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बुधवार, 19 अगस्त 2026

सूफ़ीमत... 10. सूफ़ी दर्शन-5

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


10. सूफ़ी दर्शन-5


10.8 हज़रत अब्दुल करीम अल-जीली रह. (1365 - मृ. 1428 ई.)

प्रसिद्ध मुस्लिम सूफी संत, रहस्यवादी, दार्शनिक और ‘इंसान-उल-कामिल के प्रणेता और शुहूदिया शखा के प्रवर्तक शेख़ करीम जीली हज़रत इब्न अरबी संप्रदाय के ही थे। चौदहवीं शताब्दी के अंत में वे फारस में रहते थे। ऐसा कहा जाता है कि वे अपने जीवन काल में भारत भी आए थे। उनके सिद्धांत हज़रत इब्न अरबी से बहुत मिलते-जुलते हैं। उन्होंने 'वहदत-उल-वजूद' (अस्तित्व की एकता) के सिद्धांत को आगे बढ़ाया। वे वहदतुश शुहूद (दृष्टि की एकता) के सिद्धांत को मानते हैं।  हज़रत अल-जीली ने गुणों वाली दुनिया किस प्रकार फिर शुद्ध और सरल तत्व में लौट आती है इस पर भी अपने विचार प्रकट किए हैं। सूफी तत्वमीमांसा के अनुसार, समस्त विविधता और गुणों का यह खेल अंततः अपनी मूल एकता की ओर लौटता है। जब आंतरिक शुद्धि या चेतना अपने स्रोत की ओर यात्रा करती है, तो गुण-दोष के आवरण विलीन हो जाते हैं और वह भिन्नता पुनः उस परम, शुद्ध और सरल दिव्य सार-तत्व में समाहित हो जाती है। हज़रत इब्न-अरबी ने पूर्ण मानव के चिंतन पर अपनी पुस्तक फ़ुसूस-अलहकम में प्रकाश डाला है। उनसे काफ़ी पहले हज़रत मंसूर हल्लाज रह. (मृ. 922 ई.) ने अपनी पुस्तक किताब-अलवास्तैन में पूर्ण मानव के सिद्धांत को प्रकाश में लाया था। मरातिब अल-वुजूद पुस्तक में उन्होंने अस्तित्व के विभिन्न आध्यात्मिक स्तरों का वर्णन किया है।

हज़रत अब्द अल-करीम बिन इब्राहिम अल-जिली का जन्म 1365 में आधुनिक इराक के बगदाद के पास हुआ था और उनकी मृत्यु 1412 में हुई थी। वह प्रसिद्ध सूफ़ी संत हज़रत अब्दुल क़ादिर जीलानी रह. के वंशज माने जाते हैं। वह शेख़ शराफ अल-दीन अल-जबरती के शिष्य थे और ज़ाबिद (यमन) में रहते थे। उनका दावा है कि उन्हें रहस्यवादी रोशनी मिली, जिसने उन्हें अपनी प्रसिद्ध पुस्तक, `अल-इंसान अल-कामिल फी मारिफ़त अल-अवाखिर व-अल-अवेल’ (द परफेक्ट मैन) लिखने के लिए प्रेरित किया। इस पुस्तक का उद्देश्य सत्य की व्याख्या और अभिव्यक्ति करना है।

अलइंसानुल-अल कामिल में हज़रत अब्दुल कलीम अल-जीली रह. ने पूर्ण मानव के सिद्धांत पर विस्तार से चर्चा की है। उनका मानना है कि परमात्मा का स्वरुप (ज़ात) इतना महान है कि उसके सामने सृष्टि के अन्य पदार्थ नहीं के बराबर हैं। निरपेक्ष सत्ता एक है और सभी बहुलता मिथ्या है। निरपेक्ष होना सृष्टि (ख़ल्क़) और ईश्वर (हक़) का गुण (ऐन) है। निरपेक्ष सत्ता स्वयं को दो अलग-अलग वास्तविकताओं, ख़ल्क़ और हक़ में प्रकट करती है। यह ज़ात (स्वरुप) ही दृश्यमान है। सिफ़त (गुण) बराबर अव्यक्त रहती है। कोई भी विवरण शब्दों में उस तत्त्व को पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर सकता है। ब्रह्मांड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उस परम सत्ता से संबंधित है। यह शुद्ध सत्ता अंतर्विरोधों का योग है। इसकी दो विशेषताएं हैं: अनंत और चिरस्थायी; दो गुण हैं: ईश्वर (हक्क़) और सृष्टि (ख़ल्क़); दो विवरण: अनंत काल/अनश्वर (किदम) और सीमित (हुदूद); दो नाम: रब और अब्द (ईश्वर और दास)। इसके दो चेहरे हैं: बाहरी (दृश्यमान), यानी प्रत्यक्ष जगत, और भीतरी (अदृश्य), यानी परलोक। यह स्वयं के लिए अस्तित्वहीन है और दूसरों के लिए अस्तित्व में है। यह स्पष्ट है कि हज़रत अल-जिली के अनुसार वास्तविकता एक है और वह दिव्य पदार्थ (जौहर) से संबंधित है जिसके दो अलग-अलग पहलू: ईश्वर और दुनिया हैं। तशबीह (अमरता/ शरीरधारी ब्रह्म)  दिव्य सौंदर्य का रूप है जो बिना किसी भेद के अभूतपूर्व दुनिया की सभी चीज़ों में प्रकट होता है।

हज़रत अल-जिली के अनुसार, भौतिक दुनिया एक असत्य (माया) नहीं है, बल्कि एक वास्तविकता है जो परम सत्य के बाहरी रूप को व्यक्त करती है। वे परमार्थ और अपरमार्थ दो सत्ता मानते हैं। एक परमात्मा की सत्ता दूसरे जीव की। जीव की सत्ता शून्य जैसी है। उसे अपने अस्तित्व के लिए परमार्थ सत्ता की अपेक्षा है। जब गुण (सिफ़त) अभिव्यक्त होते हैं तब उसको नाम दिए जाते हैं। ये नाम दर्पण के सामान है जो परम सत्ता के सभी रहस्यों को प्रकट करते हैं। उसकी अभिव्यक्ति सम्पूर्ण सत्ताओं में अन्तर्निहित है। वह सृष्टि के प्रत्येक अणु-परमाणुओं में अपनी पूर्णता को अभिव्यक्त करता है। वह खण्डों में विभक्त नहीं है। सृष्टि के सम्पूर्ण पदार्थ उसकी पूर्णता के कारण हैं। सृष्टि परमात्मा के गुणों में उसकी (परमात्मा की) अभिव्यक्ति मात्र है। परमात्मा अपनी सत्ता को अपने गुणों में अभिव्यक्त करता है। मनुष्य परमात्मा के नाम और गुणों में विश्वास करता है। इसलिए मनुष्य के विश्वासों में ही वह अभिव्यक्त होता है। यह विश्वास ज्ञान के सहारे ही टिका हुआ है। इसलिए वह ज्ञान के सहारे ही मनुष्य के निकट अभिव्यक्त होता है।  

