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सोमवार, 21 सितंबर 2026

सूफ़ीमत... 15. साधना के चार हालात-1

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


15. साधना के चार हालात-1

पुण्य ये नहीं है कि तुम अपना मुख पूर्व अथवा पश्चिम की ओर फेर लो! पुण्य कर्म उस व्यक्ति का भाग्य है जो ईश्वर, प्रलय, देवदूतों, किताब और नबियों पर ईमान ले आए तथा फ़रिश्तों, सब पुस्तकों, नबियों पर  भी ईमान लाए, धन का मोह रखते हुए, समीपवर्तियों, अनाथों, निर्धनों, यात्रियों तथा याचकों (फ़क़ीरों) को और दास मुक्ति के लिए दिया, नमाज़ की स्थापना की, ज़कात दी, अपने वचन को, जब भी वचन दिया, पूरा करते रहे एवं निर्धनता और रोग तथा युद्ध की स्थिति में धैर्यवान रहे। यही लोग सच्चे हैं तथा यही अल्लाह से डरते हैं। (क़ुरआन : 2/177)

जब कोई साधारण व्यक्ति साधना के मार्ग पर चलने का निश्चय करता है, तो उसके लिए यह साधारण से मोमिन (धर्मनिष्ठ मुसलमान)  बनने की यात्रा का अभ्यास करने जैसा होता है। मोमिन बनने पर उसके अन्दर जब ईश-प्रेम का विकास होता है, तो वह सालिक (आध्यात्मिक मार्ग के अनुयायी ) की स्थिति में पहुंचता है। जब ईश्वर को खोजने की तीव्र अभिलाषा जाग्रत होती है, तो वह साधना के पथ पर अग्रसर होता है। अपनी साधना का रहस्य जानने, उसका अभ्यास करने और उसकी सफलता के लिए सालिक या साधक को किसी पीर की शरण लेनी ही पड़ती है। पीर उस सालिक को साधना के मार्ग पर बढ़ने का रास्ता दिखाते हैं। कई सूफ़ी साधक सूफ़ी मार्ग की तीन अवस्थाओं की ज़िक्र किया है लेकिन अधिकाँश सूफ़ी गुरुओं ने साधकों को साधना के लिए ये चार सोपान निर्धारित किए हैं

कही सरीअतचिस्ती पीरू।

उधरित असरफ़ और जहंगीरू।

राह हक़ीक़तपरै न चूकी।

पैठि मारफ़तमार बुडूकी॥

1.     शरीयत

2.     तरीक़त

3.     मारिफ़त

4.     हक़ीक़त

यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ महान सूफ़ी कवि मलिक मुहम्मद जायसी की रचना 'अखरावट' से ली गई हैं। इन पंक्तियों में सूफी साधना की चार मुख्य मंजिलों—शरीयत, तरीकत, हकीकत और मारिफतका सुंदर वर्णन किया गया है। कवि बताते हैं कि चिश्ती संप्रदाय के गुरुओं द्वारा बताए गए शरीयत (धार्मिक आचरण) के मार्ग पर चलकर ही सैयद अशरफ़ जहाँगीर जैसे संतों का उद्धार हुआ। साधक सत्य यानी हकीकत के मार्ग से कभी नहीं चूकता और अंत में मारिफत की अवस्था में प्रेम-सागर में डुबकी लगाकर परमात्मा से एकाकार हो जाता है।

15.1 शरीयत (शास्त्रमार्ग) -  शरीयत अर्थात धर्मग्रंथ, अल्लाह के बताए क़ानून का नाम है। शरीयत का अर्थ है इस्लामी कानून या जीवन पद्धति। अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए शरीयत की पाबन्दी ज़रूरी है। इसे हमारे यहां के संदर्भ में कर्मकांड कहा जा सकता है। सूफी मत में शरीयत को एक मज़बूत नींव माना जाता है। जैसे बिना नींव के कोई इमारत खड़ी नहीं हो सकती, वैसे ही शरीयत के बिना कोई भी साधक आध्यात्मिक मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता। यह इंसान के बाहरी आचरण और चरित्र को पवित्र बनाती है। शरीयत के तीन अंग हैं – इल्म (ज्ञान)अमल (कर्म) और इख़लास (निष्ठा)। जबतक ये तीनों जीवन में नहीं उतरेंगे, शरीयत पर पूरा अमल न होगा। सही और गलत का ज्ञान होना इल्म है। जो ज्ञान (इल्म) हासिल किया है, उसे अपने व्यावहारिक जीवन में लागू करना अमल है। सूफी मत में कहा जाता है कि "बिना अमल के इल्म उस पेड़ की तरह है जिसमें फल न लगे हों।" किसी भी कर्म को केवल और केवल अल्लाह (ईश्वर) की रज़ा और प्रेम के लिए करना, न कि दुनिया को दिखाने (दिखावे या 'रिया') के लिए करना इख़लास (निष्ठा) है। यह शरीयत की 'आत्मा' है। यदि आप नमाज़ पढ़ते हैं (अमल) और आपको उसका तरीका भी पता है (इल्म), लेकिन मन में दिखावा है, तो इख़लास के बिना वह कर्म आध्यात्मिक रूप से खारिज हो जाता है। यदि इल्म शरीर है, तो अमल उसकी हरकत (गति) है, और इख़लास उसकी रूह (आत्मा) है। सूफी साधक इन तीनों को एक साथ मिलाकर ही अपनी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत करते हैं।

