गुरुवार, 11 अगस्त 2011

भारतीय भाषाएँ और ध्वनियाँ-एक परिचर्चा-2

भारतीय भाषाएँ और ध्वनियाँ-एक परिचर्चा-2

आचार्य परशुराम राय

मो. नं. 09936526011

ई-मेल : parashuramrai25@gmail.com

पिछले अंक में स्वरों पर चर्चा हुई थी। अब बारी है व्यंजनों की। स्वरों की सहायता के बिना व्यंजनों का उच्चारण कठिन है। व्यंजन स्वर के मुख से ही मुखर होते हैं। स्वरों की भाँति व्यंजन भी कई श्रेणियों में विभक्त किए गए हैं, यथा- कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, अन्तस्थ और ऊष्म-

कवर्ग – क ख ग घ ङ

चवर्ग – च छ ज झ ञ

टवर्ग – ट ठ ड ढ ण

तवर्ग – त थ द ध न

पवर्ग – प फ ब भ म

अन्तस्थ – य र ल व

उष्म – श ष स ह

आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, जिन्हें हिन्दी का पाणिनि कहना अत्युक्ति न होगी, इन व्यंजन वर्णों को पहले तीन भागों में विभक्त करते हैं- वर्गीय, अन्तस्थ और ऊष्म। वर्गीय में पाँच वर्ग- कवर्ग से पवर्ग तक 25 वर्ण हैं। ये वर्ग उच्चारण के स्थान की दृष्टि से बाँटे गये हैं- कवर्ग का उच्चारण स्थान कंठ है, चवर्ग का तालु, टवर्ग का मूर्धा, तवर्ग का दन्त और पवर्ग का ओष्ठ है। इसके अतिरिक्त पाँचो वर्गों के पाँचवे वर्ण- ङ, ञ, ण, न और अनुनासिक हैं। जिन वर्णों के उच्चारण मुख और नासिका से किए जाते है, उन्हें अनुनासिक कहते हैं- मुखनासिकावचनोSनुनासिकः। इनमें से और का प्रयोग हिन्दी में समाप्त हो गया है। का प्रयोग केवल ज्ञ (=ज्+ञ) के साथ जुड़कर अवशेष रूप में पड़ा हुआ है।

अन्तस्थ और ऊष्म वर्णों में और का उच्चारण स्थान तालु है, और का मूर्धा, और का दन्त, का दन्तोष्ठ और का उच्चारण स्थान कंठ है।

आगे बढ़ने से पहले थोड़ी चर्चा अन्तस्थ और ऊष्म वर्णों पर चर्चा कर लेते हैं। अन्तस्थ वर्णों में स्वर और व्यंजन दोनों के गुण पाए जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि स्वर और व्यंजन के बीच में स्थित होने के कारण इन्हें अन्तःस्थ या अन्तस्थ कहा जाता है- अन्तः (स्वरव्यञ्जनयोः मध्ये) तिष्ठन्तीति अन्तःस्थाः। इ का य्, ऋ का र्, लृ का ल् और उ का व् होता है- यदि+अप=यद्यपि, पितृ+आदेश= पित्रादेश, तव+लृकार=तवल्कार, सु+आगत=स्वागत।

ऊष्म का अर्थ गरम तो होता है, पर यहाँ उच्छ्वास है। इसके विषय मे आचार्य उवट (भाष्यकार) का कहना है- ऊष्मा वायुः तत्प्रधाना वर्णाः ऊष्माणः, अर्थात् ऊष्मा वायु है, इसकी प्रधानता वाले वर्ण ऊष्म हैं। ऊष्म व्यंजनों के उच्चारण में अन्य व्यंजनों की अपेक्षा अधिक वायु (उच्छ्वास) निकलती है। इसलिए श, ष, स और ह को ऊष्म कहते हैं। इन वर्णों के विषय में आचार्य किशोरीदास वाजपेयी जी कहते हैं- इनका उच्चारण महाप्राणता स्पष्ट करता है। ऊष्मा (गरमाहट) इनमें स्पष्ट है। महाप्राण (एक प्रकार का बाह्य प्रयत्न) जो ठहरे। वैसे इनके अतिरिक्त अन्य वर्ण भी महाप्राण हैं जिनकी चर्चा आगे की जाएगी।

पिछले अंक में ध्वनियों पर चर्चा करते समय यह उल्लेख किया गया था कि इनके (ध्वनियों के) उच्चारण के लिए स्थान, करण और प्रयत्न - तीन चीजों की आवश्यकता पड़ती है। इन वर्णों के उच्चारण मुख के विभिन्न स्थानों से करते हैं, जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। स्थान स्थिर होते हैं, पर करण चलायमान हैं। करण के अन्तर्गत ओष्ठ, जिह्वा, कोमल तालु और स्वर-तंत्री आते हैं। इनमें ओष्ठ की गणना स्थान और करण दोनों में होती है। क्योंकि इसमें दोनों गुण पाए जाते हैं।

