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गुरुवार, 11 अगस्त 2011

भारतीय भाषाएँ और ध्वनियाँ-एक परिचर्चा-2

भारतीय भाषाएँ और ध्वनियाँ-एक परिचर्चा-2

आचार्य परशुराम राय

मो. नं. 09936526011

ई-मेल : parashuramrai25@gmail.com

पिछले अंक में स्वरों पर चर्चा हुई थी। अब बारी है व्यंजनों की। स्वरों की सहायता के बिना व्यंजनों का उच्चारण कठिन है। व्यंजन स्वर के मुख से ही मुखर होते हैं। स्वरों की भाँति व्यंजन भी कई श्रेणियों में विभक्त किए गए हैं, यथा- कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, अन्तस्थ और ऊष्म-

कवर्ग – क ख ग घ ङ

चवर्ग – च छ ज झ ञ

टवर्ग – ट ठ ड ढ ण

तवर्ग – त थ द ध न

पवर्ग – प फ ब भ म

अन्तस्थ – य र ल व

उष्म – श ष स ह

आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, जिन्हें हिन्दी का पाणिनि कहना अत्युक्ति न होगी, इन व्यंजन वर्णों को पहले तीन भागों में विभक्त करते हैं- वर्गीय, अन्तस्थ और ऊष्म। वर्गीय में पाँच वर्ग- कवर्ग से पवर्ग तक 25 वर्ण हैं। ये वर्ग उच्चारण के स्थान की दृष्टि से बाँटे गये हैं- कवर्ग का उच्चारण स्थान कंठ है, चवर्ग का तालु, टवर्ग का मूर्धा, तवर्ग का दन्त और पवर्ग का ओष्ठ है। इसके अतिरिक्त पाँचो वर्गों के पाँचवे वर्ण- ङ, ञ, ण, न और म अनुनासिक हैं। जिन वर्णों के उच्चारण मुख और नासिका से किए जाते है, उन्हें अनुनासिक कहते हैं- मुखनासिकावचनोSनुनासिकः। इनमें से ङ और ञ का प्रयोग हिन्दी में समाप्त हो गया है। ञ का प्रयोग केवल ज्ञ (=ज्+ञ) के साथ जुड़कर अवशेष रूप में पड़ा हुआ है।

अन्तस्थ और ऊष्म वर्णों में य और श का उच्चारण स्थान तालु है, र और ष का मूर्धा, ल और स का दन्त, व का दन्तोष्ठ और ह का उच्चारण स्थान कंठ है।

आगे बढ़ने से पहले थोड़ी चर्चा अन्तस्थ और ऊष्म वर्णों पर चर्चा कर लेते हैं। अन्तस्थ वर्णों में स्वर और व्यंजन दोनों के गुण पाए जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि स्वर और व्यंजन के बीच में स्थित होने के कारण इन्हें अन्तःस्थ या अन्तस्थ कहा जाता है- अन्तः (स्वरव्यञ्जनयोः मध्ये) तिष्ठन्तीति अन्तःस्थाः। इ का य्, ऋ का र्, लृ का ल् और उ का व् होता है- यदि+अप=यद्यपि, पितृ+आदेश= पित्रादेश, तव+लृकार=तवल्कार, सु+आगत=स्वागत।

ऊष्म का अर्थ गरम तो होता है, पर यहाँ उच्छ्वास है। इसके विषय मे आचार्य उवट (भाष्यकार) का कहना है- ऊष्मा वायुः तत्प्रधाना वर्णाः ऊष्माणः, अर्थात् ऊष्मा वायु है, इसकी प्रधानता वाले वर्ण ऊष्म हैं। ऊष्म व्यंजनों के उच्चारण में अन्य व्यंजनों की अपेक्षा अधिक वायु (उच्छ्वास) निकलती है। इसलिए श, ष, स और ह को ऊष्म कहते हैं। इन वर्णों के विषय में आचार्य किशोरीदास वाजपेयी जी कहते हैं- इनका उच्चारण महाप्राणता स्पष्ट करता है। ऊष्मा (गरमाहट) इनमें स्पष्ट है। महाप्राण (एक प्रकार का बाह्य प्रयत्न) जो ठहरे। वैसे इनके अतिरिक्त अन्य वर्ण भी महाप्राण हैं जिनकी चर्चा आगे की जाएगी।

