शनिवार, 14 सितंबर 2019

विश्व बन्धुत्व और क्षमायाचना दिवस


विश्व बन्धुत्व और क्षमायाचना दिवस
मनोज कुमार
आज 14 सितम्बर है। यह दिन विश्व बन्धुत्व और क्षमायाचना दिवस के रूप में प्रति वर्ष मनाया जाता है।
पूरी दुनिया एक है।  ज़रूरी है कि हम पूरे विश्व के प्रति बन्धुत्व यानी भाईचारे के भाव को विकसित करके वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा को साकार करें। विश्व बन्धुत्व का आधार एक ऐसे युद्धरहित दुनिया के निर्माण का होना चाहिए जिसका सर्वोच्च तथा परम लक्ष्य मानव जाति के भविष्य को सुरक्षित बनाना हो। अतः अंतरराष्ट्रीय सद्भावना के लिए विश्व बन्धुत्व की भावना का फलना-फूलना आवश्यक है। इसके लिए सहयोग एवं मैत्री की भावना से शान्ति आन्दोलन के प्रति प्रतिबद्ध शक्तियों को संगठित एवं पुनर्बलित करने का प्रयास सारे संसार में होना चाहिए। इसी उद्देश्य को लेकर14 सितम्बर को विश्व बन्धुत्व और क्षमायाचना दिवस के रूप में मनाया जाता है।
भाईचारा के निर्वाह  के समय अक्सर यह देखा जाता है कि कडवाहट मंद पड़ जाती है। विश्व वन्धुत्व और क्षमायाचना दिवस के अवसर को हमें  किसी भी गलत कार्यों को सुधारने के अवसर के रूप में मनाना चाहिए। इसका परिणाम होगा कि लोगों के बीच की कटुता दूर होगी और एक ऐसी भावना का विकास होगा जो जो लोगों को एक साथ मिलजुल कर भाईचारे के साथ रहने के लिए प्रोत्साहित भी करेगी।
खेद व्यक्त करना और क्षमा मांगना और दूसरे को क्षमा कर देना मानव की श्रेष्ठ शक्तियों में से एक है।
क्षमा शस्त्रं करे यस्य दुर्जनः किं करिष्यति।
अत्रिने पतितो वहिः स्वयं एव उपशाम्यति॥
अर्थात्‌ जो इंसान क्षमा जैसे अलंकारों से अलंकृत हो, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जिस तरह आग जमीन पर गिरकर घास की अनुपस्थिति में बुझ जाती है, ठीक उसी प्रकार क्षमा की उपस्थिति में क्रोधी का क्रोध पानी की तरह बह जाता है।
हां महत्वपूर्ण यह है कि कोई भी खेद की अभिव्यक्ति दिल से की जानी चाहिए। यह भी ज़रूरी है कि किसी को क्षमा करने के लिए जहां व्यक्ति की नीयत हो वहीं उसमें साहस और धैर्य भी होना चाहिए। महात्मा गांधी ने कहा था, दंड देने की शक्ति होने पर भी दंड न देना सच्ची क्षमा है
कुछ लोग माफ़ी मांग लेने को कमज़ोरी समझते हैं। पर यह सज्जनता का भी तो नमूना है। जो भी व्यक्ति क्षमा मांगता है वह छोटा नहीं हो जाता। निःसंदेह माफ़ी मांगने की शाक्ति एक ऐसी शक्ति होती है जोकि पल भर में बहुत बड़ी दूरियों को भी समाप्त कर देती है। क्षमा में बड़ा बल है। इस एक शब्द क्षमा में असीम शक्ति निहित है। इससे हम न सिर्फ़ पुरानी शत्रुता को मित्रता में बदल सकते हैं, बल्कि दोस्ती में आई खटास को भी पाट सकते हैं।
वेदव्यास ने महाभारत में कहा है,
क्षमा बलं अशक्तानां शक्तानां भूषणं क्षमा।
क्षमा वशीकृते लोके क्षमाय किं न साध्ये॥
अर्तात्‌ क्षमा एक तरफ़ जहां कमज़ोर प्राणी की ताकत है, वहीं दूसरी तरफ़ बलवान का गहना है। ऐसा कौन सा काम है जो क्षमा के द्वारा संभव नहीं है। इस शस्त्र के बल पर तो हम सारे जहां पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।
विश्वबंधुत्व और क्षमा याचना दिवस मनाने के पीछे मूल उद्देश्य समाज के विकास का होना चाहिए। तभी हम एक संगठित समाज का निर्माण कर सकते हैं। इसलिए हमें ग़ालीब (दीवान) की बातों पर चलना चाहिए,
रोक लो गर ग़लत चले कोई
बख़्श दो गर ख़ता करे कोई
माफ़ी मांगने में बड़ी शक्ति होती है। इस शब्द के कहने भर से दूरियां मिट जाती हैं और लोगो के मध्य मतभेद मिट जाता है। जैसे ही आप किसी से माफ़ी मांगते हैं उसी समय आपके सकारात्मक व्यक्तित्व और स्वस्थ दिमाग के बारे में जानकारी हो जाती है। आज के दिन हमें लोगो के बीच से दूरियों को मिटाने के लिए संकल्प लेना चाहिए। समय आ गया है कि आपसी संघर्ष को समाप्त किया जाये और विश्व बंधुत्व की भावना को आगे बढ़ाया जाये। अलेक्ज़ेंडर पोप ने ऐन ऐसे ऑन क्रिटिसिज़्म मे कहा थाTo err is humane, to forgive is divine अर्थात्‌ ग़लती करना मानवीय है, किन्तु क्षमा करना दिव्य है।

