रविवार, 5 फ़रवरी 2012

भारतीय काव्यशास्त्र – 98


भारतीय काव्यशास्त्र – 98
आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में अपुष्ट, कष्ट, व्याहत और पुनरुक्त अर्थदोषों पर चर्चा की गयी थी। आज इस अंक में दुष्क्रमत्व, ग्राम्यत्व, सन्दिग्धत्व और निर्हेतुत्व अर्थदोषों पर चर्चा अभीष्ट है।
जहाँ काव्य में लोक और शास्त्र में निर्धारित क्रम का उल्लंघन पाया जाय, वहाँ दुष्क्रमत्व अर्थदोष होता है। जैसे-
भूपालरत्न!       निर्दैन्यप्रदानप्रथितोत्सव।
विश्राणय तुरङ्गं मे मातङ्गं वा मदालसम्।।
अर्थात् लोगों को धन देकर आनन्दित होनेवाले हे भूपाल शिरोमणि, मुझे एक घोड़ा अथवा मदमत्त हाथी प्रदान कीजिए।
यहाँ घोड़ा के पहले हाथी का प्रयोग करना चाहिए था, क्योंकि लोक में हाथी-घोड़ा प्रयोग किया जाता है। दूसरी बात है कि सबसे पहले उत्तम उपहार माँगते हैं, विकल्प सदा निम्न श्रेणी का होता है। अतएव यहाँ दुष्क्रमत्व अर्थदोष है।
इसी प्रकार निम्नलिखित सवैया की दूसरी पंक्ति में मन को खगराज के बाद प्रयोग करना चाहिए था, क्योंकि मन का वेग खगराज के वेग से अधिक होता है। पहले हवा, उसके बाद खगराज और फिर मन का वेग यह क्रम उचित होता। क्योंकि कम वेग से प्रारम्भकर अधिक वेग की दिशा में मन को बीच में ला देने से क्रम बिगड़ गया है। अतएव यहाँ दुष्क्रमत्व दोष आ गया है।    
लीन्हो उखारि पहार बिसाल चल्यो तेहि काल  बिलंब न लायो।
मारुतनंदन मारुत को,  मन को,  खगराज  को  बेग लजायो।
तीखी तुरा तुलसी कहतो पै  हिए  उपमा को समाउ न आयो।
मानो प्रतच्छ परब्बत की नभ लीक लसी कपि यों धुकि धायो।।
गोस्वामी तुलसीदास जी एक आर्षकवि हैं। उनकी रचना में दोष-दर्शन करना अनुचित है। केवल यहाँ समझाने के लिए यह सवैया उद्धृत किया गया है। वैसे परमादरणीय आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्रजी ने भी इस सवैया को इसी दोष के सन्दर्भ में अपनी पुस्तक काव्यांग-कौमुदी (तृतीय कला) में उद्धृत किया है।
जहाँ काव्यार्थ में विदग्धता न होकर सामान्यता हो, वहाँ ग्राम्यत्व अर्थदोष होता है। जैसे-
     स्वपिति यावदयं निकटे जनः स्वपिमि तावदहं किमपैति ते।
     तदपि  सांप्रतमाहर  कर्पूरं  त्वरितमूरुमुदञ्चय   कुञ्चितम्।।
     अर्थात् जबतक पास में लेटा आदमी सो न जाय, तबतक मैं भी सोने का बहाना करके तुम्हारी बगल में लेट जाती हूँ, इसमें तुम्हारा नुकसान क्या है? और तुम भी अपनी कोहनी सिर के नीचे लगा लो तथा सिकुड़ी टाँगों फैलाकर सोने का बहाना करो।
            यहाँ कथन में विदग्धता का अभाव है, अतएव ग्राम्यत्व अर्थदोष है।
     जहाँ काव्य का अर्थ निश्चित करना सम्भव न हो सके, वहाँ सन्दिग्धत्व अर्थदोष होता है। जैसे-
     मात्सर्यमुत्सार्य  विचार्य   कार्यमार्याः   समर्यादमुदाहरन्तु।
     सेव्या नितम्बाः किमु भूधराणामुत स्मरस्मेरविलासिनीनाम्।।
     अर्थात् हे आर्यगण, पक्षपात छोड़कर और विचारकर प्रमाण के साथ यह बताएँ कि पर्वतों के मध्यभाग का सेवन करना चाहिए या कामुक स्त्रियों के नितम्बों का?
     यहाँ सन्दर्भ के अभाव में यह निश्चित करना कठिन है कि क्या सेवनीय है- पर्वतों का मध्य भाग या कामुक विलासिनियों का नितम्ब भाग। यदि सन्दर्भ होता तो शान्त रस या शृंगार रस की प्रधानता के आधार पर किसी एक पक्ष में इसके अर्थ का निर्धारण सम्भव हो सकता है। सन्दर्भ के अभाव में यहाँ सन्दिग्धत्व अर्थदोष है।
     इसी प्रकार निम्नलिखित दोहे में किसी स्त्री द्वारा अपने घर में भगवान शिव की प्रतिमा बनाने की बात कही गयी है। पर यह स्पष्ट नहीं है कि उसने कामदेव के डर से यह मूर्ति बनाई है या पूजन आदि के लिए। अतएव यहाँ भी सन्दिग्धत्व अर्थदोष है।
     लै कर में लेखनि ललित, प्रगटि  स्वकला अछेह।
     केहि कारन कामिनि लिख्यो, सिवमूरत निज गेह।।