पिछले अंक में ध्वनियों पर चर्चा करते समय यह उल्लेख किया गया था कि इनके (ध्वनियों के) उच्चारण के लिए स्थान, करण और प्रयत्न - तीन चीजों की आवश्यकता पड़ती है। इन वर्णों के उच्चारण मुख के विभिन्न स्थानों से करते हैं, जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। स्थान स्थिर होते हैं, पर करण चलायमान हैं। करण के अन्तर्गत ओष्ठ, जिह्वा, कोमल तालु और स्वर-तंत्री आते हैं। इनमें ओष्ठ की गणना स्थान और करण दोनों में होती है। क्योंकि इसमें दोनों गुण पाए जाते हैं।

पिछले अंक में चर्चा हुई थी कि प्रयत्न दो प्रकार के होते हैं- आभ्यन्तर और बाह्य प्रयत्न। आभ्यन्तर प्रयत्न के पाँच भेद किए गए हैं- स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट0, ईषद्विवृत, विवृत और संवृत।

स्पृष्ट अर्थात् स्पर्श किया गया। जितने भी वर्गाक्षर हैं- कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग- वे सभी कंठ से ओष्ठ तक जिह्वा के स्पर्श से उच्चरित होते हैं। इसलिए इनका आभ्यन्तर प्रयत्न स्पृष्ट माना गया है।

ईषत्स्पृष्ट का अर्थ है थोड़ा स्पर्श किया गया। इसमें अन्त0स्थ वर्ण- य र ल और व आते हैं। क्योंकि इनके उच्चारण में जीभ इनके उच्चारण-स्थानों को उतना स्पर्श नहीं करती, जितना कि स्पृष्ट में।

ईषद्विवृत का अर्थ होता है थोड़ा खुला हुआ। इसके अन्तर्गत सभी ऊष्म वर्ण- श ष स और ह आते हैं। इनके उच्चारण में मुख-विवर उतना नहीं खुलता जितना स्वरों के उच्चारण में। इसलिए इन्हें आभ्यन्तर प्रयत्न की दृष्टि से ईष्द्विवृत वर्ण कहा जाता है। इसे भाषावैज्ञानिक अर्धविवृत भी कहते हैं और ऐ तथा औ स्वरों को इस श्रेणी में रखते हैं। कुछ भाषावैज्ञानिक केवल ऑ को इस श्रेणी में रखते हैं।

विवृत का अर्थ खुला हुआ होता है। स्वरों के उच्चारण में ईषद्विवृत व्यंजन वर्णों की अपेक्षा मुख-विवर अधिक खुलता है और जीभ और मुख विवर के ऊपरी भाग के बीच अधिक दूरी होती है। इषद्विवृत में यह दूरी थोड़ी विवृत की अपेक्षा कम होती है। इसलिए स्वरों को विवृत की श्रेणी में रखा गया है। जबकि भाषावैज्ञनिक आ (हिन्दी में) को विवृत मानते हैं।

संवृत का अर्थ बन्द होता है। यह विवृत का ठीक उलटा है। लेकिन बिलकुल बन्द होने पर किसी ध्वनि का उच्चारण असम्भव हो जाएगा। अतएव व्यावहारिक तौर पर इसे यों समझना चाहिए कि जिन स्वरों के उच्चारण करने में जिह्वा और मुख-विवर के बीच बहुत कम दूरी रहती है, उन्हें संवृत स्वर कहा गया है। इसके व्यवहार के विषय में कहा गया है- ह्रस्वोSकारः प्रयोगे संवृतः अर्थात् ह्रस्व अकार (अ) प्रयोग (व्यवहार) में आने पर संवृत होते हैं। जबकि कुछ भाषावैज्ञानिक इ, ई, उ, ऊ को संवृत मानते हैं और कुछ केवल ई तथा ऊ को।

कुछ आधुनिक विद्वान एक और भेद अर्धसंवृत भी मानते हैं तथा इसके अन्तर्गत ए और ओ को रखते हैं।

