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शुक्रवार, 1 मई 2026

सूफ़ीमत ...5. सूफ़ीमत का उदय-2

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम

5. सूफ़ीमत का उदय-2

5.3 पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’

('सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम' का अर्थ है: "अल्लाह की रहमत और सलामती हो उन पर।" यह वाक्यांश पैगम्बर मोहम्मद का नाम लेने के बाद सम्मान में कहा जाता है।)

पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ ख़ुदा के पैग़ंबर दीन-ए-इस्‍लाम के नबी और रसूल माने जाते हैं। रसूल का अर्थ होता है ईश्वर का दूत या संदेशवाहकरसूल को ईश्वर ने मानव जाति के लिए अपना दूत (प्रेषित) बनाकर भेजा, ताकि वह ईश्वर के आदेशों, जिसे शरीअत (दैवी विधान) कहा जाता है, को स्थापित करे और समस्त मानव-जगत का दिशा निर्देशन करे। शरीअत का आधार पैग़म्बर का पवित्र जीवन, उनके अह्लेबैत (परिवारजन) और क़ुरआन है। इस्लामी मान्यता के अनुसार हर देश और हर काल में युग-पुरुष आकर इंसान को दुनिया में रहने का तरीक़ा बताते रहे हैं। ख़ुदा का संदेश लाने वालों को पैग़म्बर कह कर पुकारा गया है। क़ुरआन शरीफ़ में भी कहा गया है

वमा मुहम्मदुन इल्ला रसूल कदखलत मिन्‌कब्लेहिर्रोसोलो

अर्थात्‌ ख़ुदा का पैगाम लाने वाले दुनिया में लगातार आते रहे हैं, हज़रत मुहम्मद ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ उनमें से एक हैं। रिसालात (रसूल का बहुवचन) को इस्लाम में मौलिक स्थिति प्राप्त है। रसूल का चुनाव अल्लाह अपनी पसंद से करते हैं, जिसे इस्तफ़ा (अनेक वस्तुओं में से सर्वश्रेष्ठ का चुनाव) कहा जाता है। आदम से लेकर हज़रत मुहम्मद साहब तक एक लाख चौबीस हज़ार पैग़म्बर की संख्या बताई गई है। पृथ्वी पर जितने प्रेषित आये उनमें से सिर्फ 25 प्रेषितों के नाम क़ुरआन में लिए है जैसे के – आदम! जिनकी हम सब संतान है, तो हम अपने-आपको आदमी कहते है, इसी तरह नूह, या जिसको नोहा कहते है, इब्राहीम (अब्राहम), मूसा (मोसेस), ईसा (यशु) और प्रेषित मोहम्मद इन सबको भेजे थे उनके साथ कुछ ग्रंथ भेजे और क़ुरआन ने 3 ग्रंथो के नाम अपने अलावा अर्थात कुल 4 तौरात (धर्म-पुस्तक, अल्लाह की वाणी), या ग्रंथों के नाम लिए है, ये है

1.   तौरेत (तौरह) – यह ग्रंथ प्रेषित मूसा (अलैहि सलाम) पर अवतरण हुआ था

2.  ज़बूर – यह ग्रंथ प्रेषित दाऊद (अलैहिस्सलाम) पर अवतरण हुआ था जिन्हें डेविड कहते है, दाऊद अलैहिस्सलाम पैगंबर तालूत की सेना में एक सैनिक थे, जिन को अल्लाह ने राज्य देने के साथ नबी भी बनाया। उन्हीं के पुत्र सुलैमान अलैहिस्सलाम थे। दाऊद अलैहिस्सलाम को अल्लाह ने धर्म पुस्तक ज़बूर प्रदान की। हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम का जीवन साहस, अल्लाह पर अटूट विश्वास, और न्याय का एक महान उदाहरण है।

3.  इंजील (बाइबिल) – प्रेषित ईसा मसी (अलैहिस्सलाम) पर अवतरित हुआ था,

4.  क़ुरआन – ये ग्रंथ ईश्वर के अंतिम प्रेषित मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर इसका अवतरण हुआ था इसका एक नाम फुरकान भी है, अर्थात कसौटी (Criteria, "सत्य और असत्य के बीच अंतर करने वाला"), फर्क करने वाली किताब, अर्थात अच्छे और बुरे को अलग करनेवाली किताब है ये क़ुरआन अपने पूर्व की धर्म पुस्तकों का केवल पुष्टिकर ही नहीं, कसौटी (परख) भी है।  यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जब तौरात तथा इंजील और क़ुरआन सब एक ही सत्य लाये हैं, तो फिर इन के धर्म विधानों तथा कार्य प्रणाली में अन्तर क्यों है? क़ुरआन उस का उत्तर देता है कि एक चीज़ मूल धर्म है, अर्थात एकेश्वरवाद तथा सत्कर्म का नियम, और दूसरी चीज़ धर्म विधान तथा कार्य प्रणाली है, जिस के अनुसार जीवन व्यतीत किया जाये, तो मूल धर्म तो एक ही है, परन्तु समय और स्थितियों के अनुसार कार्य प्रणाली में अन्तर होता रहा है, क्योंकि प्रत्येक युग की स्थितियाँ एक समान नहीं थीं, और यह मूल धर्म का अन्तर नहीं, कार्य प्रणाली का अन्तर हुआ।

