गुरुवार, 4 अगस्त 2011

भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होने वाली ध्वनियाँ - एक परिचर्चा

आँच-79

भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होने वाली ध्वनियाँ - एक परिचर्चा

आचार्य परशुराम राय

आज के आँच के अंक में भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होने वाली ध्वनियों पर चर्चा की जा रही है। सोचा गया कि समीक्षा पढ़ते-पढ़ते उबन से बचने के लिए विषयान्तर अच्छा रहेगा। वैसे यह विषय भी रोचक नहीं है। फिर भी मन में यह विचार आया कि जिन ध्वनियों का हम अपने दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं, उनमें कितनी विशेषताएँ छिपी हैं, इसपर चर्चा करना अनुपयुक्त नहीं होगा। प्रस्तुत अंक में केवल स्वरों पर चर्चा पर्याप्त होगी। क्योंकि व्यंजनों को समाविष्ट करने पर यह आलेख काफी लम्बा हो जाएगा। अतएव अगले अंक में व्यंजनों पर चर्चा करेंगे। इस पर चर्चा के लिए हमारे एक बाल-सखा के एक फोन ने मुझे प्रेरित किया।

उस दिन मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब मेरे बाल सखा ने प्रश्न किया कि हिन्दी के अक्षरों को पढ़ाते समय क्ष, त्र और ज्ञ को अलग से क्यों पढ़ाया जाता है, जबकि वे संयुक्ताक्षर हैं, अर्थात् क्+ष=क्ष, त+र=त्र और ज्+ञ=ज्ञ होते हैं। आश्चर्य इसलिए हुआ कि मेरे जिस मित्र ने प्रश्न किया था, वे संस्कृत के बड़े अच्छे ज्ञाता हैं। सत्तर के दशक में उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के वेद विभाग में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था और वर्तमान में वे एक उत्तर माध्यमिक विद्यालय (इंटर कालेज) में पिछले तीस वर्षों से भी अधिक समय से संस्कृत के प्रवक्ता हैं। मैंने हँसते हुए कहा कि कहीं एक वैयाकरण मजाक तो नहीं कर रहा है। इस पर उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्कृत में नहीं, हिन्दी में क्यों बच्चों को पढ़ाया जाता है। तभी विचार आया कि ब्लॉग पर इस विषय में चर्चा करना अच्छा रहेगा। यह मैं नहीं जानता कि पाठक मेरी इस बचकानी हरकत पर कितना हँसेंगे यह सोचकर कि यह व्यक्ति ब्लॉगर्स को ककहरा सिखा रहा है। लेकिन मुझे याद है कि एक बार टी.वी. पर किसी चैनल ने एक सर्वेक्षण किया था कि कितने लोग हिन्दी अक्षरों को आद्योपान्त जबानी बता सकते हैं। जिन लोगों से यह प्रश्न किया गया था, वे हाई स्कूल से लेकर एम.ए. तक के छात्र थे या अच्छे पढ़े-लिखे थे। उनमें से 10% से भी कम लोग यह ठीक-ठीक बता पाए। जबकि अंग्रेजी के 26 अक्षर प्रायः सभी बोल गए। यह सर्वेक्षण हिन्दी-भाषी क्षेत्र में ही किया गया था। इसलिए थोड़ा साहस जुटा पाया हूँ कि इस विषय पर चर्चा करना इतना हास्यास्पद नहीं होगा।

प्रायः सभी भाषाओं में प्रथम दृष्ट्या ध्वनियों को दो भागों में विभक्त किया गया है- स्वर और व्यंजन। भारतीय भाषाओं में भी स्वर और व्यंजन दो प्रकार की ध्वनियाँ होती हैं। इसके बाद पुनः स्वरों और व्यंजनों को विभिन्न प्रकार से विभाजित किया गया है, यथा- स्वर- अ से लृ तक ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत तीन भेद किए गए हैं और फिर इन सभी के उदात्त, अनुदात्त और स्वरित तीन भेद किए गए हैं। इसी प्रकार व्यंजन के अल्पप्राण, महाप्राण, घोष, अघोष, अनुनासिक आदि भेद किए गए हैं। इस प्रकार के विभाजनों पर चर्चा करने के पहले यह जान लेते हैं कि कुल कितनी ध्वनियाँ होती हैं। इसके लिए सर्वप्रथम महर्षि पाणिनि द्वारा अष्टाध्यायी (व्याकरण का ग्रंथ) में दी गयी ध्वनियों को लेते हैं जो माहेश्वर सूत्र में दी गयी हैं। माहेश्वर सूत्रों की कुल संख्या चौदह है-