किसी भी साधना पद्धति में आचार और विचार मुख्य होते  हैं। इन विचारों के साथ-साथ सूफ़ी लोग चार आचारों की भी बात करते हैं, ये हैं,

15.1 (क) सलात/नमाज़ प्रार्थना/पूजाअरबी शब्द सलात का अर्थ है इस्लामी पद्धति से ईश-वंदना। फ़ारसी में इसे नमाज़ कहा जाता है। सूफी मत में सलात (नमाज़) को केवल एक शारीरिक या धार्मिक कर्तव्य नहीं माना जाता, बल्कि इसे साधक की रूह (आत्मा) का खुदा से सीधा संवाद और मिलन माना जाता है। नमाज़ के द्वारा प्रत्येक मुसलमान हर रोज़ बार-बार ईश्वर की महानता, उसकी श्रेष्ठता और स्वीकृति, हज़रत मुहम्मद साहब के रसूल होने की गवाही और पैग़म्बर के परिवारजनों की श्रेष्ठता का ऐलान करता है। अज़ान की पुकार सुन एक-एक मुसलमान नमाज़ के लिए दौड़ पड़ता है। इस्लाम में पांच वक्त की नमाज़ फर्ज है, यानि पांच बार नमाज़ पढ़ना जरूरी है। नमाज़ -ए-फ़जर (उषाकाल की नमाज़) यह पहली नमाज़ है जो प्रात: काल सूर्य के उदय होने के पहले पढ़ी जाती है। नमाज़-ए-ज़ुहर (अवनतिकाल की नमाज़) यह दूसरी नमाज़ है जो मध्याह्न सूर्य के ढलना शुरू करने के बाद पढ़ी जाती है। नमाज़-ए-अस्र (दिवसावसान की नमाज़) यह तीसरी नमाज़ है जो सूर्य के अस्त होने के कुछ पहले होती है। नमाज़-ए-मग़रिब (पश्चिम की नमाज़) चौथी नमाज़ जो सूर्यास्त के तुरंत बाद होती है। नमाज़-ए-ईशा (रात्रि की नमाज़) अंतिम पांचवीं नमाज़ जो सूर्यास्त के डेढ़ घंटे बाद पढ़ी जाती है। दिन में पांच बार अज़ान दी जाती है। नमाज़ के माध्यम से व्यक्ति में अनुशानबद्धता, ईश्वर का सानिध्य, एकाग्रता, सेवाभाव, परोपकार आदि भावों का विकास होता है। पैगंबर मुहम्मद की एक प्रसिद्ध हदीस है: "अस्सलातु मेअराजुल मोमिनीन" अर्थात् "सलात (नमाज़) मोमिन (आस्तिक) की मेअराज (आध्यात्मिक उन्नति या ईश्वर से मिलन) है।" सूफी संत इसी दृष्टिकोण से सलात को देखते हैं। आम लोगों के लिए सलात दिन में पांच बार इबादत करने का एक नियम है, लेकिन एक सूफी के लिए यह अल्लाह की उपस्थिति में खड़े होने का अनुभव है। नमाज़ के दौरान साधक दुनिया की हर चीज़ को भूलकर पूरी तरह से ईश्वर में लीन हो जाता है, जिसे सूफी शब्दावली में 'फ़ना' (अहंकार का मिट जाना) की शुरुआत माना जाता है। सूफी संत बाहरी शारीरिक क्रियाओं (झुकने और सजदा करने) से ज़्यादा 'हुज़ूर-ए-क़ल्ब' (दिल की मौजूद्गी) पर ज़ोर देते हैं। उनका मानना है कि यदि सलात पढ़ते समय दिल में ईश्वर के अलावा किसी और चीज़ का ख्याल है, तो वह सलात अधूरी है। प्रसिद्ध सूफी इमाम गज़ाली के अनुसार, बिना ध्यान और प्रेम के पढ़ी गई सलात बिना रूह (आत्मा) के शरीर जैसी है। सलात में जब साधक अपना माथा ज़मीन पर टेकता है (सजदा करता है), तो सूफी मत में इसे अहंकार (नफ़्स) को पूरी तरह मिटाने का प्रतीक माना जाता है। यह इस बात की घोषणा है कि अल्लाह के सामने इंसान की अपनी कोई औकात या वजूद नहीं है। सूफियों के लिए सलात एक प्रकार का सक्रिय ध्यान है। नमाज़ में पढ़े जाने वाले कुरान के शब्दों (क़िरात) पर गहराई से विचार करना और ईश्वर के प्रेम में डूब जाना ही सूफी साधना का मूल है।