पिछले अंक में चर्चा हुई थी कि प्रयत्न दो प्रकार के होते हैं- आभ्यन्तर और बाह्य प्रयत्नआभ्यन्तर प्रयत्न के पाँच भेद किए गए हैं- स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट0, ईषद्विवृत, विवृत और संवृत

स्पृष्ट अर्थात् स्पर्श किया गया। जितने भी वर्गाक्षर हैं- कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग- वे सभी कंठ से ओष्ठ तक जिह्वा के स्पर्श से उच्चरित होते हैं। इसलिए इनका आभ्यन्तर प्रयत्न स्पृष्ट माना गया है।

ईषत्स्पृष्ट का अर्थ है थोड़ा स्पर्श किया गया। इसमें अन्त0स्थ वर्ण- य र ल और व आते हैं। क्योंकि इनके उच्चारण में जीभ इनके उच्चारण-स्थानों को उतना स्पर्श नहीं करती, जितना कि स्पृष्ट में।

ईषद्विवृत का अर्थ होता है थोड़ा खुला हुआ। इसके अन्तर्गत सभी ऊष्म वर्ण- श ष स और ह आते हैं। इनके उच्चारण में मुख-विवर उतना नहीं खुलता जितना स्वरों के उच्चारण में। इसलिए इन्हें आभ्यन्तर प्रयत्न की दृष्टि से ईष्द्विवृत वर्ण कहा जाता है। इसे भाषावैज्ञानिक अर्धविवृत भी कहते हैं और तथा स्वरों को इस श्रेणी में रखते हैं। कुछ भाषावैज्ञानिक केवल को इस श्रेणी में रखते हैं।

विवृत का अर्थ खुला हुआ होता है। स्वरों के उच्चारण में ईषद्विवृत व्यंजन वर्णों की अपेक्षा मुख-विवर अधिक खुलता है और जीभ और मुख विवर के ऊपरी भाग के बीच अधिक दूरी होती है। इषद्विवृत में यह दूरी थोड़ी विवृत की अपेक्षा कम होती है। इसलिए स्वरों को विवृत की श्रेणी में रखा गया है। जबकि भाषावैज्ञनिक (हिन्दी में) को विवृत मानते हैं।

संवृत का अर्थ बन्द होता है। यह विवृत का ठीक उलटा है। लेकिन बिलकुल बन्द होने पर किसी ध्वनि का उच्चारण असम्भव हो जाएगा। अतएव व्यावहारिक तौर पर इसे यों समझना चाहिए कि जिन स्वरों के उच्चारण करने में जिह्वा और मुख-विवर के बीच बहुत कम दूरी रहती है, उन्हें संवृत स्वर कहा गया है। इसके व्यवहार के विषय में कहा गया है- ह्रस्वोSकारः प्रयोगे संवृतः अर्थात् ह्रस्व अकार (अ) प्रयोग (व्यवहार) में आने पर संवृत होते हैं। जबकि कुछ भाषावैज्ञानिक इ, ई, उ, ऊ को संवृत मानते हैं और कुछ केवल तथा को।

कुछ आधुनिक विद्वान एक और भेद अर्धसंवृत भी मानते हैं तथा इसके अन्तर्गत और को रखते हैं।

बाह्य प्रयत्न उन्हें कहा जाता है जब ध्वनियों के उच्चारण करने में कंठ और ओष्ठ के बाद (नीचे) जो प्रयत्न किए जाते हैं। इनकी संख्या ग्यारह है- विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त और स्वरित। इनमें से उदात्त, अनुदात्त और स्वरित बाह्य प्रयत्नों पर चर्चा पिछले अंक में हो चुकी है। क्योंकि ये प्रयत्न केवल स्वरों में ही लगते हैं। अतएव उन्हें यहीं छोड़ रहे हैं। यहाँ केवल शेष आठ प्रयत्नों पर ही चर्चा की जाएगी। बाह्य प्रयत्न मुख्य रूप से स्वरतंत्री में होते हैं। इसके अन्तर्गत स्वरतंत्री की अवस्था, प्राणवायु की गति और इन दोनों (स्वरतंत्री की अवस्था और प्राणवायु की गति) के कारण होने वाला घर्षण महत्त्वपूर्ण हैं।

जिन व्यंजनों के उच्चारण में स्वरतंत्री पूर्ण रूप से विवृत (खुली) होती हैं, उन्हें विवार कहते हैं। सभी वर्गों के प्रथम, द्वितीय और अन्तस्थ के तीन अक्षर- श, ष और -विवार कहलाते हैं।

संवार में स्वरतंत्रियाँ बन्द कर प्राणवायु को निकालते हैं। यह विवार के विपरीत अवस्था है। इसमें सभी वर्गो के तृतीय, चतुर्थ और पंचम अक्षर तथा ऊष्म अक्षर आते हैं।

निःश्वास का निर्बाध रूप से निकलना श्वास प्रयत्न कहलाता है। सभी वर्गों के प्रथम, द्वितीय और ऊष्म वर्ण- , और के उच्चारण में श्वास प्रयत्न होता है। विवार और श्वास दोनों प्रयत्नों वाले वर्ण समान हैं।

