रविवार, 26 फ़रवरी 2012

भारतीय काव्यशास्त्र – 101

भारतीय काव्यशास्त्र – 101

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में अनवीकृत, सनियमपरिवृत्त, अनियमपरिवृत्त, विशेषपरिवृत्त और अविशेषपरिवृत्त अर्थदोषों पर चर्चा की गई थी। इस अंक में साकांक्षता, अपदयुक्तता और सहचरभिन्नता अर्थदोषों पर चर्चा की जाएगी।

जहाँ काव्य में काव्य किसी पद की आकांक्षा बनी रह जाती है, वहाँ साकांक्षता अर्थदोष होता है। इसके लिए आचार्य मम्मट ने महावीरचरित नाटक से एक श्लोक उद्धृत किया है। यह श्लोक सीता के न प्राप्त होने से निराश रावण के प्रति उसके आमात्य माल्यवान की उक्ति है-

अर्थित्वे प्रकटीकृतेSपि न फलप्राप्तिः प्रभो प्रत्युत

द्रुह्यन् दाशरथिर्विरुद्धचरितो युक्तस्तया कन्यया।

उत्कर्षञ्च परस्य मानयशसोर्विस्रंसनं चात्मनः

स्त्रीरत्नञ्च जगत्पतिर्दशमुखो देवः कथं मृष्यते।।

अर्थात् हे प्रभो, (महाराज जनक के समक्ष) याचक बनने पर भी सीतारूपी फल आपको प्राप्त नहीं हुआ। बल्कि उलटे वह आपके विरोधी और शत्रु दशरथ के पुत्र राम को दे दी गयी। अपने शत्रु का उत्कर्ष, अपने मान और यश का अपकर्ष एवं स्त्री-रत्न की उपेक्षा जगत्पति दशानन कैसे सहन कर सकता है?

यहाँ अन्तिम चरण में वाक्य को स्त्रीरत्नं के पश्चात् उपेक्षितुं पद की आकांक्षा बनी हुई है। क्योंकि तीसरी पंक्ति में प्रयुक्त परस्य पद का सम्बन्ध उत्कर्ष पद के साथ किया जा चुका है। अतएव इसका (परस्य) सम्बन्ध भी स्त्रीरत्नं के साथ नहीं हो सकता। अतएव इसमें साकांक्षता अर्थदोष है।

निम्नलिखित दोहे में भी यह दोष देखा जा सकता है-

परम बिरागी चित्त निज, पुनि देवन को काम।

जननी रुचि पुनि पितु बचन,क्यों तजिहैं बन राम।।

यहाँ तजिहैं पद के पहले जाइबो पद की आकांक्षा बनी रह जाती है।

इसी प्रकार आँसू के निम्नलिखित कविता में भी इसे देखा जा सकता है-

परिरम्भ कुम्भ की मदिरा,

निस्स्वास मलय के झोंके,

मुख चन्द्र चाँदनी जल से

मैं उठता था मुँह धोके। (आँसू- जयशंकर प्रसाद)

यदि यहाँ देखा जाय, तो परिरम्भ कुम्भ की मदिरा के बाद पीता था और निस्स्वास मलय के झोंके के बाद लगते थे की आकांक्षा बनी रह जाती है। अतएव उक्त दोहे और कविता में भी साकांक्षता अर्थदोष है।

काव्य में जहाँ अनुचित स्थान पर अनावश्यक पद प्रयोग किए गए हों, वहाँ अपदयुक्तता अर्थदोष होता है। इसके लिए काव्यप्रकाश में आचार्य राजशेखर द्वारा विरचित बालरामायण से उद्धृत किया गया है। इस श्लोक सीता के वर के रूप में रावण के प्रस्ताव की विवेचना करते हुए उसके दूत से महाराज जनक के पुरोहित शतानन्द की उक्ति है-

