शनिवार, 20 अगस्त 2011

फ़ुरसत में ... स्मृतियों के क्षण

फ़ुरसत में ...

स्मृतियों के क्षण

मनोज कुमार

कुछ चीज़ें विशेष महत्व की होती हैं। ... और हर चीज़ का अपना महत्व होता है। महत्वहीन समझकर किसी चीज़ का तिरस्कार या त्याग नहीं करना चाहिए। तिरस्कार कभी-कभी भारी पड़ सकता है और उसका त्याग किसी खास लाभ से वंचित कर सकता है।

ये बातें आज (19 अगस्त 2011 को) राजधानी एक्सप्रेस के ए.सी.-II टियर के साइड अपर बर्थ पर लेटे-लेटे याद आ रही हैं। आज से 22 साल पहले इसी दिन पटना से मद्रास एक्सप्रेस की ए.सी.-II टियर के साइड अपर बर्थ पर लेटे हुए अपने बीते दिनों की उपलब्धियों को सोचता हुआ नागपुर के लिए चला था। ऐसा नहीं था कि उसके पहले इस तरह की क्लास या बर्थ पर हमने यात्रा नहीं की थी। पिता जी रेलवे में कार्यरत थे और उनको मिलने वाले पास से देश के विभिन्न भागों की यात्रा का अवसर मिलता रहता था, पर उस बार की यात्रा का हमारे लिए विशेष महत्व था। वह टिकट आज भी मेरे पास सुरक्षित है। मेरे लिए वह एक विशेष महत्व की चीज़ है।

पिछले दो दिनों से दिल्ली में था। दिल्ली इन दिनों एक महान संघर्ष का गवाह बनी है। एक ऐसे व्यक्ति का संघर्ष है जिसने अपनी इस संघर्ष-यात्रा की शुरुआत राजघाट से मौन-ध्यान से शुरु की और तिहाड़ जेल होते हुए रामलीला मैदान तक पहुंची। इस दौरान एक ऐसी आत्मा का तिरस्कार किया गया जो बापू की समाधि पर मौन-ध्यान कर देश की दुर्दशा पर आंसू बहाता हुआ कुछ क़दम अगे बढ़ाना चाहता था, पर उसे हिरासत में लेकर वहां ले जाया गया जहां एक से बढ़कर एक भ्रष्टाचारी मौज़ूद थे। कुछ खास लोगों के लिए यह तिरस्कार भारी पड़ा और इस पुनीत आत्मा के समर्थन में देश भर में जन-सैलाब उमड़ पड़ा।

इन दो दिनों में मैंने भी गांधी स्मृति केन्द्र, गांधी संग्रहालय और राजघाट में कई घंटे गुज़ारे। राजघाट से जब नई दिल्ली स्टेशन के लिए वापस हो रहा था तो रास्ते में रामलीला मैदान भी पड़ा और वहां उपस्थित मीडिया की भीड़ इस बात की तसदीक कर रही थी कि देश में जागृति की अलख जगाने वाला व्यक्ति अंदर अपना आसन जमा चुका है। बाहर सड़क पर अभी-अभी हुई वर्षा की तेज़ बौछारों से भींगे युवक-युवतियां, बाल-वृद्ध पूरे जोश और उत्साह का प्रदर्शन करते हुए उस मैदान की तरफ़ बढ़ रहे थे जहां एक और आज़ादी पाने का संघर्ष अपनी जड़ें जमा रहा था।

