रविवार, 21 अगस्त 2011

भारतीय काव्यशास्त्र – 80


भारतीय काव्यशास्त्र – 80
-         आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में वाच्यसिद्ध्यंग और अस्फुट (अगूढ़) गुणीभूतव्यंग्य  पर चर्चा की गयी थी। इस अंक में गुणीभूतव्यंग्य के तीन अन्य भेदों- संदिग्धप्राधान्य, असुन्दर, तुल्यप्राधान्य व्यंग्य और काक्वाक्षिप्त व्यंग्य पर चर्चा होगी।
जब यह स्पष्ट न हो सके या सन्देह बना रहे कि काव्य में वाच्यार्थ प्रधान है या व्यंग्यार्थ तो वहाँ संदिग्धप्राधान्य गुणीभूतव्यंग्य समझना चाहिए। इसके लिए काव्यप्रकाश में कुमारसम्भव महाकाव्य का निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया गया है-
हरस्तु किञ्चित्परिवृत्तधैर्यश्न्चन्द्रोदयारम्भ इवाम्बुराशिः।
उमामुखे बिम्बफलाधरोष्ठे व्यापारयामास  विलोचनानि।।
अर्थात् चन्द्रोदय के समय सागर के समान अधीर होकर भगवान बिम्ब फल की तरह लाल अधरोष्ठ से युक्त उमा (पार्वती) के मुख पर अपने तीनों नेत्र गड़ा दिए।
यहाँ यह स्पष्ट नहीं है कि भगवान शिव पार्वती के मुख का चुम्बन करना चाहते थे या मात्र उनके मुख को निहारना उद्देश्य है। अतएव यहाँ संदिग्धप्राधान्य व्यंग्य माना गया है।
इसके लिए एक हिन्दी का दोहा उदाहरण के लिए लेते हैं-
मानहु बिधि तन अच्छ छबि, स्वच्छ राखिबे काज।
दृग  पग  पोंछन  को  कियो,  भूषण  पायंदाज।।
यहाँ आभूषण मानो आँख के पैरों को पोछने के लिए पायंदाज हैं से व्यंग्य है कि आभूषण उनके शरीररूपी भवन में पायंदाज हैं, अर्थात् आभूषण की शोभा शरीर की शोभा के सामने निरर्थक है, नगण्य है। इसमें वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ कौन प्रधान है, यह स्पष्ट नहीं है।  
जब काव्य में वाच्यार्थ से अभिव्यक्त व्यंग्यार्थ चमत्कार का अभाव हो तो वहाँ असुन्दर गुणीभूतव्यंग्य होता है। इसके लिए उदाहरण स्वरूप प्राकृत भाषा का एक श्लोक संस्कृत छाया सहित नीचे दिया जा रहा है-
वाणीरकुञ्जुड्डीणसउणिकोलाहलं सुणनतीए।
घरकम्मवावडाए  बहुए  सीअन्ति   अंगाइं।।
(वानीरकुञ्जोड्डीनशकुनिकोलाहलं शृण्वन्त्याः।
गृहकर्मव्यापृताया  वध्वाः  सीदन्त्यङ्गानि।।) संस्कृत छाया।
अर्थात् बेत-कुंज में उड़ते हुए पक्षियों के शोर-गुल को सुनकर घर के काम में व्यस्त वधू के अंग शिथिल हो रहे हैं।
बेत-कुंज में पक्षियों का कोलाहल सुनकर बधू को यह पता चल गया कि उसका प्रेमी वहाँ नियत समय पर पहुँच गया जिसकी उपस्थिति के कारण पक्षियों का कोलाहल हो रहा है। लेकिन घरेलू कामों में व्यस्त होने के कारण वह नहीं पहुँच पा रही है जिसके कारण उसके अंग शिथिल हो रहे हैं। यहाँ पक्षियों के कोलाहल से प्रेमी का बेत कुंज में पहुँचना व्यंग्य है और इससे बधू के अंग शिथिल हो रहे हैं यह वाच्यार्थ अधिक चमत्कारपूर्ण है। इसलिए यहाँ असुन्दर गुणीभूतव्यंग्य माना गया है।  
नीचे उद्धृत दोहा इस श्लोक का लगभग अनुवाद है। इसमें बेत-कुंज के स्थान पर पछवारे की बाग कहा गया है और बधू के अंग शिथिल हो रहे हैं के स्थान पर प्रिया भरी अनुराग कहा गया है। शेष सब एक समान हैः-
बिहँग सोर सुनि सुनि समझि, पछवारे की बाग।
जाति  परी  पियरी  खरी, प्रिया भरी अनुराग।।