बाह्य प्रयत्न उन्हें कहा जाता है जब ध्वनियों के उच्चारण करने में कंठ और ओष्ठ के बाद (नीचे) जो प्रयत्न किए जाते हैं। इनकी संख्या ग्यारह है- विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त और स्वरित। इनमें से उदात्त, अनुदात्त और स्वरित बाह्य प्रयत्नों पर चर्चा पिछले अंक में हो चुकी है। क्योंकि ये प्रयत्न केवल स्वरों में ही लगते हैं। अतएव उन्हें यहीं छोड़ रहे हैं। यहाँ केवल शेष आठ प्रयत्नों पर ही चर्चा की जाएगी। बाह्य प्रयत्न मुख्य रूप से स्वरतंत्री में होते हैं। इसके अन्तर्गत स्वरतंत्री की अवस्था, प्राणवायु की गति और इन दोनों (स्वरतंत्री की अवस्था और प्राणवायु की गति) के कारण होने वाला घर्षण महत्त्वपूर्ण हैं।

जिन व्यंजनों के उच्चारण में स्वरतंत्री पूर्ण रूप से विवृत (खुली) होती हैं, उन्हें विवार कहते हैं। सभी वर्गों के प्रथम, द्वितीय और अन्तस्थ के तीन अक्षर- श, ष और स -विवार कहलाते हैं।

संवार में स्वरतंत्रियाँ बन्द कर प्राणवायु को निकालते हैं। यह विवार के विपरीत अवस्था है। इसमें सभी वर्गो के तृतीय, चतुर्थ और पंचम अक्षर तथा ऊष्म अक्षर ह आते हैं।

निःश्वास का निर्बाध रूप से निकलना श्वास प्रयत्न कहलाता है। सभी वर्गों के प्रथम, द्वितीय और ऊष्म वर्ण- श, ष और स के उच्चारण में श्वास प्रयत्न होता है। विवार और श्वास दोनों प्रयत्नों वाले वर्ण समान हैं।

नाद प्रयत्न श्वास प्रयत्न के विपरीत होता है, अर्थात् नाद प्रयत्न में स्वरतंत्रियाँ मिलती हैं। इसमें वे सभी वर्ण आते हैं, जिनकी चर्चा संवार के अन्तर्गत की गयी है, अर्थात् सभी वर्गो के तृतीय, चतुर्थ और पंचम अक्षर तथा ऊष्म अक्षर ह।

घोष वर्ण वे हैं जिनके उच्चारण में लगनेवाले प्रयत्न के परिणाम स्वरूप स्वरतंत्री में घर्षण उत्पन्न होता है। इसमें संवार और नाद प्रयत्न के अन्तर्गत आनेवाली सभी ध्वनियाँ आती हैं, अर्थात् पाँचो वर्गों के तृतीय, चतुर्थ और पंचम अक्षर, सभी अन्तस्थ वर्ण तथा ऊष्म का ह आते हैं।

श्वास प्रयत्न में घर्षण का न होना अघोष कहलाता है। इसमें व सभी ध्वनियाँ आती हैं, जो विवार और श्वास प्रयत्न के अन्तर्गत मानी जाती हैं- सभी वर्गों के प्रथम, द्वितीय और अन्तस्थ के तीन अक्षर- श, ष और स।

अल्पप्राण वे वर्ण हैं जिनके उच्चारण में कम प्राणवायु निकलती है। इसमें प्रत्येक वर्ग (कवर्ग से पवर्ग तक) के प्रथम, द्वितीय और पंचम वर्ण और सभी अन्तस्थ वर्ण आते हैं।

महाप्राण अल्पप्राण के ठीक विपरीत है, अर्थात् जिन वर्णों के उच्चारण में अधिक प्राण वायु निकलती है, उन्हें महाप्राण कहा गया है। इसमें सभी वर्गों के द्वितीय और चतुर्थ वर्ण तथा सभी ऊष्म वर्ण आते हैं।

उक्त वर्णों के अलावा एक और वर्ण का प्रयोग देखा जाता है और वह है ळ। यह ध्वनि मूर्धा से उच्चरित होती है। इसलिए इसे मूर्धन्य ल कहते हैं। इसका प्रयोग वेदों मे हुआ है और आधुनिक भारतीय भाषाओं- मराठी, तेलुगु, तमिल, कन्नड और मलयालम में आज भी होता है। तंत्र में भी मंत्रों में बीजाक्षर के रूप में इस अक्षर का प्रयोग हुआ है। उत्तर भारत में बोली जानेवाली भाषाओं मे इस ध्वनि का प्रयोग नहीं होता। यहाँ तक कि लौकिक संस्कृत में भी इसका प्रयोग नहीं हुआ है। महर्षि पाणिनि ने भी इस वर्ण का उल्लेख नहीं किया है। इसके स्थान पर हिन्दी में दूसरी ध्वनि ड़ का प्रयोग होता है। लगता है यह ळ का ही विकसित रूप है। इसी प्रकार ढ से विकसित एक ध्वनि ढ़ भी हिन्दी भाषा में प्रयोग होती है। ळ के अलावा ड़ और ढ़ से मिलती जुलती दो ध्वनियों का प्रयोग तमिल और मलयालम भाषाओं में देखा जाता है।