इस्लामी क्रांति के प्रवर्तक, मानव अधिकारों के संरक्षक और अंतिम एवं सर्वश्रेष्ठ पैग़म्बर हज़रत अबुल क़ासिम मुहम्मद मुस्तफ़ा इब्न अब्दुल्लाह का जन्म 570 ई. (अधिकांश सुन्नी परंपराओं के अनुसार 12 रबीअ-उल-अव्वल जबकि शिया परंपराओं के अनुसार 17 रबी-उल-अव्वल को (आम-अल-फ़ील (हाथी का वर्ष) में अरब के  रेगिस्तान के मक्का नामक शहर के मुहल्ला बनू हाशिम के क़ुरैश क़बीले में हुआ था। उनकी पीढ़ियों का क्रम हज़रत इब्राहिम के पुत्र हज़रत इस्माइल से जाकर मिल जाता है। अरबी रिवाज़ के मुताबिक़ उनका पूरा नाम मुहम्मद बिन-अब्दुल्लाह (अब्दुल्लाह का बेटा मुहम्मद) था। मुहम्मद का अर्थ होता है जिस की अत्यन्त प्रशंसा की गई हो' (प्रशंसनीय)। उनके पिताश्री हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अब्दुल मुत्तलिब थे और माताश्री हज़रत आमिना बिन्त वहब थीं। उनकी माता ज़ोहरा क़बीला के प्रमुख वहब फ़हरी की पुत्री थीं। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के पूर्वजों में से एक हज़रत कोसई, क़ुरैश क़बीला से थे। यह क़बीला बड़ा ही दबंग था। हज़रत कोसई ने ख़ुद को कभी बादशाह तो नहीं कहा, पर व्यावहारिक तौर पर वे मक्का के बादशाह ही थे। उन्हें मक्का का व्यवस्थापक बनाया गया था। उनके बाद भी इसी वंश के लोग काबा के प्रबंधक रहे। हज़रत मुहम्मद सल्ल. के जन्म के समय मक्का मूर्तियों का गढ़ था। केवल काबा में 360 मूर्तियाँ थीं और उनका वंश कुरैश ही उसका पुजारी था। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. के क़बीले का नाम बनू हाशिम था, जो उनके पूर्वज हज़रत हाशिम के नाम पर पड़ा था। हालाँकि उनका नाम उमरू था, पर समस्त मक्का वासियों को हशम (रोटी को चूरा कर शोरबा में भिंगाकर खिलाना) खिलाया था, इसलिए वे हाशिम कहलाए। पवित्र तीर्थ-स्थल काबा का प्रबंधन और संरक्षण मुख्य रूप से हाशिमी ख़ानदान के ही हाथ में था।

पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. के दादा, हज़रत हाशिम के पुत्र हज़रत मुत्तलिब एक विराट और प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके दस बेटों में से एक पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के पिताश्री हज़रत अब्दुल्लाह थे। व्यापार के सिलसिले में वे शाम गए थे और व्यापारिक यात्रा करके जब वापस आ रहे थे तो मदीना में बीमार हो गए और वहीं हज़रत अब्दुल्लाह का 25 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। उस समय माताश्री आमिना गर्भवती थीं। हज़रत अब्दुल्लाह की मृत्यु के दो महीने बाद हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. का जन्म हुआ। उनके जन्म के छः वर्ष बाद माता का भी निधन हो गया। माताश्री आमिना बीबी उन्हें लेकर दो सौ मील दूर मदीना (यथरिब) गयी थीं। उन दिनों सफ़र में बहुत-सी तकलीफ़ें झेलनी पड़ती थी। हज़रत आमिना बीबी जब अपने पति हज़रत अब्दुल्लाह की कब्र देखने और रिश्तेदारों से मिलने के बाद वापसी की यात्रा कर रही थीं तो उनका रास्ते में ही अल-अब्वा (Al-Abwa)  नामक स्थान पर देहांत हो गया। हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने अपने पौत्र का बड़े प्यार से लालन-पालन किया। माताश्री बीबी आमिना की मृत्यु के दो वर्ष बाद, जब हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. आठ साल के थे तो दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब का भी देहावसान हो गया। अब उनकी देख-रेख की ज़िम्मेदारी हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के पुत्र हज़रत अबू तालिब (अ.स.) पर आ गई।