अब तुल्यप्राधान्य गुणीभूतव्यंग्य पर चर्चा करते हैं- जब काव्य में वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ दोनों में समान रूप से चमत्कार दिखाई पड़े तो उसे तुल्यप्राधान्य गुणीभूतव्यंग्य कहा गया है। इसके लिए महावीरचरितम् नाटक में रावण के मंत्री माल्यवान के पास रावण के लिए महर्षि जमदग्नि के पुत्र परशुराम का संदेश है-
ब्राह्मणातिक्रमत्यागो  भवतामेव  भूतये।
जामदग्न्यस्तथा मित्रमन्यथा दुर्मनायते।।
अर्थात् ब्राह्मण के अपमान करने का आदत छोड़ने में आपका ही भला है। क्योंकि इससे परशुराम आपके मित्र बने रहेंगे, अन्यथा वे अप्रसन्न हो जाएँगे।
यहाँ वे (परशुराम) अप्रसन्न हो जाएँगे से वे नाराज हो जाएँगे तो क्षत्रियों की तरह राक्षसों का विनाश कर देंगे व्यंग्य उतना ही चमत्कारपूर्ण है जितना कि वे अप्रसन्न हो जाएँगे। अतएव यहाँ तुल्यप्राधान्य गुणीभूतव्यंग्य है।
इसके लिए एक हिन्दी कविता का उदाहरण लेते हैं-    
आज बचपन का कोमल गात। आगे जरा का पीला पात।
चार दिन सुखद चाँदनी रात। और फिर अंधकार अज्ञात।।
यहाँ वाच्यार्थ से व्यंग्य है कि सबके दिन एक समान नहीं होते या सभी दिन एक समान नहीं होते, सुख और दुख का आना-जाना लगा रहता है। यह वाच्यार्थ के समान ही चमत्कारपूर्ण है।
इसके बाद अब चर्चा के लिए काक्वाक्षिप्त (काकु से आक्षिप्त) व्यंग्य लेते हैं- जहाँ काव्य में स्वर-शैली या लहजे (intonation) के माध्यम से व्यंग्यार्थ आए, तो वहाँ काक्वाक्षिप्त व्यंग्य होता है।
यहाँ उद्धृत श्लोक वेणीसंहार नाटक से लिया गया है और भीमसेन की उक्ति है। यह उस समय भीम के द्वारा कहा गया है जब कौरवों से संधि की बात चल रही थी-
मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपात् दुःशासनस्य रुधिरं न पिवाम्युरस्तः।
सञ्चूर्णयामि गदया    सुयोधनोरू सन्धिं करोतु भवतां नृपतिः पणेन।।
अर्थात् यदि आपका राजा किसी शर्त पर संधि कर ले तो क्या मैं युद्ध में क्रोधित होकर सभी कौरवों का विनाश नहीं करूँगा? अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार दुःशासन के वक्षस्थल का रक्तपान नहीं करूँगा? और दुर्योधन की जाँघों को अपनी गदा से नहीं तोड़ूँगा?
इसमें निषेधात्मक कथन से व्यंग्यार्थ निकलता है कि महाराज युधिष्ठिर भले ही संधि कर लें मैं(भीम) कौरवों का विनाश अवश्य करूँगा। यह व्यंग्य को काकु से आक्षिप्त होकर आया है। इसलिए यहाँ काक्वाक्षिप्त व्यंग्य है।
इसी प्रकार रामचरितमानस की एक चौपाई की अर्धाली काक्वाक्षिप्त व्यंग्य के उदाहरण के रूप में उद्धृत है। यह विभीषण की रावण के प्रति उक्ति है-
हैं दससीस मनुज रघुनायक।
      जिनके हनूमान से पायक।।
      अर्थात् हे रावण जिस रघुनायक के पास हनुमान जैसे पायक हैं, क्या वे मनुष्य हैं? यहाँ व्यंग्य है कि वे साधारण मानव न होकर असाधारण महापुरुष, भगवान के अवतार हैं
      अगले अंक से गुणीभूतव्यंग्य के अन्य भेदों एवं पक्ष पर चर्चा होगी।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य जी, सर्वप्रथम क्षमा चाहता हूँ अनुपस्थिति के लिए... आज की कड़ी पिछली ही कड़ियों की तरह सरल, सहज और ग्राह्य है.. जिन काव्यांशों का दृष्टांत प्रस्तुत किया गया है वे अनुपम हैं.. और आपकी व्याख्या के आलोक में, उन्हें पढकर अर्थ और भी मुखर हो जाते हैं!!

