पोस्टरसत्येन्द्र झा |
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एक कर्मचारी, "बाबा ! इस पोस्टर का क्या करेंगे ? यह तो पुराना हो गया है।"
दूसरा कर्मचारी, "मगर यह तो पुराना है। अब तो नया सिनेमा आ गया है।" बूढा, "तो क्या हुआ ? पुराने के लिए बाजार मे कोई जगह नहीं है। घर में अभी भी 'पुरानी चीजों' का कुछ महत्व है।" बूढा पोस्टर को लेकर आगे बढ़ गया। कर्मचारी अबाक थे। |
(मूल कृति मैथिली में "अहीं के कहै छी" में संकलित 'पोस्टर' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।) |
मंगलवार, 21 सितंबर 2010
पोस्टर
सोमवार, 20 सितंबर 2010
और समय ठहर गया!
और समय ठहर गया!
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| बनारस की रसमयी धरती के सपूत श्री ज्ञानचंद मर्मज्ञ समकालीन कविता में एक अमूल्य हस्ताक्षर के रूप में उभरे हैं। जन्म से भारतीय, शिक्षा से अभियंता, रोजगार से उद्यमी और स्वभाव से कवि, श्री मर्मज्ञ अपेक्षाकृत कम हिन्दीभाषी क्षेत्र बेंगलूर में हिंदी के प्रचार-प्रासार और विकास के साथ स्थानीय भाषा के साथ समन्वय के लिए सतत प्रयत्नशील हैं। लगभग एक दशक से हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की शोभा बढ़ा रहे ज्ञानचंद जी की अभी तक एक मात्र प्रकाशित पुस्तक "मिट्टी की पलकें" ने तो श्रीमान को सम्मान और पुरस्कार का पर्याय ही बना दिया। श्री मर्मज्ञ के मुकुट-मणी में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शलाका सम्मानजैसे नगीने भी शामिल हैं। मित्रों ! मर्मज्ञ जी जितने संवेदनशील कवि हैं उतने ही सहृदय सज्जन ! आप चाहें तो +91 98453 20295 पर कविवर से वार्तालाप भी कर सकते हैं !!! और समय ठहर गया! गुमसुम सन्नाटों में, बिक-बिक के हाटों में, टुकड़ों में टूट-टूट, कौन कहां किधर गया, और समय ठहर गया!
ज़हरीले नागों से, आबाद होती है, कैसी ये बस्ती है, अजगर संजोती है, राजा की रानी तो महलों में सोती है, अंधे गलियारों में भारत मां रोती है, सागर में ज्वार उठा आंखों में लहर गया, और समय ठहर गया!
जुड़ने की कोशिश में टुकड़े हज़ार हुए, जितने लुटेरे थे यारों के यार हुए, नोच-नोच खाने के ज़ुर्म बार-बार हुए, सोने की चिड़ियां के पंख तार-तार हुए, पथरीले दांतों से उपवन को कुतर गया, और समय ठहर गया!
माटी कलंकित है, अभिशाप अंकित है, झूठे दिलासों का विश्वास शंकित है, इज़्ज़त है मोहताज़ ऊँची दुकानों की, मानवता नाच रही नंगे इंसानों की, लगता है सन्नाटा चीख़ों पर पसर गया, और समय ठहर गया!
झीलों को पीते हैं कैसे शहर देखो, पत्थर है तर देखो, आंसू के घर देखो, दर्पण में बिखर गई भीगी नज़र देखो, चेहरे को नोचा तो चेहरा उभर गया, और समय ठहर गया!
रोती हैं दीवारें, गलियारे रोते हैं, आंगन के धुएं में अंगारे रोते हैं, दरवाज़ा सूना है, ग़म इसका दूना है, खिड़की के पास पड़ा घायल एक कोना है, दस्तक का ऐतबार चौखट पे बिखर गया, और समय ठहर गया!
चांद अगर शीतलता छोड़ दे तो क्या होगा? बचपन जो चंचलता छोड़ दे तो क्या होगा? गीत अगर व्याकुलता छोड़ दे तो क्या होगा? दर्द बड़ा ज़ालिम है घावों में उतर गया, और समय ठहर गया!
आएगा इंक़लाब लिख दो दीवारों पर, अब बिगुल बजाना है, ख़ून में नहाना है, देश के ग़द्दारों को देश से भगाना है, दीप चला जलने को, जलने से मुकर गया, और समय ठहर गया! |