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

लेटर टू छट्ठी मैय्या !


हे छट्ठी मैय्या,
प्रणाम !





तब, सज गया सब घाट-बाट? कैसा लग रहा है इस बार हमारे बिना? हम भी आपही की तरह साल में एक ही बार आते थे। कभी-कभी तो कनफ़्युज हो जाते थे कि हमरे माता-पिता, सखा-संगी, अरिजन-परिजन आपकी प्रतीक्षा करते हैं या हमारी। वैसे बात तो एक्कहि है... हमारे आने पर आप आती थी या आपके आने पर हम। ई बार ममला गड़बड़ा गया। हम आ नहीं पाये। चलिये कम से कम आप आ गयीं, पर्व तो हो ही जायेगा। दरअसल उ का है कि हम परेशान हो गये...! पन्द्रह दिन पहिलैह से सब फोन-फान करके भुका दिया.. आ रहे हैं कि नहीं? कौन तारीख को आ रहे हैं? जब पता चल गया कि नहीं आ रहे हैं तैय्यो फोन... ई बार बड़ी मिस कर रहे हैं, आये काहे नहीं ब्ला... ब्ला... ब्ला। सब हमरे माथा भुका रहा है आपसे कौनो पूछा? आपके मर्जी के बिना तो कुच्छो होता नहीं है, फिर हमरे नहीं आने की जवाबदेही भी आपही उठाइये।
गाँव का लोग तो भावुक है। पूछेगा ही। मगर एक बात बताइये, आप हमको मिस नहीं कर रही हैं का? बचपन से ही आपसे गहरा नाता रहा है। जनम के छः दिन बादे छट्ठी पूजा हुआ था। उसके बाद से तो बस सिलसिला चलता ही रहा। जो उमर में केला का पत्ता हमरे लंबाई से ज़्यादा था तब भी पूरा का पूरा कदली-स्तम्भ कंधा पर चढ़ाकर ले जाते थे आपका घाट सजाने। आपके पैर में नरम घास तक भी ना चुभे, इ खातिर अपने नन्हे हाथों में खुरपी-कुदाली पकड़कर एकदम से दूभवंश-निकंदन कर देते थे। एकाध-बार तो आपके भोग लगने से पहले ही आपका ठेकुआ भी चुराकर खा लिये। और फिर दोनो गाल पर दादी का थप्पर! और सुबह में घाट पर कान-पकड़ कर उठक-बैठक। एक से एक संस्मरण जुड़ा है... लिखने बैठ जायें तो महापुराण बन जायेगा। लेकिन बताइये बीस बरस की वार्षिक सेवा के बदले हमको तीस सौ किलोमीटर दूर फेंक दिये। मगर हम हृदय में कौनो बात लगा नहीं रखते हैं। और संबंध भी माँ-बेटे का है। सब-कुछ भूल विसराकर हर साल एहि भरम में जाते रहे कि हमरे खातिर आप आती हैं। लेकिन ई बार इहो भरम जाता रहा। लेकिन इतना गरंटी के साथ कह सकते हैं कि अभी तक भले नहीं पता चला हो मगर कल सुबह तक आपको भी हमरी कमी जरूर खलेगी। देखियेगा न... ई बार पोखर के बदले अंगने-अंगने गड्ढा खुदाया है।  