मक्का की सरदारी और राज्य को लेकर कुरैश जनजाति के कबीलों, विशेष रूप से बनू हाशिम (हज़रत अब्दुल मुत्तलिब का परिवार) और बनू उमय्या (हरब इब्न उमय्या का परिवार) के बीच प्रतिस्पर्धा थी।  हज़रत अब्दुल मुत्तलिब की मृत्यु (लगभग 578 ईस्वी) के बाद राज्य और सरदारी उन्हीं के वंशज की दूसरी शाखा उम्मैय्या के पुत्र हरब इब्न उमय्या ने हथिया ली। ये लोग हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के परिवार के घोर शत्रु थे। हरब ने ज़मज़म, जिसको खुदाई करके हज़रत हाशिम ने बरामद किया था, और तीर्थ-यात्रियों का सेवा कार्य भी अपने सुपुत्र अब्बास को दे दिया। इस तरह हर प्रकार से हज़रत अबू तालिब को सत्ता से बाहर कर दिया गया। उन्होंने अपने भतीजे हज़रत मुहम्मद के पालन-पोषण और रक्षा को अपने जीवन का परम उद्देश्य बना लिया। मक्का में कुरैश के कड़े विरोध के बावजूद, उन्होंने अंतिम सांस तक पैगंबर मुहम्मद की रक्षा की और उन्हें कबीले की दुश्मनी से बचाए रखा। इस काम को अंजाम देने में उनकी पत्नी हज़रत फ़ातिमा-बिन्ते-असद ने उनकी भरपूर मदद की। हज़रत मुहम्मद ने भी हज़रत फ़ातिमा को अपनी माताश्री के रूप में हमेशा सम्मान दिया। यहां तक कहा जाता है कि जब चाची हज़रत फ़ातिमा का स्वर्गवास हुआ, तो जनाज़े के गहवारा (पालना, झूला, हिंडोला) के नीचे-नीचे हज़रत मुहम्मद चलते रहे। किसी ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा, जितनी देर तक माताश्री की छत्रछाया सर पर बनी रहे, उचित ही है!

5.4 हज़रत ख़दीजा (रज़िअल्लाहु अन्हा)

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) अपने चाचा के काम में भी हाथ बंटाने लगे। उनके चाचा हज़रत अबू तालिब व्यापार करते थे। तेरह साल की उम्र में तिजारत (वाणिज्यिक व्यापार) में अनुभव हासिल करने के सिलसिले में चाचा के साथ वे शाम (सीरिया) गए। जब वे पच्चीस साल के थे तो पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. को किसी व्यापारिक काम से मक्का की सबसे धनवान महिला हज़रत ख़दीजा-बिन्त-खुवायलद  (र.अ.)  के माल के साथ जाना पड़ा। वे एक संभ्रांत महिला थीं। उनका घर बनू हाशिम क्षेत्र में स्थित था। उन्होंने गरीबों को भोजन और वस्त्र प्रदान किए, अपने रिश्तेदारों को आर्थिक सहायता दी और गरीब रिश्तेदारों को शादी के खर्चों में मदद की। वह धनी भी थीं और ताक़तवर भी। वह 556 ईसवी में मक्का में पैदा हुईं। सुशीलता, पवित्रता और चरित्रवान होने के कारण लोग उन्हें ‘ताहिरा (पवित्र) नाम से पुकारा करते थे। उनके दादा, असद इब्न अब्द-अल-उज्जा, असद कबीले के [मक्का में कुरैश़ जनजाति के पूर्वज] थे। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) एक अमीर सौदागर खुवायलद इब्न असद  की बेटी थीं। इस सौदागर ने अपने पुश्तैनी काम को बढ़ा कर एक बड़े कारोबारी साम्राज्य में तब्दील कर दिया था। लेकिन एक युद्ध में पिता की मौत के बाद हज़रत खदीजा (र.अ.) ने ख़ुद आगे बढ़ कर इस कारोबारी साम्राज्य की बागडोर संभाल ली। उनकी मां फातिमा बिन्त ज़ैदह्, कुरैश़ के आमिर इब्न लुऐइ कबीले की सदस्य थी। हज़रत ख़दीजा अपना सारा कामकाज़ मक्का (सऊदी अरब) से ही करती थीं। कारोबार के सिलसिले में उन्हें मध्य-पूर्व के देशों में सामान ले जाने वाले कारवाँ रवाना करने पड़ते थे। ये कारवाँ लंबा सफ़र तय करते थे। ये दक्षिणी यमन से लेकर उत्तरी सीरिया तक की राह नापते थे। हालाँकि हज़रत ख़दीजा (र.अ.) को काफ़ी सारा धन अपने परिवार से विरासत में मिला था लेकिन उन्होंने ख़ुद भी काफ़ी संपत्ति कमाई थी। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) अपनी ही तरह की विलक्षण कारोबारी थीं। वह अपने फ़ैसले ख़ुद लेती थीं। उनमें ग़ज़ब का आत्मविश्वास था। वह ख़ुद अपने कर्मचारियों का चयन करती थीं। वे ऐसे ख़ास हुनर वाले लोगों को चुनती थीं जो उनका व्यापार बढ़ाने में मददगार साबित हों। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) निश्चित तौर पर अपनी तरह से ज़िंदगी जीना चाहती थीं। वह अपनी राह पर चलती थीं।

