पाटलिपुत्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पाटलिपुत्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 2 जुलाई 2011

फ़ुरसत में ... फिर बसा पाटलीपुत्र

फ़ुरसत में ...

फिर बसा पाटलीपुत्र

IMG_0130_thumb[1]मनोज कुमार

मित्रं पिछले अंक में हमने चर्चा की थी … पाटलिपुत्र – गौरवपूर्ण इतिहास के झरोखे से झांकता उज्ज्वल भविष्य !! (लिंक)

अब आगे …

कुम्हरार के हाल के उत्खनन से ज्ञात होता है कि विश्व के प्राचीनतम महानगरों में से एक पाटलिपुत्र दो बार नष्ट हुआ था। परिनिब्बान सुत्त में उल्लेख है कि बुद्ध की भविष्यवाणी के अनुसार यह नगर केवल बाढ़, अग्नि या पारस्परिक फूट से ही नष्ट हो सकता था। 1953 की खुदाई से यह प्रमाणित होता है कि मौर्य सम्राटों का प्रासाद अग्निकांड से नष्ट हुआ था।

प्राचीन साहित्य में पाटलिपुत्र के लिए पाटलिग्राम, पाटलिपुर, कुसुमपुर, पुष्‍पपुर एवं कुसुमध्‍वज इत्‍यादि नामों का उल्‍लेख किया गया है। छठी शताब्‍दी ई. पूर्व में यह एक छोटे से गांव के रूप में था। बुद्ध जब अंतिम बार मगध गए थे तो गंगा और सोन नदियों के संगम के पास पाटलि नामक ग्राम बसा हुआ था जो पाटल या ढाक के वृक्षों से आच्छादित था। अपने निर्वाण से कुछ समय पहले भगवान बुद्ध ने एक दुर्ग को निर्माणाधीन अवस्‍था में देखा था। अजातशत्रु ( मगध सम्राट, 492-460 ई पू ) ने सर्वप्रथम यहां एक सैन्य शिविर का निर्माण कराया। मगधराज अजातशत्रु ने लिच्छवीगणराज्य का अंत करने के पश्चात, एक मिट्टी का दुर्ग पाटलिग्राम के पास बनवाया जिससे मगध की लिच्छवियों के आक्रमणों से रक्षा हो सके।  पाटलिपुत्र की स्थापना का श्रेय अजातशत्रु के पुत्र उदायिन ( 460-444 ई पू ) को जाता है। सामरिक दृष्टिकोण से इसकी भौगोलिक स्थिति से प्रभावित होकर अजातशत्रु के पुत्र उदयन ने 5वीं शताब्‍दी ई.पूर्व के मध्‍य मगध की राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र स्‍थानान्‍तरित कर दिया। अजातशत्रु तथा उसके वंशजों के लिए पाटलिपुत्र की स्थिति महत्त्वपूर्ण थी। अब तक मगध की राजधानी राजगृह थी किंतु अजातशत्रु द्वारा वैशाली (उत्तर बिहार) तथा काशी की विजय के बाद मगध के राज्य का विस्तार भी काफ़ी बढ़ गया था और इसी कारण अब राजगृह से अधिक केंद्रीय स्थान पर राजधानी बनाना आवश्यक हो गया था। मौर्य शासनकाल ( 323-185 ई पू ) में विशाल मगध साम्राज्य की राजधानी के रूप में पाटलिपुत्र का अभूतपूर्व उत्कर्ष हुआ। तब से लेकर लगभग एक हजार वर्ष तक शिशुनाग, नन्‍द, मौर्य, शुंग एवं गुप्‍त इत्‍यादि वंशो के शासन काल में पाटलिपुत्र ही मगध साम्राज्‍य की राजधानी थी। बिम्बिसार, अजातशत्रु, उदायिन, नंदिवर्द्धन, महापद्मनंद, चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार, अशोक, चन्द्रगुप्त द्वितीय, समुद्रगुप्त, वर्ष, उपवर्ष, पाणिनी, कौटिल्य ( चाणक्य ), नेमिनाथ, मोग्गलिपुत्त तिष्य, कात्यायन, पतंजलि, नागसेन ( यूनानी राजा मिनांदर अथवा मिलिन्द के गुरू ), अश्वघोष, आर्यभट, वराहमिहिर, वसुवंधु, उमास्वाति ( जैन दार्शनिक ), आदि इस नगर से जुड़े रहे।

