गुरुवार, 18 अगस्त 2011

आँच-83 भारतीय भाषाएँ और ध्वनियाँ-एक परिचर्चा-3

आँच-83

भारतीय  भाषाएँ और ध्वनियाँ-एक परिचर्चा-3

(अनुस्वार  और विसर्ग)

-आचार्य परशुराम राय

पिछले दो अंकों में भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होने वाली ध्वनियों पर संक्षिप्त चर्चा की गयी जिसमें स्वर और व्यंजन ध्वनियों को लिया गया था।  इस अंतिम अंक में अनुस्वार और अनुनासिक ध्वनियों की विशेषताओं तथा उससे उत्पन्न कुछ अन्य ध्वनियों पर चर्चा करना अभीष्ट स्वर और व्यंजन के अलावा दो प्रकार की और ध्वनियाँ भारतीय भाषाओं में प्रयोग होती हैं – अनुस्वार और विसर्ग। इन्हें स्वर और व्यंजन से अलग करने से पहले स्वर और व्यंजन की स्थिति समझना आवश्यक है। व्यंजन हमेशा स्वर के पहले उच्चरित होता है जबकि स्वर व्यंजन के बाद। लेकिन अनुस्वार और विसर्ग स्वर के बाद उच्चरित होते हैं। यही कारण है कि स्वर और व्यंजन से अलग इनके अस्तित्व को स्वीकार किया गया है।

इन  ध्वनियों पर चर्चा करने के पहले अनुनासिक और अनुस्वार के भेद पर चर्चा करना आवश्यक है। आचार्य किशोरी दास वाजपेई अपने ग्रंथ “हिन्दी शब्दानुशासन” में संस्कृत भाषा को अनुस्वार प्रधान और हिन्दी भाषा को अनुनासिक प्रधान बताया है। वैसे अनुस्वार की स्थिति भी अनुनासिक है। श्री कामता प्रसाद गुरु अपनी पुस्तक “हिन्दी व्याकरण” में अनुनासिक शब्द को परिभाषित करते हुए लिखा है कि जिनका उच्चारण मुख और नासिका से होता है वे अनुनासिक वर्ण हैं। इसके अन्तर्गत ङ,ञ,ण,न,म और अनुस्वार ध्वनियाँ आती हैं। आचार्य किशोरी दास वाजपेई के अनुसार हिन्दी के सन्दर्भ में अनुस्वार और अनुनासिक में निम्नलिखित भेद बताए गए हैं।

  1. अनुनासिक का उच्चारण हलका, अर्थात् लघु (कविता में एक मात्रा) होता है और अनुस्वार का उच्चारण खींचकर, अर्थात गुरु (कविता में दो मात्रा)।
  2. अनुस्वार की पृथक सत्ता है। जैसे ‘दिनांक’ कहने में ‘दिनाङ्क’ की ध्वनि स्पष्ट होती है। पहले शुद्ध दिना उच्चरित होता है जिसमें नासिका का तनिक भी सहारा नहीं लिया जाता। अनुस्वार का उच्चारण ना के अनन्तर होता है जिसकी ध्वनि ङ् जैसी सुनायी पड़ती है।
  3. अनुस्वार पृथक ध्वनि है और इसीलिए उसके उच्चारण की एक मात्रा गिनकर उसपर आश्रित स्वर ‘गुरु’ माना जाता है और उसकी मात्रा दो होती है। जबकि अनुनासिक की पृथक सत्ता नहीं है। स्वर से पृथक इसका उच्चारण नहीं किया जा सकता।
  4. अनुनासिकता स्वरों का अपना स्वभाव है। जैसे आँख कहने में से अनन्तर कोई नासिक्य ध्वनि सुनाई नहीं पड़ती, बल्कि का अनुनासिक उच्चारण होता है। नासिका यहाँ अनुस्यूत है (अतः इसे ‘सानुनासिक’ न कहकर अनुनासिक आँ कहा जाएगा। इसलिए ‘सानुनासिक स्वर’ कहना सही नहीं होगा)। जबकि अनुस्वार का उच्चारण स्वर के साथ नहीं, बल्कि स्वर के बाद उच्चारण होता है।
  5. ‘अनुनासिक’ विशेषण है जबकि ‘अनुस्वार’ संज्ञा है।
  6. दीर्घ स्वरों में अनुनासिक भी दीर्घ होता है – आँख, आँत, दाँत, ईंट, खूँटा, लड़कोँ आदि।
  7. अनुस्वार और अनुनासिक के उच्चारण में अन्तर वस्तु-भेद है।