उनका विचार सत-असत के चक्र को पूरा करता है। उनके अनुसार इस चक्र के बीच में आदमी है क्योंकि उसकी आत्मा एक ओर ब्रह्म और दूसरी ओर प्रकृति से मिल जाती है। आदमी सत और असत के बीच पुल बांधता है। आत्मा में सत्ता के सारे गुण एक हो जाते हैं। इसीलिए उसके द्वारा बहुत्व में फंसा हुआ एक अपने एकत्व के बारे में सचेत हो जाता है। जिस मनुष्य में इस एकत्व के ज्ञान का उदय हो जाता है वह इन्साने कामिल (पूर्ण पुरुष परम हंस) कहलाता है। इस ज्ञान के उदय की तीन अवस्थाएं हैं नाम की ज्योति, गुणों की ज्योति और तत्व की ज्योति। यह अवस्थाएं ब्रह्म के प्रकृति में उतरने की तीन मंजिलें हैं। इन्हें अहदियत (एकत्व, एक होना), हुविय्यत (तदीयता, उससे संबंध रहनेवाला) और अनिय्यत (अस्मदीयता) के नामों से पुकारते हैं। अहदियत (परम एकता) ईश्वर की वह अवस्था है जहाँ वह पूरी तरह निराकार, अज्ञात और शुद्ध चेतना है। हुवियत (दिव्य आंतरिकता) के चरण में ईश्वर के भीतर अपनी पहचान और छिपे हुए गुणों का अहसास प्रकट होता है। इनायिया (दिव्य प्रकटीकरण) अंतिम चरण है, जिसमें ईश्वर के नाम और गुण (जैसे दया, ज्ञान, शक्ति) ब्रह्मांड और मानव के रूप में दृश्यमान होते हैं।

सृष्टिकर्ता (रब) और सृष्टि (अब्द) में संबंध को बताने के लिए तीन अवस्थाओं की चर्चा की गयी है। पहली अवस्था अहदत में वह (परमात्मा) केवल सत्ता (अज़-ज़ात) मात्र है। इस अवस्था में वह निर्गुण, निरपेक्ष रहता है। इस अवस्था के दो रूप अल-अमा और अहदियत हैं। अल-अमा अभ्यंतर रूप है और अहदियत वाह्य रूप। अल-अमा घना अन्धकार है। होने वाली सृष्टि के बीज मात्र के रूप में परमात्मा इस अवस्था में रहता है। अहदियत’ (बाह्यरूप) में परमात्मा अपने आपको सर्वातीत सत्ता के रूप में जानता है। परमात्मा को अपने एकत्व का ज्ञान रहता है।

दूसरी अवस्था को ‘वहदत कहा जाता है। इस अवस्था में ‘ज़ात (सत्ता) से भिन्नत्व नहीं होता।  इस अवस्था के भी दो रूप हैं, हूवीय्यत (अभ्यंतर) और अनीय्यत (बाह्यरूप)। हूवीय्यत से मतलब तत्त्व है। इसमें शुद्ध सत्ता अनेक विरोधी रूप में ही अपने एकत्व को जानती है। अनीय्यत जो बाह्यरूप है उसमें विशुद्ध सत्ता को एक की अनेक में अभिव्यक्ति का बोध होता है। तत्त्व उस एक से बाहर नहीं है। न इस तत्त्व का बोध कराने वाला उस से बाहर है। इस वहदत की हूवीय्यत अवस्था में वह एक अंतर्दर्शन करता रहता है और अनीय्यत अवस्था में वह सृष्टि को ध्यान में रखकर अपनी और संकेत करता रहता है। इस अवस्था में भी परमात्मा अनाभिव्यक्त रूप में रहता है। लेकिन उसे अपने आपका ज्ञान रहता है यानी वह आत्मज्ञ है। इस अवस्था में वह अनेक का विरोधी एक  है और अनेक का आश्रय एक है, लेकिन द्वैत नहीं है। परम सत्य में ‘वह, ‘मैं’ और ‘तू एक ही वस्तु है। उसका एकत्व ‘विभेद से परे है।

तीसरी अवस्था वाहिदीयत है। यह परमात्मा के नामरूप-विशिष्ट जगत-प्रपंच में अभिव्यक्त होने की अवस्था है। इस अवस्था में अनेकत्व में एकत्व की अभिव्यक्ति होती है। परमात्मा का ज्ञान सभी पदार्थों में व्याप्त हो जाता है। स्थूल जगत प्रकाशित हो जाता है। जीवन प्रकट होता है। इस तरह ‘अहदियत’ की अवस्था में परमात्मा निरपेक्ष, निर्गुण, संबंधविहीन, अनभिव्यक्त रहता है। ‘वहदत की अवस्था में वह आत्मज्ञ होता है और सत्ता, प्रकाश और शक्ति का उसे भान होता है। ‘वाहिदीयत’ की अवस्था में सत्ता जीवन में, प्रकाश, शक्ति और इच्छा में परिणत हो जाता है। जब सत्ता के विभिन्न गुण जीवन, ज्ञान, शक्ति, इरादा, सुनना, देखना और बोलना आदि प्रकट होते हैं, तब वह लाहूत (देवत्व) के नाम से जाना जाता है। जब उसके गुण क्रियात्मक रूप धारण करते हैं, जैसे सृष्टि करना, जीवनदान करना, मारना, तब उसे ज़बरूत (शक्ति) कहते है। जब ये क्रियाशील गुण विभिन्न लोकों में प्रकट हुए तब उन्हीं के अनुरूप उनका नामाकरण हुआ। जैसे जब ये देवलोक में प्रकट हुए तो आलमे-मलकूत कहलाए। जब सदृश रूपों में प्रकट हुए तो आलमे-मिसाल कहलाए। जब ये भौतिक जगत में प्रकट हुए तो आलमे-नासूत कहलाए।

हज़रत अलजीली ने पूर्ण मानव के अध्यात्मिक प्रशिक्षण के तीन शिखर बताए हैं। पहले शिखर में ईश्वर का नाम जपते हुए समाधि लेना है। दूसरा शिखर तजल्ली-सिफ़ात (प्रकाश गुण) है। इसमें इंसान ईश्वरीय गुणों से प्रकाश ग्रहण कर ब्रह्मांड की आत्मा में सम्मिलित हो जाता है। फिर तो उसमें कुछ चमत्कारी गुण आ जाते हैं, जैसे हवा में उड़ना, पानी पर चलना। तीसरा शिखर परमसत्ता के राज्य में प्रवेश करने का होता है। इस शिखर पर पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. विराजमान थे। सरल शब्दों में कहें तो पूर्ण मानव मनुष्य और ईश्वर के बीच की कड़ी है। उनके अनुसार, पैगंबर मुहम्मद साहब ब्रह्मांड के सबसे आदर्श और पूर्ण मनुष्य हैं, जो ईश्वर के गुणों का सबसे सुंदर रूप प्रस्तुत करते हैं।

अल-जिली के अनुसार, एक सामान्य व्यक्ति तौहीद को केवल बौद्धिक स्तर पर समझता है। 'अल-इंसान अल-कामिल' (पूर्ण मानव) वह है जो अपने 'अहम' (Self) को मिटाकर ईश्वर की एकता में लीन (फना) हो जाता है। पूर्ण मानव ही वह बिंदु है जहाँ ईश्वर की एकता और सृष्टि की विविधता आपस में मिलती हैं। अल-जिली के तौहीद में ईश्वर के जलाल (क्रोध/महानता) और जमाल (सौंदर्य/दया) जैसे विपरीत गुण अंततः एक ही स्रोत में विलीन हो जाते हैं। अच्छाई और बुराई का अंतर केवल मानवीय स्तर पर है; दिव्य स्तर पर सब कुछ उसी एक इच्छा का हिस्सा है।

10.9 हज़रत अब्द अल-रहमान जामी (1414-1492)

