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शनिवार, 13 नवंबर 2010

उगो हो सुरुज देव अर्घ के बेर…

उगो हो सुरुज देव अर्घ के बेर…

करण समस्तीपुरी

023हाथों में अर्घ्य, सजल नयन में प्रतीक्षा, जल में ध्यानस्थ व्रती महिलायें, तट पर पथ निहारते अंशुमान का श्रद्धालु। पूर्व क्षितिज में उदित हुए रक्ताभ दिनकर। बांस के हरे सूपों पर गिरी अरुणिमा। व्रतियों का मन हुआ प्रसन्न। सूर्यदेव ने स्वीकार किया आराधना। पूर्ण हुआ छ्ठ महाव्रत। मिला छ्ट्ठी मैय्या का आशीष। शीष धर घर लाया माई का प्रसाद।

उदर ज्वाला में दग्ध दूर मातृभूमि से…. जननि जन्मभूमि से। छट्ठी मैय्या के आशीश से भी वंचित। विगत कुछ वर्षों से अभिलाषा थी संचित। जायेंगे घर । बुहारेंगे छट्ठी मैय्या का दर। करेंगे उनकी वन्दना और सूर्योपासना।

101जली बत्तियां बहुत सारी। कार्तिक अमावस की रात हुई उजियारीग। आरम्भ हुआ पुण्य मास का उज्ज्वल पक्ष। प्रवास से प्रयाण। घर आने का उत्साह। परिजनों से मिलने की ललक। वर्षों से आंखें बिछाई पगडण्डियां चूमेगी कदम। फिर सजे चौपाल पर बैठेंगे हम। बाल-सखाओं से होगी बतकही। फिर याद आयेगा पुराना ठाठ। फिर सब मिल सजायेंगे छ्ट्ठी मैय्या का घाट।

यही परिमल अरमान संजोये हम आये अपने गांव। अपने घर – रेवाड़ी, जिसे हम अपनी कहानियों में प्यार से कहते आये हैं रेवाखण्ड। सुना था बिहार में विकास की चतुरन्गिनि बयार बह रही है। देखा भी। बीसियों वर्ष से जिर्णोद्धार की बाट जोह रही सड़कें कोलतार से सपाट कर दी गयी थी, जिस पर मोटरयान को सरपट भागते देख सहसा ख्याल आया, “काश… ! यह सड़क कुछ साल पहले बन जाती तो हमारी सायकिल इतनी खराब नही हुआ करती और समय पर महाविद्यालय की कक्षायें भी पकड़ पाता।

सड़क दुरुस्त हो गयी थी। बिजली भी पहले से कुछ ज्यादा ही रहती है।  कहां कब क्या हो जाये… कभी इस से आशंकित समाज भी अब के भयमुक्त था…. किन्तु क्या यही विकास का मानक है ? मेरे अधिकांश सहपाठी और ग्रामसखा अभी भी बेरोजगार हैं। मेरा विद्यालय – भवन भी जिर्ण-शीर्ण हो चुका है ? शिक्षकों का टोटा भी है। थोड़ा दुख हुआ था।

सुबह मेरे चिर-सखाओं को मेरे आने की खबर लग गयी थी। मुलाकात का सिलसिला शुरु हुआ तो कुछ सुध न रहा । आहार छूटा मगर विहार का सुख अनवरत रहा। तलाब के किनारे का विशाल वट-वृक्ष तो कब का धाराशायई हो गया था। अब के पोखर का पानी भी अनावृष्टि की भेंट चढ चुका था। जिसकी गंभीर जल-राशि में हम कभी कलरव-किलोल करते थे, इस बार खुद ही पानी मांग रह था। उफ़…. पीड़ की सिहरन… !

107चौपाल मौन। कहां सजेगा छठ का घाट ? उत्साही युवक का प्रश्न, “अगर हमारे घरों में कोई विधवा हो जाये तो क्या हमें उसका परित्याग कर देना चाहिये ?” “नहीं”, आधुनिक सभ्य युग का समवेत उत्तर। मिल गया समाधान। अब छ्ट्ठी मैय्या का घाट यहीं सजेगा। यह तालाब हमेशा हमें पानी देता रहा है। इस बार यह सूख गया तो क्या ? हम देंगे इस में पानी। यहीं बनेगा छठ का घाट। शुरु हुआ सफ़ाई अभियान। फिर पम्पिंग्सेट से पोखर में जलभराई। दो दिनों में ही कमर तक जल चढ चुका था।

001गांव के अल्हड़्पन का कोई सानी नहीं। बाथटब की आदी आबादी जब पोखर में डुबकी लगाते बालवृन्द को देखेंगे तो कहीं चक्कर ना खा जायें। मैं भी मस्ती का कोई मौका नही छोड़्ता। सुना था, “यथा नामं तथा गुणं” ! मै ने भी इसे चरितार्थ करने की कोशिश की।  जल-विहार करने गये किशोरों का पट-परिधान ही उठा लिया… ! हा…हा…हा…. !