जैनग्रंथ विविध तीर्थकल्प में पाटलिपुत्र के नामकरण के संबंध में उल्लेख है कि आजातशत्रु की मृत्यु के पश्चात उसके पुत्र उदयी ने अपने पिता की मृत्यु के शोक के कारण अपनी राजधानी को चंपा से अन्यत्र ले जाने का विचार किया और शकुन बताने वालों को नई राजधानी बनाने के लिए उपयुक्त स्थान की खोज में भेजा। ये लोग खोजते-खोजते गंगातट पर एक स्थान पर पहुंचे। वहां उन्होंने पुष्पों से लदा हुआ एक पाटल वृक्ष (ढाक या किंशुक) देखा जिस पर एक नीलकंठ बैठा हुआ कीड़े खा रहा था। इस दृश्य को उन्होंने शुभ शकुन माना और यहाँ पर मगध की नई राजधानी बनाने के लिए राजा को मन्त्रणा दी। फलस्वरूप जो नया नगर उदयी ने बसाया उसका नाम पाटलिपुत्र या कुसुमपुर रखा गया। बिहार और आस-पास के क्षेत्रों में आज भी आहार-रत नीलकंठ का दर्शन शुभ माना जाता है।

शिक्षा, व्‍यापार कला और धर्म आदि क्षेत्रों में भी यह एक महत्‍वपूर्ण केंद्र था । चंद्रगुप्‍त मौर्य के शासनकाल में विख्‍यात जैन आचार्य स्‍थूल भद्र द्वारा यहां जैन वैरागियों का एक संगति का आयोजन किया गया था। अशोक के काल में यहां तृतीय बौद्ध संगति का आयोजन हुआ था। कुछ विद्धानों की ऐसी मान्‍यता है कि प्रारंभिक पाल युग में भी पाटलिपुत्र का अस्तित्‍व राजधानी के रूप में बना हुआ था। इसके बाद इसकी पहचान राजधानी के रूप में समाप्‍त हो गई।

अनेक यशस्‍वी रचनाकारों का संबंध भी पाटलिपुत्र से रहा है। अर्थशास्‍त्र के रचयिता कौटिल्‍य (चाणक्‍य) तथा महाभाष्‍य के रचयिता पंत‍जलि के नाम विशेष उल्‍लेखनीय है।

पांचवी सदी के सुप्रसिद्ध चीनी यात्री फाहयान ने पाटलिपुत्र का वर्णन एक वैभवशाली नगर तथा ख्‍यातिलब्‍ध शिक्षा केंद्र के रूप में किया है। लगभग 300 ई.र्पू. में चंद्रगुप्‍त मौर्य के शासनकाल में सुप्रसिद्ध यूनानी राजदूत मेगास्‍थनीज की पुस्‍तक इंडिका में पहली बार हमें पाटलिपुत्र एवं इसके नगर प्रशासन आदि के विषय में विस्‍तृत विवरण प्राप्‍त होता है जिसमें इसके लिए पालिबोथ्रा नाम प्रयोग किया गया है। इसमें प्राप्त विवरण के अनुसार यह नगर एक समानान्‍तर चतुर्भुज के रूप में बसा था। जिसका विस्‍तार गंगा तट के साथ-साथ पूर्व-पश्चिम लगभग 14 किलोमीटर तथा उत्तर में दक्षिण लगभग 3 किलोमीटर था। नगर की परिधि का माप लगभग 36 कि.मी. था। नगर को लकड़ी के विशाल स्‍तंभो की सुदृढ़ प्राचीर द्वारा सुरक्षित किया गया था अतिरिक्‍त सुरक्षा के लिए प्राचीर के बाहर एक चौड़ी तथा गहरी खाई थी जिसका नाले के रूप में भी व्‍यवहार किया गया था और जिसमें जिसमें सोन नदी का पानी भरा रहता था। कौटिल्‍य के अर्थशास्‍त्र में भी नगर के चारो ओर एक चौड़ी सुरक्षा प्राचीर का उल्‍लेख मिलता है।