हमें ट्रेन पकड़नी थी इसलिए रुकने का तो अवसर नहीं था। पर मन में उस हुजूम में शामिल होने की तीव्र उत्कंठा हिलोरें मार रही थी। इस बार जान-बूझकर हमने ट्रेन से दिल्ली से कोलकाता वापसी का मन बनाया था, ताकि हम 22 साल पहले की पुरानी यादों को ताज़ा कर सकें। उस साल जब हम 19 अगस्त को चले थे और 20 अगस्त को हमें एन.ए.डी.पी. नागपुर में फाउण्डेशन कोर्स के लिए ज्वायन करना था, तो कई हलकों में इस बात की चर्चा थी कि यह दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री के जन्म दिन को ध्यान में रखकर चुना गया था, राजनीति का मज़ाक़ उड़ाने वाले इसका अर्थ अपने-अपने हिसाब से अलग-अलग लगा रहे थे। मंशा चाहे जो भी हो, पिछले कई वर्षों से यह कोर्स सिविल सर्विस के लिए चुने गये अन्य सेवाओं के अधिकारियों के लिए बन्द कर दिया था, क्योंकि एल.बी.एस. में जगह कम पड़ती थी और इस बार तीन जगहों पर इसकी व्यवस्था की गई थी, जिनमें से एक नागपुर था, जहां हम जा रहे थे। अब तो यह दिन पूर्व-प्रधानमंत्री की याद में सद्भावना दिवस के रूप में मनाया जाता है। वे देश की सद्भावना के प्रयास में बहुत कुछ कर रहे थे। वे किसी खास वर्ग की नफ़रत का शिकार हुए और उनकी हत्या कर दी गई। ... देश में एक महात्मा और थे जिन्होंने देश की सद्भावना के लिए प्राणपण से कोशिश की और हत्यारों की गोली का शिकार हुए।

अक्टूबर 1946 को नवाखाली, पश्चिम बंगाल, में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। भारी लूट-मार, बलात्कार और आगजनी मची थी। वह महात्मा (बापू) बिल्कुल सामने से परिस्थिति का सामना करने और शांति और सद्भावना बहाल करने के उद्देश्य से नवाखली पहुंचे। गांव-गांव की पद-यात्रा की। एक दिन की बात है, सुबह का पानी गर्म करने के लिए जब मनु बहन चूल्हा जलाने बैठी तो आग सुलग ही नहीं रही थी। बापू को देर न हो इसलिए उन्होंने अपनी साड़ी का एक किनारा फाड़कर मिट्टी के तेल में भिंगोया ताकि जल्दी से आग सुलगा ली जाए। बापू ने इसे देख लिया। मनु से बोले, “यह तो नाड़े लायक चिन्दी है। इसे जलाया कैसे जाये? इसे धोकर सुखा दो। क्या नाड़े बनने लायक़ चिन्दी चूल्हा सुलगाने के काम में लायी जा सकती है? गरम पानी अगर देर से मिलेगा तो कोई हर्ज़ नहीं।”

ऐसे थे बापू। देश की महान समस्यायों में उलझे रहकर भी बापू को ऐसी छोटी-मोटी बातों में महत्व की चीज़ें बताते रहने में बड़ा आनन्द आता था।

आज मैं उनके द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं को जहां संग्रह कर रखा गया है, उस जगह (राष्ट्रीय गांधी संग्राहलय) गया था। वहां पर उनके खून के धब्बों वाला वह वस्त्र भी है, जिसने देश की आत्मा को छलनी कर दिया था। पर आज उस प्रसंग पर चर्चा नहीं। आज तो मैं बात करना चाहता हूं उस संग्रहालय में रखे एक मामूली से दिखने वाले पत्थर की। उसे देखते ही मेरी श्रीमती जी ने प्रश्न किया था, “गांधी जी इस पत्थर से क्या करते थे?”

इस पत्थर से जुड़ा एक रोचक वाकया सुना कर आज मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। बापू नहाते समय साबुन कभी नहीं लगाते थे। वे एक खुरदरा पत्थर काम में लाते थे। वह पत्थर 1922 में उन्हें मीरा बहन ने दिया था। नवाखाली के नारायणपुर गांव में जब पहुंचे तो उनके नहाने की तैयारी मनु बहन कर रही थी। बापू के नहाने के सामान में वह पत्थर नहीं था। बापू के पूछने पर मनु ने बताया कि वह तो उसे पिछले पड़ाव वाले गांव में ही भूल आईं। बापू अपने नियम के बड़े पक्के थे। उन्होंने मनु से कहा, “तुमने भूल की है तो उसे तुम्हें ही ढूंढ़ कर लाना होगा और तुम्हें अकेले ही जाना होगा, तुम्हारे साथ कोई स्वयंसेवक नहीं जायेगा। एक बार ऐसा करोगी तो जीवन भर तुम्हें याद रहेगा।”