15.1 (ख) ज़कात अरबी भाषा के इस शब्द का अर्थ है – दान। इस्लाम धर्म को मानने वालों के अनुसार 622 ईस्वी में जब पैगंबर मोहम्मद सल्ल. मदीना गये और उन्होंने इस्लामिक राष्ट्र व्यवस्था की शुरुआत की, तब उस देश में ज़कात प्रणाली भी शुरू की गई थी। शरीयत में ज़कात उस माल को कहते हैं जिसे इंसान अल्लाह के दिए हुए माल में से उसके हक़दारों के लिए निकालता है। यह उन लोगों को दिया जाता है जो अपाहिज या असहाय और साधनहीन हों यह ऐसा आदेश है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी आय का चालीसवां भाग (2.5%) समाज कल्याण के लिए दान देगा। यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक अच्छा क़दम है। संसार में कोई धर्म ऐसा नहीं है जिस ने दीन दुखियों की सहायता और सेवा की प्रेरणा न दी हो और उसे इबादत (वंदना) का अनिवार्य अंश न कहा हो। परन्तु इस्लाम की यह विशेषता है कि उस ने प्रत्येक धनी मुसलमान पर एक विशेष कर निर्धारित कर दिया है जो उस पर अपनी पूरी आय का हिसाब कर के प्रत्येक वर्ष देना अनिवार्य है (क़ुरआन 9:60)। फिर उसे इतना महत्व दिया है कि कर्मों में नमाज़ के पश्चात् उसी का स्थान है। क़ुरआन में दोनों कर्मों की चर्चा एक साथ करके यह स्पष्ट कर दिया गया है कि किसी समुदाय में इस्लामी जीवन के सब से पहले यही दो लक्षण हैं, नमाज़ तथा ज़कात। यह भी निश्चित कर दिया गया है कि ज़कात का धन किन को दिया जायेगा और आयत (9:60) में उनकी चर्चा की गई है, जो यह हैः 1. फ़क़ीर  (जिस के पास कुछ न हो) 2. मिस्कीन, (जिस के पास कुछ धन हो, मगर उस की आवश्यकता की पूर्ति न होती हो) 3. ज़कात के कार्यकर्ता, 4. नये मुसलमान, 5. दास-दासी, 6. ऋणी, 7. धर्म के रक्षक, 8. और यात्री। कुरआन में कहा गया है, यदि तुम खुले दान करो, तो वह भी अच्छा है तथा यदि छुपाकर करो और कंगालों को दो, तो वह तुम्हारे लिए अधिक अच्छा है। ये तुमसे तुम्हारे पापों को दूर कर देगा तथा तुम जो कुछ कर रहे हो, उससे अल्लाह सूचित है। (2:271) अर्थात निःस्वार्थ दान जैसे भी दिया जाये, उस का प्रतिफल मिलेगा।  इस्लाम मानव में परस्पर प्रेम तथा सहानुभूति उत्पन्न करना चाहता है, इसी कारण उसने दान करने का निर्देश दिया है कि एक मानव दूसरे की आवश्यकता पूर्ति करे। तथा उस की आवश्यकता को अपनी आवश्यकता समझे। यदि इस्लाम में ज़कात के नियम का पालन किया जाये तो समाज में कोई ग़रीब नहीं रह जायेगा। धनवानों तथा निर्धनों के बीच प्रेम की ऐसी भावना पैदा हो जायेगी कि पूरा समाज सुखी और शान्तिमय बन जायेगा। धन कुछ हाथों में सीमित नहीं रह कर उस का लाभ पूरे समाज को मिलेगा। इस्लाम ने इस का नियम निर्धारित किया है, जिसका पूरा विवरण हदीसों में मिलता है। सूफी मत में ज़कात (अनिवार्य दान) को केवल एक वित्तीय नियम या टैक्स नहीं माना जाता, बल्कि इसे आत्मा की शुद्धि (तज़किया-ए-नफ़्स) और भौतिक संसार से वैराग्य का एक गहरा आध्यात्मिक माध्यम माना जाता है। ज़कात शब्द का शाब्दिक अर्थ ही है "पवित्र करना" या "बढ़ाना"। सूफियों के अनुसार, जब तक इंसान अपने धन का मोह नहीं छोड़ता, तब तक उसका दिल खुदा के प्रेम के काबिल नहीं हो सकता। सूफी साधक और उन्नत आध्यात्मिक लोग के लिए नियम 2.5% का नहीं होता। वे अपनी ज़रूरत भर का सामान रखकर बाकी सब कुछ (100% अधिशेष) अल्लाह की राह में गरीबों और मजलूमों को सौंप देते हैं। वे मानते हैं कि जो कुछ भी उनके पास है, वह अल्लाह की अमानत है, इसलिए उसे अपने पास जमा करके रखना आध्यात्मिक प्रगति में बाधा है। 'खास-उल-खास' की ज़कात (हकीकत और मारिफत का स्तर) सूफी संतों का सर्वोच्च स्तर है। इस मकाम पर पहुँचने के बाद सूफी मानते हैं कि "मेरा" कहलाने वाला कोई वजूद ही नहीं है, सब कुछ अल्लाह का ही है। वे न केवल अपने धन का, बल्कि अपने प्राणों, अपनी खुशियों और अपने वजूद का भी ज़कात (त्याग) कर देते हैं। वे खुद को पूरी तरह खुदा की रज़ा में फना कर देते हैं। ज़कात देने से नफ़्स की यह बीमारी ठीक होती है। ज़कात देकर एक सूफी यह स्वीकार करता है कि वह दुनिया के किसी भी माल का असली मालिक नहीं है। सब कुछ ईश्वर का है और उसे ईश्वर के ही बंदों पर खर्च करना है। सूफी ज़कात देते समय पूरी गोपनीयता बरतते हैं, ताकि उनके मन में 'दाता' होने का अहंकार या दिखावा (रिया) न आए।