IMG_1399पटना से सटा कुम्हरार जहां कभी मौर्य राजाओं का महल हुआ करता था अस्सी स्तंभों वाले सभागार के नीचे से एक चौड़ी नहर बहती थी जिसमें सोन नदी से पानी आता है। खुदाई में मिले अवशेषों के अनुसार सभागार में पहुंचने के लिए नौकाओं का भी सहारा लिया जाता था लेकिन खुदाई के बाद नहर के पानी को संभालने की कोई व्यवस्था नहीं हुई और पूरा हिस्सा पानी में डूब गया।

लोहानीपुर, बहादुरपुर, सन्‍दलपुर, बुलंदी बाग, कुम्‍हरार सहित पटना के अन्‍य कई स्‍थलों पर किए गए विभिन्‍न उत्‍खनन द्वारा काठ से बने सुरक्षा प्राचीर के अवशेष प्राप्‍त हुए हैं। मेगास्‍थनीज ने चंद्रगुप्‍त मौर्य के काठ से बने हुए राजभवन का भी उल्‍लेख किया है। जो ईरान के सूजा और एकबतना महलों से भी अधिक सुंदर तथा भव्‍य था। कुम्हरार के उत्‍खनन के द्वारा चमकदार एकाश्‍म स्‍तंभों वाले मौर्यकालीन सभागार का भग्नावशेष प्रकाश में आया है। यह आधुनिक ईरान के परसोपोलिस महल के समतुल्‍य है।

बुकानन के द्वारा सबसे पहले पाटलिपुत्र के प्राचीन भग्नावशेष का सर्वेक्षण किया गया था। अंग्रेज विद्वान सर एलेक्‍जेंडर कनिंघम एवं वेगलर द्वारा भी प्राचीन पाटलिपुत्र के अवशेषों की पहचान करने का प्रयास किया गया। फिर से 1892 में अंग्रेज विद्वान बाडेल ने पटना की गहन खोजकर 1894 में उत्‍खनन करवाया। विख्‍यात विद्धान श्री पी.सी. मुखर्जी ने भी 896-97 में उत्‍खनन करवाया। परंतु बड़े पैमाने पर इस जगह की खुदाई 1911-12 से लेकर 1914-15 तक बी.बी स्‍पूनर ने किया। इस काम के लिए वित्तीय सहयोग रतन टाटा ने दिया। एक लम्बे अंतराल के बाद डा. ए.एस. अलतेकर एवं श्री विजयकांत मिश्र के निर्देशन में इस जगह का उतखनन 1951-55 तक किया गया। इन उत्‍खननों से 80 खम्‍भों वाला सभागार तथा आरोग्‍य विहार, के अवशेष प्राप्‍त हुए। इस चिकित्‍सालय सह संघाराम का संचालन गुप्‍तकाल के महान चिकित्‍सक धन्‍वन्‍तरि द्वारा किया जाता था।

