बुधवार, 10 अगस्त 2011

देसिल बयना – 93 : अपना लाल गंवाय के दर-दर माँगे भीख

देसिल बयना – 93

अपना लाल गंवाय के दर-दर माँगे भीख

करणकरण समस्तीपुरी

“बदरा उमरि-घुमरि घन गरजे बुंदिया बरसन लागी ना...!”

जय हो वृंदावन बिहारी लाल की! तीज, लग-पांचे, मधुश्रावनी गया। किशनभोग, मालदह, बंबैय्या गया। भदैय्या आम उतर आया था। मगर रेवाखंड की सुरभि चकचका रही थी। आंगन में कजरी और मेड़ों पे चौमासा गूंज रहे थे,

“बहे पुरबैय्या बयार... लाल-लाल लागे रे गगनमा...

कोयल की सुनके पुकार धान रोपे जाला रे किसनमा...!

आगे-आगे हल चले, पीछे से किसनमा...

झूम-झूम गोरिया ले आयी जलपनमा...

करे ला पिया के पुकार... कि आके कर ले हो जलपनमा...!!”

उपर के खेतों में धनरोपनी प्रायः निपट गयी थी। चौरी में बांकी था। “कन्हा नच्छत्तर से पहिले सारा रोपनी हो जाना चाहिये नहीं तो फ़सल भी काना-कोतरा ही होगा। धान कम झर जादा।” मूसन बबाजी कहते थे, “हफ़्ता भर बचा है।”

images (57)किसान-गृहस्थ भागम-भाग कर रहे हैं। इंदिराजी की किरपा से जमींदारी गयी तो रैय्यत-असामी भी भाव खाने लगे थे। “बौकू मालिक तीस रुपैय्या रोज और चूड़ा-गुड़ का जलखई भी देते हैं।.... खिलहा चौरी में इयेह बड़का-बड़का जोंक है...। बाप रे बाप...! ई सेवतिया में जो भींगेंगे तो साल भर जोड़ों में दरद मारता रहेगा...!” मालिक-महतो बड़ी मान-मनव्वल से उन्हे खेतों में लाते थे। मांझी टोल और घुघलिया में भोर-सबेरे से लेकर देर रात तक बाबुओं की आबक लगी रहती थी। फिर भी जब तक खुद खेतों में ना लगो, चार मजदूर मिलकर भी दिन में ढाई कट्ठा भी रोप दें तो जय-हरि।

बाबूजी तो कोट-कहचरी में ही बीजी रहते थे। इधर बड़का कक्का, मंगरु भैय्या, मैं और पकौरिया … झिंगुरदास, नथवा और खीखरा के परिवार को लिये खेतों में झूलते रहते थे। पूरे टोल का एकहि हाल था। खेतों में धान रोपने का छपा-छप और घर में मकई की रोटी ठोकने का थाप। इन सब में सब से निठाह इलैची भौजी ही थी। बिरजू भैय्या पछिले हफ़्ता गये थे कलकत्ता कमाने। पिया गये परदेस अब डर काहे को। दिन भर कजरा, गजरा, झूला, मेहंदी, झूमर-कजरी में मस्त। भैय्या गये, भौजी एकदम अजाद बुलबुल के तरह चुलबुल करने लगी। चिंता से मरे बेचारी कुंजा मौसी, “खिलहा-बरकुरवा नहीं रोपायेगा तो फ़ागुन के बाद कहाँ से चलेगा...? ई बिरजुआ पटनिया औरत लाय के डाका दे दिया... अपने गया परदेस।”

जाके घर मरद-मानुस उ तो घुघलिया, नोनफ़र, मांझीटोल, खेरवन में खाक छाने तो चार मजदूर धरायें बेचारी कुंजा मौसी झुकी कमर पे लकुटिया टेक कहाँ-कहाँ जायें? कभी हमरे घर में आती थी कहे, कभी किसुनिया कने, कभी तेतरा को तो कभी डमरुआ के आंगन में जाके गिरगिराये, “बेटा...! कौनो मजदूर को पकड़ के लाय दो....! सबा बीघा बचा है... जौन रोपा जाए... हफ़्ते में।”

ई ताक के समय में सब अपने में व्यस्त। कुंजा मौसी को दूर से ही देख पराय। बड़का कक्का के साथे डोरा खेत में दिन भर रोपनी कराके लौटे कलेउ कर रहे थे। कोनैला वाली पुरबारी द्वार पर मकई का उलबा कर रही थी। मैय्या बुढ़ी ओझाइन को बीड़ी सुलगा के दे रही थी। “पायं लागी कुंजा दीदी...!”

