बुधवार, 6 जून 2012

स्मृति शिखर से – 16 : बदरा


स्मृति शिखर से 16 :  बदरा

करण समस्तीपुरी

उसकी उम्र कोई अधिक नहीं रही होगी जब वो पहली बार हमारे घर आया था। कृषकाय, एक कान थोड़ा कटा हुआ, कातर दृष्टि, एकवर्ण भूरा शरीर। उस समय बाबा दोपहर का भोजन करने बैठे थे। स्वाभावानुसार उन्होंने अपना भोजन उसे दे दिया। उस पहले दिन से शुरु हुआ सिलसिला उसके जीवन के अंतिम दिन तक चलता रहा। मृत्युपूर्व कोई दो दिनों तक गायब रहा था। बहुत कोशिश की ढूंढने की...। हर आने-जाने वाले से पूछा। हाट-बाजार में भी खोजा गया। नहीं मिला। भादों की दोपहरी थी। भारी गर्मी और उमस। बदरी के भीतर से झाँक रही धूप त्वचा-भेद देने वाली थी। छत पर सूख रहे अन्न को समेटने में मैं माँ की मदद कर रहा था। सहसा दृष्टि गई सड़क पे। वह दौड़ता आ रहा था... बेतहाशा दौड़ता हुआ...। उसके पीछे मेरे चचेरे भाई बहनों और टोले के अन्य छोटे बच्चों की टोली समवेत घोषणा करते हुए दौर रहे थे, “बदरा आ गया...! बदरा आ गया...! बड़की माँ, बदरा आ गया...!!” बदरा दलान के किनारे पहुँचा। शायद उसकी सारी शक्ति जवाब दे गई थी। जीभ एक-एक हाथ बाहर आ रहा था। शायद बोलना भी चाह रहा था। मगर सिर्फ़ खाँस सका। दो तीन तेज खाँसी के बाद वह ढेर हो गया। चेतना शून्य। प्राण शून्य।

बदरा अनाथ श्वान था। एक बार बाबा के भोजन के समय क्या आ गया उसके आने का सिलसिला चल ही पड़ा था। फिर उसे पिताजी के भोजन का समय भी ज्ञात हो गया। अब वह बाबा और पिताजी के भोजन के समय नियमित आने लगा। दोपहर और रात को। पहले हम उसे भगा भी देते थे किन्तु मेरे मझले भाई का कुछ अतिरिक्त स्नेह था उस पर। उसी ने उसका नामकरण किया था, “बदरा। धीरे-धीरे हम लोग भी उसे खाना-पानी देने लगे। वह भी व्यर्थ भ्रमण को छोड़ हमारे परिवार में घुल-मिल गया या यूँ कहें कि उसे परिवार की अघोषित सदस्यता मिल गई। वह द्वार पर कभी नहीं चढ़ता था। अमूमन वहीं सीढियों के नीचे बैठा या सोया रहता। घर का दरबाजा खुला हो या घर सूना हो वह कभी दरवाजे की सीढ़ी पर पैर तक नहीं रखता। जब तक कोई खाद्य-पदार्थ उसके आगे न डाला जाए, वह निस्पृह बना रहता। बदरा के रहने से अन्य कुत्ते-बिल्लियाँ भी घर के अंदर नहीं घुस पाते थे।

गाँव में प्रायः बिजली नहीं होती है। शुक्ल पक्ष की धवल चंद्रिका में तो सब-कुछ बड़ा सुहावना लगता है मगर कृष्ण-पक्ष की रात घुप्प अँधेरी। बदरा सीढ़ी के नीचे पड़ा रहता था। अँधेरे में कई बार हम सब ने उसके उपर पैर तक रख दिया था। काटने की बात तो दूर भौंकता भी नहीं था। बच्चे रहे तो चुप-चाप खिसक जाता और यदि वजन उसकी सह्य-क्षमता से अधिक हुआ तोकुँउँउँ…’ करके छिटक पड़ता।