कुम्‍हरार स्थित स्‍तंभों से युक्‍त मौर्यकालीन सभागार के भग्नावशेष में 80 स्‍तंभ आनावृत किए IMG_1394गए थे। इसी कारण 80 स्‍तंभों वाला सभागार इसका प्रचलित नाम है। इसके अलावे चार और स्‍तंभ मिले हैं जो संभवतः द्वार मण्‍डप के थे। दक्षिण की ओर प्रदेश द्वार वाले इस महाकक्ष में पूर्व से पश्चिम 8-8 स्‍तंभों की दस पंक्तियों थी। जिनके बीच परस्‍पर अन्‍तराल लगभग 4.57 मीटर था। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिला के अन्‍तर्गत चुनार की खदाने के बलुए पत्‍थर से बने स्‍तंभ एकाश्‍म थे तथा मौर्यकालीन विशिष्‍ट चमक से युक्‍त थे। सभी स्‍तंभों की उँचाई लगभग 9.75 मीटर थी। जिसका लगभग 2.74 मीटर भाग फर्श की सतह से नीचे था। इनको काठ से बने हुए वर्गाकार आधार संरचना के सहारे खड़ा किया गया था। सभागार की छत तथा फर्श भी काठ से बने थे। दीवारों के कोई चिह्न नहीं मिलने के कारण अनुमान है कि यह भवन एक खुले मण्‍डप के रूप में रहा होगा। छत को ईंटों से आच्‍छादित कर के ऊपर से चूने का प्‍लास्‍टर किया गया था। प्रवेश द्वार के IMG_1401नजदीक साल की लकड़ी से बने सात चबूतरे थे जिसके सहारे लगभग तीस पदों वाली सीढि़यां बनी थी। ये सीढि़यां लगभग 13.10 मीटर चौड़ाई और 3.04 मीटर वाली एक नहर तक पहूँचती थी जो सोन नदी से जुड़ी थी। इनका व्‍यवहार मौका द्वारा आने वाले विशिष्‍ट आगन्‍तुक सभागार तक पहुँचने के लिए करते थे। विशाल एकाश्‍म स्तंभों को चुनार की खादानों से गंगा मार्ग द्वारा यहां तक पहुँचाने में भी इस नहर का प्रयोग किया गया होगा। विभिन्‍न विद्वानों द्वारा इस भवन का वर्णन अशोक का महल, मौर्य राजाओं का सिंहासन कक्ष, रंगमहल, सभाकक्ष आदि विभिन्‍न रूपों में किया गया है। लेकिन सबसे अधिक मान्‍य मत के अनुसार यह तीसरी शती ई.र्पू. अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र में आयोजित तृतीय बौद्ध संगति के लिए बना सभागार था।

IMG_1424811 ई॰ के लगभग बंगाल के पाल-नरेश धर्मपाल द्वितीय ने कुछ समय के लिए पाटलिपुत्र में अपनी राजधानी बनाई। इसके पश्चात सैकड़ों वर्ष तक यह प्राचीन प्रसिद्ध नगर विस्मृति के गर्त में पड़ा रहा। बख़्तियार ख़लजी ने नालंदा को जला डाला। पठानों, खलजियों और तुग़लकों ने बारी-बारी से हमले किये और बिहार को तबाह कर डाला। दुनिया का यह सबसे ख़ूबसूरत शहर विध्वंस का शिकार हो चुका था। लेकिन इस नगर का सौभाग्य अभी सोया नहीं था। यह शहर सृजन और विनाश के दो पाटों से गुजरता रहा।

IMG_14281541 ई॰ में शेरशाह ने पाटलिपुत्र को पुन: एक बार बसाया क्योंकि बिहार का निवासी होने के कारण वह इस नगर की स्थिति के महत्व को भलीभांति समझता था। अब यह नगर पटना कहलाने लगा और धीरे-धीरे बिहार का सबसे बड़ा नगर बन गया। शेरशाह से पहले बिहार प्रांत की राजधानी बिहार नामक स्थान में थी जो पाल-नरेशों के समय में उद्दंडपुर नाम से प्रसिद्ध था। शेरशाह ने पंजाब से मालवा और गुजरात तक अपना आधिपत्य जमाया। फिर पटना मुग़ल साम्राज्य के अधीन रहा।  जहांगीर के द्वितीय पुत्र परवेजशाह ने 1626 ई में यहां एक मस्जिद बनवाई जो आज भी पत्थर की मस्जिद के रूप में मौजूद है। 1697 ई में बिहार के सूबेदार के रूप में औरंगजेब के पोते अजीमुश्शान की नियुक्ति की गई। पूरब में जब मुग़ल कमजोर हुआ तो बंगाल के सूबेदारों ने इसपर क़ब्ज़ा जामाया। सिराजुद्दौला और मीरज़ाफ़र के नष्ट होने पर नवाब मीरकासीम ने पाटलिपुत्र को नवजीवन दिया। शेरशाह के पश्चात मुग़ल-काल में पटना ही स्थायी रूप से बिहार प्रांत की राजधानी रही। ब्रिटिश काल में 1892 में पटना को बिहार-उड़ीसा के संयुक्त सूबे की राजधानी बनाया गया। 1912 में बंगाल का विभाजन के फलस्वरूप बिहार नाम का राज्य अस्तित्व में आया । 1935 में उड़ीसा इससे अलग कर दिया गया। सन् 2000 में झारखंड राज्य इससे अलग कर दिया गया। पटना आज भी बिहार की राजधानी है और पुनर्निर्माण के दौर से गुज़र रहा है।

शनिवार, 25 जून 2011

फ़ुरसत में ... पाटलिपुत्र – गौरवपूर्ण इतिहास के झरोखे से झांकता उज्ज्वल भविष्य !!

