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गुरुवार, 14 जुलाई 2011

आँच-77 .....आभासी दुनियाँ

समीक्षा

आँच-77

आभासी दुनियाँ …. !

clip_image002हरीश प्रकाश गुप्त पत्नी घर द्वार से दुखी ब्लॉग लिख कर खुश फिर भी कहती है आभासी दुनिया में हम रीयल दुनिया से भाग कर नहीं आये हैं पति , पत्नी से दुखी कुछ समझती नहीं सालो से एक घर में रह कर भी मानसिक रूप से अलग ब्लॉग पर मर्मस्पर्शी कविता लिखकर संबंधो में मिठास भर रहे हैं और फिर भी कहते हैं हम आभासी दुनिया में रीयल दुनिया से भाग कर नहीं आये वृद्ध , खाली घर में परेशान बेटा , बेटी विदेश में नेट पर ब्लॉग परिवार में इजाफा कर रहे हैं अपना समय परिवार से दूर व्यतीत कर रहे हैं पर कहते हैं हम रीयल दुनिया से आभासी दुनिया में नहीं आये आज पढ़ा एक ब्लोगर के भाई ने उससे नाता तोड़ रखा हैं और वो ब्लोगर, बाकी सब ब्लोगर में अपना भाई खोज रहा हैं फिर भी कहता हैं हम रीयल दुनिया से भाग कर आभासी दुनिया में नहीं आये किसी ब्लोगर का ब्लॉग भरा हैं रोमांटिक कविता से और वोमन सेल में मुकदमा चल रहा हैं पति की यातना के खिलाफ फिर भी कहते हैं रीयल लाइफ में खुश थे आभासी दुनिया में बस यूहीं हैं किसी ब्लोगर की पत्नी ने उनको नकार दिया था क्युकी पत्नी का सौन्दर्यबोध पति के शरीर को स्वीकार नहीं कर पाया वही ब्लोगर नेट पर रोमांस करता पाया जाता हैं फिर भी कहता हैं रीयल लाइफ में सुखी हैं मै एक एकल महिला रात को कमेन्ट पुब्लिश नहीं करती क्युकी रात सोने के लिये होती हैं सुबह देखती हूँ हर विवाहित ब्लोगर रात भर जग कर कमेन्ट देता हैं और पुब्लिश ना होने का ताना भी और फिर भी कहता हैं उसकी जिन्दगी में सब सही था वो रीयल दुनिया के रिश्तो से भाग कर आभासी दुनिया में नहीं आया

ब्लागों के नाम सामान्यतया एक से लेकर दो-चार शब्दों तक सीमित हुआ करते हैं लेकिन एक ब्लाग है जो अपने नाम की विशिष्ट लम्बाई के कारण सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। ब्लाग है “बिना लाग लपेट के जो कहा जाए वो सच है” यह नाम नहीं वरन पूरा वाक्य ही है। यह एक विचार है कि सच को किसी अवलम्ब की आवश्यकता नहीं होती। इसमें ब्लागर का अपना संदेश भी निहित है कि उसे साफगोई पसंद है। वह सीधे, सरल और सच्चे तरीके से बात कहने में विश्वास करती है और कवयित्री का यह विचार उनकी रचनाओं में प्रतिबिम्बित भी होता है। गत 24 जून को इस ब्लाग पर एक कविता प्रकाशित हुई थी। यद्यपि कवयित्री ने इस कविता का कोई शीर्षक नहीं दिया है (लिंक) तथापि कविता में यही सच्चाई प्रकाशित होती है और कविता की विचार सूक्ष्मता प्रभावित करती है। आँच के विगत चार अंकों में इस स्तम्भ पर अर्थविज्ञान पर शास्त्रीय चर्चा होती रही। अब समीक्षा क्रम में पुनः लौटते हुए रचना जी की इस कविता को चर्चा के लिए लिया जा रहा है।