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  2. इस दुर्योधन की सेना में सब शकुनी हैं ,एक भी सेना पति भीष्म पितामह नहीं हैं ,शूपर्ण -खा है ,मंद मति बालक है जिसे भावी प्रधान मंत्री बतलाया समझाया जा रहा है .एक भी कृपा -चारी नहीं हैं काले कोट वाले फरेबी हैं जिन्होनें संसद को अदालत में बदल दिया है ,तर्क और तकरार से सुलझाना चाहतें हैं ये मुद्दे .एक अरुणा राय आ गईं हैं शकुनियों के राज में ,ये "मम्मीजी" की अनुगामी हैं इसीलिए सरकारी और जन लोक पाल दोनों बिलों की खिल्ली उड़ा रहीं हैं.और हाँ इस मर्तबा पन्द्रह अगस्त से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है सोलह अगस्त अन्नाजी ने जेहाद का बिगुल फूंक दिया है ,मुसलमान हिन्दू सब मिलकर रोजा खोल रहें हैं अन्नाजी के दुआरे ,कैसा पर्व है अपने पन का राष्ट्री एकता का ,देखते ही बनता है ,बधाई कृष्णा ,जन्म दिवस मुबारक कृष्णा ....
    ...मनोज जी .,काव्य शाश्त्र की समीचीन समीक्षा प्रस्तुत कर रहें हैं .,आप . ram ram bhai


    कुर्सी के लिए किसी की भी बली ले सकती है सरकार ....
    स्टेंडिंग कमेटी में चारा खोर लालू और संसद में पैसा बंटवाने के आरोपी गुब्बारे नुमा चेहरे वाले अमर सिंह को लाकर सरकार ने अपनी मनसा साफ़ कर दी है ,सरकार जन लोकपाल बिल नहीं लायेगी .छल बल से बन्दूक इन दो मूढ़ -धन्य लोगों के कंधे पर रखकर गोली चलायेगी .सेंकडों हज़ारों लोगों की बलि ले सकती है यह सरकार मन मोहनिया ,सोनियावी ,अपनी कुर्सी बचाने की खातिर ,अन्ना मारे जायेंगे सब ।
    क्योंकि इन दिनों -
    "राष्ट्र की साँसे अन्ना जी ,महाराष्ट्र की साँसे अन्ना जी ,
    मनमोहन दिल हाथ पे रख्खो ,आपकी साँसे अन्नाजी .
    http://veerubhai1947.blogspot.com/
    Saturday, August 20, 2011
    प्रधान मंत्री जी कह रहें हैं .....

    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

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  3. बहुत सुंदर पोस्ट भाई मनोज जी कृष्ण जन्माष्टमी की बधाई

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  4. बहुत सुंदर पोस्ट भाई मनोज जी कृष्ण जन्माष्टमी की बधाई

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