कई पुस्तकें महीनों पड़ी रह जाती हैं। पढ़ने का समय ही नहीं मिलता। बिना पढ़े कुछ लिखने की प्रेरणा ही नहीं मिलती। कहीं मैंने पढ़ा था कि 10 पेज लिखने के लिए 1000 पेज पढ़ना चाहिए। सच भी है। अच्छा साहित्य दिल-दिमाग दोनों पर प्रभाव छोड़ता है। यह हमारे आचार-विचार दोनों को प्रभावित करता है।
पढ़ने के क्रम में मैं पाता हूँ कि साहित्य जगत में एक ही विषय पर कई तरह के विचार होते हैं। हर रचना में उसके रचनाकार का अपना दृष्टिकोण होता है। अब सबका दृष्टिकोण एक समान तो हो नहीं सकता। कई बार जो मान्य दृष्टिकोण बन गया है, उसमें भी बीतते समय के साथ बदलाव संभव है। इस परिवर्तित होते दृष्टिकोण के कारण विवाद होता है, तर्क-वितर्क होता है। यह भी एक स्वस्थ परंपरा है। इन बहसों से शायद अंतिम मूल्य-निर्धारण न हो, पर उस दिशा में कुछ क़दम तो बढ़ ही जाता है। अपनी-अपनी रचनाधर्मिता के प्रति प्रतिबद्धता का निर्बाह हर कोई करता है।
जब हम किसी रचना के सृजन में रत होते हैं तो कई ऐसे तत्व होते हैं जो हमारी सृजन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, कई तो उनके जन्म का कारण ही होते हैं। जैसे हमारा अध्ययन, हमारा अनुभव, हमारे आस पास का वातावरण (सामाजिक, रातनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, आदि), हमारे संपर्क क्षेत्र, हमारे ईर्द-गिर्द के कुछ ज्वलंत प्रश्न या समस्यायें जिनसे हम रू-ब-रू हो रहे होते हैं। ये सब हमें झकझोड़ते हैं, उद्वेलित करते हैं। फिर हमारा एक दृष्टिकोण बनता है। हम लिखते हैं। रचते हैं। अब ये कारक सबके लिए एक समान हो, ज़रूरी तो नहीं। अलग-अलग भी हो सकते हैं। तो कई बार दृष्टिकोण भी मेल नहीं खाता।
हर किसी के जीवन में कुछ न कुछ प्रेरक शक्तियां होती हैं। कुछ के लिए माता-पिता, तो कुछ के लिए गुरु। वहीं किसी के लिए हालात तो दूसरे के लिए अग्रज। कहीं न कहीं से प्रेरणा तो मिल ही जाती है। फिर जीवन में कई वास्तविकताओं से भी पाला पड़ता है। अपने अच्छे-बुरे अनुभवों से भी हम बहुत कुछ सीखते हैं। जीवन में आगे बढ़ते हैं। इस बीच हम कल्पना का अपना एक संसार भी बनाते रहते हैं। कई बार, वास्तविकता एवं कल्पना दोनों मिलकर, कुछ सृजन के कारक बन जाते हैं। सिर्फ प्रेरणा से सृजन नहीं होता। सृजन के लिए प्रयास तो स्वयं करना पड़ता है। सृजन के लिए एक संतुलित दृष्टि भी आवश्यक है। बहुधा आधुनिक समाज की अतिशय संवेदनशीलता में थोड़ी सी भी नादानी कई भारी भूल बन जाती है।
मैं प्रयास करता हूँ कि मैं जो भी रचता हूँ लोगों को यह लगे कि हमने दिल से लिखा है। और यह सिर्फ मेरे साथ होता हो, ऐसा नहीं है। मुझे तो हर किसी की हर रचना दिल से लिखी लगती है। लगता है जैसे यह उनकी वर्षों की साधना है, जीवन भर का तप है।
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