सोमवार, 9 अप्रैल 2012

ज्योति-छंद फूटते नहीं


ज्योति-छंद फूटते नहीं


श्यामनारायण मिश्र

राजा की खंडहर हवेली से
सन्नाटा आकर
          बैठा दालानों में पालथी जमाकर।

जाने  क्या  कह दिया हवा ने
गुमसुम    हो  बैठी है  चीज़ें
आकृतियां सहमी सी लगती हैं
ओझे   के    गंडे   ताबीजें।
संवेदन कोने में
खड़ा हुआ जैसे
     कड़ी सज़ा सुनने को रुका हुआ चाकर।

मनहूसी  गलियों में
धान के पुआलों सी
जगह जगह ढेर हुई।
कल तक तो चंगा था
सूरज  को  आने  में
जाने  क्यों देर हुई।
किरणों के
ज्योति-छंद फूटते नहीं
          टोने सा पढ़ता है कौन बुदबुदाकर।

अपने ही भीतर
मन सुरंग खोदे
या मेले रोपे।
सांसों  में  गूंज रही
इस आदिम धुन को
किसके आंचल-बाहों सौंपे।
अंगुली के धरते ही
क्षितिज पार जाती थीं लहरें
     पत्थर हो गई वह झील थरथराकर।
***  ***  ***
चित्र : आभार गूगल सर्च

25 टिप्‍पणियां:

  1. अंगुली के धरते ही
    क्षितिज पार जाती थीं लहरें
    पत्थर हो गई वह झील थरथराकर।

    गहरी संवेदना अभिव्यक्त हुई है इन पंक्तियों में ...!

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  2. कल तक तो चंगा था
    सूरज को आने में
    जाने क्यों देर हुई।
    किरणों के
    ज्योति-छंद फूटते नहीं
    टोने सा पढ़ता है कौन बुदबुदाकर......
    बहुत बढ़िया...........

    बेहतरीन रचना.
    सादर.

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  3. महान कवि की माला का एक चमकता मोती ।

    आभार ।।


    जीवन में ठहराव से, ठहरी हवा -किरण ।

    कुरुक्षेत्र-मन बिकल है, चलिए प्रभू शरण ।।

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  4. बहुत खूबसूरत गीत पढ़वाने का आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  5. अपने ही भीतर
    मन सुरंग खोदे
    या मेले रोपे।
    सांसों में गूंज रही
    इस आदिम धुन को
    किसके आंचल-बाहों सौंपे।
    अंगुली के धरते ही
    क्षितिज पार जाती थीं लहरें
    पत्थर हो गई वह झील थरथराकर।

    बेहतरीन भाव पुर्ण प्रस्तुति,सुन्दर रचना...


    RECENT POST...फुहार....: रूप तुम्हारा...

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  6. कल तक तो चंगा था
    सूरज को आने में
    जाने क्यों देर हुई।
    किरणों के
    ज्योति-छंद फूटते नहीं
    टोने सा पढ़ता है कौन बुदबुदाकर।

    उत्तर देंहटाएं
  7. राजा की खंडहर हवेली से
    सन्नाटा आकर
    बैठा दालानों में पालथी जमाकर।
    प्रारंभ से ही ऐसा समां बंधा ...सांस ही रुक गयी हो मानो ....
    बहुत ही भावपूर्ण ...सुंदर रचना ...
    आभार .

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  8. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति.......

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  9. गहरी संवेदना समेटे सुंदर रचना बार बार पढ़ती रही !

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  10. दिल को छू गयी यह कविता.. ऐसा लगता है मानो एक मधुर संगीत बज रहा हो और उसकी स्वर-लहरियाँ कविता के रूप में बिखरी हों.. बस महसूसने वाली कविता!!

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  11. मनोज जी बहुत ही भावपूर्ण ...सुंदर अभिव्यक्ति.. ...

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  12. राज्यमहल का माहौल राज्य भर में पसर जाता है।

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  13. मन के अंदर चलते उहापोह को शब्दों के जाल में बाँधने का सुंदर प्रयास इस मधुर गीत के माध्यम से हुआ है.

    बधाई मिश्र जी.

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  14. उत्कृष्ट कृति |
    बुधवारीय चर्चा-
    मस्त प्रस्तुति ||

    charchamanch.blogspot.com

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  15. अभिनव बिम्बों से सुसज्जित भावपूर्ण रचना।

    बहुत सुन्दर।

    आभार

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