हज़रत मौलाना नूर अल-दीन अब्द अल-रहमान जामी (1414-1492), फारसी भाषा के महान क्लासिक कवि और सूफी संत और महान विद्वान थे। उन्हें 'खतम अल-शुअरा' (कवियों की मुहर/अंतिम महान कवि) भी कहा जाता है। उनका जन्म खुरासान (वर्तमान अफगानिस्तान) के जाम कस्बे में हुआ था और उनका अधिकांश जीवन हेरात में बीता। 'जामी' उपनाम उन्होंने अपने जन्मस्थान जाम के सम्मान और प्रसिद्ध सूफी अहमद जाम से आध्यात्मिक संबंध के कारण चुना। उन्होंने हेरात और समरकंद के प्रसिद्ध मदरसों में इस्लामी विज्ञान, अरबी साहित्य, दर्शन और खगोल विज्ञान की उच्च शिक्षा प्राप्त की। अपनी आध्यात्मिक खोज में वे सूफी संत साद अल-दीन काशगरी के शिष्य बने और बाद में नक़्शबंदिया संप्रदाय के प्रमुख मार्गदर्शक ख़्वाजा उबैदुल्लाह अहरार के प्रभाव में आए। यद्यपि वे स्वभाव से एकांतप्रिय और तपस्वी थे, फिर भी तैमूरी वंश के सुल्तान हुसैन मिर्ज़ा और ऑटोमन साम्राज्य के सुल्तान मुहम्मद फातह (कुस्तुनतुनिया के विजेता) जैसे महान शासक उनका बेहद सम्मान करते थे।

वे हज़रत इब्न अरबी के अनुयायी थे। वे सूफी आध्यात्मिक साधना में उच्च स्थान रखते थे। उनका इंतकाल 1492 ईस्वी (898 हिजरी) में हेरात (अफ़गानिस्तान) में हुआ, जहाँ उनकी मज़ार स्थित है। हफ्त औरंग उनकी सात मसनवियों का प्रसिद्ध संग्रह, जिसमें यूसुफ और जुलेखा, लैला और मजनू जैसी अमर प्रेम और आध्यात्मिक कथाएँ शामिल हैं। उन्होंने सूफीवाद, इस्लामी दर्शन और तत्वज्ञान पर लगभग 11 महत्वपूर्ण गद्य ग्रंथ लिखे। पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब की शान में लिखी उनकी रचित नाअत और फारसी कविताएँ पूरी दुनिया में बहुत प्रसिद्ध और आदरणीय हैं।

हज़रत अब्द अल-रहमान जामी की रचना 'लवाइह' (चमक) सूफी दर्शन और इस्लामी रहस्यवाद (तसव्वुफ़) का एक अनमोल और विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ है। इस पुस्तक में अस्तित्व की एकता के सिद्धांत का एक विवरण है। 'लवाइह' शब्द का अरबी में अर्थ होता है "प्रकाश की किरणें" या "चमक" (Flashes of Light)। इस किताब में जामी ने सूफी मत के बेहद कठिन और गहरे सिद्धांतों को बहुत ही सरल और खूबसूरत अंदाज में समझाया है। यह पूरी किताब महान सूफी दार्शनिक इब्न अरबी के 'वहदत अल-वुजूद' (Unity of Existence/अस्तित्व की एकता) के सिद्धांत पर आधारित है। जामी समझाते हैं कि इस ब्रह्मांड में केवल एक ही वास्तविक अस्तित्व (सत्य) है, और वह ईश्वर (अल्लाह) है। हम जो कुछ भी दुनिया में देखते हैं, वह उसी एक परमेश्वर का प्रतिबिंब या प्रकाश है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी इसकी शैली है। जामी पहले गद्य (Prose) में किसी गहरे आध्यात्मिक सिद्धांत को समझाते हैं, और फिर तुरंत उसे और स्पष्ट करने के लिए एक खूबसूरत रूबाई या कविता (Poetry) पेश करते हैं। पूरी किताब छोटे-छोटे अध्यायों में बंटी है, जिन्हें 'लवीहा' (किरण या फ्लैश) कहा जाता है। हर अध्याय पाठक के दिमाग में ज्ञान की एक नई रोशनी जगाता है। पुस्तक में 'फना' (स्वयं के अहंकार और अस्तित्व को मिटा देना) के आध्यात्मिक चरण को बहुत महत्व दिया गया है। जामी के अनुसार, जब तक इंसान सांसारिक मोह और अपने 'मैं' (अहंकार) से मुक्त नहीं होता, तब तक वह उस परम सत्य का अनुभव नहीं कर सकता। अहंकार मिटते ही साधक ईश्वर के रंग में रंग जाता है। 'लवाइह' केवल एक किताब नहीं है, बल्कि ईश्वर को अपने भीतर महसूस करने और आध्यात्मिक यात्रा को समझने की एक व्यावहारिक गाइडबुक है।

निरपेक्ष सत्ता को ईश्वर कहा जाता है जो सभी जीवों का स्रोत है और फिर भी बहुलताओं से ऊपर है। वह सभी अभिव्यक्तियों से परे है और अज्ञेय है। वह शुद्ध और सरल पूरी तरह से बिना किसी निर्धारण के है और नाम, गुण और संबंधों के भेदों से ऊपर है। परम सत्य हर मौजूद चीज़ का आधार है। ईश्वर और संसार एक ही वास्तविकता के दो पहलू हैं। ब्रह्मांड ईश्वर की बाहरी (अभिव्यक्ति) है और ईश्वर ब्रह्मांड की आंतरिक (वास्तविकता) है। प्रकट होने से पहले संसार ईश्वर था और प्रकट होने के बाद ईश्वर संसार के समान है। वास्तव में वह तो एक ही है, ईश्वर और दुनिया को अलग-अलग देखने का हमारा तरीक़ा अलग-अलग है। जामी के अनुसार सृष्टिकर्ता और जीव एक ही वास्तविकता के दो पहलू हैं। बाहरी दुनिया में एक वास्तविकता के अलावा कुछ भी नहीं है जो विविध रूपों और विशेषताओं में होने के कारण कई प्रतीत होता है।

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर   

रविवार, 9 अगस्त 2026

सूफ़ीमत... 10. सूफ़ी दर्शन-2

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम



10. सूफ़ी दर्शन-2

10.3 हज़रत शेख़ मोहि-उद-दीन इब्नुल अरबी रह. (1164-1240 ई.)

वहदत-उल-वुजूद के प्रवर्तक हज़रत शेख़ मोहि-उद-दीन इब्नुल अरबी रह. (मृ. 1240 ई.) एक महान अरब सूफी संत, दार्शनिक और कवि थे। उनको शेख़-उल-अकबर (सबसे बड़ा शेख़) और "मुहियुद्दीन" (धर्म के पुनरुद्धार करने वाले) के नाम से भी जाना जाता है। उनकी मातृभूमि उन्दूलुस थी। उनका जन्म अल-अंदलूस (स्पेन) के मुरचिया (मर्सिया) शहर में  28 जुलाई, 1165 . में हुआ था।  इनके पिता का नाम अबू बकर इब्न-उल अरबी था।   उनका परिवार अरब के ताई क़बीले से था। यह परिवार अपनी दानशीलता और धर्मपरायणता के लिए विख्यात है। उनके पिता और उनके दो चाचा  सूफ़ी थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सेविल में प्राप्त की जो उस समय शिक्षा का एक बड़ा केंद्र था। वहाँ वे तीस साल तक कुछ महान विद्वानों के अधीन हदीस, कुरान और तसव्वुफ (सूफीवाद) का अध्ययन करते रहे। सच की तलाश में वे कई देशों का भ्रमण करते हुए दमिश्क (सीरिया) में बस गए। 17 नवम्बर 1240 ई. को उनका देहावसान हो गया। उन्हें क़ाज़ी मोहिउद्दीन  अल-ढाकी के निजी क़ब्रगाह में माउंट क़सीयुन में दफ़नाया गया था।