फ़ुरसत में ...

पाटलिपुत्र गौरवपूर्ण इतिहास के झरोखे से झांकता उज्ज्वल भविष्य !!

vcm_s_kf_repr_832x624मनोज कुमार

महात्मा गाँधी सेतु से गंगा नदी का दृश्य

एम.एस.सी. की पढाई पूरी हो चुकी थी, आगे क्या करना है यह प्रश्न सामने था। उत्तर बिहार में ज़्यादा स्कोप था नहीं, पटना में सिविल सर्विसेज़ की तैयारी के लिए कोचिंग इंस्टीच्यूट में दाखिला ले लिया। अब समस्या थी भरण पोषण की ? संयोग से तब पटना के साइंस कॉलेज को गंगा प्रदूषण के ऊपर शोध करने के लिए एक प्रोजेक्ट मिला था। अखबार में जुनियर रिसर्च फ़ेलो का विज्ञापन देख उसके लिए आवेदन किया। पटना साइंस कॉलेज के विद्यार्थियों के बीच बिहार विश्वविद्यालय मुज़फ़्फ़रपुर से आया एक मात्र मैं ही बाहरी कैंडिडेट था। पर सलेक्शन हो गया। तब आठ सौ रुपये मिलते थे। हमारा पटने में रहने खाने पीने का जुगाड़ बैठ गया। दो-तीन साल के शोध के बाद पटना स्थित बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद में साइंटिस्ट के रूप में नियुक्ति मिली। एक दो साल उधर भी किस्मत आजमाई और गांगा मां की सेवा करते रहे। 1989 में सिविल सर्विसेज़ द्वारा चुन लिए गए और फिर पटना छूट सा गया।

इधर मई-जून में तीन बार अपने ही शहर को वर्षों बाद देखने का अवसर मिला। बहुत बदल सा गया यह शहर... नहीं-नहीं बिल्कुल भी नहीं बदला था। बिल्कुल बिहारियों की तरह ही, चाहे कहीं पहुंच जाएं, कुछ भी बन जाएं, सड़क को सरक कहेंगे ही।

इस बार कुछ समय निकाल कर पटना को एक बार फिर देखने निकल गया। दो जगह खास तौर से देखा, जिन्हें पहले नहीं देखा था, सुना ज़रूर था। एक तो कुम्रहार की खुदाई में मिले भग्नावशेष और दूसरा पटना म्यूज़ियम, जिसे हम पहले जादूघर कहते थे।

वर्तमान शासक ने पटना की छवि बदलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। कई फ़्लाई ओवर के आ जाने से यातायात की गति ठहरे हुए बिहार में तेज़ हुई है। चाणक्य विधि विश्वविद्यालय और चन्द्रगुप्त प्रबंधन संस्थान के आने से निश्चित रूप से पटना का गौरव भी बढ़ता हुआ प्रतीत हुआ। तो आज फ़ुरसत में ... पटलिपुत्र गौरवपूर्ण इतिहास के झरोखे से झांकता उज्ज्वल भविष्य !!

कभी अज़ीमाबाद, कुसुमपुर, पाटलिपुत्र, और अब पटना, मेट्रो की राह पर जाता हुआ दिखा मुझे। इन नए विद्याध्ययन केन्द्र के आने से एजुकेशनल हब बनता जा रहा है। जगह जगह पर पार्क बन चुके हैं, बन रहे हैं। हाइटेक शहर भी होता जा रहा है। अब जिस शहर का इतिहास हजारों साल का हो वहां तंग सड़कें और गलियां होना तो लाजिमी है, पर जहां-जहां संभव हो सकता था सड़कें चौड़ी और बड़े-बड़े, ऊंचे-ऊंचे अपार्टमेंट भी दिखे, मिले।