“ओ....खीं...छ्छ्छ्छ....” बड़की काकी की आवाज पर मेरा तो मुंह का निबाला ही सरक गया...! अब पता नहीं मौसी का हुकुम बजाय खातिर कहाँ जाय पड़े... किस मजदूर की पैरपकड़ी करे पड़े...?

images (58)मैय्या कुंजा मौसी के लिये भी एक बीड़ी ले आई थी। एक कश के बाद शुरु हो गया मौसी का बहू-पुराण, “ई चकतबा बिरजुआ... चाम-चिकनी लुगाई को बैठा गया है, मीना बजार लगाए खातिर और हमरे बुढ़ापा में मौगत...! एक भोर से डगर बजा रहे हैं...! सात आंगन घूम आये... तन-धन का कौन कहे... केहु खेरवन से फ़कीरिया को बुला दे। लुत्ती लगे ई समाज में... बेर-वखत में भी केहु केहु को देखे वाला नहीं है.... !” कुंजा मौसी का बायां हाथ स्वतः सिर पर चला गया था और दहिने हाथ में सुलगती बीड़ी फिर होंठों से जा लगी थी... !

आंगन में एक मिनट के सन्नाटे को ओझाइन की कंपकंपाती आवाज ने तोड़ा था, “ए कुंजा बाई... कहबो तो लहर मारतो....! उ फ़करा में कहता नहीं है वही वाली बात कि ’अपना लाल गंवाई के दर-दर मांगे भीख’। खुद बिरजुआ को खास धनरोपनी के ताक में ही कमाने भेज दिये पुरबी मुलुक... और अंगने-अंगने जरा तू कर दो... तो जरा तू कर दो...! इहाँ तो अबहि सब अपने माथा का पसीना पछुआरी से पोछता है। साते दिन में कन्हा नछत्तर चढ़ आएगा। अपना खेती देखे के कुंजा मौसी का...! बिरजुआ को धनरोपनी तक रोक लेते तो अबहि अंगने-अंगने डगर नहीं न बजाना पड़ता....? फू.....!!” कुंजा मौसी के कश का जवाब ओझाइन ने धुएं के छल्ले से दिया था। मौसी बची हुई बीड़ी को जमीन में रगड़ कर चुप-चाप आंगन से निकल गई।

पाछे ओझाइन ने फिर से मुँह नचाकर बोला था, “बला क्या कहे... ’अपना लाल गंवाय के दर-दर मांगे भीख...!” ओझाइन ने बायां हाथ भी उपेक्षा के अंदाज में हिलाया था। वैसे कुंजा मौसी के आने से सबसे ज्यादा परेशानी हमें ही थी और जाने से बड़ी राहत भी कि अब कहीं जाना नहीं पड़ेगा...! मगर फिर भी ओझाइन का उपहास हमें अच्छा नहीं लगा। अनमनाकर कलेउ पर से उठकर आचमन किये। वहीं खटिया पर बैठे कांधे से गमछी खींच हाथ पोछने लगे। कक्का तार गये थे। बगल में बैठते हुए बोले, “हलाँकि कुंजा बाई का उपहास नहीं करना चाहिये मगर कोई करे भी क्या...? बेवकूफ़ी भी तो वैसने की है न...! अब कोई अपना खुद का धन/संसाधन गंवाकर दूसरे से उधार मांगने चले तो क्या कहेंगे...? हम तो कहावतो नहीं जानते थे। ओझाइन के भले से नयी कहावत सीखे, ’अपना लाल गंवाय के दर-दर मांगे भीख।’ हें...हें...हें...हें....!” कक्का की हंसी से हम खुद को भी नहीं रोक सके। ही...ही..ही...ही...!