वह भी एक कृष्ण-निशा थी। कृष्ण-निशा का प्रथम प्रहर। पिताजी प्रातः कार्यालय की जल्दबाजी में समाचार पत्र नहीं पढ़ पाए थे। सो दालान में पड़ी चौकी पर लालटेन की मद्धिम लौ में अपनी समाचार-पिपासा का समन कर रहे थे। माँ अंदर रसोई में थी और हम तीनों भाई यत्र-तत्र। हमेशा चुप रहने वाला बदरा अचानक भौंकने लगा। पिताजी समाचार पत्र में डूबे रहे। बदरा का भौंकना बढ़ता जा रहा था। पिताजी का ध्यान भंग हुआ और उन्होंने बदरा को पुचकार कर शांत करने लगे। मगर बदरा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वह दौड़ कर सीढ़ियों तक आता। अपने अगले चंगुलों को दलान पर पटकता और फिर दौड़कर अहाते के दूसरी ओर भागता। वह बहुत तेज भौंक रहा था। पिताजी को लगा कि कुत्ता पागल हो गया है। वहीं चौकी पर बैठे सबको सावधान करने लगे।

बदरा सच में पगला रहा था। दौड़कर इधरदौड़कर उधर…! किसी की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। बदरा का दौड़ना अब रुक गया था। वह सीढियों के सामने अड़ा गुर्राने लगा। अब पिताजी को उसके पागल होने पर कोई शक नहीं था। न कोई दूसरा कुत्ता है और न ही कोई आदमी आखिर यह गुर्रा किस पर रहा है? पिताजी भय के मारे चौकी पर खड़े हो कर टार्च का मुँह बदरा की तरफ़ कर स्वीच पर दबाब बढ़ाने लगे। अब जो उन्होंने देखा तो उनके होश गुम हो गए। घिग्घी बँध गई।

एक विशालकाय सर्पाधिपति गेहुँअन महाराज फन ताने बदरा के सामने डटे हुए थे। ओहतो बदरा तभी से इसीलिए भौंक रहा था और दौड़-दौड़ कर उस दिशा में यही दिखाना चाह रहा था। कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं पा वह स्वयं उस विषधर के मार्ग में अड़ गया। बदरा की गुर्राहट उसे आगे नहीं बढ़ने दे रही थी..। पिताजी की घिग्घी सुन लोग दौड़े आए थे। कुछ लोगों ने हिम्मत कर के बर्छी और लाठी के बल पर गेहुँअन जी का स्वर्गारोहन करवा चुके थे। बदरा पहली और एक मात्र बार दालान पर चढ़कर पिताजी के पैर के पास बैठ जीभ निकाल कर दूम हिलाने लगा।

हमने उसे पालतू का दर्जा नहीं दिया मगर वह कई मौके पर अपनी स्वामीभक्ति दिखा चुका था। बाबा के देहावसान के बाद पार्थीव शरीर को परिजनों के दर्शनार्थ रात भर रखना पड़ा था। हमलोग वहीं बैठे रहे। गाँव के भी कई लोग थे। बदरा भी सायं से वहीं बैठा रहा। सांझ से सुबह तक। दिन में बाबा द्वारा दी गई दूध-रोटी वहीं किनारे पड़ा हुआ था।  उसने कुछ भी खाया नहीं। कहीं भी गया नहीं। एक मिनट के लिए भी हिला नहीं। गरचे उसकी आँखें भी कई बार सजल देखी गई। बेचारा मूक प्राणी। जब बाबा की अर्थी बस पर रखकर अंतिम संस्कार के लिए सिमरिया ले जाया जाने लगा तो बदरा की बेचैनी फिर बढ़ गई। वह ताबरतोड़ बस की चारों ओर ऐसे परिक्रमा कर रहा था गोया बस को जाने नहीं देगा। बस के पीछे बहुत दूर तक दौड़ता रहा था।

कोई दो-तीन महीने गुजरे होंगे। बरसात का मौसम आ गया था। बदरा का जी उन दिनों कुछ अच्छा नहीं रहता था, शायद। दिन-दिन भर गायब रहने लगा। रात को पिताजी के खाने के समय जरूर आ जाता। एक रात उस वक्त भी नहीं आया। अगले दिन भी नहीं। अगली रात हम सभी नेबदरा-बदराकहकर जोर-जोर से पुकार लगाई। किन्तु कोई लाभ नहीं। हमें लगा कि वह कहीं और चला गया है या। रात हम में से जो भी बाहर आया उसे बदरा की कमी महसूस हो रही थी। हमसब को बदरा की कमी महसूस हो रही थीपता नहीं कहाँ गया ?