हरित कदलीस्तम्भों के लग जाने से माई का घाट एकदम निखर गया था। उस में बांस की फट्ठियों को भेद कर दीप-श्रृंखला सजाने का जुगार लगाया गया।  सान्झ से ही झिलमिलाने लगी थी दीपमालिकायें। सन्ध्याकालीन अर्घ्य दे कर किया गया अस्ताचल गामी सूर्य को नमन। व्रत का एक विश्राम।

IMG0479Aगांव का अद्वितीय साम्प्रदायिक सौहार्द्र। गंगा-यमुनी साझा संस्कृति। लोक अस्था के आड़े कभी नहीं आयी मत और सम्प्रदाय की रेखा। हिन्दु भाई उठाते रहे हैं मुहर्रम का ताजिया और मुसलमान भाई लगाते रहे हैं होली के रंग। इस बार भी सलीम खान और महबूब मियां के परिवार ने घाट पर सूप भिजवाया था और अर्घ्य अर्पण की प्रतीक्षा में हमारे साथ ही थे।

उफ़… सांस्कृतिक विरासत के धनी रहे गांव में छ्ठ की रात सूनी ही गयी। हम लोग जिस घाट पर छ्ठ की रात में ऐतिहासिक या धार्मिक नाटक का मंचन करते थे, वहां इस बार फिल्मी गीतों के कानफोड़ू धुन से ही सन्तोष करना पड़ा। गुरुजी कह रहे थे कि अब यह गांव भी सांस्कृतिक रूप से अपाहिज हो गया।

015आंखों में बीती रात। इस से पह्ले कि आये प्रभात…. निकल चुके थे माता के कहारे ! एक बार फिर घाट पर पसर चुके थे नैवेद्य से भरे बांस के सूप। व्रती महिलायें जल में कर जोड़े कर रही हैं दिनकर की प्रतीक्षा। दिनमान के आगमन की आहट। अर्घ्य लिये दोनो हाथ उठ गये! भगवान भाष्कर ने कर लिया अर्घ्य ग्रहण। इस तरह पूर्ण हुआ छट्ठी मैय्या की अराधना और सूर्यदेवता का व्रत! 

 

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शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

डूबते सूरज को नमस्कार !

193मनोज कुमार - करण समस्तीपुरी

नमस्कार मित्रों!

अभी-अभी लौटे हैं छठ घाट से। भगवान भाष्कर का संध्या पूजन कर।

114आज तो दिन भर चहल पहल रही। हालाकि इन्द्र देवता नाराज़ थे इस बार सो पोखर में पर्याप्त जल नहीं था और जो भी बचा था वह हानिकारक जीव जंतुओं का आश्रयस्थल ही था। पर गांववासियों के हौसले की दाद देनी होगी, जो था उसकी साफ़ सफ़ाई की गई और फिर पास के जलस्रोंतों से यांत्रिक सहायता के द्वारा जलभरकर पोखर को छठ पूजन योग्य बनाया गया।

129फिर शाम तक घाट पर चौकी आदि डाल कर साज-सजाई का काम करण समस्तीपुरी के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ।

127हां बीच-नीच में हास-परिहास की उत्सव लीला के दृश्य भी हमने कैमरे में कैद कर लिये ।

अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि इस बार हम आपने गांव रेवाड़ी में हैं। छठ पूजा मनाने। करण भी साथ में है। हम अभी-अभी घाट से लौटे हैं और ताज़ा-ताज़ा तस्वीर आपको समर्पित कर रहे हैं।

बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में महापर्व के नाम से प्रसिद्ध “छठ पर्व” श्रद्धा, विश्वास एवं आस्था के साथ मनाया जाता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि छठ से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। वैसे तो कहावत है कि लोग उगते सूर्य की पूजा करते हैं, किन्तु इस पर्व में अस्त एवं उदय होते हुए दोनों रूपों में भगवान भास्कर की पूजा-अर्चना की जाती है। आज हम अस्ताचल सूर्य की पूजा कर घाट से लौटे हैं। गांव में तो पोखर ही है। और उत्साह की कोई कमी नहीं।

