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शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2025

292. श्रमिक वर्ग का आंदोलन

राष्ट्रीय आन्दोलन

292. श्रमिक वर्ग का आंदोलन



19वीं सदी के अंत में भारतीय राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों द्वारा मजदूर वर्ग के आंदोलनों से जुड़ने से पहले, कई आंदोलन हुए थे, जिनमें बंबई, कलकत्ता, अहमदाबाद, सूरत, मद्रास, कोयंबटूर, वर्धा आदि की कपड़ा मिलों, रेलवे और बागानों में मजदूरों की हड़तालें शामिल थीं। हालाँकि, वे ज़्यादातर छिटपुट, स्वतःस्फूर्त और असंगठित विद्रोह थे जो तात्कालिक आर्थिक शिकायतों पर आधारित थे और उनका कोई व्यापक राजनीतिक निहितार्थ नहीं था। श्रमिकों की स्थिति सुधारने के लिए संगठित प्रयास भी किए गए। ये सभी प्रयास निश्चित रूप से परोपकारी प्रकृति के थे। मुख्यधारा का राष्ट्रवादी आंदोलन अभी तक श्रम के सवाल के प्रति काफी हद तक उदासीन था। इस समय  साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन अपनी प्रारंभिक अवस्था में था इसलिए राष्ट्रवादी किसी भी तरह से भारतीय लोगों के बीच विभाजन पैदा करके ब्रिटिश शासन के खिलाफ आम संघर्ष को कमजोर नहीं करना चाहते थे।

1903-08 का स्वदेशी उभार मजदूर आंदोलन के इतिहास में एक अलग मील का पत्थर था। इस समय हड़तालों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई और कई स्वदेशी नेताओं ने स्थिर ट्रेड यूनियनों, हड़तालों, कानूनी सहायता और धन संग्रह अभियानों के आयोजन के कार्यों में खुद को पूरी तरह झोंक दिया। हालांकि, यूरोपीय उद्यमों और भारतीय उद्यमों में कार्यरत श्रमिकों के प्रति अलग-अलग रवैया इस अवधि के दौरान बना रहा। स्वदेशी के दिनों में मजदूर आंदोलन की शायद सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि विशुद्ध आर्थिक मुद्दों पर आंदोलन और संघर्ष से मजदूर वर्ग की उस समय के व्यापक राजनीतिक मुद्दों में भागीदारी की ओर बदलाव हुआ। मजदूर आंदोलन आर्थिक मुद्दों पर अपेक्षाकृत असंगठित और स्वतःस्फूर्त हड़तालों से राष्ट्रवादियों के समर्थन से आर्थिक मुद्दों पर संगठित हड़तालों और फिर व्यापक राजनीतिक आंदोलनों में मजदूर वर्ग की भागीदारी में बदल गया था। 1908 के बाद राष्ट्रवादी जन-उभार में गिरावट के साथ, श्रमिक आंदोलन को भी ग्रहण लगा। प्रथम विश्व युद्ध के तुरंत बाद अगले राष्ट्रवादी उभार के आने के बाद ही श्रमिक वर्ग आंदोलन को अपनी गति वापस मिल पाई।

1920 में शुरू हुए असहयोग आंदोलन के कारण जनआंदोलनों ने ज़ोर पकड़ा। 1921 में जनआंदोलनों के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक मज़दूर आंदोलन छिड़ा। मजदूर वर्ग ने अब अपने वर्ग अधिकारों की रक्षा के लिए अपना राष्ट्रीय स्तर का संगठन बनाया। इसी अवधि में मजदूर वर्ग भी राष्ट्रवादी राजनीति की मुख्यधारा में काफी हद तक शामिल हो गया। प्रिंस ऑफ वेल्स की भारत यात्रा के दौरान मज़दूरों की साम्राज्यवादी भावना ज़ोरदार ढंग से प्रदर्शित हुई। बंबई, कलकत्ता और मद्रास में मज़दूरों ने हड़ताल मनाई। असहयोग आंदोलन के अंतिम दिनों में दर्शनानंद और विश्वानंद ने ईस्ट इंडियन रेलवे में एक सशक्त हड़ताल का नेतृत्व किया था।  ईस्ट इंडिया और नार्थ वेस्टर्न रेलवे के मज़दूरों की आम हड़ताल को तोड़ने के लिए प्रबंधकों ने ऐसी-ऐसी रियायतें दीं जिसकी मज़दूरों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। 