अगली दोपहर दौड़ता हुआ आ गया था। शायद उसमें सिर्फ़ उतनी ही ऊर्जा शेष रह गई थी। आया और निढ़ाल हो गया। जीभ ऐंठ कर बाहर आ गया था। बदरा नहीं रहा। लोग कह रहे थे कि इस घर से जरूर इसका कोई न कोई संबंध रहा होगा। कैसे मरने समय भाग कर यहाँ आ गया…!

गाँव में मृत पशुओं को फ़ेंकने के लिए एक खास समुदाय की जरूरत पड़ती थी। उन्हें बुलाबा भेजा गया। आकाश में घनघोर-घटा छाई थी। अब बरसे कि तब। बदरा को ले जाने वाले का पता नहीं। हम भाइयों ने निश्चय किया कि बदरा को मिट्टी हमारे ही हाथों नसीब हो। घर से थोड़ा हटके उसे बाइज्जत सुपुर्दे-खाक किया गया।

पिछले हफ़्ते अचानक बदरा आ गया स्मृति शिखर पर। मैंने कहा था न कि लाइफ़ बहुत सेटल हो गई है। कोई क्रिएटिव एक्सीडेंट होना चाहिए। पता नहीं यह उसी श्रेणी में है या नहीं मगर कुछ हुआ तो जरूर जिसने बदरा को मेरी स्मृति-शिखर पर लाकर एक रुके हुए सिलसिले को जारी कर दिया।

यूँ तो मैं चाय-काफ़ी का आदी नहीं हूँ किन्तु उस दिन दो घंटे की अरुचिकर बैठक के बाद सहकर्मी-मित्रों के विशेष आग्रह पर चाय पीने बगल की दूकान पर चला गया। चाय का छोटा ग्लास हाथ में लेकर जैसे ही मैं बढ़ने लगा वहाँ बैठे स्वान-दल के सेनापति को मेरी यह गुस्ताखी नागवार गुजर गई। महोदय जीभ से पानी टपकाते हुए मेरे लेग-पीस पर टूट पड़े। भला हो मोटे पतलून का। एक दाँत ही चुभ पाया।

दाँत एक चुभे या चार…! इससे चिकित्सक महोदय को क्या फ़र्क! उन्होंने तो पाँच टीके लगवाने का फ़रमान सुना दिया। तीन टीके लग चुके हैं। दो शेष रहे। घाव का नामो-निशाँ नहीं है। बस बदरा की यादें है। एक हमारा बदरा थाऔर एक। हाहाहाहा….! 

मंगलवार, 5 जून 2012

“विश्व पर्यावरण दिवस पर ”


विश्व पर्यावरण दिवस पर ”

मनोज कुमार

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। हमारा नारा है, कि “हम कल के लिए आज विश्व को संरक्षित करें!” बढ़ती आबादी, आधुनिकीकरण, शहरीकरण और औद्योगीकरण की हमारी लालसा ने हमारे ऊपर ही संकट उत्पन्न कर दिया है। औद्योगिक विकास के कारण पृथ्वी के जीवन पर दबाव पड़ रहा है। जीवन खतरे में पड़ गया है। सौर प्रणाली में ढ़ेर सारे भौतिक और रासायनिक बदलाव आ रहे हैं। जीवनोपयोगी प्रणालियों में भी परिवर्तन आ रहा है। जीवन की न सिर्फ़ गुणवत्ता नष्ट हो रही है बल्कि जीवन की क्षमता भी प्रभावित हो रही है। जीव-जंतु विलुप्त हो रहे हैं। फसलों की पैदावार घट रही है। जल-संकट गहराता जा रहा है। आज पृथ्वी की पर्यावरण चिन्ता सर्वाधिक महत्वपूर्ण सरोकार और गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि आज हम खुद को बचाने के उपाय ढ़ूंढ़ रहे हैं।

  • संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर साल बीस लाख से भी अधिक लोग जल प्रदूषाण से होने वाली बीमारियों से मर जाते हैं।
  • दुनिया के चालीस प्रतिशत से भी अधिक लोग जल-संकट का शिकार हैं।
  • भारत के 114 से भी अधिक शहरों में सीवेज की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
  • गंगा नदी के 100 मिली जल में 60,000 मिली बैक्टेरिया पाए जाते हैं। यह नहाने के जल से 120 गुना प्रदूषित है।
  • संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर साल शहरी प्रदूषण से सात लाख से भी अधिक लोग वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों से मर जाते हैं।
  • पिछली एक सदी में पृथ्वी की सतह के औसत तापमान में 0.80 सेल्सियस की बढोत्तरी हुई है।
  • पृथ्वी पर ज्ञात 5,487 स्तनधारी प्रजातियों में से 1,141 पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।

वर्षों पूर्व गांधी जी ने आने वाले संकट को भांप लिया था। एक रोचक दृष्टांत से बात को आगे बढ़ाते हैं। गीता के तीसरे अध्याय का चौदहवां श्लोक है –
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥१४॥
अर्थात्‌ सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा से यज्ञ होती है। यज्ञ कर्म से होता है। 

इस श्लोक की व्याख्या करते हुए गांधी जी ने 15 अक्तूबर 1925 के ‘यंग इंडिया’ के अंक में लिखा था “अन्न जो समस्त प्राणि जगत के जीवन का आधार है वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा यज्ञ से अर्थात्‌ शारीरिक श्रम से होती है। यह भली-भांति स्थापित वैज्ञानिक तथ्य है जहां वन के वृक्षों को को काटकर धरती को नंगा कर दिया गया वहां वर्षा बंद हो गई और जहां वृक्ष लगाए गए वहां वर्षा होने लगी। वर्षा से वनस्पतियों की वृद्धि होती है और धरती की जलग्रहण क्षमता बढ़ती है।” आज से लगभग आठ दशक पूर्व गीता की व्याख्या को पर्यावरण की चिन्ता से जोड़कर प्रस्तुत करना निश्चय ही एक असाधारण विचार था।

अपने स्वार्थ और स्पर्धा के नंगे नाच में मनुष्य अपनी सबसे मूल्यवान वस्तु अपनी आत्मा को खो बैठा है। विकास और औद्योगीकरण का कितना भयावह परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं यह जग ज़ाहिर है। पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए गांधी जी कहते थे कि शहरी औद्योगिक सभ्यता का विकल्प ग्राम्यकरण है। उनका मानना था कि गांवों का समाज मनुष्य और प्रकृति के सामंजस्य पर आधारित होता है। मनुष्य और प्रकृति में सामंजस्य बिठाना यह चिंतन सिर्फ़ हमारे देश के लिए ही लागू नहीं होता, यह सारे संसार के लिए प्रासंगिक है।

इसका यह कदापि मतलब नहीं है कि गांधी जी आधुनिक मशीनों के ख़िलाफ़ थे। वे अमानवीय मशीन के खिलाफ़ थे। वे तो चाहते थे कि ऐसी तकनीक और ऐसी मशीनों का प्रयोग हो जो गांव वालों की पहुंच में हो। इसका मतलब यह था कि यदि अत्याधुनिक और महंगी तकनीक का इस्तेमाल खुले आम होने लगा तो सिर्फ़ विकसित और आर्थिक रूप से सक्षम गांव ही उसका लाभ उठा सकते थे। गांधी जी शहर द्वारा गांवों के दोहन और शोषण का विरोध करते थे। वे लघु उद्योगों को बढ़ावा दिए जाने के पक्ष में थे। वे अंधाधुंध शहरीकरण और उद्योगीकरण के खिलाफ़ थे। प्रकृति के बेहिसाब दोहन के खिलाफ़ थे। वे गावों की आत्मनिर्भरता की पैरवी आजीवन करते रहे। वह मानते थे कि शहरों की स्फीत धमनियों में बहता हुआ रक्त दरअसल गांव की संकुचित होती धमनियों से बेरहमी से निचोड़ा गया रक्त है। विश्व के समृद्ध समाज की भूख पल-पल विकराल होती जा रही है। उस पर नियंत्रण बहुत ज़रूरी है। बिना इसके पर्यावरण की रक्षा की बात बेमानी है।