वह अपने समय के मशहूर सूफ़ी इस्लामिक विचारक थे। इनकी लिखी हुई किताबें अल -फुतुहात -अल -मकियह में इस्लाम के सभी रहस्यों से पर्दा उठाया गया है। जब वह 16 वर्ष  के थे तभी रियासत के एक ऊँचे घराने में रात के खाने की दावत में शामिल हुए थे। वहाँ खाने के बाद शराब पिलाई जा रही थी। जैसे ही शराब का प्याला उन्होंने अपने होंठों पर रखा तो उनके कानों में एक आवाज़ गुंजने लगी हे मोहम्मद क्या तुम्हें  इसी के लिए बनाया गया था?’’ इसके बाद वह वहाँ से बाहर निकल गए। इस घटना के बाद ही वह अपना सामान्य छोड़ एकांत में रहने लगे और अधिकतर समय इबादत में ही गुजारते। इब्न अरबी का आध्यात्मिक सफर इतिहास के सबसे गहरे और रहस्यमयी सूफी अनुभवों में से एक है। उनका यह सफर किसी एक गुरु के मार्गदर्शन तक सीमित नहीं था, बल्कि दर्शनों, सपनों और दिव्य प्रेरणाओं (कश्फ़) से भरा हुआ था। वे सेविले (स्पेन) के पास एक कब्रिस्तान में बने गुप्त तहखाने में चले गए। उन्होंने कई महीनों तक तीव्र ध्यान और उपवास किया, जहाँ उन्हें बिना किसी जीवित गुरु के सीधे आध्यात्मिक रहस्य प्राप्त हुए। इसके बाद उन्होंने कई  देशों की यात्राएं कीं और कई उस्ताद शेखों से इनकी मुलाक़ात हुई। जब इब्न अरबी अभी युवा ही थे, तब महान तर्कशास्त्री और दार्शनिक इब्न रुश्द ने उनकी आध्यात्मिक ख्याति सुनकर उन्हें मिलने बुलाया। इब्न रुश्द ने पूछा कि क्या रहस्यवादी अनुभव और तार्किक दर्शन एक ही सत्य तक पहुँचाते हैं? इब्न अरबी ने उत्तर दिया, "हाँ और ना। 'हाँ' और 'ना' के बीच में ही आत्माएं अपनी सामग्री से उड़ जाती हैं।" इस उत्तर ने इब्न रुश्द को झकझोर कर रख दिया था। इब्न अरबी के सफर में दो महिला सूफियों का बहुत बड़ा प्रभाव रहा, जिन्हें वे अपनी 'आध्यात्मिक माँ' मानते थेफातिमा बिन्ते इब्न अल-मुथन्ना एक अत्यंत वृद्ध महिला थीं जो सेविले में रहती थीं। इब्न अरबी ने कई वर्षों तक उनकी सेवा की। वे कहती थीं कि सूरा अल-फातिहा उनकी सेवा में रहती थी। शम्स उम अल-फुकरा मक्का की एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक महिला थीं, जिनकी बुद्धिमानी और ईश्वर-प्रेम ने इब्न अरबी को गहराई से प्रभावित किया। साल 1200 के आसपास, दिव्य आदेश मिलने पर उन्होंने अंडालूसिया (स्पेन) छोड़ दिया और मध्य पूर्व की ओर यात्रा शुरू की। मक्का में काबा की परिक्रमा करते हुए उन्हें 'रूहानी युवा' (Eternal Youth) का दर्शन हुआ, जिसने उन्हें अपने भीतर छिपे असीमित ज्ञान को लिखने की प्रेरणा दी। यहीं से उनके सबसे विशाल ग्रंथ "अल-फुतुहात अल-मक्किय्या" (The Meccan Illuminations) की शुरुआत हुई, जिसमें उन्होंने अपने सभी आध्यात्मिक अनुभवों को दर्ज किया।

अपनी पुस्तकों के माध्यम से जब वे अपने विचार लोगों के सामने रख रहे  थे, तो उनके समक्ष इस्लाम के एकेश्वरवादी सिद्धांत के साथ परम-सत्ता की वास्तविकता की प्रकृति के एक सर्वेश्वरवादी सिद्धांत को समेटते हुए साधकों को हल पहुंचाने जैसी असंभव समस्या सामने थी। उन्हें इस्लाम के कट्टर एकेश्वरवाद यानी 'तौहीद' (जहां ईश्वर और सृष्टि पूरी तरह अलग हैं) और उनके अपने आध्यात्मिक अनुभवों से उपजे 'वहदत अल-वुजूद' (अस्तित्व की एकता) के बीच एक ऐसा पुल बनाना था, जिससे साधक (सालिक) भटके बिना परम-सत्य को पा सकें। इब्न अरबी ने इस "असंभव समस्या" को तर्क से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि (क़श्फ़) और विरोधाभासों को स्वीकार करके हल किया। उनके इस रहस्यवादी दृष्टिकोण के कारण ही जहाँ रूढ़िवादी उलेमाओं ने उन पर कुफ्र (नास्तिकता) के फतवे लगाए, वहीं सूफी साधकों के लिए वे "शेख अल-अकबर" (सबसे महान गुरु) बन गए, क्योंकि उन्होंने एकेश्वरवाद की सीमाओं को तोड़े बिना ईश्वर से मिलन का मार्ग प्रशस्त किया।

सूफ़ी विचारधारा और इसलाम दोनों के प्रति उनकी निष्ठा समान थी, और वास्तव में उन्होंने यह मानने में कोई विरोधाभास नहीं देखा कि इस्लाम के ईश्वर सभी चीज़ों का सार और अंतिम आधार हैं। वह मुस्लिम क़ानून, धर्मशास्त्र और दर्शनशास्त्र के विद्वान होने के अलावा एक पवित्र तपस्वी और रहस्यवादी थे। निस्संदेह वह एक विचारक और विचारधारा के एक स्कूल के संस्थापक हैं, लेकिन वे मुख्य रूप से एक रहस्यवादी हैं। उनके लिए कल्पना की दुनिया एक वास्तविक दुनिया है; शायद ठोस वस्तुओं की बाहरी दुनिया से भी ज़्यादा वास्तविक। उनकी रचनाओं और विचारों को धर्मशास्त्रियों द्वारा हमेशा ही संदेह की दृष्टि से देखा जाता रहा। ऐसा लगता है जैसे मुस्लिम विद्वानों को उनके दर्शन या रहस्यवाद से कोई सरोकार नहीं था, लेकिन उनके दार्शनिक और रहस्यमय विचार इस्लाम के स्थापित हठधर्मिता के साथ सामंजस्य या असहमति के साथ कितने दूर थे, इस पर उनकी पैनी नज़र थी।

यद्यपि हज़रत इब्न अरबी पर उनके विरोधियों द्वारा उनके विचारों को अपरंपरागत मानकर हिंसक हमला किया गया था, फिर भी, उनकी शिक्षाएं न केवल हमलों से बच गईं, बल्कि भविष्य के सूफ़ीवाद के विकास के लिए सबसे गहरा प्रभाव डाला। वह उस चरण के अंत का प्रतीक हैं जहां सूफ़ीवाद अपने चरम बिंदु पर पहुंच गया। इसके बाद की सदियों ने मुस्लिम दुनिया में सूफ़ी परम्पराओं का तेजी से प्रसार देखा; और सूफ़ीवाद सिद्धांत के रूप में ही नहीं बल्कि कर्मकांड और व्यवहार के साथ इस्लाम का लोकप्रिय रूप बन गया। इब्न अरबी के रहस्यमय दर्शन को चुनौती नहीं दी गई। वे वास्तव में भविष्य के विचारकों के लिए प्रेरणा का एकमात्र स्रोत थे, जो सभी की एकता के विषय पर प्रवचन करते थे।