इस परिचर्चा को यहीं विराम देते हैं। अगले अंक में विसर्ग, अनुस्वार और उक्त ध्वनियों के प्रयोग पर चर्चा करते हुए इस विषय को समाप्त किया जायगा।

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गुरुवार, 4 अगस्त 2011

भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होने वाली ध्वनियाँ - एक परिचर्चा

आँच-79

भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होने वाली ध्वनियाँ - एक परिचर्चा

आचार्य परशुराम राय

आज के आँच के अंक में भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होने वाली ध्वनियों पर चर्चा की जा रही है। सोचा गया कि समीक्षा पढ़ते-पढ़ते उबन से बचने के लिए विषयान्तर अच्छा रहेगा। वैसे यह विषय भी रोचक नहीं है। फिर भी मन में यह विचार आया कि जिन ध्वनियों का हम अपने दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं, उनमें कितनी विशेषताएँ छिपी हैं, इसपर चर्चा करना अनुपयुक्त नहीं होगा। प्रस्तुत अंक में केवल स्वरों पर चर्चा पर्याप्त होगी। क्योंकि व्यंजनों को समाविष्ट करने पर यह आलेख काफी लम्बा हो जाएगा। अतएव अगले अंक में व्यंजनों पर चर्चा करेंगे। इस पर चर्चा के लिए हमारे एक बाल-सखा के एक फोन ने मुझे प्रेरित किया।

उस दिन मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब मेरे बाल सखा ने प्रश्न किया कि हिन्दी के अक्षरों को पढ़ाते समय क्ष, त्र और ज्ञ को अलग से क्यों पढ़ाया जाता है, जबकि वे संयुक्ताक्षर हैं, अर्थात् क्+ष=क्ष, त+र=त्र और ज्+ञ=ज्ञ होते हैं। आश्चर्य इसलिए हुआ कि मेरे जिस मित्र ने प्रश्न किया था, वे संस्कृत के बड़े अच्छे ज्ञाता हैं। सत्तर के दशक में उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के वेद विभाग में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था और वर्तमान में वे एक उत्तर माध्यमिक विद्यालय (इंटर कालेज) में पिछले तीस वर्षों से भी अधिक समय से संस्कृत के प्रवक्ता हैं। मैंने हँसते हुए कहा कि कहीं एक वैयाकरण मजाक तो नहीं कर रहा है। इस पर उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्कृत में नहीं, हिन्दी में क्यों बच्चों को पढ़ाया जाता है। तभी विचार आया कि ब्लॉग पर इस विषय में चर्चा करना अच्छा रहेगा। यह मैं नहीं जानता कि पाठक मेरी इस बचकानी हरकत पर कितना हँसेंगे यह सोचकर कि यह व्यक्ति ब्लॉगर्स को ककहरा सिखा रहा है। लेकिन मुझे याद है कि एक बार टी.वी. पर किसी चैनल ने एक सर्वेक्षण किया था कि कितने लोग हिन्दी अक्षरों को आद्योपान्त जबानी बता सकते हैं। जिन लोगों से यह प्रश्न किया गया था, वे हाई स्कूल से लेकर एम.ए. तक के छात्र थे या अच्छे पढ़े-लिखे थे। उनमें से 10% से भी कम लोग यह ठीक-ठीक बता पाए। जबकि अंग्रेजी के 26 अक्षर प्रायः सभी बोल गए। यह सर्वेक्षण हिन्दी-भाषी क्षेत्र में ही किया गया था। इसलिए थोड़ा साहस जुटा पाया हूँ कि इस विषय पर चर्चा करना इतना हास्यास्पद नहीं होगा।