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(लेखक का

मेल आई.डी. keshav.karna@gmail.com ,

मोबाइल नं. 09740011464)

11 टिप्‍पणियां:

  1. टिप्‍पणी क्‍या, बस उपस्थिति मानें, पढ़ कर मन ऐसा उभ-चूभ होता रहता है कि कहने को कुछ नहीं रह जाता.

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  2. करण जी, बीच में अवसर बना था तो मनोज जी के माध्‍यम से चैट पर संदेश भेजा था. कभी आपके लिए कुछ बातें मेल पर या फोन पर कहने लायक होती हैं, लेकिन संपर्क का कोई तरीका नहीं समझ में आता.

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  3. देशिल बयना का तो भैया हमरे पास ना कोई जवाब बा ना कउनो टिप्पणी, बस इहे अच्छा लागेला कि इ पढके के गांव में बर्षों पहले छोड़ आईल याद मन के झकझोर जाले। हमार तहे दिल से आशीर्वाद बा कि बबुआ गांव के माटी से जुड़ल रह,काहें कि हमरो बाबूजी हमसे एगो बात कहले बाड़े की जवन लोग अपने गांव के माटी से नईखन जुड़ल उ लोग अपने जीवन में कौनो चीज से ना जुड़ पईहें। हमार ई बात जरूर याद रखिह।
    धन्वाद।

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  4. करण बाबू!
    हम भेओरे का नींद तोडकर अउर जाने में लेट होकर भी देसिल बयना पढ़ लेते हैं ताकि "बासी बयना" नहीं मिले पढ़ने को एही सबूत है कि हमको इसमें केतना आनंद आता है..
    आज तो दिरिस खींचा गया कि बयान हाथ कपार पर अउर दाहिना हाथ में बीडी.. हमारे टोला का बखोडिया के माय याद आ गयी..
    अति सुन्दर!!

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  5. करन भाई.. आपके बयना से रेवाखंड का सम्पूर्ण आर्थिक, मानसिक और सामाजिक खाका खिंच जाता है... आज के बयना के पीछे जो दर्द है .. विस्थापन से उपजी जो आम कमी है आदमी की देहात में... उसका बहुत मार्मिक और सहज चित्रण है... सचमुच परदेश गया लाल ... गवाया हुआ लाल ही है... बहुत बढ़िया...

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  6. मैं सभी पाठकों का हृदय से आभारी हूँ। धन्यवाद !!

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  7. अपना लाल गंवाय के दर-दर मांगे भीख...

    सही कहावत है.

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  8. आपकी यह श्रंखला पढके सीधे गांव में पहूंच जाते हैं, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम

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  9. मनोज भाई "अपना लाल गंवाय के ......"बहुत यथार्थ परक प्रस्तुति जन भाष आका प्रवाह लिए ,


    जय हो वृंदावन बिहारी लाल की! तीज, लग-पांचे, मधुश्रावनी गया। किशनभोग, मालदह, बंबैय्या गया। भदैय्या आम उतर आया था। मगर रेवाखंड की सुरभि चकचका रही थी। आंगन में कजरी और मेड़ों पे चौमासा गूंज रहे थे,

    “बहे पुरबैय्या बयार... लाल-लाल लागे रे गगनमा...

    कोयल की सुनके पुकार धान रोपे जाला रे किसनमा...!

    आगे-आगे हल चले, पीछे से किसनमा...

    झूम-झूम गोरिया ले आयी जलपनमा...

    करे ला पिया के पुकार... कि आके कर ले हो जलपनमा...!!”
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
    Wednesday, August 10, 2011
    पोलिसिस -टिक ओवेरियन सिंड्रोम :एक विहंगावलोकन .
    व्हाट आर दी सिम्टम्स ऑफ़ "पोली -सिस- टिक ओवेरियन सिंड्रोम" ?
    http://veerubhai1947.blogspot.com/
    बुधवार, १० अगस्त २०११
    सरकारी चिंता .
    http://sb.samwaad.com/
    ऑटिज्‍म और पर्यावरणीय प्रभाव। Environment plays a larger role in autism.
    Posted by veerubhai on Wednesday, August 10 .Thanks for yr presence.

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  10. बहुत रोचक लगा। पर देसिल बयना की एकरूपता से बचना अच्छा रहेगा। आभार।

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