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बुधवार, 12 फ़रवरी 2025

276. ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस का गठन

राष्ट्रीय आन्दोलन

276. ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस का गठन



1920

1903-08 का स्वदेशी उभार मजदूर आंदोलन के इतिहास में एक अलग मील का पत्थर था। कई स्वदेशी नेताओं ने स्थिर ट्रेड यूनियनों, हड़तालों, कानूनी सहायता और धन संग्रह अभियानों के आयोजन के कार्यों में खुद को पूरी तरह झोंक दिया। स्वदेशी के दिनों में मजदूर आंदोलन की शायद सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि विशुद्ध आर्थिक मुद्दों पर आंदोलन और संघर्ष से मजदूर वर्ग की उस समय के व्यापक राजनीतिक मुद्दों में भागीदारी की ओर बदलाव हुआ। 16 अक्टूबर 1905 को राष्ट्रीय विद्रोह, जिस दिन बंगाल का विभाजन लागू हुआ, बंगाल में मजदूर वर्ग की हड़तालों और हड़तालों में तेजी आई। 1905-07 के दौरान हड़ताल में शरीक मज़दूर ‘वंदे मातरम्‌’ का नारा लगाने लगे थे। अंग्रेज़ों ने भारतीय मज़दूरों को उनका दुश्मन करार किया था। ‘होम रूल’ आंदोलन ने मज़दूर आंदोलन को बहुत प्रभावित किया था। अनेक राष्ट्रवादी आंदोलनकारी नेताओं ने असहयोग आंदोलन के दौरान मज़दूरों को संगठित किया और उनके संघर्ष का नेतृत्व भी किया। मदुरै के डॉ. पी.ए. नायडू, कोयंबटूर के एम.एस. रामास्वामी आयंगार, बंबई के जोसेफ बैपटिस्ट और एन.एम. जोशी, लाहौर के दीवान चमनलाल, एम.ए. खां, बंगाल में स्वामी विश्वानंद और सी.एफ़. एन्ड्र्यूज़ बिहार में, के अलावा आर.एस. निंबकार, एस.ए. डांगे, एस.एस. मिरजकर, के.एन. जोगलेकर आदि मज़दूर नेता जो उन दिनों असहयोग आंदोलन में भी सक्रिय थे। इस तरह हम कह सकते हैं कि असहयोग आंदोलन के दौरान ही मज़दूर संगठन मज़बूत हुए। नागपुर अधिवेशन में ही मज़दूरों की दशा सुधारने का प्रस्ताव पारित कर उनकी दशा सुधारने के लिए कार्यक्रम बनाने का निर्णय लिया गया।

सबसे महत्वपूर्ण विकास 1920 में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी) का गठन था। लोकमान्य तिलक, जिन्होंने बॉम्बे के काम से घनिष्ठ संबंध विकसित किए थे, एआईटीयूसी के गठन में प्रेरक शक्तियों में से एक थे, जिसके पहले अध्यक्ष पंजाब के प्रसिद्ध उग्रवादी नेता लाला लाजपत राय थे और दीवान चमन लाल, जो भारतीय श्रमिक आंदोलन में एक प्रमुख नाम बन गए थे, इसके महासचिव थे। 31 अक्तूबर, 1920 को बंबई में लाला लाजपतराय की अध्यक्षता में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस का गठन किया गया। तिलक, एनी बेसंट और ऐंड्र्यूज इसके उपाध्यक्ष थे। बाद में अनेक राष्ट्रीय नेताओं चितरंजन दास, नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस आदि ने इसके कार्यों में रुचि ली। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अनेक नेता ‘एटक’ में विभिन्न पदों को सुशोभित करते रहे। नेहरू और लाजपत राय एक ही समय में ‘एटक’ और कांग्रेस के अध्यक्ष थे। पहले एआईटीयूसी को अपने अध्यक्षीय भाषण में लाला लाजपत राय ने इस बात पर जोर दिया कि, '...भारतीय श्रमिकों को राष्ट्रीय स्तर पर खुद को संगठित करने में कोई समय नहीं गंवाना चाहिए... इस देश में सबसे बड़ी जरूरत संगठित होना, आंदोलन करना और शिक्षित होना है। हमें अपने कार्यकर्ताओं को संगठित करना होगा, उन्हें वर्ग-चेतन बनाना होगा... 'यह जानते हुए कि 'आने वाले कुछ समय के लिए' कार्यकर्ताओं को उन बुद्धिजीवियों से सभी प्रकार की सहायता, मार्गदर्शन और सहयोग की आवश्यकता होगी जो उनके मुद्दों का समर्थन करने के लिए तैयार हैं, उन्होंने कहा कि 'अंततः श्रमिक अपने नेताओं को अपने ही बीच से खोज लेंगे।'

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मनोज कुमार

 

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संदर्भ : यहाँ पर

 

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2025

275. लोकमान्य तिलक का निधन

 

राष्ट्रीय आन्दोलन

275. लोकमान्य तिलक का निधन



1920

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जिन नेताओं ने दिशा दी उनमें से एक थे दूर दृष्टि संपन्न लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (1856-1920)। भारत में महात्मा गांधी का युग शुरू होने से पहले वह कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे। उस वक्त भारत के राजनीतिक माहौल में तिलक का जो क़द था उसे देखकर 1917 से 1922 तक देश में ब्रिटिश सेक्रेट्री ऑफ़ स्टेट फॉर इंडिया रहे सैमुअल मोंटेग्यू ने कहा था, "इस वक़्त भारत में शायद तिलक से ज़्यादा ताक़तवर कोई दूसरा शख़्स नहीं है।" उस समय के किसी भी व्यक्ति की जनता पर श्री तिलक जैसी पकड़ नहीं थी। वे निस्संदेह अपने लोगों के आदर्श थे। उनका वचन हजारों लोगों के लिए कानून था। उनकी देशभक्ति उनके लिए जुनून थी। वह जन्मजात लोकतांत्रिक थे। किसी भी व्यक्ति ने लोकमान्य की तरह स्वराज के उपदेशों का प्रचार नहीं किया। इसलिए उनके देशवासियों ने उन पर पूरी तरह से विश्वास किया। उनका आशावाद अदम्य था।

थोड़े वक्त तक बीमार रहने के बाद 1 अगस्त, 1920 में तिलक का बॉम्बे (मुंबई) में निधन हो गया। उस वक्त उनकी उम्र 64 साल थी। देश में शोक छा गया। उनके अंतिम संस्कार में दस लाख से अधिक लोग शामिल हुए। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उस रविवार को पूरा बंबई उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़ा था। लोकमान्य का भारत के प्रति प्रेम असीम था, इसलिए लोगों का भी उनके प्रति प्रेम भी उतना ही असीम था। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। जब अंतिम संस्कार के बाद तिलक की अस्थियां एक विशेष ट्रेन से उनके पैतृक शहर पुणे लाई गईं तो इसके साथ चल रहा जुलूस एक मस्जिद के सामने रुका। लोगों ने वहां अपने प्रिय नेता को श्रद्धांजलि दी और नारे लगाए- "हिंदू-मुस्लिम एकता की जय"।

गांधीजी को जब तिलक के निधन की सूचना मिली तो वे स्तब्ध रह गए और उनके मुख से निकला, मेरा सहारा छूट गया। दोनों के बीच कई विषयों पर असहमति थी, लेकिन दोनों का एक-दूसरे के प्रति असीम श्रद्धा और विश्वास था। शोकाकुल महात्मा गांधी ने अपने अखबार 'यंग इंडिया' में लिखा, "एक विशाल व्यक्तित्व चला गया। एक शेर की आवाज़ शांत हो गई। तिलक ने जिस तन्मयता और आग्रह से स्वराज की अविरल गाथा सुनाई वैसा कोई नहीं कर पाया। तिलक के बेहद नज़दीकी सहयोगी रहे मोहम्मद अली जिन्ना ने हार्दिक श्रद्धांजलि देते हुए कहा- श्री तिलक ने एक सैनिक की तरह देश की सेवा की और हिंदू-मुस्लिम एकता को बनाए रखने में अहम भूमिका अदा की। उन्हीं की वजह से 1916 में लखनऊ समझौते को ज़मीन पर उतार पाना संभव हुआ। वे आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में आने वाली पीढ़ियों तक याद किए जाएंगे। तिलक की पुण्य स्मृति में कांग्रेस ने एक करोड़ रुपए का फंड एकत्रित करने का निर्णय किया। इस हेतु 2 अक्तूबर को ‘तिलक स्वराज्य फंड’ की स्थापना की गई। एक साल के भीतर इस फंड में एक करोड़ रुपए एकत्रित हो गए।

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मनोज कुमार

 

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