प्रायः सभी भाषाओं में प्रथम दृष्ट्या ध्वनियों को दो भागों में विभक्त किया गया है- स्वर और व्यंजन। भारतीय भाषाओं में भी स्वर और व्यंजन दो प्रकार की ध्वनियाँ होती हैं। इसके बाद पुनः स्वरों और व्यंजनों को विभिन्न प्रकार से विभाजित किया गया है, यथा- स्वर- अ से लृ तक ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत तीन भेद किए गए हैं और फिर इन सभी के उदात्त, अनुदात्त और स्वरित तीन भेद किए गए हैं। इसी प्रकार व्यंजन के अल्पप्राण, महाप्राण, घोष, अघोष, अनुनासिक आदि भेद किए गए हैं। इस प्रकार के विभाजनों पर चर्चा करने के पहले यह जान लेते हैं कि कुल कितनी ध्वनियाँ होती हैं। इसके लिए सर्वप्रथम महर्षि पाणिनि द्वारा अष्टाध्यायी (व्याकरण का ग्रंथ) में दी गयी ध्वनियों को लेते हैं जो माहेश्वर सूत्र में दी गयी हैं। माहेश्वर सूत्रों की कुल संख्या चौदह है-

1.अइउण्, 2. ऋलृक्, 3. एओङ्, 4. ऐऔच्, 5. हयवरट्, 6. लण्, 7. ञमङणनम्, 8. झभञ्, 9. घढधष्, 10. जगबडदश्, 11. खफछठथचटतव्, 12. कपय्, 13 शषसर्, 14. हल्।

उक्त सूत्रों से ध्वनियों को लेने के लिए हर सूत्र के अन्तिम हलन्त्य वर्ण- ण्, क्, ङ्, च्, ट्, ण्, म्, ञ्, ष्, श्, व्, य्, र् और ल् को हटा दिया जाता है। इन्हें हटाने के बाद सूत्रों में कथित ध्वनियों को निम्नलिखित रूप में रखा जा सकता है-

अ इ उ, ऋ लृ, ए ओ, ऐ औ, ह य व र, ल, ञ म ङ ण न, झ भ, घ ढ ध, ज ग ब ड द, ख फ छ ठ थ च त व, क प, श ष स और ह।

इसमें यह ध्यातव्य है कि ह दो बार आया है। ऐसा महर्षि पाणनि ने क्यों किया है, इस पर कभी बाद में चर्चा की जाएगी। इन ध्वनियों के प्रथम दो भाग किये गये हैं- स्वर और व्यंजन। स्वरों में अ, इ, उ और ऋ के तीन भेद किये गये हैं- ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत। लृ के केवल ह्रस्व और प्लुत भेद ही होते हैं, इसका दीर्घ रूप नहीं होता। ए, ऐ, ओ और औ के दो भेद दीर्घ और प्लुत होते हैं, ह्रस्व नहीं। ए, ऐ, ओ और औ को संयुक्त स्वर भी माना गया है, जबकि अ, इ और उ को मूल स्वर। क्योंकि ए=अ या आ+इ या ई, ऐ=अ+ए, ओ=अ या आ+उ या ऊ और औ=अ या आ+ओ। इनमें से हमलोग केवल प्रथम दो, अर्थात् ह्रस्व और दीर्घ स्वरों का प्रयोग करते हैं। प्लुत का प्रयोग केवल वेदों में होता है। इनके उच्चारण के विषय में कहा गया है कि ह्रस्व स्वर के उच्चारण में जितना समय लगता है, उसका दुगुना दीर्घ स्वर के उच्चारण में और प्लुत में तिगुना। महर्षि पतञ्जलि ने स्वर के तीनों प्रकार के स्वरों के उच्चारण में लगनेवाले समय के लिए बहुत ही व्यावहारिक और प्राकृतिक उदाहरण दिया है और वह है मुर्गे की आवाज- कुक्-ड़ू-कूS। इसमें पहला ह्रस्व, दूसरा दीर्घ और तीसरा प्लुत है। इसके बाद ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत स्वरों के पुनः तीन भेद- उदात्त (अर्थात स्वर का आरोही क्रम), अनुदात्त (अर्थात् स्वर का अवरोही क्रम) और स्वरित (अर्थात् उदात्त और अनुदात्त के बीच) होते हैं। इनके उच्चारण के विषय में महर्षि पाणिनि के सूत्र यहाँ दिये जाते हैं- उच्चैरुदात्तः, नीचैरनुदात्तः और समाहारः स्वरितः, अर्थात् तालु आदि स्थानों के उर्ध्व भाग से उच्चारण होने पर उदात्त, नीचे वाले भाग से उच्चरित होने पर अनुदात्त तथा दोनों (उदात्त और अनुदात्त) के बीच की अवस्था में उच्चरित होने पर स्वरित। इसके बाद इन सभी को पुनः दो भेद किये गये हैं- अनुनासिक के मेल से और अननुनासिक, अर्थात् नाक की सहायता से और बिना नाक की सहायता से बोले जानेवाले। वैसे स्वरों के उदात्त, अनुदात्त और स्वरित रूपों का प्रयोग केवल वेदों में ही होता है। लौकिक संस्कृत में भी उदात्त, अनुदात्त और स्वरित रूपों का अभाव है। हाँ, मराठी और भारत के दक्षिणी राज्यों में बोली जानेवाली चारो भाषाओं- तेलुगु, कन्नड़, तमिल और मलयालम में ए और ओ के दो रूप पाए जाते हैं। लगता है कि वेदों में प्रयुक्त होनेवाले स्वरों के प्लुत स्वरूप का प्रचलन दक्षिण भारत की भाषाओं में इन दो स्वरों में वहीं से आया है। लृ का प्रयोग वेदों में भी अत्यन्त सीमित या नहीं के बराबर पाया जाता है, अन्यथा किसी भी अन्य भारतीय भाषाओं में इस ध्वनि का प्रयोग नहीं देखा जाता, यहाँ तक कि लौकिक संस्कृत में भी नहीं। हाँ, तन्त्रों में प्रयुक्त मंत्रों में बीज वर्ण के रूप में इसका प्रयोग हुआ है। स्वरों के उक्त विभाजन को संक्षेप में निम्नलिखित सारिणी में दिया जा रहा है। यह सारिणी गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित लघुसिद्धान्तकौमुदी से साभार ली गयी है-

