विचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

दिल से लिखी गई रचना

-- मनोज कुमार
हम जैसे मध्यमवर्गीय परिवार में जीने वालों को और खासकर जिनका साहित्य से लगाव हो, विभिन्न प्रकार की समस्यायों का सामना करना पड़ता है। हम कई चीज़ों से तालमेल बिठाते हुए लेखन कार्य कर पाते हैं। दफ़्तर का कामकाज, उसका दवाब तो रहता ही है। सृजन करने की आकांक्षा में कई सोच-विचार भी मन में साथ-साथ चलते रहते है। पत्नी, बच्चे, घर की जिम्मेदारियां, इन सबसे लड़ते-उबरते जो समय बच पाता है, उसमें उतना लिख पाना संभव नहीं होता, जितना मन करता है। लिखने के लिए जो शांति चाहिए, जितना धैर्य चाहिए, उसे बटोरने में ही आधी ऊर्जा निकल जाती है। फलस्वरूप अंदर की छटपटाहट और बढ़ जाती है। हो सकता है घर के लोग हमारी इन आदतों से तालमेल बिठा चुके हों, पर अपनी तो लड़ाई ज़ारी ही रहती है, शायद अपने भीतर को तत्वों से।

कई पुस्तकें महीनों पड़ी रह जाती हैं। पढ़ने का समय ही नहीं मिलता। बिना पढ़े कुछ लिखने की प्रेरणा ही नहीं मिलती। कहीं मैंने पढ़ा था कि 10 पेज लिखने के लिए 1000 पेज पढ़ना चाहिए। सच भी है। अच्छा साहित्य दिल-दिमाग दोनों पर प्रभाव छोड़ता है। यह हमारे आचार-विचार दोनों को प्रभावित करता है।

पढ़ने के क्रम में मैं पाता हूँ कि साहित्य जगत में एक ही विषय पर कई तरह के विचार होते हैं। हर रचना में उसके रचनाकार का अपना दृष्टिकोण होता है। अब सबका दृष्टिकोण एक समान तो हो नहीं सकता। कई बार जो मान्य दृष्टिकोण बन गया है, उसमें भी बीतते समय के साथ बदलाव संभव है। इस परिवर्तित होते दृष्टिकोण के कारण विवाद होता है, तर्क-वितर्क होता है। यह भी एक स्वस्थ परंपरा है। इन बहसों से शायद अंतिम मूल्य-निर्धारण न हो, पर उस दिशा में कुछ क़दम तो बढ़ ही जाता है। अपनी-अपनी रचनाधर्मिता के प्रति प्रतिबद्धता का निर्बाह हर कोई करता है।

जब हम किसी रचना के सृजन में रत होते हैं तो कई ऐसे तत्व होते हैं जो हमारी सृजन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, कई तो उनके जन्म का कारण ही होते हैं। जैसे हमारा अध्ययन, हमारा अनुभव, हमारे आस पास का वातावरण (सामाजिक, रातनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, आदि), हमारे संपर्क क्षेत्र, हमारे ईर्द-गिर्द के कुछ ज्वलंत प्रश्न या समस्यायें जिनसे हम रू-ब-रू हो रहे होते हैं। ये सब हमें झकझोड़ते हैं, उद्वेलित करते हैं। फिर हमारा एक दृष्टिकोण बनता है। हम लिखते हैं। रचते हैं। अब ये कारक सबके लिए एक समान हो, ज़रूरी तो नहीं। अलग-अलग भी हो सकते हैं। तो कई बार दृष्टिकोण भी मेल नहीं खाता।