वह बंधन में रहना पसंद नहीं करती थीं। वह काफ़ी मज़बूत इरादों वाली महिला थीं। उन्होंने अपने रिश्तों के भाइयों (कजिन) से शादी करने से इनकार कर दिया था। उनके परिवार में यह परंपरा चली आ रही थी। लेकिन वह ख़ुद अपना जीवनसाथी चुनना चाहती थीं। उन दिनों के तमाम प्रतिष्ठित लोगों ने उनके सामने शादी के प्रस्ताव रखे लेकिन उन्होंने इनमें से अधिकांश को ठुकरा दिया। आख़िरकार उन्होंने दो शादियां कीं। उनके पहले पति का निधन हो गया और माना जाता है कि दूसरे पति से उन्होंने ख़ुद अलग होने का फ़ैसला किया था। इसके बाद उन्होंने तय किया कि अब फिर कभी शादी नहीं करेंगी। लेकिन थोड़े वक्त के बाद उनकी ज़िंदगी में एक तीसरा शख़्स आया। वह थे पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. । उन दिनों वह किसी भागीदार के साथ साझा व्यापार किया करती थीं। अपना कारोबार का कामकाज देखने के सिलसिले में उन्हें एक ऐसे शख्स के बारे में पता चला जो बेहद ईमानदार और मेहनती माना जाता था। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) से उनकी मुलाक़ात हुई। इस मुलाक़ात से संतुष्ट ख़दीजा (र.अ.) ने उन्हें अपने एक कारवाँ की अगुआई करने के लिए चुन लिया।  हज़रत ख़दीजा (र.अ.) अपने व्यापारिक कारवां के साथ यात्रा नहीं करती थी।

यह कहा जाता है कि कुरैश के व्यापार कारवाँ जब गर्मियों में यात्रा करने के लिए सीरिया या सर्दियों में यात्रा पर यमन के लिए एकत्र होते, तब हज़रत ख़दीजा (र.अ.) के कारवाँ को भी कुरैश के अन्य सभी व्यापारियों के कारवाँओं के साथ रखा जाता था।  हज़रत ख़दीजा (र.अ.) व्यापार कारवाँ के साथ यात्रा नहीं करती थी, बल्कि नौकरों को अपनी ओर से व्यापार करने के लिए कमीशन पर नियुक्त करती थीं। 595 ई. में सीरिया में एक सौदे के लिए ख़दीजा को एक एजेंट की ज़रूरत पडी। हज़रत अबू तालिब इब्न अब्द अल मुतालीब ने उनके दूर के चचेरे भाई मोहम्मद इब्न अब्दुल्ला की सिफारिश की।  हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने हज़रत मुहम्मद सल्ल. को काम पर रखा, तब वे 25 साल के थे। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. ने न सिर्फ़ उस धनवान स्त्री हज़रत ख़दीजा (र.अ.) के व्यापार में सहयोग किया बल्कि उस बार व्यापार में उन्हें दोगुना से भी ज़्यादा मुनाफ़ा हुआ। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने उनमें कुछ अद्भुत गुण देखे थे। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) उस शख्स की दृढ़ता से बेहद प्रभावित थीं। कारोबार के सिलसिले में ख़दीजा (र.अ.) से उनका वास्ता बढ़ता गया। उस शख़्स ने हज़रत ख़दीजा (र.अ.) को इतना प्रभावित किया कि आख़िरकार उन्होंने उनसे शादी करने का फ़ैसला कर लिया। इस तरह एक पति के निधन और दूसरे से अलगाव के बाद फिर कभी शादी न करने का फ़ैसला करने वाली हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने अपना फिर कभी शादी न करने का फ़ैसला बदल दिया था। कई अमीर कुरैश पुरुष पहले से ही हज़रत ख़दीजा से शादी के लिए हाँ कह चुके थे, लेकिन उन्होंने सभी को मना कर दिया था।

हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने उस ज़माने के चलन के उलट ख़ुद उनकी उच्च विशेषताओं से प्रभावित होकर उनके पास विवाह करने का संदेश भिजवाया। पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. उस समय पच्चीस के थे और एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे, जबकि हज़रत ख़दीजा (र.अ.) मक्का की सबसे धनवान महिला थीं और चालीस साल की हो चुकी थीं। पैग़म्बर मोहम्मद अनाथ थे। उनको उनके चाचा ने पाला-पोसा था। फिर भी  595 ई. में राज़ी-ख़ुशी निकाह हुआ, उनके दूसरे चाचा हज़रत हम्ज़ा ने निकाह पढ़कर उनका  विवाह सम्पन्न किया। जीवन-पर्यन्त हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने बड़े प्रेम और वफ़ादारी से पैग़म्बर का साथ निभाया। जन्म से ही हज़रत मुहम्मद सल्ल. ग़ुरबत (कंगाली, दरिद्रता) झेलते आए थे। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) से शादी के बाद उनकी ज़िंदगी में अचानक 'काफ़ी निश्चिंतता और आर्थिक समृद्धि' आ गई, शादी के बाद वे दौलतमंद हो गए थे। मगर उनका रुझान दुनिया के ऐशो-आराम में न था। इसके बाद तो हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. का सारा जीवन और धन-दौलत इस्लाम के प्रचार-प्रसार में व्यतीत हुआ। माना जाता है कि इस दंपति की चार संतानें हुईं। लेकिन एक बेटी को छोड़ कर बाक़ी बचपन में ही गुज़र गईं। उनकी सुपुत्री हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (र.अ.) थीं। उनका विवाह हज़रत अली-बिन-अबूतालिब से हुआ था। इन दोनों के पुत्र इमाम हसन (शब्बर) और इमाम हुसैन (शब्बीर) थे, समूहिक रूप से इन्हें हसनैन कहा जाता है। इनकी सुपुत्रियां हज़रत ज़ैनब और हज़रत उम्मे-कुल्सूम थीं।

हज़रत मुहम्मद सल्ल. ने एक युवा संगठन हल्फ़-उल-फ़ुज़ूल (फ़ाज़िलों की मंडली) बनाया। अभी उनकी उम्र 25 वर्ष की थी। यह अत्याचार के विरुद्ध न्याय की स्थापना करने वाला एक ऐतिहासिक कबीलाई संघ था। बड़े आश्चर्य की बात है कि उनके इन प्रयासों, उच्चतम जीवन मूल्यों, सत्यवादिता, के कारण उस समय के समाज ने उन्हें अस्‌-सादिक़ (परम सत्यवादी) और अलअमीन (परम विश्वासी, निष्ठावान) की उपाधियों से अलंकृत किया, किन्तु जब 40 वर्ष की उम्र में उन्होंने पैग़म्बर होना घोषित किया, तो वही समाज और प्रशंसक उनके घोर शत्रु हो गए, खासकर अरब का धनवान वर्ग, जिसका नेतृत्व उमैय्या वंश कर रहा था।

ऐसा माना जाता है कि इस्लाम प्राचीन धर्मों के विकास का अंतिम पड़ाव है। क़ुरआन में कहा गया है, कोई जाति ऐसी नहीं है, जिसमें निर्देशित करने वाला (नबी या पैग़म्बर) न हुआ हो। (क़ुरआन : 35/24)। इस्लाम धर्म की यह विशेषता है कि यह किसी जनसमूह, समाज या देश तक ही सीमित नहीं है बल्कि समस्त मानव प्राणी, देश-समाज और काल इसकी परिधि में आते हैं। इस्लाम यानी सुख-शांति मतलब यह कि जो भी सुख-शांति में विश्वास करता है, इसका अनुयायी है। इस्लाम शब्द सुलह-समझौता, कुशलता, विनम्रता, आज्ञापालन, समर्पण आदि अर्थों में भी आता है। इसका ईश्वर सिर्फ़ मुसलमानों का पूज्य नहीं है, बल्कि वह तो रब्ब-उल-आलमीन है यानी सारी दुनिया का पालनहार है, वह रहमत-उल-आलमीन यानी सारी दुनिया का दया निधान है। (क़ुरआन : 1 / 2, 21/107)। इसका संदेश सभी मानव जाति के लिए एक समान है।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांसूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

सूफ़ीमत ... 5. सूफ़ीमत का उदय-1

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


5. सूफ़ीमत का उदय-1

वह ईश्वर ऐसा है कि जिसके अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। वह सम्राट अत्यंत पवित्र, सर्व गुण-संपन्न, दोष-रहित, क्षमादानी, पर्यवेक्षक, प्रतिष्ठित, विराट स्वामी, सर्वथा शान्ति प्रदान करने वाला, रक्षक, प्रभावशाली, शक्तिशाली बल पूर्वक आदेश लागू करने वाला, बड़ाई वाला है।। वह उन सभी बातों से पवित्र और पावन है जिसे धर्मभ्रष्ट किया करते हैं। (क़ुरआन : 59/23)

