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सोमवार, 3 जनवरी 2011

बड़ा ही जानलेवा है

बड़ा ही जानलेवा है

IMG_0130_thumb[1]मनोज कुमार

सलिल भाई ने इसमें जान फूंक कर इसे ग़ज़ल बना दिया है वरना यह रचना तो … जान लेवा ही थी!

Imageतुम्हारा    रूठकर  जाना,     बड़ा  ही  जानलेवा है,

हुई ग़लती  चलो माना,       बड़ा ही जानलेवा है,

हमारी बात पर हमको भले ही     बे अदब समझा

यूँ महफिल छोड़कर जाना,    बड़ा ही जानलेवा है.

जो पल हमने बिताये साथ में, वो याद करना तुम

तुम्हें पाकर,   तुम्हें खोना,  बड़ा ही   जानलेवा है.

कभी हँसकर,  कभी यूँ ही, ठिठोली साथ की हमने

ठिठोली   का  सिला  ऐसा,  बड़ा  ही जानलेवा है.

वो खट्टी, मीठी, कड़वी और  सच्ची सारी बातें थीं

उन्हें अब याद भी करना     बड़ा ही जानलेवा है.

ज़रा धीमी  ज़ुबाँ से ही जो  तुम इज़हार कर देते

तुम्हारा   ऐंठकर   जाना,    बड़ा ही जानलेवा है.

कही जो बात, तीखी थी, चलो हम मान लेते हैं

बिना माफी   दिए  जाना बड़ा    ही जानलेवा है.

शनिवार, 1 जनवरी 2011

साल ग्यारह आ गया है !!

सलिल भाई की नज़रे इनायत कि इसे अब ग़ज़ल कह सकता हूं और आपके सामने पेश करने गुस्ताख़ी कर सकता हूं नए साल ग्यारह के आगाज़ पर।

साल ग्यारह आ गया है !!

साल ग्यारह आ गया है खुशियों की सौग़ात लेकर,

आइये  स्वागत  करें  हम  जोश  के  जज़्बात लेकर.

मुस्कुराते बीते   पल   की   याद  बस  मन  में रहे

उम्र  भर  रोना  नहीं,    बिगड़े  हुए  हालात लेकर.

प्रेम  की ख़ुशबू  से  मँहकी  नज़्म  उड़ती  हर   तरफ

फूल लिखते हों ग़ज़ल जब कलम और दावात लेकर.

प्यार  हो  दुनिया  का  मजहब,  प्रेम  में  हो आस्था

स्नेह  का  आँचल  लिये,  आये  घटा बरसात लेकर.

जग  की चादर  हो न  मैली,  मन चमन ऐसे खिलें

साल की हर सुबह आए, अमन की एक रात लेकर.

ऐ  ख़ुदा,  उनसे  बचाना  जिनकी  फ़ितरत  हो छिपी

तिरछी चालें चलने वाले आते शह और मात लेकर.

मेल हो, एका हो,  सबमें प्यार का  जज़्बा ‘मनोज’

दो हज़ार ग्यारह है आया मिलन की बारात लेकर.

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

ग़ज़ल :: बातें उनकी रही अनकही

ग़ज़ल

बातें  उनकी रही  अनकही

015मनोज कुमार

मन की बात कही न   उनसे बस मन में ही छिपाए रहे.

द्वार कभी न आए वो मेरे,   हम पलकें ही   बिछाए रहे.

 

उनकी     आँखें   रहीं उनींदी,   देखता कैसे    ख़्वाब   कोई

सामने जब   आए  हम उनके,    हमसे नज़रें   बचाए रहे.

 

बंद हैं सारे   दर औ दरीचे,  बंद है यह   मन का आँगन,

झाँकें कैसे दिल में  वो पलकों की चिलमन    गिराए रहे.

 

उनके  नैनों  के  सागर  में    डूबने  की  इक  हसरत थी

दगा  दे  गई  किस्मत    वे नज़रों के द्वार    लगाए  रहे.

 

बातें  उनकी रही अनकही,   कैसे समझे भला ‘मनोज’,

कभी न की इज़हारे मोहब्बत हसरते दिल की दबाए रहे.

सोमवार, 22 नवंबर 2010

ग़ज़ल :: सहरा में कोई फूल खिला कर तो देखिये

ज्ञानचंद मर्मज्ञ

सहरा  में  कोई फूल  खिला  कर तो देखिये,

दुश्मन से कभी हाथ मिला कर तो देखिये ।

काँधा  लगा के  रस्म अदा कर  लिए बहुत,

अब  अर्थियों का बोझ उठा  कर तो देखिये।

शायद  इसी  बाज़ार  में  मिल  जाए  कहीं पर,

कीमत किसी वफ़ा की लगा कर तो देखिये ।

मंदिर की ना दरकार, ना मस्जिद की जरूरत,

पानी किसी प्यासे को  पिला  कर तो  देखिये।

शायद   बुलंद   हिम्मतों   में   बात  हो  कोई,

पत्थर   का   ऐतबार   हिलाकर  तो   देखिये।

ग़म का इलाज क्या पता ग़म का वजूद हो,

पल भर के लिए ग़म को भुला कर तो देखिये।