097छठ का महापर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरु हो जाता है। चतुर्थी को छठ पूजा करने वाले छठव्रती, नहाए-खाय करते हैं। फिर पंचमी को खरना, जिसमें शाम के समय छठव्रती इष्टदेव की पूजा कर भोग आदि लगाते हैं।

169षष्ठी यानी आज, डूबते हुए सूर्य को तालाब, पोखर या नदी में खड़े होकर अर्घ्य देकर विशेष प्रकार के प्रसाद ठेकुआ, खजुर, फल, आदि जिसमें गन्ने, नारियल आदि का विशेष महत्व है, चढ़ाया जाता है।

सप्तमी, यानी कल उगते सूर्य को अर्घ्य, नैवेद्य से पूजा की जाएगी। जिसे स्थानीय भाषा में हाथ उठाना कहते हैं। हाथों में नैवेद्य, नयनो में प्रतीक्षा, "उगा हो सुरुज देव अरघ के' बेर...." और मन में अनुनय "ले हो अरघ हमार हे छट्ठी मैय्या...!" इस व्रत का समापन सप्तमी को होता है।

चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व के प्रति श्रद्धालुओं में श्रद्धा के साथ उमंग व्याप्त रहता है। इस पर्व की एक और विशेषता जो क़ाबिले तारीफ़ है, वह है साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाना। कई जगह तो पूरा-का-पूरा शहर ही विशेष अभियान द्वारा साफ-सुथरा कर दिया जाता है। अन्यथा तालाब, पोखर या नदी के उन स्थलों की तो पूरी सफाई की ही जाती है जहां पर्व मनाने श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। हमारा गांव भी आज चकाचक है!

माहात्म्य ....

महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार, जुए में सब कुछ गंवा कर पांडव जब बनवास में थे, तभी दुर्योधन प्रेरित महर्षि दुर्वाषा पहुँच गए, पांडवों के पर्ण कुटीर। "अतिथिदेवो भवः !" परन्तु वनवासी याचक पांडव आतिथ्य धर्म का निर्वाह करें तो कैसे घर में अन्न का केवल एक दाना और अठासी ब्रह्मण। धर्मसंकट। द्वार पर आये ब्राह्मण और असहाय पतियों को देख द्रौपदी ने भगवन कृष्ण को याद किया और भक्तवत्सल गोपाल के अनुग्रह से ब्रह्मणों का परितोष रखने में सफल रही। द्रौपदी की सेवा-निष्ठा से प्रसन्न महर्षि दुर्वाषा ने आशीष के साथ 'कार्तिक शुक्ल षष्ठी' को भगवान् भाष्कर का व्रत करने की सलाह दिया।

द्रौपदी ने वन में ही उक्त तिथि को सूर्योपासना किया और छट्ठी मैय्या के प्रताप से एक वर्ष सफल अज्ञातवासोपरांत पांडवों को महाभारत युद्ध में विजय और खोया राज-पाट ऐश्वर्या व यश प्राप्त हुआ। तो ऐसी है भगवान् भुवन भाष्कर की महिमा और छठ महापर्व का महातम्य !!!

बोलो छट्ठी मैय्या की जय !!!

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आगे मैय्या का डालावाहक और पीछे छ्ट्ठी मैय्या का गीत गाते हुए श्रद्धालु महिलायें घर को वापस होती हैं और आज के व्रत को मिलता है विराम । आप गीत का आनन्द लीजियए । हम कल फिर मिलेंगे । जय छट्ठी मैय्या ।

: गीत :

"केलबा के पात पर उगेलन सुरुज देव झांके झुके ...

हे करेलू छठ बरतिया से झांके झुके... !

हम तोह से पूछीं बरतिया हे बरतिया से किनका लागी... ?

हम तोह से पूछीं बरतिया हे बरतिया से किनका लागी... ?

हे करेलू छठ बरतिया से किनका लागी .... ?

हमरो जे स्वामी तोहरे ऐसन स्वामी से हुनके लागी...

हे करेलू छठ बरतिया से हुनके लागी.... !!"