5.1 विद्वानों में मतभेद 

निकोलसन के अनुसार आधुनिक शोध ने यह साबित कर दिया है कि सूफ़ीवाद की उत्पत्ति का पता एक निश्चित कारण से नहीं लगाया जा सकता है। हां यह तय है कि सूफ़ीमत का उद्भव तत्कालीन धार्मिक और राजनीतिक वातावरण की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप हुआ, लेकिन सूफ़ीमत के आविर्भाव के संबंध में विद्वानों में बहुत मतभेद है। डॉ. यूसुफ हुसैन के अनुसार सूफ़ीवाद की उत्पत्ति इस्लाम धर्म से हुई है। मूल रूप से, सूफ़ीवाद इस्लाम में निहित है, जो इसका स्रोत और मूल है। सूफ़ीवाद का मूल स्रोत क़ुरआन और मुहम्मद साहब सल्ल. का जीवन है। क़ुरआन की मक्की सुरा में भक्ति भावना हैं और उनमें से एक में अल्लाह के नाम के लिए अल वदूद शब्द आया है जिसका अर्थ है मुहब्बत करने वाला, जो प्यार के रिश्ते का सुझाव देते हैं। सूफ़ियों की कई आध्यात्मिक शब्दावली क़ुरआन से ली गई है, जैसे भगवान की पवित्रता के लिए आग जैसे भावों में, 'पक्षी' के रूप में मानव आत्मा के पुनरुत्थान या अमरता का प्रतीक, मनुष्य के भाग्य और व्यवसाय का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतीक के रूप में 'पेड़', या अभिवादन, शराब और प्याले की आकर्षक कल्पना जिसका सूफ़ी आदेशों में दीक्षा के लिए उपयोग किया जाता है। क़ुरआन से सूफ़ीवाद में कई  सूफ़ी क्रियाएं और सूफ़ी अवधारणाएं ली गयी हैं, जैसे मानव क्रिया की दैवीय प्रेरणा, दैवीय न्याय (अदल) की अवधारणा, संतोष (रिदा), अहवाल (रूहानी अनुभूति, अध्यात्म की मनःस्थितियां), अहदियत (ईश्वरीय एकता), तौबा (प्रायश्चित, अनुताप, अपने पाप पर लज्जित होना फिर उसे न करने का संकल्प लेना), अक़ल (बुद्धि) और क़ल्ब (दिमाग, हृदय) के बीच अंतर के बारे में, आरिफ़ (ज्ञानी) और मोमिन (ईमानवाला, आस्तिक) का अंतर आदि। सूफ़ी अभ्यास धिकर (दरवेशों की एक सभा जिसमें परमानंद की स्थिति उत्पन्न करने के लिए भगवान के नाम वाले एक वाक्यांश का लयबद्ध रूप से उच्चारण किया जाता है), किरा (क़ुरआन का शुद्ध उच्चारण) से व्युत्पन्न है। भारतीय सूफ़ी परंपरा ने गुप्त जप (ज़िक्र-ए-खफ़ी) को पैगंबर के साथियों के अभ्यास के रूप में माना। बुलंद आवाज़ में नाम लेना ज़िक्र ए जाली या जहरी’ कहलाता है।

इस्लाम की मान्यता है कि ईश्वर ही एकमात्र शासक है और उसका कोई भागीदार नहीं है। समस्त ब्रह्मांड पर उसी का राज है। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ उसके रसूल हैं, जो उसके आदेशों को क्रियान्वित करते हैं। यहां तक तो सब ठीक है, किंतु इस्लाम धर्म के बीच एक विशिष्ट विद्या या धारा के रूप में प्रचलित सूफ़ीमत के उदय को लेकर विद्वानों में मतभेद है। आइये इन मतों को देखें:

डॉ. युसुफ़ हुसैन के अनुसार सूफ़ीमत का उदय इस्लाम के मध्य ही हुआ, और इस पर विदेशी धारणाओं और प्रथाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव यह मत स्वीकार न करते हुए कहते हैं कि सूफ़ीमत पर हिंदू सोच, मान्यताओं और प्रथाओं का गहरा असर है। उनका यह भी मानना है कि सूफ़ीमत में मौज़ूद आत्मा और परमात्मा के संबंध, ईश्वर के प्रति प्रेम, अहिंसा, शांति-प्रियता, उपवास, त्याग, आदि प्रथाएं हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म से मिलती-जुलती हैं। निकोल्सन के अनुसार सूफ़ीमत के आविर्भाव में यूनानी प्रभाव का प्रमुख स्थान है। हालाकि प्रो. के.ए. निज़ामी मानते हैं कि सूफ़ियों के चिश्ती संप्रदाय ने भारत में इसके विकास के प्रारंभिक दौर में हिन्दुओं की कई प्रथाओं को अपनाया था, जैसे शेख़ के सामने झुकना, आगन्तुकों को पानी देना, सिर मुंड़वाना आदि, लेकिन सूफ़ीमत के आविर्भाव पर अन्य धर्मों के प्रभावों को अस्वीकार करते हुए उनका स्पष्ट मानना है कि सूफ़ीमत का मूल स्रोत क़ुरआन तथा पैगम्बर की जीवनी है। एडलबर्ट मार्क्स के अनुसार सूफ़ीमत का आविर्भाव यूनानी दर्शन से हुआ है। ब्राउन के अनुसार इस प्रभाव के कारण इस्लाम के संन्यासी जीवन में रहस्यवादी प्रवृत्तियों का प्रवेश हुआ। ब्राउन ने सूफ़ीमत पर बौद्ध तथा जैन धर्म के प्रभाव को भी स्वीकार किया है। सूफ़ीमत संबंधी शांति तथा अहिंसा पूर्णरूप से जैन तथा बौद्ध धर्म से संबंधित है। अनेक बौद्ध भिक्षु धर्म के प्रचार के लिये पश्चिम एशिया के देशों में गये अतसूफ़ी साधकों के ऊपर प्रभाव पड़ना स्वभाविक था। सूफ़ीमत पर ईसाई धर्म का भी प्रभाव पड़ा। ईसाई विचारधारा से प्रभावित होकर सूफ़ी साधक को व्यक्तिगत स्वार्थ में कोई रुचि नहीं थी। उनके हृदय में मानव सेवा का भाव ईसाई धर्म के प्रभाव की ही देन है। ईश्वर पर पूर्ण रूप से आश्रितभौतिक पदार्थों के प्रति अरुचि भी ईसाई धर्म के प्रभाव के कारण ही है। अबू अब्दुल्ला अल मुहासिबी नामक सूफ़ी सन्त ने अपने संदेश में बाइबिल के कुछ विषयों का उल्लेख किया है। सूफ़ियों की यौगिक क्रियाओं में हिन्दू संन्यासियों के क्रियाकलापों को ढूँढा जा सकता है।

राईट्स का मत है कि सूफ़ियों में भावाविष्टावस्था को उत्पन्न करने वाली कुछ क्रियाएं तथा प्राणायाम जैसी विधियाँ हिन्दू धर्म की ही देन हैं। अधिकांश विद्वान यह स्वीकार करते हैं कि सूफ़ी मत के विकास में भारतीय विचारधारा का प्रभाव पड़ा है। डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव के अनुसार, "सूफ़ी साधकों का चिल्ला-ए-माकुस अर्थात् शरीर को यातना देनाखानक़ाह के प्रधान के समक्ष नतमस्तक होनानवागन्तुकों को जल देनासिर मुंडानासंकीर्तन का आयोजन आदि बातें पूर्ण रूप से हिन्दू प्रमाणों को स्पष्ट करती हैं।" डॉ. चौबे तथा श्रीवास्तव के कथनानुसार, "इस प्रकार सूफ़ी धर्म विश्व के प्राचीन धर्मों की श्रेणी में ही नहीं हैबल्कि अनेक धर्मों के प्रभावों की उपज है।"

डॉ. ताराचन्द के अनुसार सूफ़ीमत एक ऐसा स्रोत है जिसमें अनेक देश की नदियों का समावेश है। क़ुरआन तथा पैगम्बर मुहम्मद का जीवन इसके मुख्य स्रोत हैं। ईसाई धर्म तथा नव अफलातून दर्शन के प्रभाव से इसका विकास हुआ। हिन्दू तथा बौद्ध सिद्धान्तों तथा नास्तिकों ने इसे अधिक प्रभावित किया। अतः हम निःसन्देह कह सकते हैं कि सूफ़ी मत के आविर्भाव में इस्लामईसाईबौद्धजैननास्तिक मतवेदान्त तथा हिन्दू आदि धर्मों का योगदान है। परन्तु यह प्रभाव नकल के रूप में नहीं रहा। बल्कि सूफ़ी साधकों एवं चिन्तकों ने उन बाहरी विचारधाराओं को अपने ढंग से अपनाया तथा सूफ़ीमत का विकास इस्लाम धर्म के अनुसार ही हुआ है।

