रविवार, 14 अगस्त 2011

भारतीय काव्यशास्त्र – 79


भारतीय काव्यशास्त्र – 79
-आचार्य परशुराम राय
पिछले तीन अंकों में गुणीभूतव्यंग्य के दूसरे भेद अपरांग गुणीभूतव्यंग्य पर चर्चा की गयी थी। जिसमें देखा गया कि एक रस दूसरे रस का, रस  भाव का, एक भाव दूसरे भाव का, एक रसाभास दूसरे रसाभास का, भावशान्ति, भावोदय, भाव-संधि और भाव-शबलता दूसरे का अंग होकर किस प्रकार गुणीभूतव्यंग्य की अवस्था को जन्म देते हैं। इसके अतिरिक्त संलक्ष्यक्रमव्यंग्य के दो भेद अलंकारध्वनि और वस्तुध्वनि की अपरांगता के कारण अपरांग गुणीभूतव्यंग्य की स्थिति पर चर्चा की गयी। आगे बढ़ने से पहले यह उल्लेख करना आवश्यक है कि गुणीभूतव्यंग्य पर चर्चा शुरु करते समय इसके आठ भेद बताए गए थे। जिसमें से दो- अगूढ़ और अपरांग गुणीभूतव्यंग्य पर चर्चा हो चुकी है। इस अंक में वाच्यसिद्ध्यंग और अस्फुट (अगूढ़) गुणीभूतव्यंग्य  पर चर्चा की जाएगी।  
अपने विषय पर चर्चा करने के पहले वाच्यांग व्यंग्य और वाच्यसिद्ध्यंग व्यंग्य के अन्तर पर बात करते हैं। क्योंकि इसके अभाव में संदेह की छाया पड़ सकती है। इन दोनों की सीमा-रेखा वाच्यार्थ की निरपेक्षता और सापेक्षता है, अर्थात् जहाँ वाच्यार्थ को अन्य किसी की अपेक्षा न हो फिर भी यदि व्यंग्यार्थ उसका अंग बन जाय, तो वहाँ वाच्यांग-व्यंग्य समझना चाहिए। जैसा कि आगत्य सम्प्रति......... पादपतनेन सहस्ररश्मिः (पिछले अंग में उद्धृत श्लोक) में हमने देखा। परन्तु जहाँ वाच्यार्थ को अपनी सिद्धि के लिए दूसरे अर्थ (व्यंग्यार्थ) की अपेक्षा हो, अर्थात् निर्भर रहना पड़े, और वाच्यार्थ की पूर्ति के लिए व्यंग्यार्थ उसका अंग बन जाय, तो वहाँ वाच्यसिद्धि का अंग होने से वाच्यसिद्ध्यंग-व्यंग्य होगा।
आचार्य मम्मट ने वाच्यसिद्ध्यंग-व्यंग्य के लिए निम्नलिखित श्लोक को उदाहरण के रूप में लिया है-
भ्रमिमरतिमलसहृदयतां  प्रलयं  मूर्छां  तमः  शरीरसादम्।
मरणञ्च जलदभुजगजं प्रसह्य कुरुते विषं वियोगिनीनाम्।।
अर्थात् मेघ रूपी सर्प से उत्पन्न यह विष विरहिणियों में बलात् (जबरदस्ती) चक्कर, बेचैनी, उदासीनता, ज्ञानशून्य, चेष्टाहीनता, मूर्छा, अन्धापन, शारीरिक दुर्बलता और मृत्यु जैसी अवस्था उत्पन्न देता है।  
यहाँ विष पद से हलाहल (ज़हर) व्यंग्य है। विष का अर्थ जल भी होता है। लेकिन यहाँ मेघ पर आरोपित सर्परूप वाच्यार्थ की पूर्ति के लिए विष का हलाहल के अर्थ में व्यंग्यार्थ आवश्यक है। अतएव यहाँ वाच्यसिद्ध्यंग-व्यंग्य नामक गुणीभूतव्यंग्य है।
वाच्यसिद्ध्यंग-व्यंग्य के लिए हिन्दी की एक कविता उद्धृत करते हैं-
पंखुड़ियों  में  छिपी  रह  कर न बातें व्यर्थ।
ढूँढ़  कोषों  में  न प्रियतम! नाथ का तू अर्थ।
हटा घूँघट पट न मुख से मत उझककर झाँक।
बैठ  पर्दे  में  दिवानिसि  मोल  अपनी आँक।
कर कभी मत किसी सुन्दर का निवेदन ध्यान।
री  सजनि,   वन    की    कली    नादान।
यहाँ कली पद से मुग्धा नायिका व्यंग्यार्थ है। इस व्यंग्यार्थ के अभाव में वाच्यार्थ सिद्ध नहीं होगा। अतएव यहाँ भी वाच्यसिद्ध्यंग-व्यंग्य है।
इसके बाद अस्फुट गुणीभूतव्यंग्य पर चर्चा करने के लिए आचार्य मम्मट दारा उद्धृत निम्नलिखित श्लोक लिया जा रहा है-        
अदृष्टे दर्शनोत्कण्ठा दृष्टे विच्छेदभीरुता।
नादृष्टेन न दृष्टेन भवता लभ्यते सुखम्।।
अर्थात् आपका दर्शन न होने पर दर्शन पाने की उत्कंठा रहती है और दर्शन होने पर वियोग का भय सताता है। इस प्रकार अपका दर्शन न होने पर और होने पर दोनों ही अवस्थाओं में आपसे सुख नहीं मिलता।
यहाँ नायिका का अभिप्राय है कि नायक कुछ ऐसा करे कि वह सदा उसके पास रहे, ताकि उसे भय से मुक्ति मिल सके। लेकिन इस व्यंग्यार्थ को समझना कठिन है। इसलिए इसे अस्फुट गुणीभूतव्यंग्य का उदाहरण माना गया है।
इसी प्रकार एक हिन्दी कविता की दो पंक्तियां यहाँ उद्धृत की जा रही हैं जिनमें अस्फुट व्यंग्य स्पष्ट दिखता है-
खिले नव पुष्प जग प्रथम सुगन्ध के
प्रथम   वसन्त  में  गुच्छ   गुच्छ।
यहाँ वसन्त काल में प्रकृति के वर्णन के माध्यम से युवावस्था के आगमन, जिसमें अनेक नयी-नयी आशाएँ जन्म लेती हैं, यह व्यंग्य है। परन्तु इस अर्थ की ग्राह्यता आसान नहीं होने से यहाँ अस्फुट व्यंग्य या गूढ़ व्यंग्य है।
अगले अंक में गुणीभूतव्यंग्य के तीन अन्य भेदों- संदिग्धप्राधान्य, असुन्दर और तुल्यप्राधान्य व्यंग्य पर चर्चा होगी।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. हर बार की तरह सुंदर अंक. अगले अंक का इन्तेज़ार रहेगा. आभार.

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  2. हिंदी में इस तरह की चर्चा कम ही पढने को मिलती है... अंग्रजी में सटायर के भेद तो पढ़े हैं ...आज व्यग्य के बारे में जानकार अच्छा लगा...

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  3. Nice post.
    भारतीय स्वाधीनता दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं .

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  4. सार्थक लेख......

    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.

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