व्रती इस गीत में आगे बताती हैं कि वो छठ का महाव्रत अपने पति, पुत्र, घर एवं परिवार के लिए करती है इस प्रकार यह मान्यता पुष्ट हो जाती है कि छठ महाव्रत के प्रसाद से धन, वैभव, संतान मान, यश और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

लोक आस्था का महापर्व छठ

--- मनोज कुमार
बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में महापर्व के नाम से प्रसिद्ध “छठ पर्व” श्रद्धा, विश्वास एवं आस्था के साथ मनाया जाता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि छठ से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। वैसे तो कहावत है कि लोग उगते सूर्य की पूजा करते हैं, किन्तु इस पर्व में अस्त एवं उदय होते हुए दोनों रूपों में भगवान भास्कर की पूजा-अर्चना की जाती है। छठ का महापर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरु हो जाता है।
चतुर्थी को छठ पूजा करने वाले छठव्रती, नहाए-खाय करते हैं। फिर पंचमी को खरना, जिसमें शाम के समय छठव्रती इष्टदेव की पूजा कर भोग आदि लगाते हैं। षष्ठी को डूबते हुए सूर्य को तालाब, पोखर या नदी में खड़े होकर अर्घ्य देकर विशेष प्रकार के प्रसाद ठेकुआ, खजुर, फल, आदि जिसमें गन्ने, नारियल आदि का विशेष महत्व है, चढ़ाया जाता है। सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्य, नैवेद्य से पूजा की जाती है जिसे स्थानीय भाषा में हाथ उठाना कहते हैं। हाथों में नैवेद्य, नयनो में प्रतीक्षा, "उगा हो सुरुज देव अरघ के'र बेर...." और मन में अनुनय "ले हो न अरघ हमार हे छट्ठी मैय्या...!" इस व्रत का समापन सप्तमी को होता है।
चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व के प्रति श्रद्धालुओं में श्रद्धा के साथ उमंग व्याप्त रहता है। इस पर्व की एक और विशेषता जो क़ाबिले तारीफ़ है, वह है साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाना। कई जगह तो पूरा-का-पूरा शहर ही विशेष अभियान द्वारा साफ-सुथरा कर दिया जाता है। अन्यथा तालाब, पोखर या नदी के उन स्थलों की तो पूरी सफाई की ही जाती है जहां पर्व मनाने श्रद्धालु एकत्रित होते हैं।
छठ पर्व के अवसर पर मंगल गीत गाने का प्रचलन है। इन लोकगीतों की मिठास और संवेदना से इस पर्व की छटा और निखर जाती है। एक छठगीत आपके लिए प्रस्तुत
"केलबा के पात पर उगेलन सुरुजदेव झांके झुके ...


हे करेलू छठ बरतिया से झांके झुके... !


हम तोह से पूछीं बरतिया हे बरतिया से किनका लागी... ?


हम तोह से पूछीं बरतिया हे बरतिया से किनका लागी... ?


हे करेलू छठ बरतिया से किनका लागी .... ?


हमरो जे स्वामी तोहरे ऐसन स्वामी से हुनके लागी...


हे करेलू छठ बरतिया से हुनके लागी.... !!"


व्रती इस गीत में आगे बताती हैं कि वो छठ का महाव्रत अपने पति, पुत्र, घर एवं परिवार के लिए करती हैइस प्रकार यह मान्यता पुष्ट हो जाती है कि छठ महाव्रत के प्रसाद से धन, वैभव, संतान मान, यश और मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार, जुए में सभ कुछ गंवा कर पांडव जब बनवास में थे, तभी दुर्योधन प्रेरित महर्षि दुर्वाषा पहुँच गए, पांडवों के पर्ण कुटीर। "अतिथिदेवो भवः !" परन्तु वनवासी याचक पांडव आतिथ्य धर्म का निर्वाह करें तो कैसे घर में अन्न का केवल के दाना और अठासी ब्रह्मन। धर्मसंकट। द्वार पर आये ब्रह्मन और असहाय पतियों को देख द्रौपदी ने भगवन कृष्ण को याद किया और भक्तवत्सल गोपाल के अनुग्रह से ब्रह्मणों का परितोष रखने में सफल रही। द्रौपदी की सेवा-निष्ठा से प्रसन्न महर्षि दुर्वाषा ने आशीष के साथ 'कार्तिक शुक्ल षष्ठी' को भगवान् भाष्कर का व्रत करने की सलाह दिया। द्रौपदी ने वन में ही उक्त तिथि को सूर्योपासना किया और छट्ठी मैय्या के प्रताप से एक वर्ष सफल अज्ञातवासोपरांत पांडवों को महाभारत युद्ध में विजय और खोया राज-पाट ऐश्वर्या व यश प्राप्त हुआ। तो ऐसी है भगवान् भुवन भाष्कर की महिमा और छठ महापर्व का महातम्य !!! बोलो छट्ठी मैय्या की जय !!!