1.अइउण्, 2. ऋलृक्, 3. एओङ्, 4. ऐऔच्, 5. हयवरट्, 6. लण्, 7. ञमङणनम्, 8. झभञ्, 9. घढधष्, 10. जगबडदश्, 11. खफछठथचटतव्, 12. कपय्, 13 शषसर्, 14. हल्।

उक्त सूत्रों से ध्वनियों को लेने के लिए हर सूत्र के अन्तिम हलन्त्य वर्ण- ण्, क्, ङ्, च्, ट्, ण्, म्, ञ्, ष्, श्, व्, य्, र् और ल् को हटा दिया जाता है। इन्हें हटाने के बाद सूत्रों में कथित ध्वनियों को निम्नलिखित रूप में रखा जा सकता है-

अ इ उ, ऋ लृ, ए ओ, ऐ औ, ह य व र, ल, ञ म ङ ण न, झ भ, घ ढ ध, ज ग ब ड द, ख फ छ ठ थ च त व, क प, श ष स और ह।

इसमें यह ध्यातव्य है कि ह दो बार आया है। ऐसा महर्षि पाणनि ने क्यों किया है, इस पर कभी बाद में चर्चा की जाएगी। इन ध्वनियों के प्रथम दो भाग किये गये हैं- स्वर और व्यंजन। स्वरों में अ, इ, उ और के तीन भेद किये गये हैं- ह्रस्व, दीर्घ और प्लुतलृ के केवल ह्रस्व और प्लुत भेद ही होते हैं, इसका दीर्घ रूप नहीं होता। ए, ऐ, ओ और के दो भेद दीर्घ और प्लुत होते हैं, ह्रस्व नहीं। ए, ऐ, ओ और को संयुक्त स्वर भी माना गया है, जबकि अ, इ और उ को मूल स्वर। क्योंकि ए=अ या आ+इ या ई, ऐ=अ+ए, ओ=अ या आ+उ या ऊ और औ=अ या आ+ओ। इनमें से हमलोग केवल प्रथम दो, अर्थात् ह्रस्व और दीर्घ स्वरों का प्रयोग करते हैं। प्लुत का प्रयोग केवल वेदों में होता है। इनके उच्चारण के विषय में कहा गया है कि ह्रस्व स्वर के उच्चारण में जितना समय लगता है, उसका दुगुना दीर्घ स्वर के उच्चारण में और प्लुत में तिगुना। महर्षि पतञ्जलि ने स्वर के तीनों प्रकार के स्वरों के उच्चारण में लगनेवाले समय के लिए बहुत ही व्यावहारिक और प्राकृतिक उदाहरण दिया है और वह है मुर्गे की आवाज- कुक्-ड़ू-कूS। इसमें पहला ह्रस्व, दूसरा दीर्घ और तीसरा प्लुत है। इसके बाद ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत स्वरों के पुनः तीन भेद- उदात्त (अर्थात स्वर का आरोही क्रम), अनुदात्त (अर्थात् स्वर का अवरोही क्रम) और स्वरित (अर्थात् उदात्त और अनुदात्त के बीच) होते हैं। इनके उच्चारण के विषय में महर्षि पाणिनि के सूत्र यहाँ दिये जाते हैं- उच्चैरुदात्तः, नीचैरनुदात्तः और समाहारः स्वरितः, अर्थात् तालु आदि स्थानों के उर्ध्व भाग से उच्चारण होने पर उदात्त, नीचे वाले भाग से उच्चरित होने पर अनुदात्त तथा दोनों (उदात्त और अनुदात्त) के बीच की अवस्था में उच्चरित होने पर स्वरित। इसके बाद इन सभी को पुनः दो भेद किये गये हैं- अनुनासिक के मेल से और अननुनासिक, अर्थात् नाक की सहायता से और बिना नाक की सहायता से बोले जानेवाले। वैसे स्वरों के उदात्त, अनुदात्त और स्वरित रूपों का प्रयोग केवल वेदों में ही होता है। लौकिक संस्कृत में भी उदात्त, अनुदात्त और स्वरित रूपों का अभाव है। हाँ, मराठी और भारत के दक्षिणी राज्यों में बोली जानेवाली चारो भाषाओं- तेलुगु, कन्नड़, तमिल और मलयालम में और के दो रूप पाए जाते हैं। लगता है कि वेदों में प्रयुक्त होनेवाले स्वरों के प्लुत स्वरूप का प्रचलन दक्षिण भारत की भाषाओं में इन दो स्वरों में वहीं से आया है। लृ का प्रयोग वेदों में भी अत्यन्त सीमित या नहीं के बराबर पाया जाता है, अन्यथा किसी भी अन्य भारतीय भाषाओं में इस ध्वनि का प्रयोग नहीं देखा जाता, यहाँ तक कि लौकिक संस्कृत में भी नहीं। हाँ, तन्त्रों में प्रयुक्त मंत्रों में बीज वर्ण के रूप में इसका प्रयोग हुआ है। स्वरों के उक्त विभाजन को संक्षेप में निम्नलिखित सारिणी में दिया जा रहा है। यह सारिणी गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित लघुसिद्धान्तकौमुदी से साभार ली गयी है-

