सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

सूर्यमुखी छंद लिये भटके


सूर्यमुखी छंद लिये भटके

श्यामनारायण मिश्र

अनचाहे चेहरे आवरण हुए
दंभों ने लिखी भूमिका
अपनी ही गफलत में
    बिना पढ़े पन्नों से
         मुड़े रहे हम।

पोर-पोर पंजों की टीस
    कुहनी से कंधों तक
    पिंडली  से  रीढ़  तक चढ़ी।
जिस-तिसकी की
    चिउंटी से चीथड़े हुई
         छाती से कील न कढ़ी।
हाथ कटे जगन्नाथ
    लकदक रथयात्रा
रोगन से लिपे पुते खड़खड़िया ढांचे में
    लोहे के एक मात्र
         धुरे रहे हम।

माथे में सूर्यमुखी छंद लिये भटके
         राहु केतु मुश्किल
             से उतरे।
परती में उग आये
    गद्यों के गुल्म गाछ
    कथ्यों पर तने रहे
         आक्षितिजे कोहरे।
हाथों में हाथ धरे
    हुक्कों में लीद भरे
    फूंकते अतीत की
    अखबारी बैठक से
         जुड़े रहे हम।

15 टिप्‍पणियां:

  1. अखबारी बैठक से
    जुड़े रहे हम।

    ऽ जरूरी है यह जुड़ाव सरजी यही तो नहीं रहा अब..

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  2. बिना पढ़े पन्नों से
    मुड़े रहे हम।

    सुन्दर रचना पढवाने के लिए सादर आभार सर...

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  3. बेहतरीन बिम्बों से भावों के अर्थ सजाये हैं...

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  4. लोग जो हैं अब तलक मुझसे मिले,शब्द से रिश्तो में अंतर आ रहा है
    अर्थ अपनी जिन्दगी का ढूँढ़ने में,व्यर्थ ही जीवन यहाँ पे जा रहा है

    अति उत्तम,सराहनीय प्रस्तुति,सुंदर रचना पढवाने के लिए आभार..
    मनोज जी,बहुत दिनों से मेरी पोस्ट पर नही आ रहे,जबकि मै आपका
    न्य्मित पाठक और फालोवर हूँ,आइये आपका स्वागत है,.....

    NEW POST काव्यान्जलि ...: चिंगारी...

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  5. अद्भुत बिंबो का प्रयोग है इस रचना में ॥सुंदर प्रस्तुति

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  6. पोर-पोर पंजों की टीस
    कुहनी से कंधों तक
    पिंडली से रीढ़ तक चढ़ी।
    जिस-तिसकी की
    चिउंटी से चीथड़े हुई
    छाती से कील न कढ़ी।

    प्रभावशाली विम्ब प्रयोग, एक नवीन शैली के साथ.

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  7. हाथ कटे जगन्नाथ
    लकदक रथयात्रा
    रोगन से लिपे पुते खड़खड़िया ढांचे में
    लोहे के एक मात्र
    धुरे रहे हम।
    जबर्दस्त्त.

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  8. अध्बुध ... नवीन बिम्बों से सजी ... मन को मोह लेती है ये रचना ...

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  9. अतीत में वर्तमान की तलाश के स्वरूप का अच्छा चित्रण है।

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  10. बेहतरीन बिम्ब और अद्भुत शाब्दिक संयोजन ......

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