सबसे मौलिक सिद्धांत जो इब्न अरबी के पूरे धर्मशास्त्र-दर्शन और रहस्यमय विचारों के मूल में निहित है, "अस्तित्व की एकता" (वहदत-उल-वुजूद) का सिद्धांत है। इसके अनुसार इस ब्रह्मांड में केवल एक ही वास्तविक सत्ता (अस्तित्व) है, और वह अल्लाह (ईश्वर) है। ब्रह्मांड की सारी चीजें और रूप (इंसान, जीव-जंतु, तारे, नदियाँ) उसी एक परम सत्य (अल्लाह) की अभिव्यक्ति या प्रकटीकरण हैं। जैसे सूर्य की किरणें सूर्य से अलग नहीं होतीं, या समुद्र की लहरें समुद्र से अलग नहीं होतीं, वैसे ही यह पूरी कायनात खुदा से अलग नहीं है।

वह्दतुल वजूद का सिद्धांत दो रूहानी अवधारणाओं को जोड़ता है। पहला तनज़ीह (Transcendence) खुदा अपनी रचनाओं से बिल्कुल अलग, सर्वोच्च और पवित्र है। दूसरा तशबीह (Immanence): खुदा अपनी बनाई हुई हर चीज़ (कण-कण में) के भीतर और बहुत करीब मौजूद है। क्योंकि हर इंसान और हर जीव में उसी एक दिव्य सत्ता का अंश या रूप दिखाई देता है, इसलिए यह सिद्धांत सभी इंसानों से बिना किसी भेदभाव के प्रेम करना सिखाता है। सूफी संतों की सार्वभौमिक शांति (सुलह-ए-कुल) और मानवता से प्रेम की नीति इसी विचार पर टिकी हुई है। इब्न अरबी ने कहा कि ईश्वर को केवल 'परे' मानना या केवल 'कण-कण में' मानना अधूरा सत्य है। उनके अनुसार, ईश्वर अपनी ज़ात (Essence) में सृष्टि से पूरी तरह परे (तन्ज़ीह) है, लेकिन अपने नामों और गुणों (Names and Attributes) के माध्यम से वह इस संसार में प्रकट (तशबीह) भी है।

आलोचक अक्सर उन पर सर्वेश्वरवाद (Pantheism) का आरोप लगाते हैं, जिसका अर्थ है "यह संसार ही ईश्वर है"। कई बार लोग इसे पश्चिमी दर्शन के सर्वेश्वरवाद या 'सबकुछ ईश्वर है' मान लेते हैं। लेकिन इब्नुल अरबी का यह विचार अलग है। वे यह नहीं कहते कि यह भौतिक संसार ही खुदा है, बल्कि यह कहते हैं कि संसार का अपना कोई अस्तित्व नहीं है, जो कुछ भी अस्तित्व है वह सिर्फ खुदा का है। इसे समझाने के लिए उन्होंने 'आईने और प्रतिबिंब' का उदाहरण दिया। यदि आप आईने में अपना रूप देखते हैं, तो वह रूप 'आप' नहीं हैं, लेकिन 'आपके बिना' उसका कोई वजूद भी नहीं है। इसी तरह यह संसार ईश्वर का एक प्रतिबिंब है। साधकों को इस उलझन से निकालने के लिए इब्न अरबी ने एक प्रसिद्ध अरबी सूत्र दिया,  "हुवा वा ला हुवा" (He and Not He)। यदि आप किसी फूल को देखते हैं, तो अपनी वास्तविकता में वह ईश्वर है (क्योंकि उसमें ईश्वर का अस्तित्व प्रकट हो रहा है), लेकिन अपनी सीमा में वह ईश्वर नहीं है (क्योंकि ईश्वर फूल की सीमाओं में बंधा नहीं है)। इस समझ ने साधकों को यह हल दिया कि वे संसार की हर चीज़ में ईश्वर की महिमा देख सकें, लेकिन किसी भी चीज़ को स्वयं ईश्वर मानकर 'शिरक' (मूर्तिपूजा या बहुदेववाद) के जाल में न फंसे।

इतिहास में कुछ रूढ़िवादी विद्वानों ने इब्न अरबी के विचार की आलोचना की, जबकि सूफी संतों और रूहानी विद्वानों ने इसे ईश्वर को जानने का सबसे ऊँचा दर्जा माना। हज़रत इब्न अरबी का सर्वेश्वरवाद वास्तविकता का भौतिकवादी दृष्टिकोण नहीं है। उनके अनुसार चेतन वस्तुओं की बाहरी दुनिया वास्तविक ईश्वर (अल-हक़) की एक क्षणभंगुर छाया है। यह अविश्वासवाद (संसार का अस्तित्व इनकार करने का सिद्धांत) का एक रूप है जो इस बात से इनकार करता है कि प्रत्यक्ष जगत  का ईश्वर से अलग और स्वतंत्र रूप से अस्तित्व या अर्थ है। केवल ईश्वर ही सर्वव्यापी और शाश्वत वास्तविकता है। इसलिए, वास्तविकता एक और अविभाज्य है। दूसरे शब्दों में कहें तो, हज़रत इब्ने अरबी के अनुसार वास्तविक सत्ता एक है और वह परमेश्वर है। उस सत्ता के सिवा किसी अन्य सत्ता का अस्तित्व नहीं है वह एकमात्र सत्ता परमात्मा है यह सम्पूर्ण दृश्यमान जगत उसी परम सत्ता की अभिव्यक्ति है इसे इब्न अरबी तौहीद (एकीकरण के मुस्लिम सिद्धांत) कहते हैं हज़रत इब्न अरबी के अनुसार वास्तविकता एक आवश्यक एकता पदार्थ है; लेकिन यह एक द्वैत भी है जहाँ तक इसकी दो विभेदक विशेषताएँ हैं: हक़ (ईश्वर) और ख़लक (ब्रह्मांड)।

वास्तविकता की प्रकृति के अपने आध्यात्मिक सिद्धांत के बावजूद, हज़रत इब्न अरबी अपनी पद्धति में ईश्वर के लिए जगह रखते हैं। हज़रत इब्न अरबी के धर्मशास्त्र में ईश्वर विश्वास, प्रेम और पूजा की वस्तु के रूप में प्रकट होता है। ईश्वर ने आदेश दिया है कि वास्तव में उनके अलावा किसी भी चीज़ की पूजा नहीं की जाती है। उनका कहना था कि लोग अपने देवताओं को इस या उस नाम से पुकारते हैं, लेकिन ज्ञानी (अल-आरिफ़) अपने ईश्वर को "अल्लाह" कहते हैं, जो ईश्वर के सभी नामों में सबसे सार्वभौमिक है। पूजा की विशेष वस्तुएँ लोगों के मन की रचनाएँ हैं, जबकि ईश्वर, निरपेक्ष, अप्राप्य है। इसलिए, हमें ईश्वर को किसी विशेष प्रकार के विश्वास तक अन्य रूपों के बहिष्कार तक सीमित नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे सभी रूपों में समान रूप से स्वीकार करना चाहिए। उसे एक रूप तक सीमित रखना - जैसा कि ईसाइयों ने किया है, - बेवफाई (कुफ्र) है; और उसे सभी रूपों में स्वीकार करना ही सच्चे धर्म की आत्मा है। इससे पता चलता है कि हज़रत इब्न अरबी के धर्म का सिद्धांत रहस्यमय है, शुद्ध दार्शनिक नहीं है। इसकी जड़ें ईश्वरीय प्रेम के उनके बहुत व्यापक सिद्धांत में हैं।

