उन्होंने शुक्ल जी की विरासत और जनवादी परंपरा को आगे बढाया।

पचास के बाद की आलोचना से पश्चिमोन्मुखता की शिकायत अक्सर की जाती रही है। आलोचना में पश्चिमी सरोकारों और अवधारणा के आयात का एक कारण यह भी था कि स्वयं रचनाओं में भी यह प्रभाव कम नहीं रहा। दरअसल यह आयातित विचार से ज़्यादा आयातित बौद्धिक मुद्रा थी। आलोचकों में नामवर सिंह और रचनाकारों में अज्ञेय ने यह प्रभाव बख़ूबी अपना लिया।

समकालीन आलोचना में एक नयी पीढी नए तेवर के साथ आई। इनके मुहावरे नए थे। इनमें यथार्थ दृष्टि का आग्रह भी प्रबल था। समकालीन आलोचक वास्तविक मूल्यांकन की कुंजी आलोच्य कृति के भीतर तलाशते हैं। उनके अनुसार रचना से रचनाकर तक पहुंचना समीक्षक का लक्ष्य होना चाहिए। इस दौर में एक तरफ़ मलयज की निर्मम तटस्थता है तो दूसरी ओर रमेशचंद्र शाह की सर्जनात्मक समीक्षा है। मलयज न फ़तवे देते हैं, न नारे उछालते हैं। पूरी संवेदनशीलता और अलोचनात्मक विवेक से सही जगह उंगली रख देते हैं। शाह रचनाकार की सृजन प्रक्रिया का आत्मीय विश्लेषण ज़रूरी समझते थे।

वर्तमान हिंदी आलोचना अनेक प्रकार की विसंगतियों से घिर गई है। यह जागरूकता तो निभाती रही है, पर समसामयिकता का आग्रह अधिक प्रबल हो गया है। आज की आलोचना में व्यापक परिदृश्य बोध का स्पष्ट अभाव दिखता है। पम्परा से संबंध विच्छेद हो गया सा लगता है। अधिकांश आलोचना कर्म व्यवहारिक समीक्षा के रूप में है। जमाओ-उखाड़ो की नीयत से अतिरंजित शब्दावलि लिए यह प्रशंसा-निंदा के आगे कम ही बढता है। इसीलिए विश्वसनीयता कम होती जा रही हैआज की आलोचना सनसनीख़ेज़ पत्रकारिता के समान हो गई है। लगता है न आलोचकों को रचनात्मक साहित्य की चिंता है और न रचनाकारों को उनकी परवाह। आलोचना की भाषा का कोई निश्चित चरित्र नहीं बन पाया है। मूल्यांकन में पाद्धतियों की दृष्टि से भी पर्याप्त आराजकता है। मूल्यांकन के मानदंडों में विविधता है।

आज देश में जैसा परिदृश्य है साहित्य में भी उसी के अनुरूप परिवर्तन आया है। यथा सत्ता की उठापटक, भ्रष्टाचार, आर्थिक संकट, भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद आदि से संस्कृति, कला और साहित्य भी प्रभावित हुए हैं।

पाठक का विकल्प आलोचक नहीं है। जागरूक पाठक अपना विमर्श खुद तैयार करता है। सृजन और आलोचना दोनों में समीक्षा का अर्थ बदल गया है। विरोध आम बात हो गई है। जहां एक ओर सृजन के नाम पर सतही रचनाएं आ रहीं हैं, वहीं दूसरी तरफ़ आलोचना के नाम पर या तो दलबंदी हो रही है या पत्थरबाज़ी। लगता है वैचारिक संवेदना दिशाहीन हो गई है। साहित्य को परखने की कसौटी मत, वादों के हिचकोले खा रही है।

अतएव, समीक्षा, समालोचना या आलोचना साहित्य को समग्र रूप से परखने की विधि है, जिसमें काव्य के सभी तत्वों को रचना के परिप्रेक्ष्य में देश और काल का आकलन, रचनाकार की परिस्थितियाँ, रचना में उसकी व्यक्तिनिष्ठता आदि सभी का समावेश होना चाहिए। उक्त परिप्रेक्ष्य में आलोचना समीक्षक से उक्त तटस्थता की सर्वाधिक अपेक्षा रखती है।

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पुनश्च : एक टिप्पणी से यह अंश याद आया। इस आलेख को तैयार करते वक़्त इसे लिख कर एक जगह रख दिया था। पोस्ट बनाते वक़्त इसका ध्यान नहीं आया था। देर से ही सही … बिना इस अंश के शायद यह आलेख अधूरा लगे ….

जब उपन्यास छ्पकर आया तो श्रीलाल शुक्ल की कृति ‘राग दरबारी’ पर एक सुविज्ञात समीक्षक ने अपनी समीक्षा इस बात पर समाप्त की, “अपठित रह जाना ही इसकी नियति है।” 1968 में इसका पकाशन हुआ, 1969 में इसे साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला और तब से आज तक इसके चौदह संस्करण और पुनर्मुद्रण हो चुके हैं। इसे याद करते श्रीलाल शुक्ल लिखते हैं, “एक ही कृति पर अनेक परस्पर-विपरीत विचार एक साथ फल-फूल सकते हैं। आलोचना या समीक्षा से किसी कृति पर कोई गहरा असर पड़ता हो, कम-से-कम ‘राग दरबारी’ के उदाहरण में तो ऐसा नहीं दिखता। श्रीलाल शुक्ल की ही मानें तो,

  “सर्वथा दोष रहित होकर भी कोई कृति उबाऊ और स्तरहीन हो सकती है, जबकि कोई कृति दोषयुक्त होने के बावज़ूद धीरे-धीरे क्लासिक का दर्ज़ा ले सकती है।”