      अनुनासिक को लेखन में अकार, आकार, उकार और ऊकार व्यंजनों एवं अ, आ, इ, उ, ऊ तथा ए स्वरों पर अर्द्धचन्द्र-बिन्दु के रूप के रूप में दिया जाता है, जैसे- कँगना, आँगन, कुँवर, खूँटा, ऊँचा, गाँव आदि। किन्तु इकार, ईकार, एकार, ऐकार, ओकार और औकार व्यंजनों तथा ई, ऐ, ओ, औ स्वरों पर अनुस्वार अर्थात् बिन्दु के रूप में लिखा जाता है। लेकिन उच्चारण अनुनासिक की भाँति होता है, जैसे- में, ऐंठन, कैंची आदि।

     अनुस्वार की तरह ही विसर्ग भी स्वर के बाद उच्चरित होता है। इसका उच्चारण ‘ह’ की भाँति झटके के साथ होता है। वैसे हिन्दी भाषा में इसका प्रयोग नहीं है। यह केवल उन शब्दों में ही पाया जाता है जो संस्कृत से आए हैं, जैसे- प्रातः, प्रायः आदि। इसके अतिरिक्त ये संस्कृत से आए समस्त (समासयुक्त) पदों में के रूप में मिलते हैँ, जैसे- मनोयोग (मनः योग), मनोरोग, मनोविकार आदि। इसके दो रूप और पाए जाते हैं- उपध्मानीय और जिह्वामूलीय

और के पहले विसर्ग की ध्वनि उपध्मानीय होती है तथा इसे दो अर्द्धचन्द्र- एक उर्ध्वमुखी और दूसरा ठीक उसके नीचे अधोमुखी करके लिखा जाता है। इसी प्रकार और के पूर्व विसर्ग की ध्वनि जिह्वामूलीय कहलाती है तथा इसको भी उपध्मानीय की भाँति ही लिखकर व्यक्त किया जाता है। यहाँ इन दो ध्वनियों को केवल परिचर्चा के लिए सम्मिलित किया गया है। इनका प्रयोग केवल वेदों में ही देखने को मिलता है।

इस  प्रकार हमने देखा कि जिन ध्वनियों का हम रोज प्रयोग करते हैं, वे कितनी विशेषताओं को अपने में समेटे हुए हैं। हिन्दी ध्वनिविज्ञान पर चर्चा करने के लिए बहुत कुछ है। पर जिस विषय को लिया गया था उसपर चर्चा लगभग पूरी हो चुकी है। हिन्दी-ध्वनिविज्ञान पर कभी अवसर आने पर फिर चर्चा की जाएगी।

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11 टिप्‍पणियां:

  1. अनुस्वार और अनुनासिक ध्वनियों के संबंध में आपके द्वारा प्रस्तुत जानकरी अच्छी लगी। धन्यवाद।

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  2. साहित्य के साथ साथ भाषा का ज्ञान भी मिल रहा है... आंच की लौ सृजित कर रही है...

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  3. व्याकरणीय ज्ञान लाभ पहुँचा रहा है।

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  4. हिन्दी ध्वनिविज्ञान पर ज्ञानवर्द्धक चर्चा के लिए आभार.

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  5. ज्ञानवर्धक जानकारी के लिये आभार्।

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  6. ध्वनियों की लाजवाब जानकारी दी है आपने ... भाषा ज्ञान भी साथ है ... शुक्रिया ..

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  7. आचर्यवर,
    नमन!

    यह जानकारी जितनी मौलिक उतनी ही विरल है।

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  8. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  9. गहन विश्लेषण युक्त ज्ञानवर्धक प्रस्तुति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  10. हिन्दी व्याकरण पर गहन चर्चा हो रही है। यह हम सबके लिए लाभप्रद है।

    आभार

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  11. बहुत अच्छी ज्ञानवर्धक जानकारी दी आपने /साहित्य के साथ भाषा का भी ज्ञान मिल रहा है /सार्थक पोस्ट /बधाई आपको



    please visit my blog.thanks

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