बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

देसिल बयना - 3 : जग जीत लियो रे मोरी कानी....

-- करण समस्तीपुरी
हमारे मिथिलांचल में एक कहावत है,
'जग जीत लियो रे मोरी कानी !' हालांकि कहावत का आधा हिस्सा अभी बांकी है लेकिन वो मैं आपको देसिल बयना के इस कड़ी के अंत में कहूँगा। आईये पहले देखें कैसे बनी कहानी...

कमला घाट के एक गाँव में एक लड़की थी। कुलीन। सुशील। किंतु भगवान की माया.... एक दोष था बेचारी में। वो क्या था कि वो कानी थी। बोले तो उसकी एक आँख दबी हुई थी। तरुनाई पार कर के जैसे ही यौवन की देहरी पर पैर रखी, उसके माता-पिता को उसके विवाह की चिंता सालने लगी।

बेटी का ब्याह तो यूँ ही अश्वमेघ यज्ञ के बराबर। युवतियों के सर्वगुण संपन्न होने के बावजूद माँ-बाप को पता नही कितने पापर बेलने पड़ते हैं। नाकों चने चबाने पड़ते हैं। यह तो कानी ही थी। एक दूसरी कहावत भी है, "कानी की शादी मे इकहत्तर वाधा !"

बेचारी की डोली कैसे उठे। माँ-बाप रिश्तेदार सभी लगभग निराश हो चुके थे। लेकिन पंडित घरजोरे ने दूर तराई के गाँव में एक लड़का ढूंढ ही निकला। सगुण टीका हुआ। फिर निभरोस माँ बाप के द्वार पर बारात भी आई। लड़की के भाइयों ने पालकी से उतार कर दुल्हे को काँधे पर बिठा कर मंडप मे लाया। मंत्राचार, विधि-व्यवहार के बीच सिन्दूर-दान हुआ फिर बारी आई फेरों की। तभी पंडिताइन ने गीत की तान छेड़ी, "जग जीत लियो रे मोरी कानी...." लोग हक्का बक्का लेकिन बारात में आए चतुरी हजाम को बात भाँपते देर न लगी। उसने तुरत पंडिताइन के सुर में सुर मिलाया। पंडिताइन आलाप रही थी, "जग जीत लियो रे मोरी कानी !" अगली पंक्ति चतुरी हजाम ने जोड़ी, "वर ठाढ़ होए तो जानी !" अर्थात कन्या कानी है तो पंगु वर जब खड़ा होगा तब सच्चाई पता लगेगी न !!

क्या खूब जोरी मिलाई पंडित घरजोरे ने। कन्या कानी तो वर लंगड़ा। तभी से कहाबत बनी, "जग जीत लियो रे मोरी कानी ! वर ठाढ़ होए तो जानी !!" ये कहावत पंडिताइन सरीखे उन लोगों पे लागू होती है जो हमेशा अपना ही पलड़ा भारी समझते हैं। लेकिन जब उनके नहले पर दहला पड़ता है तब बरबस याद आ जाता है, "जग जीत लियो रे मोरी कानी! वर ठाढ़ होए तो जानी !!"

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

तुम्ही बताओ....

-- करण समस्तीपुरी

इस झूठे चक-मक मे सच का हर्ष कहाँ से लाऊं ?
तुम्ही बताओ बचपन के वो वर्ष कहाँ से लाऊं ??
जिन आंखों के मधुर स्वप्न पर,

मैंने किया सहज विश्वास !
आज उन्ही आँखों से कैसे,
बरस रहा निर्मम उपहास !
इस मिथ्या में सपनों का उत्कर्ष कहाँ से लाऊं ?
तुम्ही बताओ बचपन के वो वर्ष कहाँ से लाऊं ??

मेरा मूक निवेदन, हाये !
अंश मात्र भी समझ ना पाए !!
जब-जब अधर खुले मेरे,
तुम केवल कल्पित कथा बताये !
संप्रेषण के संकट मे विमर्श कहाँ से लाऊं ?
तुम्ही बताओ बचपन के वो वर्ष कहाँ से लाऊं ??

समय और सरिता की धारा,
आगे बढ़ती जाती !
आज सफलता चरण चूमती,
गीत मेरे है गाती !!
किन्तु सफलता में सच्चा संघर्ष कहाँ से लाऊं ?
तुम्ही बताओ बचपन के वो वर्ष कहाँ से लाऊं ??