नाद प्रयत्न श्वास प्रयत्न के विपरीत होता है, अर्थात् नाद प्रयत्न में स्वरतंत्रियाँ मिलती हैं। इसमें वे सभी वर्ण आते हैं, जिनकी चर्चा संवार के अन्तर्गत की गयी है, अर्थात् सभी वर्गो के तृतीय, चतुर्थ और पंचम अक्षर तथा ऊष्म अक्षर

घोष वर्ण वे हैं जिनके उच्चारण में लगनेवाले प्रयत्न के परिणाम स्वरूप स्वरतंत्री में घर्षण उत्पन्न होता है। इसमें संवार और नाद प्रयत्न के अन्तर्गत आनेवाली सभी ध्वनियाँ आती हैं, अर्थात् पाँचो वर्गों के तृतीय, चतुर्थ और पंचम अक्षर, सभी अन्तस्थ वर्ण तथा ऊष्म का आते हैं।

श्वास प्रयत्न में घर्षण का न होना अघोष कहलाता है। इसमें व सभी ध्वनियाँ आती हैं, जो विवार और श्वास प्रयत्न के अन्तर्गत मानी जाती हैं- सभी वर्गों के प्रथम, द्वितीय और अन्तस्थ के तीन अक्षर- श, ष और

अल्पप्राण वे वर्ण हैं जिनके उच्चारण में कम प्राणवायु निकलती है। इसमें प्रत्येक वर्ग (कवर्ग से पवर्ग तक) के प्रथम, द्वितीय और पंचम वर्ण और सभी अन्तस्थ वर्ण आते हैं।

महाप्राण अल्पप्राण के ठीक विपरीत है, अर्थात् जिन वर्णों के उच्चारण में अधिक प्राण वायु निकलती है, उन्हें महाप्राण कहा गया है। इसमें सभी वर्गों के द्वितीय और चतुर्थ वर्ण तथा सभी ऊष्म वर्ण आते हैं।

उक्त वर्णों के अलावा एक और वर्ण का प्रयोग देखा जाता है और वह है । यह ध्वनि मूर्धा से उच्चरित होती है। इसलिए इसे मूर्धन्य ल कहते हैं। इसका प्रयोग वेदों मे हुआ है और आधुनिक भारतीय भाषाओं- मराठी, तेलुगु, तमिल, कन्नड और मलयालम में आज भी होता है। तंत्र में भी मंत्रों में बीजाक्षर के रूप में इस अक्षर का प्रयोग हुआ है। उत्तर भारत में बोली जानेवाली भाषाओं मे इस ध्वनि का प्रयोग नहीं होता। यहाँ तक कि लौकिक संस्कृत में भी इसका प्रयोग नहीं हुआ है। महर्षि पाणिनि ने भी इस वर्ण का उल्लेख नहीं किया है। इसके स्थान पर हिन्दी में दूसरी ध्वनि ड़ का प्रयोग होता है। लगता है यह का ही विकसित रूप है। इसी प्रकार से विकसित एक ध्वनि ढ़ भी हिन्दी भाषा में प्रयोग होती है। ळ के अलावा ड़ और ढ़ से मिलती जुलती दो ध्वनियों का प्रयोग तमिल और मलयालम भाषाओं में देखा जाता है।

इस परिचर्चा को यहीं विराम देते हैं। अगले अंक में विसर्ग, अनुस्वार और उक्त ध्वनियों के प्रयोग पर चर्चा करते हुए इस विषय को समाप्त किया जायगा।

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13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उपयोगी जानकारी ...... इस विषय में पहले शायद सुरेश चिपुन्लाकर जी के ब्लॉग पर भी पढा था.....

    आभार.

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  2. व्यंजनों के बारे में बहुत अच्छी जानकारी.
    बचपन में मेरे नाना जी यह मुझे सिखाया करते थे.उस समय वे सुलेख के लिए ‘भर्रू’ यानी पतले बांस की कलम से लिखने का अभ्यास भी कराते थे.

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  3. बहुत ही उपयोगी जानकारी। आभार।

    हम सब बहुत कुछ जान के भी कुछ नहीं जान पाते है

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  4. इस तरह के आलेख से हमारा बेसिक ठीक हो जायेगा. भाषा के ज्ञान के लिए चीज़ें जरुरी हैं..

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  5. सार्थक प्रस्तुति , खूबसूरत..

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  6. बी.ए. और एम. ए. में पढ़ा था ये सब ,मगर उपयोग में नहीं आने कारण बिसरा दिया ...
    अच्छी जानकारी ...
    आभार !

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  7. ध्वनियों की बारे में आपकी परिचर्चा से बहुत कुछ सीखने को मिला।

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  8. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
    चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  9. मेरे लिए बहुत ही उपयोगी पोस्ट है यह , मनोज जी थैंक्स .

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  10. मेरी राजभाषा पर लिखी पोस्ट की वैज्ञानिक व्याख्या दिखाई दे रही है इस श्रृंखला में!! आचार्य जी, धन्यवाद!!

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  11. भाषा की वैज्ञानिकता पर हिन्दी का सटीक मूल्यांकन, अन्य भाषाओं में यह कहाँ?

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आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।