अ इ उ ऋ लृ

अ इ उ ऋ ए ओ ऐ औ

अ इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ

ह्रस्व भेद

दीर्घ भेद

प्लुत भेद

1.उदात्त अनुनासिक

2.उदात्त अननुनासिक

3.अनुदात्त अनुनासिक

4.अनुदात्त अननुनासिक

5.स्वरित अनुनासिक

6.स्वरित अननुनासिक

1.उदात्त अनुनासिक

2.उदात्त अननुनासिक

3.अनुदात्त अनुनासिक

4.अनुदात्त अननुनासिक

5.स्वरित अनुनासिक

6.स्वरित अननुनासिक

1.उदात्त अनुनासिक

2.उदात्त अननुनासिक

3.अनुदात्त अनुनासिक

4.अनुदात्त अननुनासिक

5.स्वरित अनुनासिक

6.स्वरित अननुनासिक

इसके बाद इन स्वरों को उच्चारण के स्थान और प्रयत्न के आधार पर भी इनका विभाजन किया गया है। स्थान-भेद से स्वरों का विवरण नीचे की सारिणी में दिया जा रहा है-

कंठ

तालु

मूर्धा

दन्त्य

ओष्ठ

कंठ-तालु

कंठ-ओष्ठ

अ

इ

ऋ

लृ

उ

ए ऐ

ओ औ

प्रयत्न दो प्रकार के होते हैं- आभ्यन्तर और बाह्य। मुख-विवर में ओठ से कंठ के बीच से वर्णों के उच्चारण के लिए जो प्रयत्न किया जाता है, उन्हें आभ्यन्तर प्रयत्न और जो प्रयत्न कंठ के नीचे से किया जाता है, उन्हें बाह्य प्रयत्न कहते हैं। आभ्यन्तर प्रयत्न चार होते हैं- स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, विवृत और संवृत। इस आधार पर इनका विभाजन करते समय इन्हें आभ्यन्तर प्रयत्न के विवृत की श्रेणी में रखा गया है। प्रयत्नों के विभिन्न रूपों की चर्चा व्यंजन वर्णों पर चर्चा के दौरान की जाएगी। यहाँ केवल विवृत को लेते हैं। विवृत का अर्थ खुला हुआ होता है। स्वरों के उच्चारण में जीभ का कहीं स्पर्श नहीं होता। इसलिए प्रयत्न की दृष्टि से इनका आभ्यन्तर विवृत प्रयत्न होता है।

तो इस प्रकार हमने देखा कि रोजमर्रा के जीवन में हम जिन ध्वनियों का प्रयोग करते हैं, वे अनेक विशेषताओं से भरी हैं। अगले अंक में व्यंजन वर्णों पर इसी चर्चा को आगे बढ़ायेंगे।

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