अट्ठारह वर्षीय मनु नारियल और सुपारी के घने जंगल के बीच से अकेले गुज़र रही थीं। उस पर से क़ौमी तूफान के दिन थे। वीरान और उजाड़ रास्ते से रामनाम का जप करते हुए मनु चली जा रही थीं। घंटों की यात्रा के बाद वापस उस गांव के उस घर तक पहुंचीं जहां बीती रात बापू ठहरे थे। उस घर में एक वृद्ध महिला रहती थीं। उन्होंने उस पत्थर को अनुपयोगी समझा होगा और फेंक दिया होगा। मनु ने हिम्मत नहीं हारी और बड़ी मुश्किल से उसे खोज ही लिया। वापस आकर बापू के हाथों में पत्थर थमाया। बापू के चेहरे पर मुस्कान और मनु की आंखें में आंसू थे।

बापू ने समझाया, “यह तुम्हारी परीक्षा थी। ईश्वर जो करता है भले के लिए करता है। मेरी यह यात्रा यज्ञ है। इस यज्ञ में शामिल होना हिम्मत का काम है। यह पत्थर पच्चीस साल से मेरा साथी है। लोगों के लिए यह महत्वहीन भले लगे, पर मेरे लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण है। यह बड़े काम की चीज़ है। काम की हर चीज़ को संभालना सीखना चाहिए।”

आज फ़ुरसत में ये कुछ बेतरतीब से ख़्यालात आए जिन्हें एक-साथ गूंथना मेरे वश की बात नहीं है। पर कहीं न कहीं मुझे इसकी कड़ियां जुड़ती दीख रही थीं इसीलिए लिखता चला गया। आज सत्य और अहिंसा की कड़ी परीक्षा की घड़ी है। चारो ओर झूठ चल रहा है। सत्य तो ढूंढ़े नहीं मिल रहा। अहिंसा के नाम पर हिंसा हो रही है। धर्म के नाम पर अधर्म हो रहा है। ऐसे में देश की एक आत्मा बापू की समाधि पर जाकर प्रण लेकर परीक्षा देने बैठ गया है। अंधेरा तो है पर अंधेरे में इस दिए की ज्योति से उजाला फैलने की आशा है!

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में,

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

दुष्यंत की ये पंक्तियां गुनगुनाने लगा हूं ....

24 टिप्‍पणियां:

  1. श्री मनोज कुमार जी,
    आपने सही कहा है- जिंदगी में हम कभी-कभी कुछ ऐसी चीजों को उपेक्षित एवं महत्वहीन समझ कर फेंक देते हैं पर वही चीजे समय आने पर किसी कार्य के निमित्त अपरिहार्य सी लगने लगती है ।
    अन्ना हजारे जी के साथ मेरी पूरी सहानुभूति है । आप यदि अपने स्मृति-पटल पर थोड़ा जोर डालेंगे तो शायद 15 अगस्त, 2011 को मैंने किसी के पोस्ट पर टिप्पणी की थी कि आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो आजादी और स्वतंत्रता के बीच के अंतर को इसके सही संदर्भों में समझ नही पा रहे हैँ । दुख इस बात का होता है कि वर्तमान समाज को एक नई दिशा और दशा देने वाले अन्ना हजारे को सामान्य कैदियों के साथ जेल में बंद कर दिया गया।
    क्या इससे जन-मानस के अंदर धधकती हुई ज्वाला की उष्णता में कमी आएगी या लोग इस मुद्दे को भूल जाएंगे ! हमें बस याद रखना है--

    जब-जब धरा विकल होती मुसीबत का समय आता
    किसी भी रूप में कोई महा-मानव चला आता । सार्थक पोस्ट । धन्यवाद।

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  2. प्रेरक प्रसंग और अविस्मरणीय घटनाओं का वर्णन किया है आपने मनोज जी.. दिल्ली की यादों में यह जो जन समुदाय और युवा आंदोलन का रुख आपने देखा वो सचमुच चुम्बकीय है..
    आपकी यह 'फुर्सत में' मन में बस गयी.. एक और शेर दुष्यंत का, खास आपके लिए;
    आज सडकों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
    घर अन्धेरा देख तू, आकाश के तारे न देख!

