सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

सूरज की बात सुनो


सूरज की बात सुनो

श्यामनारायण मिश्र
 
एक नदी क्या सूखी
    बालू में फंसी कई नावें।

मछुआरे !
हिलक-हिलक रोने से होगा क्या ?
      सूरज  की  बात तो सुनो।
जो पहाड़ टूटा है
    हिम का है पिघलेगा
    तुम  टूटे  जाल  तो  बुनो।
इन टोपी वालों की
    भीड़ गुज़र जाने दो
बच्चों से कहो नहीं नारे दुहरावें।
    बालू में फंसी पड़ी नावें।

14 टिप्‍पणियां:

  1. एक नदी में कितनी नावें,
    जीवन की गति में उतरावें..

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  2. पहले खुद ही समझ लेंय,
    बच्चों को फिर समुझावें !

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  3. सूरज की बात ही तो नहीं सुनता कोई ... गहन अभिव्यक्ति

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  4. जो पहाड़ टूटा है
    हिम का है पिघलेगा....

    टोपी वालों की भीड़... वाह...

    बहुत गहरे संकेत और बिम्ब...
    सुन्दर रचना पढवाने के लिए सादर आभार सर...

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  5. मिश्र जी की एक और प्रभावशाली रचना.. अनोखे बिम्बों को समायोजित कर एक अद्भुत असर पैदा करती है!! आभार आपका!!

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  6. पर सुने कौन ..सारगर्भित सुन्दर रचना.

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  7. जो पहाड़ टूटा है
    हिम का है पिघलेगा
    तुम टूटे जाल तो बुनो।
    ...sundar sarthak prastuti

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  8. हमेशा की तरह यह भी एक सार्थक रचना है !
    मिश्र जी की हर रचना में एक अनूठापन पढने को मिलता है !
    आभार टिप्पणी के लिये !

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  9. गहरे भाव ....अपना-अपना मतलब साधे !!
    आभार!

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  10. अर्थपूर्ण और बेहतरीन रचना ..

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  11. बहुत अच्छी रचना,सुंदर प्रस्तुति ,...
    मिश्रा जी की रचना छोटीपर अच्छी लगी ,....

    MY NEW POST ...कामयाबी...

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