सभी रहस्यवादियों का अंतिम लक्ष्य प्रेम है; और विशेष रूप से हज़रत इब्न अरबी की रहस्यवादी व्याख्या में, यह प्रेमी और प्रिय के मिलन का पूर्ण अहसास है। अब, अगर हम पूजा की प्रकृति में गहराई से देखते हैं, तो हम पाते हैं कि प्रेम ही इसका आधार है। पूजा करना परम प्रेम करना है। किसी भी वस्तु की तब तक पूजा नहीं की जाती जब तक कि उसमें किसी प्रकार का प्रेम न हो; क्योंकि प्रेम ईश्वरीय सिद्धांत है जो चीज़ों को एक साथ बांधता है और सभी प्राणियों में व्याप्त है। इसका मतलब है कि जिस उच्चतम अभिव्यक्ति में ईश्वर की पूजा की जाती है वह प्रेम है। इसलिए ईश्वर, पूजा की वस्तु के रूप में, हृदय में प्रेम की सर्वोच्च वस्तु के रूप में निवास करते हैं।

परमात्मा और आदमी के बीच के संबंधों के ऊपर चर्चा करते हुए हज़रत मंसूर अल हल्लाज (मृ. 922) ने पहली बार उस सिद्धांत की नींव रखी, जिसे हज़रत इब्न अरबी और हज़रत अब्द अल-करीम अल-जिली के लेखन में ‘पूर्ण मानव(इंसान-ए-कामिल) के सिद्धांत के रूप में मान्यता मिली। उनके मुताबिक इंसान अपनी रूहानी तरक्की और खुदा की पहचान के जरिए उस मुकम्मल इंसान के दर्जे तक पहुँच सकता है जो खुदा की सिफ़ात (गुणों) का पूरा आईना होता है। उन्होंने बताया कि मनुष्य ही वह बिंदु है जहां ईश्वर की 'परम-सत्ता' (Divine Essence) और यह 'भौतिक संसार' (Cosmos) आपस में मिलते हैं। एक सच्चा साधक अपनी साधना के जरिए आध्यात्मिक रूप से इतना पूर्ण हो सकता है कि वह इस एकता का साक्षात अनुभव कर सके। इस सिद्धांत ने मुस्लिम रहस्यवाद के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हज़रत हल्लाज का सिद्धांत यहूदी परंपरा पर आधारित अवतार का एक सिद्धांत था जिसमें कहा गया है कि "ईश्वर ने अपनी छवि में आदम को बनाया" - एक परंपरा जिसे सूफ़ियों ने पैगंबर को जिम्मेदार ठहराया। इब्न अरबी ने मनुष्य में दो स्वरूपों के बीच अंतर किया: दैवीय (अल-लाहूत), और मानवीय (अल-नासूत)। दो प्रकृतियाँ संयुक्त नहीं हैं, बल्कि एक दूसरे में मिले हुए हैं (एक समन्वय), जैसे शराब पानी में घुल जाती है। अल-नासूत मनुष्य का मानवीय, भौतिक और कॉर्पोरियल (शरीर आधारित) स्वरूप है, जो मिट्टी और नश्वर तत्वों से बना है। अल-अल-लाहूत दिव्य स्वभाव या ईश्वरीय वास्तविकता है, जो मानवीय रूप के भीतर एक आंतरिक रहस्य या जीवन के रूप में मौजूद है। इब्न अरबी के अनुसार मनुष्य केवल एक साधारण भौतिक प्राणी नहीं है, बल्कि वह अल-नासूत (बाह्य/शारीरिक) और अल-लाहूत (आंतरिक/दिव्य नाम-गुण) दोनों का एक समन्वय है। मनुष्य को ब्रह्मांड का केंद्र माना गया है जो ईश्वर और सृष्टि के बीच एक सेतु या योजक की तरह कार्य करता है। बाहरी रूप से मनुष्य नश्वर है, लेकिन आंतरिक रूप से वह ईश्वरीय गुणों और नामों का प्रतिरूप (दर्पण) है। इस प्रकार इस्लाम के इतिहास में पहली बार मनुष्य के एक दैवीय पहलू को मान्यता दी गई थी, और मनुष्य को एक अद्वितीय प्राणी के रूप में माना गया, जबकि इसके पहले परम सत्ता की तुलना उसकी दिव्यता के कारण किसी अन्य प्राणी से नहीं की जा सकती थी।

हज़रत इब्न अरबी ने हज़रत हल्लाज के विचार को और आगे बढाया और इसे व्यापक रूप दिया। उनके सिद्धांत में लाहूत (ब्रह्मलोक) और नासूत (मर्त्यलोक) का द्वैत परम सत्ता (अल-हक़) के पहलुओं का द्वैत बन गया, न कि उसकी दो स्वतंत्र प्रकृति। दूसरे, उन्हें वास्तव में न केवल मनुष्य में बल्कि हर चीज़ में मौजूद माना गया नासूत किसी चीज़ का बाहरी पहलू है, जबकि लाहूत, इसका आंतरिक पहलू। लेकिन ईश्वर जो अपने आप को सभी अभूतपूर्व अस्तित्व में प्रकट करता है, वह पूर्ण व्यक्ति के रूप में सबसे परिपूर्ण और पूर्ण तरीके से प्रकट होता है, जिसका सबसे अच्छा प्रतिनिधित्व 'संतों' द्वारा किया जाता है। सामान्य रूप से मनुष्य - और विशेष रूप से पूर्ण मनुष्य ईश्वर की सबसे उत्तम अभिव्यक्ति है। इस पूर्णता का सबसे आदिम और उच्चतम शिखर पैगंबर मुहम्मद सल्ल. हैं, और हर युग में 'संत' (औलिया) इस वास्तविकता के उत्तराधिकारी व सर्वोत्तम प्रतिनिधि होते हैं। पूर्ण संत या वली ईश्वर और सृष्टि के बीच एक सेतु का काम करते हैं, जिनके माध्यम से दैवीय ज्ञान संसार में प्रवाहित होता है। संपूर्ण ब्रह्मांड एक धुंधले या आंशिक दर्पण की तरह है, लेकिन मनुष्य (विशेषकर पूर्ण व्यक्ति) एक साफ और पॉलिश किए गए दर्पण की तरह है जो ईश्वर के सभी रूपों को पूरी तरह प्रतिबिंबित करता है। मनुष्य ही इन गुणों और नामों को सामूहिक या कृत्रिम रूप से प्रकट करता है। इसलिए उन्हें सूक्ष्म जगत और सम्मानित प्रतीक (अल-मुख्तासर अल-शरीफ) और सबसे सार्वभौमिक प्राणी (अल-कौन अल-जामी) कहा जाता है। इसलिए मनुष्य पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि होने के कारण उच्च सम्मान और गरिमा का हक़दार है। यह श्रेष्ठ पद अकेले पूर्ण व्यक्ति को जाता है, और यह दो कारणों से होता है: एक वह अपने आप में, ईश्वर के सभी गुणों और नामों में एकता के आधार पर ईश्वर की एक आदर्श अभिव्यक्ति है और दूसरे वह किसी प्रकार के अनुभव में उसके साथ अपनी आवश्यक एकता को महसूस करने के माध्यम से पूरी तरह से ईश्वर को जानता है।

नैतिक और धार्मिक निहितार्थहज़रत इब्न अरबी की दुनिया में सब कुछ नियतिवाद के अधीन है। सब कुछ वही है जो अनंत काल से है और कुछ भी इसे बदल नहीं सकता, यहां तक कि स्वयं ईश्वर भी नहीं। अस्तित्व का मौलिक नियम है कि जो आप अपनी प्रसुप्ति (थुबत) की स्थिति में हैं, वही आप अपने जागृत अवस्था (जुहुर) में होंगे। यह आत्म-साक्षात्कार है। थुबत का अर्थ है स्थिर होना या ईश्वरीय ज्ञान में अदृश्य रूप से बने रहना। हर संभावित वस्तु (मुमकिन) के प्रकटीकरण से पहले दिव्य चेतना में एक निश्चित और अपरिवर्तनीय वास्तविकता होती है। जुहुर का अर्थ प्रकटीकरण या बाहर आना है। जब वह ईश्वरीय श्वास (नफ़स अर-रहमान) के माध्यम से बाहरी अस्तित्व में आती है, तो वह वैसी ही दिखती है जैसी वह अपने थुबत में थी। इब्न अरबी के अनुसार, बाहरी दुनिया में आने के बाद भी वस्तु का मूल स्वरूप बदलता नहीं है; वह अपने 'थुबत' में स्थिर रहते हुए ही 'जुहुर' दर्शाती है।