इस कविता में एक तरफ जीवन का यथार्थ है तो दूसरी ओर आत्मतोष की आकांक्षा की सहज मानवीय वृत्ति। दोनों व्यक्ति से इस कदर सम्पृक्त होते हैं कि एक से मुँह मोड़ा नहीं जा सकता तो दूसरे को आसानी से छोड़ा नहीं जा सकता। जब जीवन का यह यथार्थ दिनानुदिन की चर्या में कसैला और कड़वापन लेकर आता है तो इस सच को सभी के समक्ष प्रकट करना आसान नहीं होता। घर परिवार, रिश्ते-नाते और सम्बन्धों के बीच प्रायः ऐसी स्थितियां आती रहती हैं जब सब-कुछ मन-माफिक नहीं होता। अपेक्षा की तीव्रता के चलते एक रिक्ति बनती है जो बढ़ती रहती है। साथ ही मन को जिससे प्रसन्नता मिलती है, वह करने के लिए व्यक्ति कुछ पल के ही लिए उसी दिशा में बढ़ जाता है। धीरे-धीरे यह प्रकृति बन जाती है। मन तो आखिर मन ही है। उसका अभीष्ट आत्मतोष, अर्थात खुशी पाना है। इस रिक्ति (स्पेस) को भरने के लिए उसे भले ही छद्म दुनियाँ का ही सहारा क्यों न लेना पड़े, लेता है। वह अपने इर्द-गिर्द एक आभासी दुनियाँ की रचना कर अपने लिए खुशी ढूँढता है, जिसे अपना मन बहलाना भी कहा जाता है। वह इस सच को स्वीकार भी करता है। लेकिन इसके कारक के रूप में उन कारणों को स्वीकार नहीं करता। हॉलाकि उसका वास्तविक दुनिया से इस प्रकार बचना यथार्थ को स्वीकार न करना ही है। परंतु इस प्रकार वह सच पर आवरण डाल लोगों के सामने सहज होने का ढोंग तो कर सकता है लेकिन उसकी कसक की छाया से अपने को बचा नहीं सकता।

यथार्थ और इस आभासी दुनियाँ के मध्य कवयित्री का मन्तव्य स्पष्ट ध्वनित है – व्यक्ति का पलायन। तथापि रचना जी ने अपनी इस कविता में जिन्दगी की इन्हीं रिक्तियों को सूक्ष्म रूप से विभिन्न चित्रों के माध्यम से सजीव रुप में रेखांकित किया है। यथा सम्बन्धों के बीच शून्य जैसे - पति और पत्नी के बीच असंतोष से उपजी रिक्ति, पत्नी की घर परिवार से निराशा, स्त्री, पुरुष अथवा वृद्धजन का एकाकी जीवन - जो अपने आप में खाली और सूनेपन से भरा होता है, भाई अथवा बहन के बीच रिश्तों की दूरी, संवेदनाओं और भावनाओं के निरादर अथवा उपयुक्त संतोष न मिल पाने से उपजी रिक्ति आदि और फिर इस रिक्ति को भरने के लिए विचारों/सामग्री की तलाश करती कवयित्री की कलम ने चित्रण को यथार्थपरक बना दिया है।

कविता में जगह-जगह पूरे-पूरे वाक्य ही प्रयोग में आए हैं। चौथे पैरा में विशेष रूप से पंक्ति विच्छेद उपयुक्त नहीं है। टंकण अशुद्धियाँ एकाधिक स्थानों पर उपस्थित हैं। शब्दाधिक्य और वर्णनात्मक शैली शिल्प के प्रति कवयित्री की शिथिलता प्रकट करते हैं और काव्य की श्रेष्ठता का अपकर्ष करते है। ये कविता की प्रांजलता में तो बाधक है ही, कविता की सरसता में भी अवरोध उत्पन्न करते हैं। ज्यादा बड़ी नहीं लेकिन पर्याप्त से अधिक शब्दों में व्यक्त की गई कविता में कवयित्री की भावनाएं पाठको तक संवेदनशीलता के साथ सम्प्रेषित होती हैं। यही इस कविता का आकर्षक पहलू है।

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