बड़ा ही जानलेवा है
सलिल भाई ने इसमें जान फूंक कर इसे ग़ज़ल बना दिया है वरना यह रचना तो … जान लेवा ही थी!
तुम्हारा रूठकर जाना, बड़ा ही जानलेवा है,
हुई ग़लती चलो माना, बड़ा ही जानलेवा है,
हमारी बात पर हमको भले ही बे अदब समझा
यूँ महफिल छोड़कर जाना, बड़ा ही जानलेवा है.
जो पल हमने बिताये साथ में, वो याद करना तुम
तुम्हें पाकर, तुम्हें खोना, बड़ा ही जानलेवा है.
कभी हँसकर, कभी यूँ ही, ठिठोली साथ की हमने
ठिठोली का सिला ऐसा, बड़ा ही जानलेवा है.
वो खट्टी, मीठी, कड़वी और सच्ची सारी बातें थीं
उन्हें अब याद भी करना बड़ा ही जानलेवा है.
ज़रा धीमी ज़ुबाँ से ही जो तुम इज़हार कर देते
तुम्हारा ऐंठकर जाना, बड़ा ही जानलेवा है.
कही जो बात, तीखी थी, चलो हम मान लेते हैं
बिना माफी दिए जाना बड़ा ही जानलेवा है.