अ इ उ ऋ लृ

अ इ उ ऋ ए ओ ऐ औ

अ इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ

ह्रस्व भेद

दीर्घ भेद

प्लुत भेद

1.उदात्त अनुनासिक

2.उदात्त अननुनासिक

3.अनुदात्त अनुनासिक

4.अनुदात्त अननुनासिक

5.स्वरित अनुनासिक

6.स्वरित अननुनासिक

1.उदात्त अनुनासिक

2.उदात्त अननुनासिक

3.अनुदात्त अनुनासिक

4.अनुदात्त अननुनासिक

5.स्वरित अनुनासिक

6.स्वरित अननुनासिक

1.उदात्त अनुनासिक

2.उदात्त अननुनासिक

3.अनुदात्त अनुनासिक

4.अनुदात्त अननुनासिक

5.स्वरित अनुनासिक

6.स्वरित अननुनासिक

इसके बाद इन स्वरों को उच्चारण के स्थान और प्रयत्न के आधार पर भी इनका विभाजन किया गया है। स्थान-भेद से स्वरों का विवरण नीचे की सारिणी में दिया जा रहा है-

कंठ

तालु

मूर्धा

दन्त्य

ओष्ठ

कंठ-तालु

कंठ-ओष्ठ

लृ

ए ऐ

ओ औ

प्रयत्न दो प्रकार के होते हैं- आभ्यन्तर और बाह्य। मुख-विवर में ओठ से कंठ के बीच से वर्णों के उच्चारण के लिए जो प्रयत्न किया जाता है, उन्हें आभ्यन्तर प्रयत्न और जो प्रयत्न कंठ के नीचे से किया जाता है, उन्हें बाह्य प्रयत्न कहते हैं। आभ्यन्तर प्रयत्न चार होते हैं- स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, विवृत और संवृत। इस आधार पर इनका विभाजन करते समय इन्हें आभ्यन्तर प्रयत्न के विवृत की श्रेणी में रखा गया है। प्रयत्नों के विभिन्न रूपों की चर्चा व्यंजन वर्णों पर चर्चा के दौरान की जाएगी। यहाँ केवल विवृत को लेते हैं। विवृत का अर्थ खुला हुआ होता है। स्वरों के उच्चारण में जीभ का कहीं स्पर्श नहीं होता। इसलिए प्रयत्न की दृष्टि से इनका आभ्यन्तर विवृत प्रयत्न होता है।

तो इस प्रकार हमने देखा कि रोजमर्रा के जीवन में हम जिन ध्वनियों का प्रयोग करते हैं, वे अनेक विशेषताओं से भरी हैं। अगले अंक में व्यंजन वर्णों पर इसी चर्चा को आगे बढ़ायेंगे।

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21 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन लेख !

    कृपया इस लेख को हिन्दी वीकीपीडीया मे डालने की अनुमति दें!