सबसे महत्वपूर्ण विकास 1920 में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी) का गठन था। लोकमान्य तिलक, जिन्होंने बॉम्बे के काम से घनिष्ठ संबंध विकसित किए थे, एआईटीयूसी के गठन में प्रेरक शक्तियों में से एक थे, जिसके पहले अध्यक्ष पंजाब के प्रसिद्ध उग्रवादी नेता लाला लाजपत राय थे और दीवान चमन लाल, जो भारतीय श्रमिक आंदोलन में एक प्रमुख नाम बन गए थे, इसके महासचिव थे। लाजपत राय के अलावा, उस समय के कई प्रमुख राष्ट्रवादी AITUC के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े। सी.आर. दास ने इसके तीसरे और चौथे सत्र की अध्यक्षता की, और अन्य प्रमुख नामों में सी.एफ. एंड्रयूज, जे.एम. सेनगुप्ता, सुभाष बोस, जवाहरलाल नेहरू और सत्यमूर्ति शामिल थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1922 में अपने गया अधिवेशन में AITUC के गठन का स्वागत किया और इसके काम में सहायता के लिए प्रमुख कांग्रेसियों की एक समिति बनाई। इन वर्षों की कोई भी चर्चा गांधीजी द्वारा 1918 में अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन (टीएलए) की स्थापना का उल्लेख किए बिना अधूरी रहेगी, जो 14,000 श्रमिकों के साथ, शायद उस समय का सबसे बड़ा एकल ट्रेड यूनियन था।

1922 तक बड़े-बड़े सैंकड़ो मज़दूर संगठन बन चुके थे। 1920 में, 125 यूनियनें थीं जिनकी कुल सदस्य संख्या 250,000 थी, और इनमें से बड़े हिस्से का गठन 1919-20 के दौरान हुआ था। मज़दूर आंदोलन राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष की मुख्य-धारा से जुड़ा हुआ था। उनकी सभाओं में ‘वंदे मातरम्‌’ गाया जाता, खादी का प्रयोग होता। टाटा उद्योग में सितंबर 1922 में कामगार वर्ग द्वारा एक स्वतःस्फूर्त हड़ताल हुई। जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन अपनी मान्यता प्राप्त करने के लिए इस अवसर का लाभ उठाया और इसका नेतृत्व अपने हाथों में ले लिया। फलस्वरूप स्वराजियों के समर्थन से सी.आर. दास और सी.एफ़. एण्ड्र्यूज़ के नेतृत्व में एक कंशीलिएशन बोर्ड की स्थापना हुई। बाद में 1925 में इस यूनियन को मान्यता मिल गई और सी.एफ़. एण्ड्र्यूज़ इसके अध्यक्ष बने। उस समय गांधीजी जमशेदपुर आए थे। उन्होंने कहा था, पूंजी और श्रम के बीच सामंजस्य होना चाहिए। कामगारों को समझाते हुए उन्होंने यह भी कहा था, व्यापार में मंदी के समय वे अपने मालिकों को सांसत में न डालें। अनेक बाधाओं के बावज़ूद श्रमिक आंदोलन चलता रहा। कर्नाटक मिल्स में हड़तालें हुईं। मद्रास के समुद्र तट पर सिंगारवेलु द्वारा आयोजित सभा में 1923 में पहला मई दिवस मनाया गया था। 1925 में नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे की हड़ताल में लाहौर में एक जुलूस निकाली गई थी, जिसमें कामगार अपने ही ख़ून से लाल किए गए झंडे लेकर निकल पड़े थे। 1925 में बंबई की कपड़ा मिलों में बोनस को लेकर हुई हड़ताल के कारण उत्पादन ठप्प पड़ गया था। सरकार द्वारा बिठाए गए जांच आयोग ने श्रमिक विरोधी फैसला दिया था। एम.एन. जोशी ने श्रमिकों को हड़ताल बंद करने की सलाह दी थी। लेकिन पुलिस के दमन और गोलियों के बावज़ूद भी श्रमिकों ने हड़ताल ज़ारी रखी। बाद में भुखमरी से विवश हो वे काम पर लौटे। बंबई के कपड़ा उद्योग क्षेत्र में ही श्रमिकों के सतत संघर्ष और हड़ताल के कारण सरकार को साढ़े तीन प्रतिशत का उत्पादन शुल्क हटाने का फैसला लेने पर विवश होना पड़ा।