गांधी जी का विश्वास अहिंसा की नीति में था। वे एक अहिंसक समाज की स्थापना के पक्षधर थे। एक ऐसा समाज जहां किसी भी व्यक्ति का शोषण न हो। इस तरह से स्वदेशी की भावना का भी विकास होता। यह भावना विदेशी चीज़ों के इस्तेमाल से लोगों को रोकती। ग्रामीण लोगों को रोज़गार के पर्याप्त अवसर मिलते। अंततोगत्वा वे न्यासीकरण के सिद्धांत को अमल में लाना चाहते थे। यानी भूमि का स्वामित्व सामूहिक होता। लोग मित्रवत रहते क्योंकि यह समाज अहिंसक समाज होता। ऐसा समाज आधुनिक अवधारणा और तौर तरीकों के रूप में नहीं था।

वे चाहते थे कि धरती के संसाधनों का समूची मानवता के लिए भगवान का उपहार मानकर मौज़ूदा और आने वाली पीढियों को ध्यान में रखकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। लोभ-लालच के कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है। इससे जैविक ह्रास होता है। फलतः पारिस्थिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है और यह तबाही का कारण बनता है। आज पर्यावरणविद्‌ भी गांधी जी के इस विचार से सहमत हैं कि औद्योगिक समाज ही मुख्यरूप से जिम्मेदार है इस विनाश का। गांधी जी ने भौतिकवादी होने के वजाय नैतिक मूल्यों को तरजीह दी। वे साधारण और किफ़ायती जीवन के हिमायती थे। उनका मानना था कि यदि हमें इस पृथ्वी को बचाकर रखना है तो विज्ञान और प्रद्योगिकी का सुनियोजित और संतुलित विकास होना चाहिए। प्राकृतिक संसाधनो का अनुशासित तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए। ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का व्यवहार किया जाना चाहिए।

इस तरह से हम देखते हैं कि गांधी जी के विचार समय से बहुत आगे के थे। पर्यावरण की चिंता उनकी प्राथमिकता थी। वे आश्रम में रहते थे। वहां एक खुला ग्रामीण परिवेश होता था। चाहे वह दक्षिण अफ़्रीका में फिनिक्स का हो, या साबरमती का या वर्धा का, यहां मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित था। गांधी जी प्रकृति के साथ प्रेम के बारे में केवल बोलते नहीं थे, बल्कि अपने आश्रमों के माध्यम से अनुभव भी करते थे। आज उनके विचार बहुत प्रासंगिक हो गए हैं। आज आर्थिक-सामाजिक, पर्यावरणीय मोर्चे पर गंभीरता से गांधीवादी दृष्टिकोण से पुनर्विचार बहुत ज़रूरी हो गया है। गांधी जी का सारा जीवन और उनके सारे काम पर्यावरण के संरक्षण का उदाहरण है। उनका पूरा जीवन ही संदेश है। उनका मानना था कि “यदि हमें इस पृथ्वी को बचाकर रखना है तो प्राकृतिक संसाधनो का अनुशासित तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए।”

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आज के दिन हमें आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। हम विकासशील और विकसित बनने की होड़ में इतना असंतुलन पैदा कर चुके हैं कि सारा समाज ही अस्तव्यस्त हो गया है। नई वैश्विक ज़रूरतों ने एक अलग किस्म की नीतियों का मार्ग प्रशस्त किया है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मुनाफ़ा कमाने की होड़ से उत्पन्न आर्थिक गतिविधियों के कारण सारे संसार में पर्यावरण की अपूरणीय क्षति हो रही है, हो चुकी है। ग्रीन हाउस, ओज़ोन परत में छेद, आदि इसके कुपरिणाम हैं। हम जागरूक होने की जगह इस अंधी दौड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं, अगर तुरत न संभले तो इतनी देर हो चुकी होगी कि स्थिति संभाल के बाहर चली जाएगी और संकट के बादल हमारे सर पर तो मंडरा ही रहे हैं। हमें उपभोक्तावादी संस्कृति से बाहर आना होगा। आम लोगों के जीवन के स्तर में यदि हम सुधार लाना चाहते हैं तो परंपरागत क्षेत्रों में हमें इसके हल तलाशने होंगे। पर्यावरण हमारे लिए एक साझा संसाधन है। इस संसाधन का उचित इस्तेमाल हो, दोहन नहीं, यह सबकी जिम्मेदारी है।
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