15.1 (ग़) सौम/रोज़ा व्रत/उपवासअरबी शब्द सौम बहुवचन सियाम जिसका अर्थ रुकना तथा त्याग देना (उपवास)। फ़ारसी में इसे रोज़ा कहते हैं। इस्लाम में रोज़ा सन् दो हिजरी में अनिवार्य किया गया। ईश्वर ने रोज़ा के लिए जिस एक माह को निर्धारित कर दिया है उसे रमज़ानुल-मुबारक कहते हैं। रमज़ान का महीना वह है, जिसमें क़ुरआन उतारा गया यह महीना सम्मानित मास है और यह मांगलिकता का महीना होता है। चार अरबी महीने सम्मानित मास होते हैं, वे ज़ुलक़ादह, ज़ुलहिज्जह, मुह़र्रम तथा रजब हैं। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के युग से इन मासों का आदर सम्मान होता आ रहा है। सहरी : उपवास के दिन सूर्योदय से पहले कुछ खा लेते हैं जिसे सहरी कहते हैं। इफ़्तारी : दिन भर न कुछ खाते हैं न पीते हैं। शाम को सूर्यास्त समय के बाद रोज़ा खोल कर खाते हैं जिसे इफ़्तारी कहते हैं। सौम शब्द की धातु समा है जिसका मतलब है कुवचन, कुविचार और कुकर्म से परहेज़। सौम इबादत का एक कर्म है; यह आध्यात्मिक बुलंदी को और शाश्वत मुक्ति को हासिल करने की प्रार्थना है। रोज़ा के द्वारा व्यक्ति अपनी पाशविक इच्छाओं पर प्रतिबंध लगाता है। यह एक प्रकार से आत्मा को संयम करने का प्रशिक्षण देना भी है ताकि व्यक्ति ईश्वर की इच्छा के अनुरूप ख़ुद को ढाल सके। रोज़े का मक़सद महज़ खाने पीने से परहेज़ करना नहीं है। बल्कि उन कामों से परहेज़ करना जो हराम हैं। रोज़ा इंसान से स्वार्थपरता और सुस्ती को दूर करता है। रोज़ा इंसान में त्याग के स्तर को बढ़ाता है। पैग़बंर साहब ने कहा है, रोज़ा रखने वाला आदमी इबादत की स्थिति में होता है, भले ही वह बिस्तर में सो रहा हो। रोज़ा रखना इंसान की हर चीज़ को पाबन्द (नियमबद्ध) बनाता है। क़ुरआन में कहा गया है कि जो अधिक बुढ़ापे अथवा ऐसे रोग के कारण जिस से आरोग्य होने की आशा न हो, रोज़ा नहीं रख पा रहें हों, तो वे प्रत्येक रोज़े के बदले एक निर्धन को खाना खिला दिया करें। सूफी मत में सौम का अर्थ केवल सुबह से शाम तक भूखा-प्यासा रहना नहीं है। अरबी भाषा में 'सौम' शब्द का मूल अर्थ होता है—"रुक जाना, खुद पर नियंत्रण पाना या परहेज करना"। सूफी संत मानते हैं कि सौम का असली मकसद इंसान के अहंकार (नफ़्स) को भूखा रखकर रूह (आत्मा) को शक्तिशाली बनाना है। मशहूर सूफी दार्शनिक इमाम गज़ाली ने अपनी पुस्तक इह्या उलूम अल-दीन में सौम (रोज़े) के आध्यात्मिक महत्व को तीन स्तरों में समझाया है। पहला स्तर सौम अल-अवाम है, जिसमें साधक सूर्योदय से सूर्यास्त तक खाने-पीने और शारीरिक इच्छाओं से दूर रहता है। सूफियों के अनुसार, यह केवल शारीरिक अनुशासन है, जो साधना का शुरुआती चरण है। दूसरा स्तर सौम अल-ख़वास है, जिसमें साधक पेट के साथ-साथ अपने शरीर के सभी अंगों का रोज़ा रखता है, जैसे आँखों का रोज़ा, किसी भी गलत या वासना से भरी चीज़ को न देखना। ज़ुबान का रोज़ा, झूठ, चुगली, गाली-गलौज और बेकार की बातों से चुप रहना। कानों का रोज़ा, बुराई या किसी की निंदा न सुनना। हाथ-पैरों का रोज़ा, किसी को नुकसान न पहुँचाना और गलत रास्ते पर न चलना। और तीसरा स्तर है, सौम ख़ुसूस अल-ख़वास जो सूफी साधना का सर्वोच्च स्तर (हकीकत और मारिफत) है। इस मकाम पर साधक के दिल और दिमाग का रोज़ा होता है। इसका अर्थ यह है कि रोज़े के दौरान दिल में अल्लाह (ईश्वर) के अलावा किसी भी सांसारिक चीज़, धन, भविष्य की चिंता या विचार का प्रवेश भी वर्जित हो जाता है। यदि दिल में खुदा के सिवा किसी और का ख्याल आया, तो सूफियों के अनुसार यह सर्वोच्च रोज़ा टूट जाता है। प्रसिद्ध सूफी संत मौलाना जलालुद्दीन रूमी ने रोज़े की आध्यात्मिक गहराई को समझाते हुए अपनी एक कविता में लिखा है, "जब पेट खाने से खाली होता है, तो वह रूहानी (आध्यात्मिक) संगीत से भर जाता है। मानव शरीर एक सितार या बांसुरी की तरह है, यदि इसका पेट पूरा भरा रहेगा, तो इससे कोई मधुर धुन (ईश्वरीय प्रेम) पैदा नहीं हो सकती।" संक्षेप में कहें तो, सूफियों के अनुसार सौम एक ऐसी भट्टी है जिसमें इंसान अपनी सांसारिक इच्छाओं को जलाकर आध्यात्मिक शुद्धता (तज़किया) हासिल करता है। सूफी साधना में इस आंतरिक शुद्धता को बनाए रखने के लिए 'भूख' (या कम खाने) को एक स्थायी अभ्यास माना गया है, न कि केवल रमज़ान के महीने तक।