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  2. भारतीय भाषाओं का स्वर-सिद्धान्त वैज्ञानिकता से परिपोषित है, राजनीति के कर्कशों से मार खाता है बस।

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  3. @ आशीष जी,

    बिल्कुल अनुमति है जी, ये तो हमारे लिए सौभाग्य की बात है।

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  4. ज्ञानवर्धन हुआ. मुझे लगता है, आपको सुनना अधिक लाभकारी रहेगा.

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  5. बिलकुल, इस तरह के आलेखों को अधिक से अधिक लोगों तक पाहुचना ही चाहिए| ये टिप्पणी वाले आलेख नहीं हैं| आचार्य जी और मनोज भाई साब पुनराभिनंदन

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  6. मनोज जी बहुत ही ज्ञानवर्धक आलेख है. बहुत दिनो बाद हिन्दीभषा का आलेख पढ़ा. आज के जमाने मे हमारे युवा वर्ग अंग्रेजी को ज्यादा महत्व दे रहे है और हिन्दी भाषा का महत्व भूलते जा रहे है.. ऐसा आलेख हमारी मातृभाषा को पुनर्जीवित करता है.
    उम्मीद है इसी तरह आप हम-लोगो को हिन्दी भषा का ज्ञान विस्तार रूप से बांटते रहेंगे. धन्यवाद..

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  7. गहन विवेचन।

    इस विशिष्ट कार्य के लिए आचार्य जी को आभार।

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  8. bahut hi gahan chintan-manan..
    Bahut upyogi aur gynvardhak prastuti ke liye aabhar!

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  9. भिक्षाटन करता फिरे, परहित चर्चाकार |
    इक रचना पाई इधर, धन्य हुआ आभार ||

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  10. आचार्य जी!
    मुझे तो हमेशा से ही आपकी पोस्ट को पढना किसी कक्षा में बैठकर सीखने जैसा है... और सच है कि सीखने की कोइ उम्र नहीं होती!
    आज 'आंच' पर भी समीक्षा से इतर कुछ सीखने को मिला!!
    आभार आचार्यवर!!

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  11. बहुत ही सार्थक आलेख है। इन सब बातों से भी हमें अवगत होना चाहिए ही। ब्लोगजगत को यह आपकी अमूल्य देन है।

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  12. महेश्वर के सूत्र को बहुत अच्छे ढंग से समझाया है आचार्य जी ने!
    प्रणाम करता हूँ!

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  13. पहली बार इतने विस्तार से जाना। बहुत शोधपूर्ण और श्रमसाध्य। अवश्य ही,कहीं संदर्भ देने के काम आएगा।

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  14. सहज लेकिन वैज्ञानिकता से स्‍पष्‍ट किया गया, क्ष-त्र-ज्ञ की प्रतीक्षा है.

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  15. वाह वाह.
    बहुत ही ज्ञानवर्धक आलेख है.
    आभार.

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  16. ज्ञानवर्धक एवं प्रशंसनीय आलेख।

    आभार,

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  17. अपनी प्रतिक्रिया में मैं उपर्युक्त सभी विचारों से सहमति रखता हूँ।

    यह पोस्ट ब्लोग-जगत के लिये अमूल्य धरोहर है। आप तो धरोहरों के संरक्षण के लिये नेट-प्रसिद्ध हो गये हैं। धन्यवाद॥

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  18. ज्ञानवर्धक आलेख. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  19. उदात्त आदि नहीं सुना था पहले कभी। लेकिन यह क्या शुरु में क्ष, त्र और ज्ञ से बात आगे और ही। उसका इन्तजार है। सूचित अवश्य कीजिएगा। अगर यह होता है तो। महाप्राण के लिए बस अंग्रेजी में एच अक्षर्काफ़ी है पहचानने के लिए

    अंग्रेजी के अक्षरों आदि का कारण है, उसे समझना और उस पर ध्यान देना। हमारे यहाँ तो लोग कहते हैं कि हिन्दी पढ़ने की जरूरत ही नहीं है जैसे सब के सब विद्वान ही पैदा होते हैं। मातृभाषा का मतलब यह नहीं कि हमें उसे पढ़ना ही न पड़े। इस मानसिकता से लोग मुक्त हों तब तो।

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