अपने स्वभाव का पालन करने और धार्मिक आदेश का पालन करने में अंतर है। सभी प्राणी-अपने स्वयं के क़ानून का पालन करते हैं जिसे रचनात्मक क़ानून (अल-अमर अल-तकविनी) कहा जाता है। दूसरी ओर, कुछ प्राणी धार्मिक क़ानून (अल-अमर अल-तक्लिफ़ी) का पालन करते हैं जबकि अन्य उसकी अवज्ञा करते हैं। तकविनी सृजन और उसकी प्रकृति से जुड़ा है जिसमें किसी का वश नहीं चलता, जबकि तक्लिफ़ी इंसान के कर्तव्यों और आज्ञापालन से जुड़ा है जिसमें इंसान को चुनने की स्वतंत्रता दी गई है। हर कोई अपनी प्रकृति के प्रत्युत्तर में रचनात्मक आज्ञाओं का पालन करता है, और ऐसा करने से परमेश्वर की इच्छा का पालन करता है, भले ही यह आज्ञाकारिता भी धार्मिक या नैतिक आज्ञा की आज्ञाकारिता या अवज्ञा है। कोई भी कर्म अपने आप में न तो अच्छा है और न ही बुरा, न धार्मिक और न ही अधार्मिक। यह केवल शुद्ध और सरल क्रिया है। यह सच है कि उन्होंने ईश्वर के विचार को कभी नहीं खोया, लेकिन उनके ईश्वर प्रकट धर्मों के श्रेष्ठ ईश्वर नहीं हैं, बल्कि निरपेक्ष व्यक्ति हैं जो अपने आप को अस्तित्व के हर रूप में और उच्चतम स्तर पर मनुष्य के रूप में प्रकट करते हैं। इब्न अरबी के अनुसार, संपूर्ण अस्तित्व (वुजूद) केवल एक ही वास्तविक सत्ता (अल-हक्क, यानी ईश्वर) का है। इसलिए, सृष्टिकर्ता और रचना के बीच एक आंतरिक संबंध है। उन्होंने कभी भी ईश्वर की उपस्थिति को सृष्टि से अलग नहीं माना। इब्न अरबी का मानना था कि धार्मिक संकीर्ण मान्यताएं (dogmas) ईश्वर को एक विशेष रूप या अपने-अपने धर्म के दायरे में सीमित कर लेते हैं, जबकि वास्तविक दिव्य सार (Essence) सभी सीमाओं और रूपों से परे एक निरपेक्ष वास्तविकता है। ईश्वर अपनी छिपी हुई अवस्था से बाहर आने और खुद को जानने की इच्छा (तजल्ली) के कारण, ब्रह्मांड और अस्तित्व के विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। उनके दर्शन में उच्चतम स्तर पर मनुष्य (विशेषकर पैगंबर या पूर्ण मनुष्य) वह दर्पण है जिसमें ईश्वर अपने सभी नामों और गुणों को सबसे स्पष्ट रूप से देखता और प्रकट करता है। संक्षेप में, उनका ईश्वर केवल किसी एक धार्मिक परंपरा तक सीमित देवता नहीं, बल्कि संपूर्ण अस्तित्व का आधार और चेतना का चरम रूप है, जो मनुष्य के माध्यम से अपनी पूर्णता को अनुभव करता है।

ऐसा कहा गया है कि उन्होंने धर्म को रूढ़िवादी अर्थों में रद्द कर दिया है जिसमें इसे आमतौर पर समझा जाता है। यह पूरी तरह सच नहीं है। उन्होंने कई अच्छी अवधारणाओं को दूर कर दिया है जो मुस्लिम न्यायविदों और धर्मशास्त्रियों द्वारा इतनी संकीर्ण रूप से समझी गई थीं, और उनके स्थान पर अन्य अवधारणाएं पेश कीं जो उनकी आध्यात्मिकता में बहुत गहरी हैं और उनके किसी भी मुस्लिम पूर्ववर्ती की तुलना में अधिक व्यापक हैं। हर चीज़ की सार्वभौमिकता के बारे में उनके विचार - प्रेम, धर्म - को मानव विचार के इतिहास में मील का पत्थर माना जा सकता है।

इसीलिए सूफ़ी यह मानते हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि का उद्गम एक परम सत्ता (अल्लाह/ईश्वर) से हुआ है और इसका लक्ष्य उस उस दिव्य स्रोत में पूरी तरह लय या विलीन हो जाना है। लेकिन रूढ़िवादी इस्लाम को यह बात स्वीकार नहीं है, हालाँकि सूफ़ियों की भाँति यह भी एकेश्वरवादी ईश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन दोनों के एकेश्वरवाद में भेद है। रूढ़िवादी इस्लाम के अनुसार परमात्मा अपने जैसा अकेला है, उनके जैसा और कुछ नहीं है। वह अपने ज़ात (सत्ता), सिफ़त (गुण) और कर्म में अकेला है। वह सृष्टि के सभी पदार्थों से भिन्न है। सम्पूर्ण सृष्टि उसके प्रकाश से प्रकाशित है। जिस प्रकार सूर्य की रश्मियाँ सूर्य से निकलती है, फिर भी सूर्य ज्यों का त्यों बना रहता है। बहुत सारे सूफ़ी ऐसे भी है, जो कहते है कि यह सृष्टि दर्पण  के समान है, जिसमें परमात्मा के गुण प्रतिबिंबित होते हैं। परमात्मा और सृष्टि के इस सम्बन्ध तक पहुँचने की प्रक्रिया के बीच सूफ़ियों ने कई स्तरों का ज़िक्र किया है।

पहला स्तर वह है, जहाँ परमात्मा निरपेक्ष, निर्गुण, अनभिव्यक्त थे, सम्बन्ध विहीन थे, यह अवस्था अहदियत थी। यह ईश्वर का वह शुद्ध और परम स्वरूप है जहाँ वह पूरी तरह से एकांत, निराकार और सभी गुणों व संबंधों से परे है।

दूसरी अवस्था  उन्हें अपनी सत्ता और शक्ति का ज्ञान हुआ। यह अवस्था वहदत थी। यह वह अवस्था है जहाँ ईश्वर के भीतर उसकी असीम विशेषताओं (सिफ़ात) और नामों का पहला आभास या प्रकटीकरण होता है।

तृतीय अवस्था में जीवन, प्रकाश, अहं , इच्छा का आविर्भाव हुआ जो वाहिदियत कहलाई। इसे कसरत (बहुलता) का शुरुआती बिंदु कहा जाता है, जहाँ तमाम संभावित वास्तविकताएं और सृष्टि का ज्ञान ईश्वर के मन में प्रकट होता है।

चौथी अवस्था  में जब सत्ता के विभिन्न गुण जीवन, ज्ञान, शक्ति, सुनना, बोलना आदि प्रकट होते है, तब वह ‘लाहूत (देवत्व) के नाम से अभिहित होते हैं। यह दिव्यता का वह उच्च लोक या आयाम है जो विशुद्ध दिव्य सार (ज़ात) से संबंधित है।