     कारण के अभाव में कार्य नहीं होता। कार्य और कारण का नित्य सम्बन्ध होता है। परन्तु काव्य में जहाँ कोई कार्य करने की बात बिना कारण बताए की जाय, वहाँ निर्हेतुत्व अर्थदोष माना जाता है। यह श्लोक वेणीसंहार नामक नाटक से लिया गया है। अपने पिता आचार्य द्रोण का वध होने के बाद अश्वत्थामा की यह उक्ति है-
गृहीतं   येनासीः    परिभवभयान्नोचितमपि
प्रभावाद्यस्याभून्न खलु तव कश्चिन्न विषयः।
परित्यक्तं तेन त्वमसि सुतशोकान्न तु भयाद्
विमोक्ष्ये शस्त्र! त्वामहमपि यतः स्वस्ति भवते।।
अर्थात् हे शस्त्र, अनुचित होनेपर भी तिरस्कृत होने से बचने के लिए ही मेरे पिता ने तुम्हें ग्रहण किया था और उनके प्रभाव से कोई भी तुम्हारे लिए अभेद्य नहीं था। उन्होंने भय से नहीं, अपितु पुत्रशोक (की झूठी सूचना) के कारण तुम्हारा परित्याग नहीं किया है। इसलिए हे शस्त्र मैं भी तुम्हें छोड़ रहा हूँ, तुम्हारा कल्याण हो।
यहाँ आचार्य द्रोण द्वारा शस्त्र-त्याग का कारण तो बताता है, लेकिन अश्वत्थामा द्वारा शस्त्र छोड़ने के कारण का उल्लेख नहीं हुआ है। इसीलिए यहाँ निर्हेतुत्व अर्थदोष है। 

5 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य जी! इतनी बारीकी से इतने सामान्य से लगने वाले दोषों को उजागर किया है आपने... ये सब बहुत साधारण सी त्रुटियाँ या दोष हैं, जिन्हें काव्ब्या-शिल्प की आड़ में हम अनदेखा कर देते हैं... इस काव्य-शास्त्र की कक्षा में बहुत कुछ सीखने को मिलता है!!

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  2. सलिल भाई, ये विचार उन काव्यविदों के हैं,जिन्होंने इन तत्त्वों पर विचार किया है। मैं तो केवल उनकी बातों को ब्लॉग के माध्यम से आपलोगों तक पहुँचाने का अपनी भाषा में प्रयास कर रहा हूँ। इस पूरा श्रेय उन्हीं काव्यविदों को जाता है। आभार सहित।

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  3. बहुत प्रतीक्षा के पश्चात यह अंक पढ़ने को मिला। ज्ञानवर्धक आलेख। आभार,

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