आज्ञा शक्रशिखामणिप्रणयिनी शास्त्राणि चक्षुर्नवं

भक्तिर्भूतपतौ पिनाकिनि पदं लङ्केति दिव्या पुरी।

उत्पत्तिर्द्रुहिणान्वये च तदहो नेदृग्वरो लभ्यते

स्याच्चेदेष न रावणः क्व नु पुनः सर्वत्र सर्वे गुणाः।।

अर्थात् जिसकी आज्ञा इन्द्र के लिए शिरोधार्य है, शास्त्र जिसके नये चक्षु हैं, भूतनाथ महादेव में जिसकी अपार भक्ति है, लंका नामक प्रसिद्ध दिव्य नगरी जिसका निवास है, ब्रह्मा के वंश में जिसका जन्म हुआ है; इस प्रकार तो ऐसा दूसरा वर मिल नहीं सकता यदि वह रावण (दुराचारी) न होता। लेकिन सभी गुण किसमें मिल सकते हैं?

यह श्लोक स्याच्चेदेष न रावणः (यदि वह रावण न होता) यहीं समाप्त हो जाना चाहिए था। क्योंकि क्व नु पुनः सर्वत्र सर्वे गुणाः (हर जगह सभी गुण नहीं पाए जाते) ऐसा कहने पर सीता का विवाह रावण से करने में कोई बाधा नहीं है, बल्कि सीता उसी को देनी चाहिए; यहाँ इस प्रकार के अर्थ की प्रतीति होती है जो उचित नहीं है। अतएव यहाँ क्व नु पुनः सर्वत्र सर्वे गुणाः पदों का अनुचित स्थान पर अनावश्यक प्रयोग हुआ है। जिससे यहाँ अपदप्रयुक्तता अर्थदोष है।

जहाँ काव्य में सजातीय वस्तुओं के साथ विजातीय वस्तुओं का उल्लेख किया गया हो, अर्थात् उत्कृष्ट के साथ निकृष्ट का भी वर्णन किया गया हो, वहाँ सहचरभिन्नता अर्थदोष होता है। जैसे-

श्रुतेन बुद्धिर्व्यसनेन मूर्खता मदेन नारी सलिलेन निम्नगा।

निशा शशाङ्केन धृतिः समाधिना नयेन चालङ्क्रियते नरेन्द्रता।।

अर्थात् शास्त्र सुनने से बुद्धि, दुर्व्यसन से मूर्खता, मद से नारी, जल से नदी, चन्द्रमा से रात्रि, समाधि से धैर्य और नीति पूर्वक राज्य-संचालन से राजपद शोभित होते हैं।

इस श्लोक में श्रुति आदि उत्कृष्ट चीजों के साथ निकृष्ट अर्थवाले दुर्व्यसन और मूर्खता पद आ जाने से सहचरभिन्नता अर्थदोष है।

लगभग इसी आशय का निम्नलिखित दोहा भी इस दोष से दूषित है-

निसि ससि सों जल कमल सों, मूढ़ व्यसन सों मित्त।

गज मद सों नृप तेज सों, सोभा पावत नित्त।।

यहाँ भी मूढ़, व्यसन पदों के कारण सहचरभिन्नता अर्थदोष है।

इस अंक में बस इतना ही।

6 टिप्‍पणियां:

  1. काव्यशास्त्र पर आपकी गहन टीका...इस विधा पर आपकी असामान्य पकड़ की द्योतक है...

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  2. अति उत्तम,सराहनीय प्रस्तुति,मनोज जी...काव्यशास्त्र के विधा में आपके ज्ञान की स्पष्ट झलक दिखाई पडती है,...बधाई...बहुत दिनों से मेरे पोस्ट पर आप नही आये,..आइये स्वागत है,...

    NEW POST काव्यान्जलि ...: चिंगारी...
    NEW POST...फुहार...हुस्न की बात...

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  3. ADBHUD JANKARIYON KA KHAJANA HAI APKA BLOG .....KAVY SHASTR KR DURLABH JANKARAI MILI SADAR ABHAR.

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 27-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  5. आचार्य जी, कितनी बारीकी है... जितना पढता हूँ उतना ही आश्चर्य होता है!! कितना वैज्ञानिक है यह शास्त्र!! आभार!!

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