पूरे विश्व में आर्थिक मंदी का दौर था। इसलिए 1923 के बाद से मज़दूरों के आंदोलन का आक्रामक रुख नरम पड़ने लगा। सरकार ने मज़दूर आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए सुधारवादी और अलगाववादी नीति अपनाई। इस तरह उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन से अलग करने की कोशिश की गई। रेल औपनिवेशिक सत्ता के लिए बहुत बड़ी ज़रूरत थी। अंग्रेज़ शासक इस पर अपनी पकड़ मज़बूत बनाए रखना चाहते थे। रेल सेवाएं सरकारी नियंत्रण में रहे इसकी हर संभव कोशिश की जाती थी। इससे ब्रिटिश हुक़ूमत को शोषण की गति तेज़ करने में मदद मिलती थी। भारतीय रेल के मज़दूरों ने औपनिवेशिक सत्ता के दमन और शोषण के खेल को बख़ूबी पहचाना। उन्हें एहसास हो गया कि उन्हें सताया जा रहा है, अपमानित किया जा रहा है, वेतन और काम के घंटे के मामले में उनके साथ भेद-भाव किया जाता है। उन्होंने शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी शुरू कर दी। देश भर में जगह-जगह हड़तालें हुईं। रेल मज़दूर के नेता विवादों के निपटारे के लिए गांधीजी से भी मदद मांगते थे। गांधीजी उस समय साम्राज्यवादी सत्ता के विरोध के प्रतीक बन चुके थे। 1922 से एन.एम. जोशी के नेतृत्व में सांविधानिक मज़दूर वाद ने मज़दूरों के आंदोलन के बीच अपनी जगह बनानी शुरू कर दी। ज़्यादातर हड़तालें आर्थिक मांग को लेकर होती थी, लेकिन सारे मुद्दे ‘राष्ट्रीय सम्मान’ के मुद्दे से जुड़ जाते थे। इस तरह आर्थिक और राष्ट्रीय संघर्ष में समन्वय बढ़ता गया। इससे ब्रिटिश हुक़ूमत का चिंतित होना लाजिमी था। उन्हें मज़दूरों के संघर्ष में ‘बोल्शेविक क्रांति’ की झलक दिखने लगी।  मज़दूर आंदोलनों को राष्ट्रीय राजनीति से अलग-थलग करने की रणनीति बनाई जाने लगी। विवादों के निपटारे के लिए समझौता मंडल, पंचाट आदि गठित किए गए। मजदूर वर्ग की बढ़ती उग्रता और राजनीतिक भागीदारी से घबराई सरकार ने, खास तौर पर राष्ट्रवादी और वामपंथी प्रवृत्तियों के एक साथ आने से, मजदूर आंदोलन पर दोतरफा हमला किया। एक तरफ तो उसने पब्लिक सेफ्टी एक्ट और ट्रेड डिस्प्यूट्स एक्ट जैसे दमनकारी कानून बनाए और मजदूर आंदोलन के लगभग पूरे कट्टरपंथी नेतृत्व को एक झटके में गिरफ्तार कर लिया और उनके खिलाफ प्रसिद्ध मेरठ षडयंत्र केस चलाया। दूसरी तरफ, उसने रियायतों (उदाहरण के लिए 1929 में रॉयल कमीशन ऑन लेबर की नियुक्ति) के जरिए मजदूर आंदोलन के एक बड़े हिस्से को अलग करने और उसे संविधानवादी और कॉर्पोरेटवादी ढांचे में ढालने की कोशिश की, जिसमें उसे कुछ हद तक सफलता भी मिली।