15.1 (घ) हज्ज तीर्थयात्रायह एक इस्लामी तीर्थयात्रा है यह मुस्लिम लोगों का पवित्र शहर मक्का में प्रतिवर्ष होने वाला विश्व का सबसे बड़ा जमावड़ा है। यह इस्लामी महीने जिल हिज्जा की आठ से बारह तारीख के बीच होता है। हज्ज एक ऐसा दायित्व (फ़र्ज़) है जिसे शारीरिक और आर्थिक रूप से सक्षम हर एक मुसलमान को अपने जीवनकाल में कम-से-कम एक बार अदा करना होता है। यह एक धर्म यात्रा है जिसमें व्यक्ति को अल्लाह के घर या क़ाबा तक जाना होता है। हज़ारों साल पहले मक्का का मैदान पूरी तरह से निर्जन था। ऐसा मानना है कि अल्लाह ने पैग़ंबर इब्राहीम अलैहि. को आदेश दिया कि वो अपनी पत्नी हज़रत हाजरा और बेटे हज़रत इस्माइल अलैहि. को फ़लस्तीन से अरब ले आएं ताकि उनकी पहली पत्नी हज़रत सारा की ईर्ष्या से उन्हें (हज़रत हाजरा और हज़रत इस्माइल अलैहि.) बचाया जा सके अल्लाह ने पैग़ंबर अब्राहम से उन्हें अपनी क़िस्मत पर छोड़ देने के लिए कहा उन्हें खाने की कुछ चीज़ें और थोड़ा पानी दिया गया कुछ दिनों में ही ये सामान ख़त्म हो गया हज़रत हाजरा और हज़रत इस्माइल अलैहि. भूख और प्यास से बेहाल हो गए  मायूस हज़रत हाजरा मदद की चाहत में मक्का में स्थित सफ़ा और मरवा की पहाड़ियों से नीचे उतरीं भूख और थकान से टूट चुकी हज़रत हाजरा गिर गईं और उन्होंने संकट से मुक्ति के लिए अल्लाह से गुहार लगाई हज़रत इस्माइल अलैहि. ने ज़मीन पर पैर पटका तो धरती के भीतर से पानी का एक सोता फूट पड़ा और दोनों की जान बच गई हज़रत हाजरा ने पानी को सुरक्षित किया और खाने के सामान के बदले पानी का व्यापार भी शुरू कर दिया इसी पानी को आब-ए-ज़मज़म यानी ज़मज़म कुआं का पानी कहा जाता है मुसलमान इसे सबसे पवित्र पानी मानते हैं और हज के बाद सारे हाजी कोशिश करते हैं कि वो इस पवित्र पानी को पीएँ और लेकर अपने घर लौटें जब पैग़ंबर अब्राहम फिलिस्तीन से लौटे तो उन्होंने देखा कि उनका परिवार एक अच्छा जीवन जी रहा है और वो पूरी तरह से हैरान रह गए इसी दौरान पैगंबर अब्राहम को अल्लाह ने एक तीर्थ स्थान बनाकर समर्पित करने को कहा हज़रत अब्राहम अलैहि. और हज़रत इस्माइल अलैहि. ने पत्थर का एक छोटा-सा घनाकार इमारत निर्माण किया इसी को क़ाबा कहा जाता है अल्लाह के प्रति अपने भरोसे को मज़बूत करने को हर साल यहां मुसलमान आते हैं सदियों बाद मक्का एक फलता-फूलता शहर बन गया और इसकी एकमात्र वजह पानी के मुकम्मल स्रोत का मिलना था धीरे-धीरे लोगों ने यहां अलग-अलग ईश्वर की पूजा शुरू कर दी पैगंबर अब्राहम के ज़रिए बनाए गए इस पवित्र इमारत में मूर्तियां रखी जाने लगीं इस्लाम के आख़िरी पैगंबर हज़रत मोहम्मद (570-632) को अल्लाह ने कहा कि वो क़ाबा को पहले जैसी स्थिति में लाएं और वहां केवल अल्लाह की इबादत होने दें साल 628 में पैग़ंबर मोहम्मद ने अपने 1400 अनुयायियों के साथ एक यात्रा शुरू की यह इस्लाम की पहली तीर्थयात्रा बनी और इसी यात्रा में पैग़ंबर इब्राहिम की धार्मिक परंपरा को फिर से स्थापित किया गया इसी को हज कहा जाता है