पांचवीं अवस्था में जब ये उसके क्रियात्मक गुण रूप धारण करके सृष्टि करते हैं, जीवनदान करते हैं, तब जबरूत (शक्ति) कहलाती है। यह शक्ति और प्रभुत्व का लोक है, जिसे आमतौर पर फरिश्तों और अर्क़ाक (आध्यात्मिक ऊर्जाओं) का जगत माना जाता है।

छठी अवस्था में यह क्रियाशील गुण जब भौतिक जगत में अभिव्यक्त हुआ तो आलमे-नासूत कहलाए। यह भौतिक और दृश्यमान संसार है, जिसमें इंसानी जिस्म और यह नश्वर सृष्टि शामिल है।

इसलिए सूफ़ियों ने परमात्मा को जानने के लिए अपने आपको जानना आवश्यक बताया। परमात्मा तो हर कण में व्या्त हैं, लेकिन मनुष्य अपने अहं के कारण उसे देख नहीं पाता। संसार की विषय वासना, उसके और परमात्मा के साथ एकत्व के बीच दीवार है; और जब मोह के वशीभूत आत्मा को इसका ज्ञान होता है, तभी वह परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है।

सूफ़ियों के अनुसार यह आत्मा इस संसार में आने के पहले परमात्मा से अभिन्न था और वापस आत्मा को उस अभिन्नता तक पहुँचने के लिए ज़िक्र (स्मरण) और मुराक़बत (ध्यान) की अवस्था से गुजरना पड़ता है। जिसमें वज्द और वुजूद की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वज्द (भावावेश) की अवस्था में साधक परमात्मा को पाने के लिए व्याकुल हो उठता है। उसी का चिन्तन-मनन करता है और उसी के नाम की रट लगाए रहता है। सांसारिक व्यापारों से परे हो जाता है और इस अवस्था के बाद उसमें वुजूद की अवस्था आती है। जिसमें साधक को अपनी अलग सत्ता का ज्ञान नहीं होता है।

इब्न अरबी के इस दर्शन के कारण इस्लामी इतिहास में उनके सबसे बड़े आलोचक इब्न तैमियाह के साथ उनका एक बड़ा वैचारिक टकराव हुआ था। इस्लामी इतिहास में मुहियुद्दीन इब्न अरबी और इमाम इब्न तैमियाह के बीच का वैचारिक टकराव केवल दो विद्वानों की बहस नहीं थी। यह असल में रहस्यवाद (Mysticism/सूफीवाद) और रूढ़िवाद (Literalism/शरिया की शाब्दिक व्याख्या) के बीच की एक ऐतिहासिक जंग थी। यह विवाद इब्न अरबी की मृत्यु के बाद तब गहराया जब उनके दर्शन 'वहदत अल-वुजूद' (अस्तित्व की एकता) को उनके शिष्यों ने व्यवस्थित रूप से प्रचारित किया। इस पूरे विवाद की जड़ में यह सवाल था कि "ईश्वर एक है" (तौहीद) का सही अर्थ क्या है? इब्न अरबी के दृष्टिकोण में वजूद (अस्तित्व) केवल एक ही है और वह ईश्वर है। यह संसार उसी का प्रतिबिंब है। जबकि इब्न तैमियाह का मानना था कि ईश्वर (स्रष्टा) और संसार (सृष्टि) दो पूरी तरह अलग और भिन्न वास्तविकताएं हैं। इब्न अरबी के अनुसार साधक अपनी साधना के चरम पर ईश्वर के साथ एकत्व (Union) महसूस कर सकता है। इब्न तैमियाह का मानना था कि बंदा कभी ईश्वर नहीं हो सकता। इंसान का काम केवल आज्ञापालन (इबादत) है, विलीन होना नहीं। इब्न अरबी के अनुसार ज्ञान का स्रोत कश्फ़ यानी दिव्य प्रेरणा, रूहानी अनुभव और आंतरिक अंतर्दृष्टि है। इब्न तैमियाह का मानना था कि यह नक़्ल (Naql) है, केवल कुरान, हदीस और शुरुआती पूर्वजों (सलफ) की शाब्दिक समझ ही ज्ञान का स्रोत है। इब्न तैमियाह (1263–1328 ईस्वी) ने इब्न अरबी की किताबों, विशेषकर फूसूस अल-हिकम का गहरा अध्ययन किया था। उन्होंने इब्न अरबी के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अपनाया। इब्न तैमियाह का मानना था कि 'वहदत अल-वुजूद' का सीधा मतलब यह निकलता है कि "ईश्वर और प्रकृति एक ही हैं"। उन्होंने तर्क दिया कि यदि सब कुछ ईश्वर है, तो बिल्ली, कुत्ता, गंदगी और यहाँ तक कि फिरौन भी ईश्वर का हिस्सा हो जाएंगे, जो इस्लाम के खिलाफ घोर ईशनिंदा (कुफ्र) है। उनका तर्क था कि यदि संसार में केवल ईश्वर का ही अस्तित्व है, तो फिर पाप और पुण्य, अच्छे और बुरे का अंतर ही समाप्त हो जाएगा। इससे शरिया (इस्लामी कानून) के पालन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी। इब्न तैमियाह ने आरोप लगाया कि इब्न अरबी ने शुद्ध इस्लामी तौहीद में यूनानी दर्शन (Greek Philosophy) और नव-प्लेतोवाद (Neo-Platonism) की मिलावट कर दी है।

इब्न अरबी के समर्थकों में उनके प्रमुख शिष्य सद्र अल-दीन अल-कुनावी और बाद के सदियों में महान विद्वान जैसे जलादुद्दीन रूमी, इमाम अल-सुयुति, और ऑटोमन साम्राज्य के मुफ्ती शामिल थे। उन्होंने इब्न तैमियाह के आरोपों का जवाब दिया। समर्थकों ने कहा कि इब्न तैमियाह सूफियों की रहस्यमयी और रूपकात्मक भाषा (Metaphorical Language) को साधारण कानूनी चश्मे से देख रहे हैं। सूफियों के ग्रंथ 'अखबार के लेख' नहीं हैं जिन्हें सतही तौर पर समझा जाए। समर्थकों ने स्पष्ट किया कि इब्न अरबी यह नहीं कह रहे थे कि "यह भौतिक संसार ही ईश्वर है" (सर्वेश्वरवाद)। बल्कि वे यह कह रहे थे कि इस संसार का अपना कोई स्वतंत्र वजूद नहीं है। जैसे सूरज की रोशनी के बिना धूप का कोई वजूद नहीं होता, वैसे ही ईश्वर के बिना इस संसार का कोई अस्तित्व नहीं है। समर्थकों ने तर्क दिया कि इब्न अरबी स्वयं शरिया के कड़े पाबंद थे (वे जाहिरी संप्रदाय से प्रभावित थे)। उनका दर्शन साधकों को शरिया से दूर नहीं करता, बल्कि इबादत में अत्यधिक गहराई (इहसान) लाता है। इस्लामी इतिहास कई सदियों तक दो धड़ों में बंट गया। एक धड़ा (रूढ़िवादी विद्वान) इब्न अरबी को 'काफिर' (नास्तिक) घोषित करता था, जबकि दूसरा धड़ा (सूफी विद्वान) उन्हें 'वलियुल्लाह' (ईश्वर का मित्र) और 'शेख अल-अकबर' मानता था। ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) ने आधिकारिक तौर पर इब्न अरबी के विचारों को संरक्षण दिया और दमिश्क में उनकी मज़ार पर एक भव्य मस्जिद का निर्माण कराया। इसके विपरीत, आधुनिक समय में वहाबी और सलाफी आंदोलनों ने इब्न तैमियाह के विचारों को अपना आधार बनाया और इब्न अरबी के दर्शन का पुरजोर विरोध किया।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियांसूफ़ीमत

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