इस तरह 1926 तक मज़दूर आंदोलनकारियों ने कुछ रियायतें ज़रूर हासिल कर ली, लेकिन मज़दूर आंदोलन सत्ता के नियंत्रण में चला गया। विदेशी हुक़ूमत मज़दूर आंदोलन को राष्ट्रवादी राजनीतिक आंदोलन से अलग करने की कोशिश में कामयाब हो गई। 1928 तक मज़दूर आंदोलन निष्क्रिय रहा। वह समाज में किसी तरह की हलचल पैदा करने में नाक़ामयाब रहा।

1927-28 से साम्यवादी मज़दूर नेताओं ने वामपंथी कांग्रेसी नेताओं के सहयोग से राष्ट्रवादी मज़दूर आंदोलन को मज़बूत बनाना शुरू कर दिया था। उस दौरान बड़ी-बड़ी रेल हड़तालें हुईं। सत्याग्रह भी उनके संघर्ष के हथियार थे। आम सभाओं में वे कहते उनका संघर्ष स्वराज के लिए जंग है। उन दिनों एन.एम. जोशी के नेतृत्व वाली ‘बंबे टेक्स्टाइल लेबर यूनियन, गिरणी कामगार महामंडल और शेतकारी कामगार पार्टी काफी सक्रिय और महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। इन्हीं दिनों एशिया की सबसे बड़ी यूनियन ‘गिरणी कामगार यूनियन’ का जन्म हुआ। इसके नेतृत्व में एक बहुत बड़ी हड़ताल हुई थी जिसका नेतृत्व एस.ए. डांगे और एस.एच. झाबवाला ने किया था। उन्होंने मज़दूरों से अपील की कि वे गांधीजी द्वारा सुझाए हुए अहिंसक प्रतिरोध का रास्ता अपनाएं और औपनिवेशिक सत्ता के काले क़ानून को मानने से इंकार कर दें। समय के साथ मज़दूरों के बीच वामपंथी व लड़ाकू ताकतों का प्रभाव बढ़ता गया और सांविधानिक मज़दूर संघ वादियों का प्रभाव ख़त्म होता गया।1929 में एटक अधिवेशन के समय दोनों खेमों के बीच की दूरी स्पष्ट दिखी। नेहरूजी के समर्थन से वामपंथी खेमे की जीत हुई। संविधानवादी खेमा एटक से अलग हो गया।

देश के विभिन्न भागों में श्रमिकों के अलग-अलग समूहों के एक संगठित, आत्म-चेतन, अखिल भारतीय वर्ग के रूप में उभरने की प्रक्रिया भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास और भारतीय 'राष्ट्र-निर्माण' की प्रक्रिया के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। मज़दूर आंदोलन को तीसरे दशक के अंतिम वर्षों में आंशिक रूप से सरकारी हमले के कारण और आंशिक रूप से आंदोलन के कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले विंग के रुख में बदलाव के कारण बड़ा झटका लगा। 1928 के अंत से कम्युनिस्टों ने राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा के साथ जुड़ने और उसके भीतर काम करने की अपनी नीति को पलट दिया। इससे कम्युनिस्ट राष्ट्रीय आंदोलन से अलग-थलग पड़ गए और मज़दूर वर्ग पर भी उनकी पकड़ बहुत कम हो गई। कम्युनिस्ट एआईटीयूसी के भीतर अलग-थलग पड़ गए और 1931 के विभाजन में उन्हें बाहर निकाल दिया गया।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2025

289. किसान और आदिवासी आंदोलन

राष्ट्रीय आन्दोलन

289. किसान और आदिवासी आंदोलन



1922

स्थापित सत्ता के खिलाफ किसानों का असंतोष उन्नीसवीं सदी की एक जानी-पहचानी विशेषता थी। बीसवीं सदी में, इस असंतोष से उभरे आंदोलनों की एक नई विशेषता थी: वे राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए चल रहे संघर्ष से गहराई से प्रभावित थे और बदले में उनका उस पर एक उल्लेखनीय प्रभाव था। असहयोग आंदोलन से अनजाने ही अनेक क्षेत्रों में आदिवासियों और किसानों का स्वतःस्फूर्त विद्रोह उठ खड़ा हुआ। यह आंदोलन असहयोग आंदोलन के वापस ले लेने के बाद भी शांत नहीं हुआ। गोदावरी के क्षेत्र में अल्लूरी सीताराम राजू ने छापामार युद्ध छेड़ रखा था। वे एक विलक्षण व्यक्ति थे। अपने विरोध के कारण वे आंध्र में लोकनायक बन गए। वे गांधीजी की बड़ी प्रशंसा किया करते थे। 6 मई, 1924 को उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और कुछ ही दिनों में उनको गोली मार दी गई। स्वामी विद्यानंद ने ज़मींदारी प्रथा समाप्त करने की मांग उठाई थी। किसानों की मांग मुख्यतः लगानों में कमी करने की होती थी। बंटाईदार फसल का अधिक न्यायपूर्ण बंटवारा चाहते थे। तटीय आंध्र प्रदेश में एन.जी. रंगा ने किसानों के ऊपरी वर्ग के बीच कार्य किया था। बाद में सरदार पटेल भी किसानों के लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे और गांधीजी के सहयोगी के रूप में काम किया। बीसवीं सड़ी के दूसरे और तीसरे दशक में उभरे देश के तीन महत्वपूर्ण किसान संघर्षों में से एक था उत्तर प्रदेश के अवध में किसान सभा और एका आंदोलन, दूसरा मालाबार में मप्पिला विद्रोह और तीसरा गुजरात में बारडोली सत्याग्रह।

अवध में ‘एका आंदोलन’  

1856 में अवध के विलय के बाद, उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में प्रांत के कृषि समाज पर तालुकदारों या बड़े जमींदारों की पकड़ मजबूत होती गई। इससे ऐसी स्थिति पैदा हो गई थी जिसमें अत्यधिक किराया, अवैध कर, नवीनीकरण शुल्क या नज़राना और मनमाने ढंग से बेदखली ने अधिकांश किसानों का जीवन दयनीय बना दिया था। प्रथम विश्व युद्ध के साथ-साथ खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की ऊँची कीमतों ने उत्पीड़न को और भी अधिक कठिन बना दिया और अवध के काश्तकारों को प्रतिरोध का संदेश देने की ज़रूरत थी।

कृषि-उत्पादों के मूल्यों में गिरावट से देश के अनेक भागों में किसानों के बीच असंतोष गहरा रहा था। इस बात के स्पष्ट संकेत मिलने लगे थे कि अब राजस्व के पुनर्मूल्यांकन का समय आ गया था। किसानों की मांगों के प्रति कांग्रेस के दृष्टिकोण में भी बदलाव दिख रहा था। अवध में ज़मींदार किसानों का बेइंतहा शोषण कर रहे थे। मनमाना लगान वसूल करते थे। जब चाहते, जिसे चाहते, उसे ज़मीन से बेदखल कर देते। ज़मींदारों के लठैत उन पर तरह-तरह के जुल्म ढ़ाते। होमरूल के कार्यकर्ताओं ने किसानों को संगठित करना शुरू कर दिया। गौरी शंकर मिश्रा और इंद्र नारायण द्विवेदी के प्रयासों और मदन मोहन मालवीय के सहयोग से फरवरी 1918 में एक संगठन बना जिसका नाम ‘किसान सभा’ दिया गया। जून 1919 तक उत्तर प्रदेश प्रांत की 173 तहसीलों में कम से कम 450 शाखाएँ स्थापित कर लीं। इस गतिविधि का परिणाम यह हुआ कि दिसंबर 1918 और 1919 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दिल्ली और अमृतसर अधिवेशनों में उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में किसान प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसके प्रयासों से किसानों में जागरूकता फैली। 1919 के अंत में, जमीनी स्तर पर किसानों की सक्रियता के पहले संकेत प्रतापगढ़ जिले की एक जागीर पर नाई-धोबी गिरोह (सामाजिक बहिष्कार का एक रूप) के गठन की खबरों से स्पष्ट हुए।

बीस के दशक में किसान खुलकर विरोध करने लगे। 1920 की गर्मियों तक, तालुकदारी अवध के गांवों में, ग्राम पंचायतों द्वारा बुलाई जाने वाली किसान बैठकें आम हो गईं। इस विकास के साथ थिंगुरी सिंह और दुर्गापाल सिंह के नाम जुड़े। महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण बाबा रामचंद्र एक घुमक्कड़ थे, जिन्होंने तेरह साल की उम्र में घर छोड़ दिया था, फिजी में एक गिरमिटिया मजदूर के रूप में कुछ समय बिताया और अंत में यूपी के फैजाबाद पहुंचे। 1920 के मध्य में, वे अवध के किसानों के नेता के रूप में उभरे, और जल्द ही उन्होंने काफी नेतृत्व और संगठनात्मक क्षमताओं का प्रदर्शन किया। जून 1920 में बाबा रामचंद्र जौनपुर और प्रतापगढ़ जिलों से कुछ सौ काश्तकारों को लेकर इलाहाबाद पहुंचे। वहां उन्होंने गौरीशंकर मिश्रा और जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की और उनसे गांवों में जाकर काश्तकारों की जीवन स्थितियों को देखने को कहा। इसका नतीजा यह हुआ कि जून और अगस्त के बीच जवाहरलाल नेहरू ने ग्रामीण इलाकों का कई बार दौरा किया और किसान सभा आंदोलन के साथ घनिष्ठ संपर्क विकसित किया।

इस बीच, कलकत्ता में कांग्रेस ने असहयोग का रास्ता चुना था। लेकिन मदन मोहन मालवीय सहित कई अन्य लोग थे, जो संवैधानिक आंदोलन से चिपके रहना पसंद करते थे। ये मतभेद उत्तर प्रदेश किसान सभा में भी परिलक्षित हुए और जल्द ही असहयोगियों ने 17 अक्टूबर 1920 को प्रतापगढ़ में एक वैकल्पिक अवध किसान सभा की स्थापना की। यह नया निकाय पिछले कुछ महीनों में अवध के जिलों में उभरी सभी जमीनी किसान सभाओं को अपने झंडे तले एकीकृत करने में सफल रहा; मिश्रा, जवाहरलाल नेहरू, माता बादल पांडे, बाबा रामचंद्र, देव नारायण पांडे और केदार नाथ के प्रयासों से, नए संगठन ने अक्टूबर के अंत तक 330 से अधिक किसान सभाओं को अपने अधीन कर लिया। कांग्रेस और ख़िलाफ़त ने इनके आंदोलन को एक नई शक्ल दी। इसका नाम दिया ‘एका आंदोलन’। किसानों से 50 फीसदी अधिक लगान वसूला जाता था। इन्होंने इसके ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया। एका बैठकों में एक धार्मिक अनुष्ठान होता था जिसमें जमीन में एक गड्ढा खोदा जाता था जो गंगा नदी का प्रतीक होता था और उसमें पानी भरा जाता था, अध्यक्षता करने के लिए एक पुजारी को बुलाया जाता था और इकट्ठे हुए किसानों से यह दायित्व लिया जाता था कि वे केवल दर्ज लगान ही देंगे, निर्धारित लगान से एक पैसा अधिक नहीं देंगे, लेकिन उसे समय पर चुकाएंगे, बेदखल किए जाने पर ज़मीन नहीं छोड़ेंगे, बेगार करने से मना करेंगे, अपराधियों की मदद नहीं करेंगे और पंचायत के निर्णयों का पालन करेंगे। आंदोलन बाद में अनुशासित और अहिंसक नहीं रहा। आंदोलन ने जल्द ही अपना स्वयं का जमीनी नेतृत्व विकसित कर लिया, जो कांग्रेस और खिलाफत नेताओं द्वारा बताए गए अहिंसा के अनुशासन को स्वीकार करने के लिए विशेष रूप से इच्छुक नहीं थे। परिणाम यह हुआ कि राष्ट्रवादी नेता इस आंदोलन से अलग हो गए। असहयोग आंदोलन का एक हिस्सा बन कर चल रहा यह आंदोलन असहयोग आंदोलन के वापस लिए जाने के बाद भी चलता रहा। सरकार ने दमन के बल पर 1922 के बाद इस आंदोलन को कुचल डाला।

मप्पिला विद्रोह

केरल के मालाबार ज़िले में भी ज़मींदारों का कहर किसानों पर टूटता रहता था। ज़मींदार जब चाहते उन्हें बेदखल कर देते। मनमाना लगान वसूलते। अगस्त 1921 में यहाँ किसान असंतोष भड़क उठा। यहाँ मप्पिला (मुस्लिम) काश्तकारों ने विद्रोह कर दिया। उनकी शिकायतें काश्तकारी की सुरक्षा न होने, नवीनीकरण शुल्क, उच्च किराए और अन्य दमनकारी जमींदारी वसूली से संबंधित थीं। अप्रैल 1920 में मंजेरी में ज़िला कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर किसानों की वाजिब मांगों का समर्थन किया और जमींदार-किराएदार संबंधों को विनियमित करने के लिए कानून बनाने की मांग की। यहां के किसान आंदोलन भी ख़िलाफ़त आंदोलन के साथ जुड़ गए। वास्तव में, खिलाफत और काश्तकारों की बैठकों के बीच कोई अंतर नहीं था, नेता और श्रोता एक ही थे, और दोनों आंदोलन एक में विलीन हो गए थे। माप्पिला किसानों के ख़िलाफ़त से जुड़ जाने से सरकार बौखला गई। गांधीजी, मौलाना आज़ाद और शौकत अली ने इन आंदोलनों का समर्थन किया था। 5 फरवरी 1921 को सरकार ने निषेधाज्ञा लागू कर खिलाफत बैठकों और सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया था। 18 फरवरी को, सभी प्रमुख खिलाफत और कांग्रेस नेताओं, याकूब हसन, यू. गोपाल मेनन, पी. मोइदीन कोया और के. माधवन नायर को गिरफ्तार कर लिया गया। आंदोलन का नेतृत्व स्थानीय मप्पिला नेताओं के हाथ से चला गया।

फिर भी मप्पिलाओं का विद्रोह ज़ारी रहा। सरकारी आदेशों की अवहेलना की जाती रही। 20 अगस्त 1921 को एरानाड तालुक़ के जिला मजिस्ट्रेट ई.एफ. थॉमस ने पुलिस और सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ खिलाफ़त नेता और एक बहुत सम्मानित पादरी अली मुसलियार को गिरफ़्तार करने के लिए तिरुरंगडी की मस्जिद पर छापा मारा। धर्मगुरु तो नहीं मिले लेकिन ख़िलाफ़त के अन्य नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया। हालांकि यह प्रयास असफल सिद्ध हुआ लेकिन लोगों में आक्रोश का ज़बरदस्त उबाल हुआ। यह खबर फैली कि प्रसिद्ध मम्ब्रथ मस्जिद, जिसके पादरी औ. मुसलियार थे, पर ब्रिटिश सेना ने छापा मारा और उसे नष्ट कर दिया। कोट्टाकल, तनूर और परप्पनगडी के मप्पिला काफी बड़ी संख्या में इकट्ठा हुए और गिरफ़्तार नेताओं की रिहाई की मांग करने लगे। लोग शांत और शांतिपूर्ण थे, लेकिन पुलिस ने निहत्थे भीड़ पर गोलियां चलाईं और कई लोग मारे गए। मप्पिला भी हिंसा पर उतर आए। झड़प हुई और सरकारी कार्यालयों को नष्ट कर दिया गया, रिकॉर्ड जला दिए गए और खजाने को लूट लिया गया। ज़िलाधिकारी को जान बचाकर भागना पड़ा। विद्रोह जल्द ही एरानाड, वल्लुवनाड और पोन्नानी तालुकों में फैल गया, जो सभी मप्पिला के गढ़ थे। इलाक़े में सैनिक शासन (मार्शल लॉ) लागू कर दिया गया। दमन बढ़ने से विद्रोह के चरित्र में एक निश्चित बदलाव आया। कई हिंदुओं पर या तो अधिकारियों की मदद करने का दबाव डाला गया या उन्होंने स्वेच्छा से सहायता की और इससे गरीब अनपढ़ मप्पिलाओं के बीच पहले से मौजूद हिंदू विरोधी भावना को और मजबूत करने में मदद मिली, जो किसी भी मामले में एक मजबूत धार्मिक विचारधारा से प्रेरित थे। मप्पिला में हिन्दू विरोधी भावना बढ़ने लगी। सत्ता का दमन बढ़ता गया। हिंदुओं पर हमला की घटनाएं भी बढ़ने लगी। जो संघर्ष सत्ता और ज़मींदारों के ख़िलाफ़ शुरू हुआ अब संप्रदायिक संघर्ष में बदल गया था। विद्रोह के सांप्रदायिकरण ने मप्पिलाओं को अलग-थलग कर दिया। असहयोग आंदोलन के नेता इस हिंसक आंदोलन से अलग हो गए। दिसंबर 1921 तक सभी प्रतिरोध समाप्त हो गए। ब्रिटिश हुक़ूमत ने दमन से इस आंदोलन को बुरी तरह कुचल डाला। 2337 माप्पिला मारे गए (अनौपचारिक अनुमानों के अनुसार यह संख्या 10,000 से अधिक थी) और 1652 घायल हुए। कुल 45,404 विद्रोही पकड़े गए या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। माप्पिलाओं का मनोबल पूरी तरह से इस तरह से गिरा दिया गया कि स्वतंत्रता मिलने तक किसी भी तरह की राजनीति में उनकी भागीदारी लगभग शून्य थी। वे न तो राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हुए और न ही किसान आंदोलन में, जो बाद के वर्षों में वामपंथी नेतृत्व में केरल में बढ़ने वाला था।

उपसंहार

किसान आंदोलन किसी न किसी रूप से राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीति से जुड़े थे। लेकिन दोनों ही आंदोलनों ने हिंसा का रास्ता अख़्तियार कर लिया था। इससे किसान आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन से अलग हो गया। गांधीजी से बार-बार उनसे अपील की कि कोई चरमपंथी रास्ता न अपनाएं। लेकिन कई लोगों ने इसका अर्थ यह लगाया कि राष्ट्रीय आंदोलन के नेता किसानों को हिंसा का रास्ता छोड़ने के लिए और लगान देते रहने के लिए इसलिए सलाह दे रहे हैं ताकि वे ज़मींदारों के हितों की रक्षा कर सकें। यह आरोप सरासर ग़लत था। राष्ट्रीय नेता जानते थे कि हिंसा का रास्ता अपनाने का अंजाम क्या होगा। जिस तरह से इन आंदोलनों को कुचल दिया गया वह ही इस बात का सबूत है कि राष्ट्रीय नेता सही थे।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

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