तीर्थयात्री उन लाखों लोगों के जुलूस में शामिल होते हैं जो एक साथ हज के सप्ताह में मक्का में जमा होते हैं और यहीं पर कई अनुष्ठानों में हिस्सा लेते हैं हज यात्री पहले सऊदी अरब के जिद्दा शहर पहुंचते हैं वहां से विशेष जगह जिसे मीक़ात कहते हैं, जाते हैं इस यात्रा में यात्री को एहरामएक प्रकार का विशेष बिना सिला परिधान (सफ़ेद वस्त्र) धारण करना होता है। यह एक भिक्षु का वस्त्र होता है, जिसमें चादर के दो टुकड़े होते हैं, एक अधोवस्त्र के रूप में धारण किया जाता है और दूसरा कंधे से लपेट लिया जाता है। (तसव्वुफ़ में यह {एहराम} बड़ी चादर, (प्रायः केसरी रंग की) होती है, जो सूफ़ी, संत एवं फक़ीर आदि आधा लुंगी के तौर पर बाँधते है तथा आधा शरीर के ऊपरी भाग पर लपेट लेते हैं) यात्री के पांव में जूते होते  हैं। इस वेश-भूषा का सांकेतिक अर्थ है कि ईश्वर के मार्ग में संतों का वेश धारण करो, ताकि जैसा वाह्य रूप है वैसा ही आंतरिक रूप भी हो जाए। यह एक प्रकार से अहंकार का त्याग है।