बिहार का अतीत गौरवपूर्ण रहा है। बिहार की राजधानी पटना का इतिहास बेमिसाल रहा है। इसने कई उतार-चढाव देखे हैं। देखी और झेली है लुटेरी सेनाओं की लूट-खसोट। ख़ूनी तलवारों का खेल देखा है। साथ ही न सिर्फ़ सुना बल्कि पूरे विश्व को दिया शांति का उपदेश, शांति का संदेश।

vcm_s_kf_repr_832x624ईसा से 304 वर्ष पूर्व चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में भारत आए सुप्रसिद्ध यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में लिखा है कि भारत के इस महानतम नगर पाटलिपुत्र (पटना) की सुंदरता और वैभव का मुक़ाबला सूसा और एकबतना जैसे नगर के महल भी नहीं कर सकते। वह मौर्य वंश का शासनकाल था। ठीक 715 साल बाद जब वर्ष 411 में चीनी यात्री फाहियान इस नगर में दाख़िल हुआ तो वह भी यहां की सुंदरता, वैभव एवं उच्च सांस्कृतिक छटा देखकर चकित और अभिभूत था। उसने इस नगर को देवों द्वारा निर्मित बताया। अशोक के राजमहल की चर्चा करते हुए उसने लिखा है कि ये सब किन्हीं अशरीरी दिव्य आत्माओं द्वारा बनाए गए मालूम होते है। जिस प्रकार पत्थरों के खंभे, दीवार, द्वार और उन पर की गईं नक्काशियों तथा स्थापत्य-मूर्तिकला का काम दिखता है, वह मनुष्यों द्वारा किसी भी प्रकार संभव नहीं है।

जब मेगस्थनीज आया था, तब भी पाटलिपुत्र राजधानी था और जब फाहियान आया, तब भी। ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी से लेकर ईसा पश्चात 9वीं शताब्दी यानी लगभग 14 सौ सालों तक पाटलिपुत्र लगातार राजधानी होने का अद्भुत कीर्तिमान अपने नाम रखता था।

पाटलिपुत्र उच्च सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक, प्रशासनिक एवं राजनीतिक केंद्र के रूप में भी प्रतिष्ठित था। राजनीति में आदर्श का प्रतीक पुरुष चाणक्य हों या शौर्य के प्रतीक सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य या गुप्त वंश के सिरमौर समुद्रगुप्त या फिर सम्राट अशोक, इन सबने अपने कर्मों से भारत को स्वर्णिम इतिहास प्रदान किया। इसी काल में महाकवि कालिदास हुए, बाणभट्ट हुए, अद्वितीय खगोलशास्त्री आर्यभट्ट हुए। प्रसिद्ध यक्षिणी (जो दीदारगंज की खुदाई में प्राप्त हुई) जैसी कलाकृति की रचना भी इसी काल में हुई और नालंदा एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना भी। यह विश्व प्रसिद्ध व्यवसायिक केंद्र था और गंगा तट से, जहां एक बड़ा पत्तन (पोर्ट) भी था, जलमार्गीय व्यापार होता था।

प्राचीन लिच्छ्वियों की राजधानी वैशाली से बुद्ध और महावीर जुड़े रहे। महावीर का जन्म यहीं के बसाढ़ गांव में हुआ था। वैशाली पंचायती राजों का केन्द्र था। यहां गणतंत्र था। प्राचीनतम। इसने साम्राज्यों की लोभ-लिप्सा को देखा। आजातशत्रु ने वैशाली के पंचायती राज को जीत लेने की ठानी। पर उसे जीत लेना आसान नहीं था। जब उसने बुद्ध से उसे जीत लेने का उपाय पुछवाया तो बुद्ध ने उसकी अजेयता के सात कारण बताए।

जब तक वज्जियों के संघ में एकता है, जब तक उसकी संघ की बैठकें जल्दी-जल्दी होती हैं, जब तक उसके भेद गुप्त रखे जाते हैं, जब तक प्राचीन परंपराओं का उसमें आदर है, जब तक वह नारी का सम्मान करता है, जब तक उसकी मंत्रणा का भेद सुरक्षित है, और जब तक उसमें संयम है, तब तक वैशाली का संघ जीता नहीं जा सकता। कालांतर में वैशाली मिटी। पर उसका गौरमय इतिहास आज भी है।