हम शहर क्या आ गये पूरा गाँवे में शहर ढुक गया है। सीडी पर शारदा सिन्हा का गीत बजेगा... केलबा के पात पर उगेला सुरुज मल झाँके-झुँके’। पता नहीं केला का थम असली है कि उहो पिलास्टिक वाला हो गया। जो भी हो माफ़ कर दीजियेगा। हमरे बाद सब बच्चे सब है। और हाँ, घबराइयेगा मत... लाइट और जनरेटर का दुरुस्त व्यवस्था है।
याद है, उ साल...! कई वर्षों के बाद से रेवाखंड के सोये हुए सांस्कृतिक विरासत को आपही के घाट पर फिर से जगाये थे। पृथ्वीराज चौहान नाटक खेल थे। "चार बांस चौबिस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण ! एते पर सुल्तान है मत चूको चौहान!!" आपके चक्कर में चंदबरदायी बनकर पृथ्वीराज के साथे-साथ मर भी गये थे। हाँ, आपके चक्कर में नहीं तो और क्या? अरे, सांझ में सब हाथ उठाने के बाद घरे जाकर घूरा तापे और फिर सुबह में किरिण फूटे के वक्त आये। कौनो सोचता ही नहीं था कि छट्ठी मैय्या घाट पर अकेले कैसे रात काटेगी। आपका अकेलापन दूर करने के लिये नाटक करवा दिये। सांझ से लेकर सुबह तक घाट रहे गुलजार। और आप हैं कि ई बार हमहि को अकेला छोड़ दिये, अयं? वर्षों बाद ई भार भी नाटक होगा, फिर से पृथ्वीराज चौहान। हम तो हैं नहीं। आपही देखकर बताइयेगा कि खेल कैसा बना। हाँ, चंदबरदायी के रोल पर जरूर ध्यान दीजियेगा। हम आयें चाहे नहीं आयें आप आ गयी हैं और सुरुजदेव तो रोजे उगते हैं, तो छठ व्रत भी पूरा हो ही जायेगा। हम नहीं आये, कौनो बात नहीं। हर साल की तरह सुबह का अर्घ्य लेकर आप श्रद्धावनत रेवाखंड पर अपना सारा अशीष उलीच दीजियेगा। और हाँ, एक विनती और है, अर्घ्य देते वक्त जब हमारी माँ की आँखों में आँसू आ जाये तो आप अपना कलेजा थाम लीजियेगा। अब और ज़्यादा नहीं लिखा जा रहा है।
आशा करते हैं अगले साल भेंट होगी। तब तक सूरुज महराज को हमारा प्रणाम कहियेगा और अगर गलती से कौनो भक्त मिलावट वाला मिठाई चढ़ा दिया हो तो अपना ध्यान रखियेगा।
आपका,
करण समस्तीपुरी

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