हर किसी के जीवन में कुछ न कुछ प्रेरक शक्तियां होती हैं। कुछ के लिए माता-पिता, तो कुछ के लिए गुरु। वहीं किसी के लिए हालात तो दूसरे के लिए अग्रज। कहीं न कहीं से प्रेरणा तो मिल ही जाती है। फिर जीवन में कई वास्तविकताओं से भी पाला पड़ता है। अपने अच्छे-बुरे अनुभवों से भी हम बहुत कुछ सीखते हैं। जीवन में आगे बढ़ते हैं। इस बीच हम कल्पना का अपना एक संसार भी बनाते रहते हैं। कई बार, वास्तविकता एवं कल्पना दोनों मिलकर, कुछ सृजन के कारक बन जाते हैं। सिर्फ प्रेरणा से सृजन नहीं होता। सृजन के लिए प्रयास तो स्वयं करना पड़ता है। सृजन के लिए एक संतुलित दृष्टि भी आवश्यक है। बहुधा आधुनिक समाज की अतिशय संवेदनशीलता में थोड़ी सी भी नादानी कई भारी भूल बन जाती है।

मैं प्रयास करता हूँ कि मैं जो भी रचता हूँ लोगों को यह लगे कि हमने दिल से लिखा है। और यह सिर्फ मेरे साथ होता हो, ऐसा नहीं है। मुझे तो हर किसी की हर रचना दिल से लिखी लगती है। लगता है जैसे यह उनकी वर्षों की साधना है, जीवन भर का तप है।
*** *** ***

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

गुरु की महत्ता

---मनोज कुमार

"गुरुतर महत्ता का प्रतीयमान 'गुरु' शब्द स्वयं में ही अलौकिक श्रद्धा का प्रतीक है । विश्वगुरु भारत की समृद्ध गुरु-शिष्य परम्परा पर समय समय आर अपसंस्कृति की धूल जमने का प्रयास करती रही है किंतु इसकी शाश्वत उज्ज्वलता आज भी विद्यमान है। अब तो गुरु-वंदना में अखिल विश्व भारत का अनुसरण कर रहा है। मासपूर्व भारत ने शिक्षक दिवस मनाया तो आज, ५ अक्टूबर को 'विश्व शिक्षक दिवस' है। जो अखंड ब्रह्माण्ड रूप में चर और अचर सब में व्याप्त है, जो ब्रह्मा, विष्णु और देवाधि देव महेश हैं, उन्हें हमरा सत सत नमन ! "

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पांव़।
बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो मिलाये।।
संत कबीर दास की ये पंक्तियां हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति में गुरु के महत्व को अभिव्यक्त करती हैं।
देश के दूसरे राट्रपति डॉ एस राधाकृष्णन के जन्म दिन 5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। सन् 1994 से यूनेस्को द्वारा 5 अक्तूबर को विश्व शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
किसी भी राष्ट्र के शिक्षा और विकास में शिक्षकों के अमूल्य योगदान को जताने का आज सुअवसर है। भविष्य की पीढ़ियों के लिए शिक्षक की ज़रूरत को समझा और समझाया जा सके विश्व शिक्षक दिवस का यही मकसद है। आज दुनिया भर के 108 से अधिक देश विश्व शिक्षक दिवस मनाते हैं।
आज सारे संसार में तरह-तरह के बदलाव आ रहे हैं। हर तरफ परिवर्तन की आंधी है। ऐसे समय में शिक्षकों के समक्ष चुनौतियां और बढ़ गई है। आज शिक्षक का काम किसी विद्यार्थी को केवल विषय में निपुण बनाना भर नहीं रह गया है बल्कि देश और दुनिया के जिम्मेदार नगरिक भी बनाना है।

हमारे देश में जहां एक ओर शिष्यों के गुरु की प्रति निष्ठा और समर्पण की भावना में ह्रस हुआ है वहीं दूसरी ओर शिक्षकों की गुणवत्ता में कमी आई है। आज हमें प्रशिक्षित ही नहीं बल्कि शिक्षा के प्रति समर्पित शिक्षकों की बहुत ही अधिक आवश्यकता है। हमें ऐसे शिक्षक चाहिए जो भारतीय संस्कृति के अनुरुप शिक्षक की परिभाषा को सही साबित करते हुए देश को विकास के पथ पर आगे ले जा सकें।