सीता माता की जन्म स्थली भी बिहार में ही थी। सीता ने नारी जाति के सिर पर गौरव का तिलक लगाया। राजा जनक अपनी विद्वता के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी सभा ज्ञान का अखाड़ा हुआ करती थी। याज्ञवल्क्य जैसे उपनिषद के ज्ञानी यहीं से जुड़े थे। उन्होंने संसार और जन्म-मरण के भेद पर प्रकाश डाला। गार्गी जैसी विदुषी का यहां से जुड़ा होना कम सौभाग्य की बात नहीं है। वो जटिल से जटिल प्रश्न हल कर महर्षियों को चकित कर देती थी।

बिहार की धरती से ही पहले शूद्र राजा हुए। महापद्मनंद ने एक बड़ा साम्राज्य गठित किया। पूरब के सागर से यमुना के कगार तक फैला था उसका साम्राज्य। इसकी सीमा पंजाब के दक्षिण , अवंतिका, मालवा तक, काशी, कोसल, और वत्स भी उसकी सीमा में थे।

पठान ब्राम्हण पाणिनि पठानों के देश यूसुफ़ज़ई के शलातुर गांव से आकर पाटलिपुत्र में ही व्याकरण अष्टध्यायी लिखा। पाणिनि के व्याकरण की कात्यायन ने पाटलिपुत्र में ही व्याख्या लिखी।

चाणक्य और चंद्रगुप्त ने मिल कर एक महान साम्राज्य की नींव रखी। अशोक ने एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया। पाणिनि के व्याकरण पर भाष्य लिखने वाले और योग दर्शन के रचयिता महर्षि पतंजलि भी गौड़ देश से आकर पाटलिपुत्र में बस गए।

इस नगर ने दुख भी कम नहीं झेले। पाटलिपुत्र का अवसान वस्तुत: भारत की अधोगति का पर्याय बन गया। 9वीं शताब्दी के बाद भारत विदेशी आक्रमणकारियों की जागीर बन गया और यही स्थिति आज़ादी के पूर्व तक बनी रही। देश की राजधानी पाटलिपुत्र से हटा दी गई। दुनिया का यह सबसे ख़ूबसूरत शहर विध्वंस का शिकार हो चुका था।

vcm_s_kf_repr_832x624अमलाट ने पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर कितनों का वध कर डाला। राजा कनिष्क कश्मीर में बौद्ध संघ की बैठक करा रहे थे। उसने सुना कि पाटलिपुत्र में अश्वघोष नाम का महान बौद्ध पंडित और कवि है, जो कश्मीर के बौद्ध संघ में आने के लिए तैयार नहीं तो वह अपनी सेना लेकर पाटलिपुत्र पहुंचा और उन्हें उठा ले गया। चंद्रगुप्त ने साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में स्थापित की। चंद्रगुप्त द्वितीय के समय में ही राजधानी अयोध्या में स्थापित हो गई थी। गुप्त काल में पाटलिपुत्र का महत्व गुप्त साम्राज्य की अवनति के साथ-साथ कम हो चला। गुप्तों के साम्राज्य को हूणों ने तोड़ डाला। छठी शती ई॰ में हूणों के आक्रमण के कारण पाटलिपुत्र की समृद्धि को बहुत धक्का पहुंचा और उसका रहा-सहा गौरव भी जाता रहा। हर्ष के समय पाटलिपुत्र का वैभव कन्नौज चला गया। 811 ई॰ के लगभग बंगाल के पाल-नरेश धर्मपाल द्वितीय ने कुछ समय के लिए पाटलिपुत्र में अपनी राजधानी बनाई। इसके पश्चात सैकड़ों वर्ष तक यह प्राचीन प्रसिद्ध नगर विस्मृति के गर्त में पड़ा रहा। बख़्तियार ख़लजी ने नालंदा को जला डाला। पठानों, खलजियों और तुग़लकों ने बारी-बारी से हमले किये और बिहार को तबाह कर डाला। लेकिन इस नगर का सौभाग्य अभी सोया नहीं था। यह शहर सृजन और विनाश के दो पाटों से गुजरता रहा। कैसे बहुरे पाटलीपुत्र के दिन इस पर चर्चा अगले अंक में ।

(ज़ारी …! शेष अगले शनिवार)