हज की शुरुआत इस्लामिक महीने ज़िल-हिज की आठ तारीख़ से होती है पहले दिन यानी आठ तारीख़ को हाजी मक्का से क़रीब 12 किलोमीटर दूर मीना शहर जाते हैं आठ की रात हाजी मीना में गुज़ारते हैं और अगली सुबह (दूसरे दिन) यानी नौ तारीख़ को अराफ़ात के मैदान पहुंचते हैं इस जगह पर हज का ख़ुत्बा (संबोधन) होता है। आख़िरी पैग़म्बर मुहम्मद साहब ने अपने आख़िरी हज के दौरान यहाँ ख़ुत्बा दिया था। हज यात्री अराफ़ात के मैदान में खड़े होकर अल्लाह को याद करते हैं और उनसे अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते हैं शाम को हाजी 8 किमी दूर मुज़दलफ़ा शहर जाते हैं और नौ तारीख़ की रात में वहीं रहते हैं यहाँ से वे शैतान को मारने के लिए कंकड़िया एकत्र करते हैं। दस तारीख़ की सुबह यात्री फिर अपने खेमे में मीना शहर लौटते हैं उसके बाद वो एक ख़ास जगह पर जाकर सांकेतिक तौर पर बड़े शैतान (प्रतीकात्मक दीवार) को कंकड़िया मारते हैं उसे जमारत कहा जाता है शैतान को कंकड़िया मारने के बाद हाजी एक बकरे या भेड़ की कुर्बानी देते हैं उसके बाद मर्द अपना सर मुड़वाते हैं और महिलाएं अपना थोड़ा सा बाल काटती हैं उसके बाद यात्री मक्का वापस लौटते हैं और काबा के सात चक्कर लगाते हैं जिसे धार्मिक तौर पर तवाफ़ (परिक्रमा) कहा जाता है इसी दिन यानी ज़िल-हिज की दस तारीख़ को पूरी दुनिया के मुसलमान ईद-उल-अज़हा या बक़रीद का त्यौहार मनाते हैं प्रत्येक व्यक्ति एक घनाकार इमारत क़ाबा के चारों ओर वामावर्त सात बार चलता है जो कि मुस्लिमों के लिए प्रार्थना की दिशा है इस तवाफ़ (परिक्रमा) के बाद वहाँ क़िबले (नमाज़ में मुख करने की दिशा) में दो रक़ात नमाज़ पढ़नी सुन्नत है। अल सफा और अल मारवाह नामक पहाड़ियों के बीच आगे और पीछे चलता हैजिसे सई करना कहते हैं ज़मज़म के कुएं से पानी पीता है, चौकसी में खड़ा होने के लिए अरफात पर्वत के मैदानों में जाता है (अरफ़ात उस स्थान का नाम है जिस में ह़ाजी 9 ज़िलह़िज्जा को विराम करते तथा सूर्यास्त के पश्चात् वहाँ से वापिस होते हैं।) चौथे दिन हज यात्री फिर मीना पहुंचाते हैं और रात को मीना में रुक कर दोनों दिन कंकरिया मारने की रस्म अदा करते हैं। इस तरह पांचवें दिन हज पूरा होता है। हज यात्री मक्का से लगभग 450 किलोमीटर दूर मदीना शहर जाते हैं और वहां मौजूद मस्जिद-ए-नबवी में नमाज़ पढ़ते हैं इसका हज की धार्मिक प्रक्रिया से कोई सीधा संबंध नहीं है लेकिन चूंकि इस मस्जिद को ख़ुद पैग़ंबर मोहम्मद ने बनवाया था, इसीलिए हर मुसलमान इसे क़ाबा के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल मानता है यहीं हज़रत मोहम्मद साहब सल्ल. की मज़ार भी है हज यात्री उसका भी दर्शन करते हैं सूफी मत में हज्ज (मक्का की तीर्थयात्रा) को केवल एक भौगोलिक यात्रा या बाहरी रस्म नहीं माना जाता, बल्कि इसे साधक की अपनी आत्मा के भीतर की यात्रा (साधना-मार्ग का प्रतीक) और ईश्वर (अल्लाह) के