सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

गांव की ललक

गांव की ललक

श्यामनारायण मिश्र

अम्मा  की  डाली आदत सी
पुरखों से  मिली विरासत सी
    छोड़  नहीं  पाता  हूं
             गांव की ललक।

धड़कन में हंसों का शोर,
    आंखों में लहराता ताल।
सपनों  में  तैरती  रही,
    मछुआरी नौका की पाल।
हंसी में नहीं
    गगरी के
             कंठ की छलक।

दफ़्तर में ढूंढ़ता कुटुम्ब,
    अफसर में दादा का नेह-छोह।
देख चापलूसों की भीड़,
उबल - उबल पड़ता  विद्रोह।
पानी में आहत
पुरुषार्थ  की झलक।

मंडी में खेत के निशान,
    कोल्हू में सरसों  की गंध।
थका - थका ढूंढ़ता रहा,
    कविता में विरहा के छंद।
मिली नहीं चश्मे
        भींगती   पलक।

21 टिप्‍पणियां:

  1. मिट्टी की खुशबू लिए पोस्ट...... सच में नहीं छूटती गाँव की ललक

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  2. गाँव का पूरा दृश्य दिखा दिया .... सुंदर प्रस्तुति

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  3. गांव की ललक तो बरक़रार ही रहती है
    बहुत सुन्दर

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  4. गाँव की याद आपकी हर पंक्ति के साथ आयी।

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  5. सुन्दर दृश्य दिखाती पंक्तियाँ.

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  6. मंडी में खेत के निशान,
    कोल्हू में सरसों की गंध।
    थका - थका ढूंढ़ता रहा,
    कविता में विरहा के छंद।
    मिली नहीं चश्मे
    भींगती पलक।
    Wah! Kya baat hai!

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    ..शिव रात्रि पर हार्दिक बधाई..

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  8. बहुत सुन्दर गीत पढवाने के लिए सादर आभार सर.

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  9. गांव की ललक को छोड़ पाना तो सच में मुश्किल होता है ...

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  10. अपने बचपन का घर भला कौन भूल पाता है। अच्‍छी कविता।

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  11. इतना कुछ जिन्हें यादकर गाँव याद आता है... 'गाँव की ललक' शायद फिर से लौट चलने का आह्वान है. एक पुकार जो कहती है आ अब लौट चलें!!
    मिश्र जी को पढ़ना हमेशा एहसास कराता है कि हमने क्या खोया है!!

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  12. अम्मा की डाली आदत सी
    पुरखों से मिली विरासत सी
    छोड़ नहीं पाता हूं
    गांव की ललक।
    sundar rachna ........

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  13. सुन्दर. इसीलिये हम बीच बीच में गाँव घूम आते हैं.

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  14. अध्बुध शैली में लिखा सुन्दर गीत ...

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  15. बहुत ही सुंदर भाव संयोजन एवं मिट्टी की खुशबू से सुसजित अभिव्यक्ति...

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  16. मंडी में खेत के निशान,
    कोल्हू में सरसों की गंध।
    थका - थका ढूंढ़ता रहा,
    कविता में विरहा के छंद।
    मिली नहीं चश्मे
    भींगती पलक।
    वाह !जहां इतने सुन्दर भाव हों वहां सिर्फ वाह ही नकालता है मुंह से ,वाह क्या बात है .

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  17. अपना प्यारा गांव याद आ गया।
    वो पहाड़ पर बैठ शाम गुजारना याद आ गया।

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