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  3. गांधी जी के बारे में कई नयी बातें पता लगीं ! आभार आपका !

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  4. हर चीज़ का अपना महत्त्व होता है . बस जरुरत है पहचान रखने की , पिछले कई दिनों से मुझे भी हुजूम का हिस्सा बनने का मौका मिल रहा है जो आमूल परिवर्तन के लिए दृढ संकल्प है .

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  5. अंधेरा तो है पर अंधेरे में इस दिए की ज्योति से उजाला फैलने की आशा है!

    ज्ञान की बातें स्वयं ही कड़ी ढूंढ लेतीं हैं ....
    गहन छाप छोड़ता हुआ आलेख ....
    आभार.

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  6. अच्छा संस्मरण.
    सार्थक पोस्ट.

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  7. अनेक नई बातों का पता चल रहा है...बहुत अच्छी जानकारी दे रहे हैं आप.

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  8. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  9. बातों ही बातों में देखिये आपने भी गाँधी जी कि एक अनसुनी घटना बता दी..

    आभार.

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  10. स्मृतियों के क्षण ..बहुत प्रेरक रहे ... अब कुछ तो बदलाव होना ही चाहिए ... प्रेरक पोस्ट

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  11. कितनी सारी बातें बस जैसे उस स्मृतिकोष से बस बहती हुई हम तक पहुंची..और हमें भी अपने साथ बहा ले गयीं.

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  12. गांधी जी के बारे में कई नयी बातें पता लगीं ...... सार्थक पोस्ट !!!

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  13. aapki yeh katha bahut kuchh sochne ko majboor karti hai, bahut achchhe sandarbhon se jod kar apni baat ko sundar dishaa dee hai,badhai meri aur se manoj jee.

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  14. बहुत रोचक प्रसंग सुनाया है आपने... कल अपनी आंटी से मिलकर अच्छा लगा... आपके दोनों बच्चे (मेरे छोटे भाई) स्मार्ट हैं, ऐसे सुशील बच्चे कहाँ मिलते हैं... आपके दिए हुए संस्कार हैं और उन्हें देख कर लगा कि आप वही हैं जो आप लिखते है.. ऐसा अक्सर नहीं होता है... अन्ना को अपने चरित्र में उतारने की आवश्यकता है.. भ्रष्टाचार को साधन संपन्न का सुविधा नहीं बनाना चाहिए....

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  15. हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में,
    हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
    सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
    मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
    मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
    हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
    बहुत खूबसूरत बात ....और आपके लेखसे हम गाँधी जी कि एक और बात से अवगत हो गए |
    बहुत सार्थक लेख |

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  16. स्मृतियों का प्रवाह चिन्तनमय हो गया, वह भी आज की परिस्थितियों में।

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  17. स्मृति के झरोखे निकली चिन्तन धारा बहुत ही रोचक और प्रेरणास्पद है। साधुवाद।

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  18. सदैव की तरह बहुत ज्ञानवर्धक और रोचक पोस्ट..

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  19. चुनाव ही विकल्प है। जोश अगर मत में तब्दील न हुआ,तो सारी क़वायद बेकार जाएगी।

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  20. दिल्ली में हलचल के बीच भी स्मृतियों में भी गाँधी साथ रहे ...
    आभार !

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  21. ज्ञानवर्धक और सार्थक प्रस्तुति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  22. हो गई है पीर पर्वत सी...गंगा को धरती पर लाने एक भागीरथ लग गया है...उम्मीद है गंगा ज़रूर अवतरित होगी...हाँ मनोज जी मै एक मजेदार बात शेयर करना चाहता हूँ...विभागीय राजभाषा पत्रिका के लिए मेरी कहानी "सिस्टम के अन्दर - अन्ना" इधर-उधर टहलाई जा रही है...सिस्टम के अन्दर से लड़ना कठिन है...पद पर बैठ लोगों का बस चले तो लोगों की ज़ुबान ही खींच लें...

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  23. मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

    हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए....


    sundar smritiyon ke saath behad ozpoorn panktiyan...

    .

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