वास्तविक घर यानी 'दिल' तक पहुँचने का माध्यम माना जाता है। सूफियों के अनुसार, काबा (मिट्टी और पत्थरों से बनी इमारत) की यात्रा करना शरीयत है, लेकिन अपने भीतर छिपे ईश्वरीय नूर को पाना हज्ज का असली आध्यात्मिक अर्थ (बातिन) है। सूफी संतों का मानना है कि मक्का में स्थित काबा पत्थरों से बना अल्लाह का घर है, जिसे इंसानों (हज़रत इब्राहिम और इस्माइल) ने बनाया था। लेकिन इंसान का दिल (क़ल्ब) वह असली काबा है जिसे खुद अल्लाह ने बनाया है। प्रसिद्ध सूफी संत बायज़ीद बुस्तामी का एक कथन बहुत लोकप्रिय है: "मैंने काबा की परिक्रमा की, तो वह मेरे चारों ओर घूमने लगा।" इसका अर्थ है कि जब दिल पूरी तरह पवित्र हो जाता है, तो खुदा खुद साधक के भीतर निवास करता है। सूफी दर्शन में हज्ज को रूपकात्मक यात्रा माना गया है। दुनिया भर से लाखों लोग अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों को छोड़कर एक जैसे सफ़ेद कपड़े (इहराम) पहनकर मक्का पहुँचते हैं। सूफी इसे 'कसरत' (अनेकता) से 'वहदत' (एकता) की ओर बढ़ने का प्रतीक मानते हैं, जहाँ साधक का अपना अलग वजूद मिट जाता है और वह केवल खुदा के रंग में रंग जाता है। सूफी संतों ने हज्ज की प्रमुख रस्मों के गहरे आंतरिक मायने बताए हैं। इहराम बांधना (सफेद चादरें पहनना) सांसारिक इच्छाओं, मोह, और अहंकार को त्यागकर आध्यात्मिक मृत्यु (कफ़न) धारण करने का प्रतीक है। तवाफ़ (काबा के चक्कर लगाना),  जैसे परवाना शमा (मोमबत्ती) के चारों ओर अपनी जान छिड़कने के लिए घूमता है, वैसे ही सूफी काबा की परिक्रमा को ईश्वर के प्रेम में पूरी तरह फना (लीन) होने का प्रतीक मानते हैं। शैतान को कंकरी मारना (रमी), सूफियों के अनुसार, यह बाहर के किसी शैतान को मारना नहीं है, बल्कि अपने भीतर के लालच, वासना, और अहंकार (नफ़्स) रूपी शैतान को कुचलना है। हज्ज में दी जाने वाली पशु की बलि को सूफी अपने अहंकार और बुरी आदतों की कुर्बानी के रूप में देखते हैं। प्रसिद्ध सूफी महिला संत राबिया बसरी के जीवन की एक घटना सूफीमत में हज्ज के दृष्टिकोण को पूरी तरह स्पष्ट करती है। एक बार जब राबिया बसरी हज्ज के लिए मक्का जा रही थीं, तो उन्होंने रास्ते में देखा कि काबा खुद उनकी अगवानी (स्वागत) करने के लिए आगे आ रहा है। राबिया ने तब मुस्कुराकर कहा, "मुझे घर के मालिक (अल्लाह) की तलाश है, मुझे इस घर (पत्थरों के काबा) से क्या लेना-देना?" सूफियों के अनुसार, असली हाजी वह नहीं है जिसने केवल मक्का की दूरी तय की है, बल्कि असली हाजी वह है जिसने अपने अहंकार की दूरी तय करके खुदा को अपने दिल के भीतर पा लिया है। सूफी मत में हज्ज के इस आंतरिक सफर को पूरा करने के लिए 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' (ईश्वर से बिना शर्त प्रेम) को सबसे ज़रूरी माना गया है।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियांसूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर