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मंगलवार, 23 अगस्त 2011

भारत और सहिष्णुता-16

भारत और सहिष्णुता-अंक-16

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जितेन्द्र त्रिवेदी

भाग दो

ईसा पूर्व दूसरी शताब्‍दी का काल इस देश में घोर निराशा का काल था। महान सम्राट अशोक के वंशज घोर विलासी, कायर और भ्रष्‍ट हो गये थे। देश का स्‍वाभिमान नष्‍ट प्राय: हो गया था। विदेशी हमलावरों ने पूरे मध्‍य देश को रौंद डाला था। मगध पर उस समय मौर्य वंश का शासक वृहद्रथ राज कर रहा था जो एक निर्वीर्य शासक था। उसके शासन काल में प्रजा असहाय थी और विदेशी हमलावरों की लूट-खसोट से त्रस्‍त हो गयी थी, किन्‍तु शासक प्रजा की रक्षा करने में असमर्थ था। तत्‍कालीन ऐतिहासिक साक्ष्‍यों से पता चलता है कि यवन, आक्रमणकारी बिना किसी अवरोध के पाटलीपुत्र के अत्‍यंत निकट आ पहुँचे। इस आक्रमण की चर्चा पतंजलि के ‘महाभाष्‍य’, ‘गार्गी संहिता’ तथा कालिदास के ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक में हुई है। ‘महाभाष्‍य’ में इसका उल्‍लेख भूतकाल को समझाने के लिये इस प्रकार किया गया है:- ‘अरुणद् यवन: साकेतम्। अरुणद् यवन: माध्‍यमिकाम्।‘ (महाभाष्‍य, 3/3, 111) अर्थात- ‘यवनों ने साकेत पर आक्रमण किया, यवनों ने चित्‍तौड़ (तब माध्‍यमिका कहा जाता था) पर आक्रमण किया। इस प्रकार का प्रयोग व्‍याकरण में उस सर्वविदित घटना के लिये किया जाता है, जो तुरंत घटी हो और यदि कोई देखना चाहे तो उसे ताजे हवाले के रूप में देख सकता है। गार्गी संहिता में भी स्‍पष्‍टत: इस आक्रमण का उल्‍लेख हुआ है:

"तत: साकेतमाक्रम्‍य पञ्चालान्‍मथुरान्‍स्‍त‍था। यवना दुष्‍टविक्रान्‍ता प्राप्‍यस्‍यन्ति कुसुमध्‍वजम्।।"

अर्थात - दुष्‍ट विक्रांत यवनों ने साकेत, पंचाल तथा मथुरा को रौंद दिया और पाटलिपुत्र तक पहुँच गये। इस यवन आक्रमण के नेता संभवत- डिमेट्रियस अथवा मिनांडर को बताया गया है। टार्न ने अपनी पुस्‍तक –‘ग्रीक्‍स इन बैक्ट्रिया एण्‍ड इंडिया’ में इसका उल्‍लेख किया है।

ऐसे समय में जब भारत यवनों द्वारा रौंदा जा रहा था और देश के वैय्याकरण (व्याकरण के ज्ञाता) भी देश की दुर्दशा के प्रति चिन्तित होकर अपने उदाहरणों के रूप मे तत्कालीन घटना का उल्लेख करके अपनी चिन्ता जाहिर की है। इस देश का भाग्‍यविधाता, भ्रष्‍टाचार और भोग विलास में लिप्‍त था और आक्रमणकारियों को रोकने का कोई प्रयास नहीं कर रहा था। अपितु जब सचिव और मंत्रियों द्वारा उसे ठोस निर्णय लेने के लिये सलाह दी जाती थी। तब वह ‘अहिंसा परमो धर्म:’ का राग अलापता था और हिंसा को पापकारी बताते हुए अपने महान पितामह अशोक का हवाला देने लग जाता था। इस तरह वह महान सम्राट अशोक की ‘धम्‍म’ नीति के सिद्धांतो की आड़ में अपनी कायरता को छिपाने की कोशिश करता था और अहिंसा की शपथ के कारण शस्‍त्र धारण को वर्जित बता कर यवनों के हमलों की उपेक्षा कर जाता था। उसके इस व्‍यवहार से मंत्री, सचिव, दरबारी, सेना सब लाचार और दुखी थे।

प्रजा पर यवनों के अत्‍याचार बढ़ रहे थे। प्रजा की कसमसाहट और व्‍याकुलता को देख कर वृहद्रथ का सेनापति पुष्‍यमित्र शुंग द्रवित हो गया था। उन्‍होंने इस विकट परि‍स्थिति से उबरने के लिये अपने समान विचार वाले लोगों से विचार-विमर्श शुरू किया। यह विचार-विमर्श बहुधा ‘महाभाष्‍य’ के रचयिता पंतजलि के आश्रम में हुआ करता था, परन्‍तु इस तथाक‍थति विचार-विमर्श की पराकाष्‍ठा हुई सेनापति पुष्‍यमित्र शुंग द्वारा मौर्य सम्राट वृहद्रथ की हत्‍या के रूप में।

पुष्‍यमित्र शुंग ने, एक दिन जब सम्राट शाही परेड का निरीक्षण कर रहे थे, संपूर्ण सेना के सामने यह घोषणा कि ‘मौर्य सम्राट अब और अधिक प्रजा की रक्षा करने के काबिल नहीं रह गये हैं, अत: मैं प्रजा की रक्षा के निमित्‍त से इस सेना की सर्वोच्‍च कमान अपने हाथों में लेता हूँ और सम्‍मानीय राजा को सभी के सामने मार रहा हूँ,’ कहते हुये अपनी तलवार वृहद्रथ की गर्दन के आर-पार घुमा दी। सम्राट की हत्‍या करने के बाद पुष्‍यमित्र शुंग ने यद्यपि शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली किन्‍तु अपने जीवनपर्यन्‍त ‘शासक’ की उपाधि नहीं प्राप्‍त की। पुराण, हर्षचरित्र, मालविकाग्निमित्र एवं ततयुगीन ऐतिहासिक दस्‍तावेजों में पुष्‍यमित्र के लिये ‘सेनानी’ शब्‍द का उल्‍लेख मिलता है, न कि ‘राजा’। इस आधार पर इतिहासकारों का विचार है कि वह कभी राजा नहीं बना, किन्‍तु उसने यवनों को भारत से बाहर खदेड़ने और प्रजा की रक्षा के लिये सभी संभव प्रयत्‍न किये। उसने मगध साम्राज्‍य की खोई हुई गरिमा पुन: स्‍थापित की और अमन-चैन का राज्‍य स्‍थापित किया। किन्‍तु बौद्धग्रंथ दिव्‍यावदान तथा तिब्‍बती इतिहासकार तारानाथ के विवरणों में उसे बौद्धों का घोर शत्रु तथा स्‍तूपों का विनाशक बताकर भर्त्‍सना की गई है। इस पर टिप्‍पणी करते हुये काशी प्रसाद जायसवाल ने अपनी पुस्‍तक – ‘जर्नल ऑफ बिहार एण्‍ड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी’ में लिखा है कि- ‘कुछ बौद्ध भिक्षु शाकल (स्‍यालकोट जो वर्तमान में पाकिस्‍तान में है) में यवनों से जा मिले थे और उन्‍हीं देश द्रोहियों का वध करने के लिये पुष्‍यमित्र ने साम्राज्‍य की सुरक्षा की दृष्टि से यह सब किया होगा।

इसके अलावा उसका बौद्ध भिक्षुओं से कोई झगड़ा नहीं था। अपितु कुछ बौद्धों को तो उसने अपना मंत्री नियुक्‍त कर रखा था’ इस कथन की पुष्टि बौद्ध ग्रंथ – दिव्‍यावदान से भी मिलती है, जिसमें पुष्‍यमित्र शुंग के दरबारियों में कई बौद्धों को दर्शाया गया है। यहाँ उन विदेशी हमलावरों को आंतकी कहें और अपने क्षुद्र स्‍वार्थों की पूर्ति के लिये उन बौद्धों को देशद्रोही, तो ऐसा कहना गलत नहीं होगा। अपितु यह साबि‍त होता है कि आंतकियों की मदद के लिये इस देश में कोई न कोई गुट हमेशा उपलब्‍ध रहा है, चाहे ईसा पूर्व की सदी में, चाहे अब 21वीं सदी में। इस तरह हम कह सकते हैं कि आतं‍कियों को मदद देना कोई आधुनिक घटना नहीं है।

आज कोई कहना चाहे तो पुष्‍यमित्र शुंग के कांड को आज की भाषा में पतंजलि के आश्रम में हुए षडयंत्र के परिणाम स्‍वरूप मगध में हुआ सैनिक तख्‍ता पलट कह सकता है लेकिन शताब्दियों बाद आज तटस्‍थता से देखें तो इस कांड के पीछे पुष्‍यमित्र शुंग का सत्‍ता-लोभ कम और देश और प्रजा की रक्षा की चिंता अधिक नजर आयेगी। क्‍योंकि देश का राजा व्रहद्रथ ‘अहिंसा परमोधर्म: का जाप करने वाला एक कायर व्‍यक्ति था, जो देवयोग से विरासत प्राप्‍त पद का उपभोग करने में मग्‍न था। देश किस विपत्ति से आक्रांत है, इसकी तरफ उसका कुछ भी ध्‍यान नहीं था और वह आँखे बंद किए हुए था। उसके पास चतुरंगिणी सेना थी और उसका सेनापति एक बहादुर व्‍यक्ति था। फिर भी संपूर्ण सेना मात्र शोभा की वस्‍तु बनकर रह गई थी और विदेशी हमलावर प्रजा के सुख-चैन को लूट रहे थे।

बाहरी हमलों से देश की सार्वभौमिकता और संस्‍कृति के लिये खतरा उत्‍पन्‍न हो गया था। सवाल किसी साम्राज्‍य की रक्षा का नहीं था, प्रजा की अस्मिता की रक्षा का था। पुष्‍यमित्र ने देखा कि ऐसे समय वही संकट का समाधान कर सकता था और उसने ई.पू. 185 में वह कर दिखाया जिसे पुन: व्‍याख्‍यायित करने के लिए हमें इस ऐतिहासिक तथ्‍य की विवेचना करनी पड़ रही है। जिसे पुष्‍यमित्र ने देखा था कि उसकी निष्‍ठाएँ केवल राजवंश के प्रति नहीं, अपितु राजवंश की अपेक्षा देश के प्रति पहले हैं और उसने अपनी निष्‍ठा को साबित करके भी दिखाया – विदेशी हमलावरों को भारत की सीमा से बाहर खदेड़ कर। क्‍या पुष्‍यमित्र शुंग के हवाले से यह विनम्र प्रश्‍न करने का साहस नहीं किया जा सकता है कि देश के सर्वोच्‍च पद पर आसीन व्‍यक्ति की निष्‍ठाएँ किसी वंश के प्रति निष्‍ठा की अपेक्षा देश के प्रति सर्वोपरि होनी चाहिये?

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मंगलवार, 12 जुलाई 2011

भारत और सहिष्णुता-10

अंक-10

भारत और सहिष्णुता

clip_image002रक्षा मंत्रालय में कार्यरत जितेन्द्र त्रिवेदी  रंगमंच से भी जुड़े हैं, और कई प्रतिष्ठित, ख्यातिप्राप्त नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन कर चुके हैं। खुद भी नाटक लिखा है। न सिर्फ़ साहित्य की गहरी पैठ है बल्कि समसामयिक घटनाओं पर उनके विचार काफ़ी सारगर्भित होते हैं। वो एक पुस्तक लिख रहे हैं भारतीय संस्कृति और सहिष्णुता पर। हमारे अनुरोध पर वे इस ब्लॉग को आपने आलेख देने को राज़ी हुए। उन्हों लेखों की श्रृंखला हम हर मंगलवार को पेश कर रहे हैं।

    जितेन्द्र त्रिवेदी

अब तक के विवेचन के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि यदि गुमराही में पड़ जाना मानव की सहज कमजोरी है तो उससे बाहर निकालने के लिये प्रकृति ऐसे लोगों को जन्म देती है और उन्हें यह न्यायबुद्धि दे देती है जो सही-गलत, उचित-अनुचित का निर्णय इतनी घटाटोप स्थिति में भी कर लेते हैं। ऐसे विकट समय में जन-मानस को दिशा देने का काम रातो-रात या कुछ वर्षों में नहीं हो सका था अपितु इसके लिये बुद्ध और महावीर को वर्षों भटकना पड़ा। कोई भी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था किन्तु उन्होंने धीरे-धीरे अपनी एक छवि निर्मित की और उनकी यह 'ब्रांड इमेज’ ही उनकी बात को सुनने का कारण बनी। इस 'ब्रांड इमेज' को एक उदाहरण द्वारा देना जरूरी है जिससे यह पता चल सके कि बुद्ध ने कैसे अपनी 'ब्रांड इमेज' बनायी और उसे समय आने पर उपयोग भी किया।

इसका वर्णन बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ 'महासच्चकसुत्त' में मिलता है जिसके अनुसार बुद्ध को जब घोर तपश्‍चर्या करते-करते सात वर्ष बीत गये तो अंत में बोधिसत्व ने मन में अचानक यह निश्‍चय कर लिया कि तपश्‍चर्या बिल्कुल निरर्थक है और उसके बिना मुक्ति मिल सकती है तब उन्होंने तपश्‍चर्या छोड़ कर ध्यानमार्ग का अवंलबन करने का निश्‍चय किया। ऐसे निश्‍चय के बाद उन्होंने सबसे पहले अन्न ग्रहण करना शुरू कर दिया, उस समय पांच भिक्षु इस आशा में बुद्ध की सेवा में लगे हुये थे कि यदि इन्हें तत्व ज्ञान मिला तो वे हमें भी उसकी शिक्षा दे देगें। परन्तु जब बोधिसत्व अन्न ग्रहण करने लगे तब इन पांचों ने सोचा कि, ''यह गौतम तपश्‍चर्या से भ्रष्ट होकर खाने-पीने की ओर मुड़ गया है और अपने क्षेत्र साधन से गिर गया है। अतः अब इसके पास हमें देने को कुछ भी नहीं है जो खुद गिर गया है वह हमें क्या देगा?'' ऐसा सोच कर वे पांचों बोधिसत्व को अकेला छोड़ उनका त्याग करके चले गये, किन्तु बोधिसत्व का निश्‍चय अटल रहा और उन्होंने तपश्‍चर्या को छोड़कर अन्न ग्रहण करते हुये शनैः शनैः ध्यानमार्ग पर चलना शुरू किया और एक दिन सुजाता की दी हुई भिक्षा ग्रहण करके वे निरंजना नदी के किनारे पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान में बैठ गये। वैशाखी पूर्णिमा की रात को बोधिसत्व को तत्व बोध हुआ और वही वृक्ष 'बोधि वृक्ष' कहलाया और तभी से वे बोधिसत्व से बुद्ध बन गये। बुद्ध बनते ही उन्हें सबसे पहले अपने उन पाँचो साथियों की याद आई जिन्हे स्वयं ज्ञान होने के बाद तत्व बोध कराने का उन्होंने वादा किया हुआ था। वे उन पाँचो की खोज में निकल पडे़ और बुद्ध ने उन्हें बनारस के पास 'ऋषिपत्तन' नामक स्थान में ढूंढ लिया। बुद्ध वहां पहुँच गये और रास्ते में उन्हे उन पांचों में से एक टकरा गया। उसकी सहायता से उन्होंने बाकी भिक्षुओं को खोज लिया। बुद्ध ने छूटते ही उससे कहा - 'मुझे तत्व बोध हो गया है' परंतु उसे इस संबंध में विश्‍वास ही नही हुआ। वह बोलाः

''आयुष्मान गौतम! तुम्हारी उस प्रकार की तपश्‍चर्या से भी तुम्हें सद्धर्म मार्ग का बोध नहीं हुआ था और अब तो तुमने तपोभ्रष्ट होकर खाना-पीना शुरू कर दिया है। ऐसी स्थिति में तुम्हें सद्धर्म का बोध भला कैसे हो सकता है।'' ऐसी विकट परिस्थिति में बुद्ध ने जब देखा कि उसके अपने प्रिय साथी ही, जिन्होंने दुख-सुख में और अन्य सब अवस्थाओं में बुद्ध को करीब से देखा है, उन पर विश्‍वास नहीं कर रहे हैं तब उन्होंने अपनी पुरानी जिन्दगी का जिक्र करते हुये कहाः

''हे भिक्षुओं, क्या इससे पहले मैंने कभी ऊट-पटाँग हांकी है, डींग मारी है या कभी मजाक में भी बकवास की है, यदि नहीं तो आप मेरी बात पर ध्यान दीजिए। अमृत का मार्ग मुझे मिल गया है . . . . . . .''

बुद्ध की यह बात सुनते ही पांचो खुसर-फुसर करने लगे और बोले कि हाँ, यह गौतम तो ठीक कहता है कि इसने कभी भी ऊट-पटाँग बात की ही नहीं है, कभी डींग भी नही मारी है और झूठ तो यह कभी बोलता ही नहीं, तो आज भला क्यों कहेगा, इसलिये इसकी बात सुन लेते हैं और जब उन्होंने सुना तो वह कोई साधारण बात नहीं थी, अपितु वह तत्वबोध था जिसके लिये वे बुद्ध की सेवा कर रहे थे। इस घटना में हम यह देख सकते हैं कि कैसे एक ''ब्रांड इमेज'' बनती है और कैसे उसके सहारे आप अपने पर अविश्‍वास की स्थिति में भी जनमानस को अपनी ओर खींचने का काम कर सकते हैं।

बुद्ध बनने के बाद उन्होंने खंडन-मंडन की प्रवृत्ति की अपेक्षा अपनी बात रखने की नयी शैली विकसित की जिसे आज तर्कवाद कहा जाता है। हजारों वर्षों के इतिहास में बुद्ध ही वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने वाद-संवाद और तर्क को आधार बना कर अपनी बात कहने की आदत विकसित की। विरोधी या कुतर्की की बातों को भी ध्यान से सुनने का धैर्य जितना बुद्ध ने दिखाया उतना सबके वश में पहले नहीं था, क्योंकि ऋग्वैदकाल में मैत्रेयी एक जगह जब याज्ञवल्क्य से एक प्रश्‍न का समाधान हो जाने पर भी दूसरा प्रश्‍न पूछती हैं और उसका भी जवाब मिलने पर अन्य अनुषंगी प्रश्‍न पूछती जाती हैं तो झल्लाकर याज्ञवल्क्य कह उठते हैं - 'अब या तो तुम चुप हो जाओ या तुम्हारे सिर के मैं दो टुकडे़ कर दूँगा। यह पति-पत्नी के बीच अक्सर होता है और याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी के बीच भी ऐसा होना स्वाभाविक बात थी, किन्तु बुद्ध ने दुनियाँ को दिखा दिया कि मानवीय सहिष्णुता का कोई वार-पार ही नहीं है। यदि वह प्राण-पण से कोशिश करे तो अनंत काल तक सामने वाले की बातों को सुन सकता है और उसका तर्क सम्मत उत्तर दे सकता है। इस तरह बुद्ध ने वाद-संवाद की प्रक्रिया को थोथे वाग्जाल से निकालकर एक 'कला' बना दिया और उससे बाद में एक जीवन दर्शन ही विकसित हो गया जिसे हम भारत के बाद के इतिहास में बार-बार देखते हैं। ई.पू. तीसरी सदी में सहिष्णुता और समृद्ध वैचारिक बहुलता की आवश्‍यकता पर भारत के सम्राट अशोक ने खूब बल दिया था और विश्‍व की सबसे पुरानी वाद-संवाद की प्रक्रिया द्वारा विवाद निपटाने की 'आचार संहिता' की भी रचना की थी। उस 'आचार संहिता' के अनुसार विरोधी का सदैव पूर्ण सम्मान होना चाहिये। अशोक द्वारा बुद्ध से लिया गया यह सिद्धान्त बाद में भारत में हुयी राजनीतिक और धार्मिक चर्चाओं में बार-बार दिखाई देता है। कालान्तर में सहिष्णुता और सभी धर्मों से राजनीति के समान अन्तर बनाए रखने की बात को सबसे स्पष्ट रूप से भारत के मुगल सम्राट अकबर ने उठाया।

अकबर के समय जहाँ भारत में धार्मिक साहिष्णुता के सिद्धांत (दीने-इलाही) रचे जा रहे थे, वहीं यूरोप में तो उन दिनों ईसाई धर्म का विरोध करने वालों पर 'धर्म अभियोग' चला कर उन्हें अपराधी घोषित कर जिन्दा जलाया जा रहा था। मेरे कहने का दुस्साहस यह है कि जिस मध्य कालीन भारत को यूरोपीय इतिहासकारों ने बर्बर कहने की गुस्ताखी की थी, वह भारत उनके समकालीन यूरोप से कितना सभ्य और सुसंसकृत था जिसमें एक मुसलमान बादशाह अपनी विधर्मी प्रजा के धर्म और पूजा-अर्चना की व्यवस्था करने के लिये चिंतित था और उसकी यह चिंता बढ़ती हुयी मानवीय चिंता का रूप लेती गयी जिसमें सभी लोगों के लिये 'साझा धर्म' की अवधारणा विकसित हुयी जिसे अकबर ने 'दीने-इलाही' नाम दिया, शायद इसीलिये हिंदी के राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त ने लिखा हैः

''प्रकट त्रिवेणी तट के मन में एक और संगम की चाह

हिन्दू-मुसलमान का मानस मिलन तीर्थ यह महा प्रवाह

राम-रहीम धाम होगा तब वही दुर्ग सन्नत सन्नाह

उस मंदिर का आदि-पुजारी स्वयं सिद्ध तू अकबरशाह''

आज के युग में भी उसी वाद-संवाद तथा बहुलता की स्वीकारोक्ति की परंपरा का बहुत महत्व है तथा लोकतंत्र और जन संवाद में चर्चा और तर्कों का निर्णायक महत्व झुठलाया नहीं जाना चाहिये। डा. अमर्त्यसेन ने अति आशावादी नजरिये से लिखा है कि - ''इन संरचनात्मक वरीयताओं से आगे निकलकर इस बहुलवादी परंपरा का यदि ठीक से उपयोग हो तो यह सामाजिक विषमताओं के विरोध तथा गरीबी और अभावों के निर्मूलन में भी सहायक हो सकती है। आलोचनात्मक स्वर कब से दुखी का सहारा रहे हैं तथा वाद-संवाद में भागीदारी एक सामान्य अवसर है।''

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

भारत और सहिष्णुता-9

अंक-9

भारत और सहिष्णुता

clip_image002रक्षा मंत्रालय में कार्यरत जितेन्द्र त्रिवेदी  रंगमंच से भी जुड़े हैं, और कई प्रतिष्ठित, ख्यातिप्राप्त नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन कर चुके हैं। खुद भी नाटक लिखा है। न सिर्फ़ साहित्य की गहरी पैठ है बल्कि समसामयिक घटनाओं पर उनके विचार काफ़ी सारगर्भित होते हैं। वो एक पुस्तक लिख रहे हैं भारतीय संस्कृति और सहिष्णुता पर। हमारे अनुरोध पर वे इस ब्लॉग को आपने आलेख देने को राज़ी हुए। उन्हों लेखों की श्रृंखला हम हर मंगलवार को पेश कर रहे हैं।

    जितेन्द्र त्रिवेदी

इन सब महानुभावों की एक अजीब तरह की प्रतिक्रिया थी - पाप से घृणा करने की वजाय पापी से ही घृणा करना और जो भी चीज उसके करीब की हो उन सबसे घृणा करना। यह तो वैसा ही है कि जब किसी परिवार के एक व्यक्ति से हमारी ठन जाती है तो हम परिवार के अन्य सभी सदस्यों से भी स्वतः ही बिदक जाते हैं, चाहे उनमें कोई सदस्य भक्त प्रहलाद जैसा पुनीत और निर्दोष ही क्यों न हो। ये सब महानुभाव घोर अनिश्‍चय और असमंजस की स्थिति में थे। ऐसी मानसिक दशा में इन्हें बुराई के विरुद्ध जो भी सूझा, उन्होंने कहने में देरी नही लगाई। यद्यपि वे ठीक कह रहे थे किन्तु कहीं-कहीं दुराग्रह कर जाते थे, अविनीत हो जाते थे, इससे फायदा होने के बजाय नुकसान ही अधिक हुआ तथा झगड़े और बढ़ने लगे क्योंकि बहुसंख्य लोग उनकी बात समझने में सक्षम नहीं थे और जो समझने में सक्षम थे, उन्होंने समाज के डर से, लोक-लाज से उनसे दूरी बना ली। ये लोग अलग-थलग पड़ गये और निराश हो कर जंगलो में सरक गये और वहाँ ये और भी अधिक उद्धत हो गये। वे ईश्‍वर की भी अब निन्दा करने लगे और नास्तिक होने लग गये। इस तरह जिस व्यवस्था में वे पैदा हुये थे और अपने चिन्तन-मनन के फल स्वरूप उसकी कमियों को देखने लग गये थे तथा वे अपनी बुद्धि को न्याय-अन्याय, सही-गलत के स्तर पर ले गये थे, खुली गुमराही में पड़े होने के बावजूद लोगों द्वारा उनकी बात को तवज्जो नहीं देने से वे कुंठित होने लगे और इस तरह से वे अनिश्‍वरवादी हो गये। ये लोग खुद जो गुमराही के खिलाफ खड़े हुए थे वे स्वयं अलग तरह की गुमराही में पड़ गये। इस तरह की स्थिति से बचा भी नहीं जा सकता था क्योंकि विश्‍व सभ्यता का अध्ययन करने वाले लोग जानते हैं कि इस तरह की स्थिति अन्य सभ्यताओं में भी हुई हैं।

भारत में जो 600 ई.पू. हो रहा था वह दूसरी जगह थोड़ा बाद में हुआ। पश्चिम में जब 'फिरऔन' के भोगवाद, बलि और अनाचर से परेशान होकर पैगम्बर 'मूसा' ने अपनी जाति वालों को समझाना शुरू किया तो उनकी बात बहुत कम लोगों ने मानी और जिन्होंने मानी, उन पर आततायी 'फिरऔन' ने इतने अत्याचार किये कि पैगम्बर 'मूसा' को विवश होकर अपना प्यारा वतन छोड़ना पड़ा और जब 'फिरऔन' की सेना उनका पीछा करते हुये नील नदी तक आ गई तब एक तरफ नदी में डूबने के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं था, सिवाय फिरऔन के द्वारा सभी की कत्लो-गारत के। ऐसे समय पैगम्बर मूसा को न चाहते हुये भी अपनी दैवीय शक्ति का सहारा लेकर अपनी लाठी की मार से पानी की धार में रास्ता बनाना पड़ा और वे अपने अनुयायियों को बचा कर निकाल ले गये लेकिन आख्यान का मजेदार अंश वह है जब मूसा उन्हें सही और सीधा-साधा रास्ता दिखा कर तपस्या करने पहाड़ पर चले गये तो उनके ये ही अनुयायी थोड़े ही दिन में फिर पहले से भी अधिक गुमराही में पड़ गये, इस खुली गुमराही में वे व्यभिचार में शामिल हो गए। जब मूसा पहाड़ पर से ध्यान पूर्ण करके उतरे तो देखते हैं कि उनके अपने ही लोग जिनको वे 'फिरऔन' की गुमराही से बचाकर नदी पार लेकर आये थे, किसी आदर्शवादी समाज की स्थापना की अपेक्षा में वही लोग प्रतीक पूजा, भोग-विलास और व्यभिचार में पहले से भी बुरी गुमराही में लिप्त हो गये हैं। तब मूसा ने इन गुमराह लोगों को 'टेन कमांडमेंट्स' का ज्ञान कराया और ये लोग सही राह पर आ गये किन्तु मूसा के इंतकाल के बाद वे फिर भटक गये। इसके पश्‍चात् ईसामसीह का आगमन हुआ और उन्होंने फिर उन्हें गुमराही से बाहर निकाला। सदियो के अंतराल के बाद फिर वही पुनरावृत्ति हुई और मनुष्य अपने जातीय स्वभाव के वशीभूत होकर फिर भटक गया और इस बार अरब में एक पैगम्बर (मोहम्मद साहब) ने उन्हें गुमराही से उबारने के लिये जद्दोजहद शुरू की और इन सभी गुमराह लोगों को पुरानी गुमराही से सबक लेने को कहा और उन्हे सचेत करते हुए पैगम्बरो का वास्ता दिया और लोगों को नई राहें-रोशनी दिखाईः

''और इससे पहले मूसा की किताब (टेन कमांडमेंटस) रही है- नायक और दयालुता; और यह कुरान उसकी तसदीक करने वाली किताब है (अरबी भाषा में) ताकि जुल्म करने वालों को सचेत करे।'' (सूरा अल-अहकाफ/आयात 12/कुरान)

पैगंबर मुहम्मद साहब की इन बातों का असर हुआ और लोग गुमराही से बाहर आने लगे लेकिन यहाँ विषय यह है कि, भारत में उत्तर वैदिक काल में जिस भोगवाद और अतिशय संग्रह की आपा-धापी की स्थिति से कुछ लोगों को वितृष्णा होने लगी थी जिससे कई नई तरह की सोच रखने वाले समूह पैदा हो गये जिनमें ये संशयवादी, अनीश्‍वरवादी, नास्तिक और बहुलवादी लोग थे। ऐसे समय में जिस तरह पश्चिम में फिरऔन की संस्कृति के विरुद्ध मूसा खडे़ हुये उसी तरह उत्तर वैदिक समाज के असमंजस के समय बुद्ध और महावीर जैन का आविर्भाव हुआ और इन दोनों महापुरुषों ने अपनी दीर्घ दृष्टि से लोगों को सुस्पष्ट दिशा देने का काम किया किन्तु बाद के काल में बुद्ध और महावीर के अनुयायी भी भटक गये और बौद्ध धर्म निरर्थक तंत्रवाद में और जैन धर्म धन के अकूत संचय से अनुप्राणित होने लगा और जैसे मूसा के बाद ईसा आये थे वैसे ही गीता ने फिर मनुष्य को राह दिखाई, और इसके बाद आगे जब मानव फिर अपने जातीय स्वभाव की कमजोरियों की वजह से भटका तो शंकराचार्य ने उन्हें गुमराही से बाहर निकाला इसीलिये उन्हे प्रच्‍छन्न बुद्ध कहा जाता है।

मंगलवार, 28 जून 2011

भारत और सहिष्णुता-8

अंक-8

भारत और सहिष्णुता

clip_image002रक्षा मंत्रालय में कार्यरत जितेन्द्र त्रिवेदी  रंगमंच से भी जुड़े हैं, और कई प्रतिष्ठित, ख्यातिप्राप्त नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन कर चुके हैं। खुद भी नाटक लिखा है। न सिर्फ़ साहित्य की गहरी पैठ है बल्कि समसामयिक घटनाओं पर उनके विचार काफ़ी सारगर्भित होते हैं। वो एक पुस्तक लिख रहे हैं भारतीय संस्कृति और सहिष्णुता पर। हमारे अनुरोध पर वे इस ब्लॉग को आपने आलेख देने को राज़ी हुए। उन्हों लेखों की श्रृंखला हम हर मंगलवार को पेश कर रहे हैं।

    जितेन्द्र त्रिवेदी

वैदिक युग के आर्य मोक्ष के लिये चिन्तित नहीं थे। वे संसार को भोगने की लालसा से ओतप्रोत थे। 'कामायनी' में इसे बडे़ विस्तार से बताया गया है और ऋग्वेद की ऋचाएं ऐसे भावों से भरी पड़ी है, जिनसे पस्त से पस्त आदमी के भीतर भी उमंग की लहर जाग सकती है। उनकी सारी प्रार्थनाएं, सारे काम, बराबर लम्बी आयु, स्वस्थ शरीर, विजय, आनंद और समृद्धि के लिये ही की जाती थीं - ''जीवेत शरदः शतम, मोदते शरदः शतम'' जैसी ऋचाएं ऋग्वेद में भरी पड़ी हैं-

हम सौ वर्षों तक जीऐं,

हम सौ वर्षों तक अपने ज्ञान को बढ़ाते रहें.

हम सौ वर्षों तक पुष्टि और दृढता को प्राप्त करें.

हम सौ वर्षों तक आनंदमय जीवन व्यतीत करें।

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''भगवान, आप तेज स्वरूप हैं,

मुझमें तेज धारण कीजिये।

आप वीर्य रूप हैं, मुझे वीर्यवान कीजिए।

हमें समुन्नत कीजिए।

आप बल रूप हैं, मुझे बलवान बनाएं।

मेरे लिये सभी दिशाएं झुक जाएं।

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इस तरह अतिशय भोगवाद ने आदमी का दिमाग फिरा कर रख दिया। वर्ण व्यवस्था जो पहले काम के आधार पर निर्धारित होती थी वह वंशानुगत होने लगी और शारीरिक श्रम करके आजीविका कमाने वालों को तुच्छ समझा जाने लगा। यहाँ तक तो फिर भी गनीमत थी, किन्तु स्थिति बद से बद्तर तब हो गयी जब इन समूहों को वर्ण व्यवस्था के क्रम में सबसे नीचे ढकेल दिया गया और अस्पृश्‍य घोषित कर दिया गया। इस तरह न केवल सामाजिक आदान-प्रदान से अपितु आर्थिक संसाधनो के बटवारे में भी उन्हे महदूद (वंचित) कर दिया गया। एक और बुरी बात इस भोगवाद के कारण जन्म लेने लगी, वह थी- नारी की अवगणना। जहाँ पहले स्त्रियों का 'सभा' एवं 'समिति' में भाग लेने का उल्लेख मिलता था, अब उसे भोगवादी सोच के कारण निषिद्ध कर दिया गया।

जहाँ पहले वेदों में यह उल्लेख मिलता था कि - ''मैं कवि हूं, मेरे पिता वैद्य हैं और मेरी माता चक्की चलाने वाली हैं और हम सब एक साथ रहते हैं'', (इसका सीधा सा मतलब है कि एक परिवार के सदस्य कई धंधे अपना सकते थे और जिस धंधे से व्यक्ति जीवन यापन करता था, वह उसकी जाति थी और इस तरह एक परिवार में ही कई जातियाँ हो सकती थी जो कि एक खुली सामाजिक व्यवस्था को दर्शाती है, परन्तु बाद में बंद समाज व्यवस्था ने ऐसे अवसरों को ही समाप्त कर दिया जिसमें एक परिवार के लोग अलग-अलग धंधे कर सकें और अपने आपको अलग-अलग जाति का बताने में कोई संकोच न करे। कालान्तर में इसी ने बंद अर्थव्यवस्था की भी नींव रख दी)। इस तरह के उल्‍लेख मिलने अब बंद हो गये। ब्राह्मण ग्रंथों तक आते-आते 'शूद्र' को व्यवस्था सम्मत संस्कारों का भी निषेध कर दिया गया और चौथा वर्ण 'उपनयन' आदि संस्कारों का अधिकारी नहीं रह गया और यही अपात्रता कुछ लोगों को बुरी तरह कचोटने लगी। ऐसे लोगों में निग्रन्थों/जैनों का संप्रदाय बड़ा प्रबल था। उसके अतिरिक्त पूरण, काश्‍यप, मख्सलि गोसाल, अजित, केश, कंबलिन, पकुध, कात्यायन, संजय वेलिटट्ठपुत्त, चार्वाक (लोकायत दर्शन) आदि के श्रमण संप्रदाय बहुत प्रख्यात हो गये थे। इन सबके विचार यद्यपि पूर्णतः समान तो नहीं थे तथापि कुछ बातों में वे एक मत थे-

- उन सबको यज्ञ-याग पसंद नहीं था।

- सब ने बलि को उतना महत्व नहीं दिया।

- तपश्‍चर्या के प्रति कम या अधिक आदर सब में था।

बढ़ती हुई भोगवादिता से उकताए हुये इन लोगों को देख कर यह भ्रांति कदापि नहीं होनी चाहिये कि 'वेद' गलत थे या उसकी शिक्षाएं सिर्फ भोगवाद को ही बढ़ावा देती थी अपितु सत्य यह है कि कुछ का कुछ समझ लेना और उसी को सबकुछ मान लेना मानव की सहज कमजोरी है। मनुष्य को चाहे कितना भी सीधा रास्ता क्यों न दिखा दिया जाए, गुमराही में पड़ जाना उसका जातीय स्वभाव है।

उस समय का समाज भी कुछ ऐसी ही खुली हुई गुमराही में खड़ा हुआ था और ऊपर जितने महानुभावों के नाम गिनाये गये हैं वे इस गुमराही का अंग नही बनना चाहते थे। ये सब उस खुली गुमराही के विरूद्ध थे किन्तु इनके पास स्पष्ट विकल्प नहीं था। इन सभी में भयानक बैचेनी थी किन्तु उस बैचेनी को चेनेलाइज करने की दृष्टि नहीं थी। ये सब तार्किक थे, बुद्धिवादी थे और सबसे अधिक मानव के अधोपतन को साफ-साफ देख रहे थे और परेशान थे। वे उस गुमराही को रोकना चाहते थे किन्तु इनके अतिरिक्त इनकी बात कोई सुनने को तैयार ही नहीं था। इनके अनुयायी न के बराबर थे और ये अजीब से पशोपेश में थे और इसी पशोपेश में इन्होंने वेदों की सीधे-सीधे निन्दा शुरू कर दी। इसलिए नहीं कि वेद गलत थे अपितु इसलिये की वैदिक नियमों के अनुयायियों को जब उन्होंने सारे कुकर्म करते देखा तो इन्हें लगा कि सारे कुकर्म वेदों में ही बताये गऐ हैं जबकि वास्तव में ऐसा नही था। इन्होंने कुकर्म से नफरत करने के बजाय कुकर्मी से नफरत (वर्तमान सिद्धान्त - Hate the sin not the sinner के उलट) करनी शुरू कर दी और अपनी मर्जी से ही सब कुकर्मो की जड़ वेदों को ही मान लिया। वेदों को पढ़ना तो दूर उसे देखना भी इन्होंने गलत ठहरा दियाः

''त्रयो वेदस्य कर्तारो भण्ड धूर्त निशाचराः।'' (वेदो के रचियता तीन लोग है- भण्ड, धूर्त और राक्षस) -चार्वाक 'सर्व दर्शन' पुस्तक से।

मंगलवार, 7 जून 2011

भारत और सहिष्णुता-5

clip_image002रक्षा मंत्रालय में कार्यरत जितेन्द्र त्रिवेदी  रंगमंच से भी जुड़े हैं, और कई प्रतिष्ठित, ख्यातिप्राप्त नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन कर चुके हैं। खुद भी नाटक लिखा है। न सिर्फ़ साहित्य की गहरी पैठ है बल्कि समसामयिक घटनाओं पर उनके विचार काफ़ी सारगर्भित होते हैं। वो एक पुस्तक लिख रहे हैं भारतीय संस्कृति और सहिष्णुता पर। हमारे अनुरोध पर वे इस ब्लॉग को आपने आलेख देने को राज़ी हुए। उन्हों लेखों की श्रृंखला हम हर मंगलवार को पेश कर रहे हैं।

    जितेन्द्र त्रिवेदी

लिंक पहले के

१. भारत में सहिष्णुता  २. भारत और सहिष्णुता –2  ३. भारत और सहिष्णुता-3 :: भारत-निर्माणभारत और सहिष्णुता-4 :: भारत निर्माण

भारत का निर्माण, इसके भूगोल के सामान्य ज्ञान के बिना नहीं समझा जा सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप की विशालता इतनी है कि इसमें रूस को छोड़ कर समूचा यूरोपीय महाद्वीप समा सकता है। इस उपमहाद्वीप की भौगोलिक इकाई में कमोबेश आगे-पीछे जो निर्माण और विकास की प्रक्रिया चली, वह वर्तमान में सम्पूर्ण भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और वर्मा क्षेत्र तक विस्तृत थी। इस पूरे भूभाग का कुल क्षेत्रफल 4,202,500 वर्ग किलोमीटर है। भारतीय उपमहाद्वीप एक स्पष्ट भौगोलिक ईकाई है और इसका अधिकांश भाग उष्ण कटिबंध में होने के कारण कमोबेश पूरे क्षेत्र को विशालता के बावजूद यह एक जैसी जलवायु में बांध देता है। भूगोल का यही तत्व हमारे लिए विलक्षण बन गया है तथा इसी ने इन पसरे हुये इलाकों को अनजाने में ही सही एक सूत्र में पिरो दिया है। इसी घटक ने इतने बड़े भू क्षेत्र को समेकित ईकाई बनने की ओर बरबस धकेला है जिसका नाम कई चरणों से गुजरते हुये भारत पडा़ है। इस तरह जलवायु का यह घटक, भारत निर्माण की प्रक्रिया का सबसे पहला सूत्र है, जिसे पकड़ कर मैं आगे बढ़ने का प्रयास करूंगा। इसी एक घटक ने इस 3200 किमी. से भी बड़े इस भू-भाग में रहने वाले व्यक्तियों को चाहे या अनचाहे बरबस एक जैसा अवसर प्रदान किया है। अगर हम जानबूझकर इस जलवायु को और मानसून की महत्वपूर्ण भूमिका को झुठला दे और अपने को क्षेत्रीय सीमा में रखना चाहें तो बात अलग है। दक्षिण-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी मानसून पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को यह एहसास दिला जाता है कि इस भूगोल में कोई भेद नहीं करते हुए वह इसे एकल इकाई मानता है।

मानसून और जलवायु रूपी कारकों के आधार पर मेरा निष्कर्ष अति सरलीकरण करके बताना नहीं है। इसके बावजूद भारतीय उपमहाद्वीप में सब जगह मानव जीवन का व्यवहार एक जैसा नहीं था और न ही किसी काल में सभी जगह एक जैसे क्रिया-कलाप थे। भौतिक और जलवायु रूपी कारक व्यवहार की समानता को कुछ हद तक ही स्पष्ट कर सकते हैं किन्तु उन्हें दिल की उदारता दिखाकर व्याख्या करके अपना लेना तो उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के ही ऊपर होता है। सामाजिक विकास के प्रारंभिक स्तर पर इतिहास का स्वरूप इस पर ज्यादा निर्भर था कि किस तरह मानव समुदाय अपने पर्यावरण के साथ परस्पर संपर्क करते थे और इस सम्बन्ध की प्रकृति के आधार पर ही विविध क्षेत्रों का स्वरूप विकसित हुआ जो हजारों साल के अनवरत विकास क्रम में भी समेकित होता रहा और इसी ने भौगोलिक इकाई के रूप में हमारी साझी पहचान को जन्म दिया। जब सिन्धु घाटी सभ्यता, जो हजारो साल पुरानी है, के वासिंदे व्यापार के लिये हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से बाहर निकलते तो देखते थे कि दूसरी जगह का मौसम और रहन-सहन उन्हीं के जैसा था और उनकी शक्ल-सूरत भी वैसी ही थी तो अनायास ही सही, पर इन समानताओं को नजर अंदाज करना उनके लिए आसान नहीं रहा होगा। उन लोगों ने जरूर देखा होगा कि क्षेत्रीय असमानताओं के बावजूद सिंधु घाटी से बाहर के लोग किस कदर उनके जैसे ही थे। विकास के उपरोक्त विविध चरण दिखलाते हैं कि जलवायु तथा मनुष्य के परिवेश में परिवर्तन होता गया और इस भूभाग के लोगों ने इन परिवर्तनों के अनुसार जीवन में ढलने की अद्भुत क्षमता दिखायी। सभ्यता के विकास में एक महान परिवर्तन तब आया जब इन समुदायों ने कृषि तथा पशुपालन को अपनाते हुये संगठित होकर रहना आरम्भ किया। इसे परिपक्व स्वरूप में आने में बहुत समय लगा लेकिन इसी के कारण प्राचीन गाँवों का निर्माण हुआ। यद्यपि कृषि तथा पशुपालन का प्रारम्भ सामान्य रूप से नव पाषाण युग (लगभग 7000 ई.पू. से 2500 ई.पू.) से जोड़ा जाता है तथापि महत्वपूर्ण बात यह है कि दूसरे स्थानों की तरह भारतीय उपमहाद्वीप में विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न कालों में शिकार तथा भोजन संग्रह की व्यवस्था से कृषि तथा पशुपालन की ओर परिवर्तन भारतीय समाज के विकास के एक नये युग के प्रवर्तन को दर्शाता है। भारतीय उपमहाद्वीप की पहली सभ्यता का विकास सिंधु के मैदान में हुआ, जबकि गंगा के मैदान में ईसा पूर्व पहली सहस्त्राब्दी से नगर जीवन, राज्य, समाज और साम्राज्य सम्बन्धी ढांचे का पोषण हुआ। गंगा घाटी में पूर्ण रूप से नियोजित कृषि, खेतीहर गांव तथा अन्य संशोधित कार्य जैसे नगरों का उदय, व्यापार तथा राज्य प्रणाली 1500 से 1000 ई.पू. के मध्य में ही दिखायी देने लगे थे और ये तत्व बढ़ते हुये क्रमश: समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में फैल गये। अन्तिम वेद की रचना तक ये कार्य पूर्व और दक्षिण में भी पहुँच गये थे क्योंकि वेदों में चक्रवर्ती की जो संकल्पना की गयी है उसमें समुद्र तट तक के क्षेत्र को चक्रवर्ती सम्राट का क्षेत्र कहा गया है। रूचिकर तथ्य यह है कि यह क्षेत्र उतना ही है जितना भारतीय उपमहाद्वीप है। चक्रवर्ती की इस अवधारणा ने भी इस क्षेत्र को समरूप करना आरम्भ कर दिया था। यद्यपि ये क्षेत्र अपने आप में साधारणतया समरूपी इकाई थे फिर भी क्षेत्रों के अंतर्गत उपक्षेत्रों की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती है। प्राचीन तमिलाकम (तमिलनाडू) के अंतर्गत पर्यावरणीय भिन्नताएं भी और आंध्र एवं उड़ीसा को भी उसी नजरिए से देखा जा सकता है। नृजातीय भिन्नता जो भी रही हो उसके बावजूद वेदों ने आर्यावर्त की संकल्पना में इन क्षेत्रों को शामिल कर लिया था और आर्यों ने जिनके जीवन में घोड़े का सबसे अधिक महत्व था। सुदूर के क्षेत्रों तक यात्रा कर ली थी। घोडे़ की तेज रफ्तार के कारण आर्यों ने 2000 ई.पू. के बाद इस भू क्षेत्र में चहल-कदमी शुरूकर दी। आर्यों के विषय में जानकारी लिखित रूप में सबसे पहले ऋग्वेद में मिलती है और इसकी अनेक बातें ''अवेस्ता'' मे पायी जाती हैं जो ईरानी भाषा का सबसे पुराना ग्रंथ है और इस तरह इन दो अलग-अलग क्षेत्रों की सभ्यताओं की ऐसी समानता कोई आधुनिक घटना नहीं है अपितु हजारो वर्ष पहले से ही ऐसे तत्व हमें समान आचरण में (similar ethics) बांधे हुये हैं और इन्हीं से भारत का निर्माण और विकास होता गया है। इस तरह से भारत के निर्माण की प्रक्रिया में आदिम सभ्यता के बाद तीन महत्वपूर्ण परिवर्तन रेखांकित किये जा सकते है –

· नव पाषाण संस्कृति से बाहर निकलना।

· पहली बार हड़प्पा क्षेत्र में सभ्यता का उदय जिसके तत्व उपमहाद्वीप के अन्य क्षेत्रों में व्यापार, वाणिज्य और आदान-प्रदान की प्रक्रिया के फलस्वरूप पहुंच गये और कमोबेश आधुनिक भारत में भी झलक मार जाते है. जैसे लिंग पूजा, मातृ देवियों की पूजा इत्यादि।

· लोहे की खोज एवं आर्यों का आगमन।

इसके साथ ही इस क्षेत्र में तथाकथित बाहरी तत्वों का आगमन, संस्कृत भाषा, वेशभूषा और जलपान इत्यादि का प्रचलन तेजी से शुरू हुआ जो आज तक जारी है और कैसे इस क्षेत्र में रहने वाले मूल निवासियों ने बड़ी खुशी से इन सब चीजों को अपना लिया जिन्हें उन्होंने अब तक देखा-सुना भी नही था। ऋग्वेद में यह उल्लेख बार-बार मिलता है कि उन्होंने कैसे दस्युओं को पराजित किया और उनके ''पुरों'' का नाश करने के कारण उनका एक राजा पुरंदर कहलाया लेकिन दस्युओं को, जो इस क्षेत्र के रहने वाले आदिवासी लोग थे, को हराने के बाद उन्हें उन क्षेत्रों से एक दम निष्कासित नहीं कर दिया था अपितु उन्हीं के सहयोग से वे गंगाघाटी में टिक कर रहने को लालायित हुये और उन्होंने घूमन्तू और कबीलाई जीवन को शनैः शनैः त्यागना आरम्भ कर दिया। ग्राम आदि की संकल्पनाए इस तथ्य को साबित करती हैं और ऋग्वैदिक युग के बारे में सभी इतिहासकार कम से कम इन तीन तथ्यों से तो कोई मतभेद अब नहीं रखते हैं:

1. अगर आर्यों या आर्य भाषाओं को बोलने वाले समूहों का आगमन इस उपमहाद्वीप में हुआ तो विस्थापन विशाल स्तर पर नहीं हुआ और न ही उनकी विजय के कारण स्थानीय आबादी दूसरी जगहों पर गई।

2. ऋग्वेद में आर्यों द्वारा रचित प्रथम ग्रंथ में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि इस समाज की अपनी प्रारंम्भिक अवस्था के आधार पर प्रमुख कार्य पशुचारण था न कि कृषि पर आधारित जीवन।

3. ऋग्वेद मे जिन कबीलाई जीवन का वर्णन है वह घुमंतू जातियों जैसा नहीं है अपितु अब वे टिककर रहने लगे और उनका पूरा समूह अब विचरण करने की जगह चुनी हुई टुकडि़याँ उर्वर क्षेत्रों की खोज में आगे बढ़ती थी और वे गांवों की संरचना करते हुये परस्पर आगे बढ़ते जाते थे और ये टोलियाँ कहीं रूकी नहीं। इस प्रकार भारत निर्माण की प्रक्रिया बाकायदा स्वरूप लेती गई और उत्तर वैदिक काल तक आते-आते वे इन क्षेत्रों के साथ अपनेपन की भावना (sense of belongingness) स्थापित कर चुके थे। उस स्थान की ऋतुओं के वनस्पतियों एवं नदियों के साथ उन्होंने अपनापन जोड़ना शुरू कर दिया जिससे प्रकारांतर में व्यापक 'आर्यावर्त' की संकल्पना प्रबल होती गई। इस प्रकार 2000 से 1500 ई.पू. के मध्य उन सरोकारों का पैदा होना प्रारम्भ हो गया था जिनसे हम आज भी बंधे हुये हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वैदिक युग में सब कुछ समेटने की भावना प्रधान थी इसीलिए आर्य या तो अपनत्व की भावना से अथवा विस्तार की लालसा से ही सही दूर-दूर के क्षेत्रों को अपने में समेट रहे थे और वर्तमान में ठीक इसके विपरीत स्वरूप जन्म ले रहा है - सिर्फ अपने आस-पास को अपना समझना और थोड़े भी दूर को एक दम पराया घोषित कर देना। इसे ही सजातीय और विजातीय अवधारणा कहते हैं।

मंगलवार, 31 मई 2011

भारत और सहिष्णुता-4 :: भारत निर्माण

clip_image002रक्षा मंत्रालय में कार्यरत जितेन्द्र त्रिवेदी  रंगमंच से भी जुड़े हैं, और कई प्रतिष्ठित, ख्यातिप्राप्त नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन कर चुके हैं। खुद भी नाटक लिखा है। न सिर्फ़ साहित्य की गहरी पैठ है बल्कि समसामयिक घटनाओं पर उनके विचार काफ़ी सारगर्भित होते हैं। वो एक पुस्तक लिख रहे हैं भारतीय संस्कृति और सहिष्णुता पर। हमारे अनुरोध पर वे इस ब्लॉग को आपने आलेख देने को राज़ी हुए। उन्हों लेखों की श्रृंखला हम हर मंगलवार को पेश कर रहे हैं।

जितेन्द्र त्रिवेदी

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clip_image001[4]भारत के निर्माण की प्रक्रिया को जानना इसलिये भी मुझे अत्यन्त आवश्‍यक लगा है कि आज महाराष्ट्र ही नहीं भारत के कई प्रांतो में या खुलकर कहूँ तो सभी प्रांतो में अपने-अपने क्षेत्र के अतीत को अपने-अपने जाति के अतीत को अपने-अपने सम्प्रदाय के अतीत को अपनी-अपनी भाषा के अतीत को, यहाँ तक कि अपने-अपने शहरों के पुराने नामों के अतीत को याद कर अपने आप को एक दूसरे से श्रेष्ठ मानने की होड़ लग गयी है। ये सब लोग अपनी-अपनी प्राचीन संस्कृति और पुराने तत्वों को फिर से जगाने के लिये आवाज उठा रहे हैं, पर समग्रता के जागरण की बात, भारतीयता के जागरण की बात, सहिष्णुता की बात कोई भी नहीं कर रहा है। चाहे आप किसी भी चेहरे को देख लीजिये जो अपने-अपने स्तर पर अपनी-अपनी बपौती -(जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्र, शहर, देहात आदि) की अधिक प्रखरता के लिये तो प्रयासरत हैं। इनमें उनका उतना बड़ा मकसद नहीं है कि वे वास्तव में उनके लिये प्राणपण देना चाहते हैं बल्कि उन्हें तो उसके माध्यम से सिर्फ वोट या अगाध प्रसिद्धि की ही चाह अधिक है। भले ही वे कभी अपने अस्तित्व पर खतरा जानकर ही इनका सहारा ले रहे हों, पर निराशा नहीं तो दुख की बात जरूर है कि ऐसा करने वालों को कोई रोकने की कोशिश और हिम्मत भी नहीं कर रहा।

वास्तव में वे जो बतलाना चाहते हैं वह है समाज, जाति, धर्म, क्षेत्र, संस्कृति का पुराना प्रतिमान कि हम वैसे ही रहें और वैसा रहने में उनको सबसे अधिक फायदा है। ऐसी स्थिति में भारत के निर्माण को समझना निहायत जरूरी है कि यह देश आखिर बना कैसे? किन तत्वों से इसकी रचना हुई है? कितने स्नेह-जल से इसकी धारा की सिंचाई हुई है? हम आज जो भी हैं उसमें हमारी पिछली बातों एवं कार्यो का भरसक योगदान है, पर अब हम उसी कीर्ति के बल पर उन्ही मान्यताओं के बल पर भारत को नही चला सकते। अगर हम इस बात को नहीं समझेगें तो हिन्द मिट जायेगा। उसकी ग्रहणशीलता ही तो उसका ऊर्जा केन्द्र है। संकीर्णता से उसका उत्स (श्रोत) सूख जायेगा। उदारता ने ही हिन्द को पाला पोसा है और उसके ना रहने पर हिन्दुस्तानियत कहाँ रह जायेगी?

अगर आज इस सोच में, जो तेरे-मेरे की बात करती है में, परिवर्तन न लाया गया तो स्वभवतः वे सारी की सारी विषमताएं भी पुनः सिर उठाएंगी ही, जिसमें अतीत में हमने अपने ही भाईयों पर सामाजिक अन्याय किया था। निम्न वर्णों पर विशेषतः शूद्रों और चण्डालों पर जिस तरह से अपात्रताएं थोपी गईं थीं, उन्‍हें आज के विचार में पुलर्व्याख्यायित करने की आवश्‍यकता है कि इन शक्तियों को पहचानने में हमें कोई भूल नहीं करनी चाहिये कि ''तेरे-मेरे’’ की अवधारणा व्यक्ति को कहां से कहां ले जा सकती है। तमिल कवि सुब्रहमण्‍यम भारती ने अपनी सुन्दर कविता में लिखा है- ''मैं और तू कहने से ओठ नहीं जुड़ते, पर हम कहने से तो जुड़ जाते हैं।''

प्राचीन मध्य और उसके बाद के काल की बहुत सी रूढ़ियां समकालीन भारत में भी हमारा पीछा करती हुई आ गई हैं। पुराने लोकाचार, मान्यताएं, सामाजिक रूढ़ियां और दकियानूसीपन और सैकड़ों कर्मकांडों की विधियां हमारे मन में इतनी गहराई तक पैठ गई है कि आज भी हम आसानी से इनसे छुटकारा नहीं पा रहे और बेवश होकर संकीर्णता के दावानल में गिर पड़े हैं। दुर्भाग्यवश ये पुराने दुराग्रह ही हमें आज भी उकसा रहे हैं और व्यक्ति, समाज, राष्ट्र के विकास में आड़े आ-आकर हमारी समग्र भारतीय की सोच को बनने में अवरोध उत्पन्न कर रहे हैं। इस तरह की बातों को पहले तो खासकर ब्रिटिश राज में और उसके बाद वोट बैंक की राजनीति में हमारे ही कर्णधारों ने, जिनको हमने देश की बागडोर थमा दी थी, हमारे भोलेपन का खूब फायदा उठाया और तत्कालीन परिस्थितियों में कभी गरीबी के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर, कभी दलित के नाम पर जान-बूझ कर बढ़ावा दिया गया। सिर्फ अपने क्षुद्र स्वार्थो की पूर्ति हेतु क्षणिक पदों को हथियाने की जोड़-तोड़ में घृणा को एक सिरे से दूसरे सिरे तक बढ़ा दिया और जब हम आज भ्रमित खडे़ है तो वे लोग मना कर रहे है कि हमने राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के लिये लड़ने को कभी नही कहा था। वे यह भी कह सकते हैं कि गरीबी भगाओ और दलित बढ़ाओं का नारा हमने तो दिया ही नही था और ''तुष्‍टीकरण’’ की राजनीति क्या होती है यह तो हमें आज तक पता ही नहीं है। वे चाहे जो कह सकते हैं और चाहे जो भी कहें, हमारे इस विश्‍लेषण का लुब्बो-लुबाव यहीं रहने वाला है कि जो उन्होंने कहा या हमने गलत समझ लिया था, अथवा जो भी है, हो चुका है, दंगे हो चुके है, खून बह चुका है, दूरियां वे बढ़ाना चाहते थे और अब दूरियां बेपनाह आ चुकी हैं। वे हममें घृणा भरना चाहते थे और अब हम सब एक दूसरे को इस कदर भी बर्दाश्‍त नहीं कर रहे कि अपने ही देश के आदमी के पास बैठना नहीं चाहते और एक राज्य का आदमी हमें दूसरे राज्य में नागवार मालूम गुजरने लगा है। तो अब हम क्या जीना छोड़ दे और मर जायें? या ऐसे ही जिएं और रोज लड़ें?

जातिवाद, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद हमारे देश के जनतांत्रिक रास्ते से एकता कायम रखते हुये आगे बढ़ने में बाधा डाल रहे है। जातीय व्यवधान और क्षेत्रीय अवरोध पढे़-लिखे लोगों, राजनेताओं और सरकारी पदों में ऊपर बैठे लोगों के मन में भी असहिष्णुता पैदा कर रही है। साथ-साथ रहने और समेकित संस्कृति के लक्षण को और सबसे अधिक शारीरिक श्रम और व्यक्तिगत प्रयासों की प्रतिष्ठा को स्थापित होने देने में व्यवधान पैदा कर रही हैं। आज के 21वीं सदी के दौर में भी हमें अपने सामान्य हित में, लोकहित में एक नहीं होने दे रही हैं। दलितों को, महिलाओं को, बच्चों को नागरिक अधिकार भले ही मिल गये हों लेकिन वे अपने कर्तव्यों को समझने में अभी भी लापरवाही कर रहे हैं। भारत के निर्माण के अध्ययन की विवेचना में हम तह में बैठकर पता लगा सकेंगे कि इन दुराग्रहों की जडे़ कहां हैं। हम साथ-साथ मिलकर उन कारणों को ढूंढ निकालने की कोशिश कर रहे हैं जिन पर सब प्रकार की असहिष्णुता टिकी हुई है और संकीर्णता को दिनानुदिन बढ़ावा मिल रहा है। अतः भारत के निर्माण की प्रक्रिया का विश्‍लेषण केवल मेरे लिये ही प्रासंगिक नहीं है, जो यह जानना चाहता है कि इस असहिष्णुता की वजहें क्या हैं और सहिष्णुता का सही स्वरूप क्या है बल्कि उन लोगों के लिये भी प्रासंगिक है जो देश की प्रगति में बाधा डालने वाले तत्वों को पहचानना चाहते है।