इन विचारधाराओं को ध्यान में रखते हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आध्यात्मिक इस्लामी पुनरुत्थान आन्दोलन के रूप में प्रचलित सूफ़ीमत का बीजारोपण मुसलिम मानस में हुआ और वह वाह्य आडंबरों के विरुद्ध एक प्रचंड टंकार थी। जाफ़र रज़ा ने ठीक ही कहा है कि इस्लाम ने टुकड़ों में बंटी अरब-राष्ट्रीयता को मिटाकर व्यापक आध्यात्मिकता का विकास किया था। आरंभ में सूफ़ियों का कोई सम्प्रदाय नहीं था। इस्लाम के शुरू के दिनों (609-661 ई.) में ईश्वर से निकटता की वृत्ति मुसलमानों में जग चुकी थी। अरब में रहने वाले धर्मनिष्ठ और पवित्र व्यक्तियों के इस वर्ग ने स्वेच्छा से सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग किया और सादी वेशभूषा एवं सदाचार से अपनी अलग पहचान स्थापित की। हालाकि इसका नाम उस युग में सूफ़ीवाद तो नहीं ही था, फिर-भी प्रसिद्ध सूफ़ी संत ख़्वाजा सय्यद अलहजवेरी ‘रहमतुल्लाह अलैह’ का मानना था कि उस युग में भले ही उसका कोई नाम नहीं था, लेकिन तथ्य के रूप में सूफ़ीवाद अस्तित्व में आ चुका था। हज़रत जामी का कहना है कि सूफ़ी शब्द का सबसे पहला प्रयोग सन् 800 से पहले हज़रत अबू हाशिम के लिए हुआ था।

5.2 तत्कालीन अरब समाज और इस्लाम का जन्म

सूफ़ीमत के उदय और विकास को जानने-समझने के लिए उस समय के अरब देशों के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था को समझना बहुत ज़रूरी है। अरब प्रायद्वीप एशिया एवं अफ्रीका की संधि पर है। यह मुख्यतः रेगिस्तान है। प्रायद्वीप के तट, पश्चिम छोर पर लाल सागर एवं अकाबा की खाडी़, दक्षिण-पश्चिम में अरब सागर (हिंद महासागर का भाग), उत्तर-पश्चिम में ओमान की खाडी़ एवं हॉर्मज़ जलडमरुमध्य तथा फारस की खाडी़ हैं। अरबी प्रायद्वीप में सबसे पहली मानवीय संस्कृति 2500 ईसा पूर्व के आसपास की उम्म अन-नार संस्कृति थी जो उत्तरी संयुक्त अरब अमीरात और ओमान के इलाक़े में लगभग 500 सालों तक चली।  इसके बाद यहाँ कई राज्य उभरे।  अरब प्रायद्वीप काफी हद तक शुष्क और ज्वालामुखीय था।

इस्लाम का जन्म अरब में हुआ, और भी सटीक कहा जाए तो मक्का में। ‘अल-रब अल ख़ाली’ नाम से प्रसिद्ध अरब के विशाल रेगिस्तान में मक्का एक मुख्य शहर था। अरब में दो भिन्न संस्कृति के लोग पाए जाते हैं। इस भिन्नता का मुख्य कारण भौगोलिक है। उत्तर और दक्षिण अरब के बीच एक विशाल मरुभूमि है। उत्तरी अरब का यह रेगिस्तान बेहद निर्मम था यहां की ज़िन्दगी कठोरताओं से भरी थी। इलाक़ा एक तरफ से समुद्र से घिरा था। इस रेगिस्तान में बद्दू नाम का एक घुमक्कड़ (खानाबदोश) क़बीला रहता था। यह क्षेत्र कृषि उत्पादन से पूरी तरह अज्ञात था। यहाँ कोई स्थाई चरागाहें भी नहीं थीं, बारिश भी बहुत कम होती थी। पारंपरिक रूप से ऊंट, भेड़ और बकरियां पालना इनका मुख्य पेशा था। अपने ऊंटों के लिए वे नए-नए चारागाह की खोज में घूमते रहते थे। कठिन से कठिन परिस्थितियों से जूझना और घोर कष्टों को सहना उनकी आदतों में शुमार था। घोर अनुशासन और सत्ता के प्रति आदर रखना उनका गुण था। वे बेहद सादी ज़िन्दगी बिताते थे, एक कमरबंद वाला लंबा वस्त्र पहनते थे जिसे सौब कहा जाता था। वदन के ऊपरी भाग में वे एक ढीला-ढाला वस्त्र अबा पहनते थे। सर एक शाल कूफ़िया से ढंका रहता था जो एक डोरी इक़ल से बंधी रहती थी। उनका भोजन भी सादा होता था, जिसमें खजूर और आटे की बनी कोई चीज़ या भुनी मकई की बाली शामिल होती थी। इसे वे पानी, ऊँट या बकरी के दूध के साथ खा लिया करते थे। वे अपनी बकरियों और ऊंटों के साथ किसी नए चारागाह की तलाश में या दुश्मनों से रक्षा के लिए लगातार चलते रहा करते थे। वे दुश्मन क़बीले के ऊपर छापे (गज्बा) भी मारा करते थे।

क़बीले की संरचना उसके गण्यमान्य व्यक्तियों द्वारा संचालित एक लोकतंत्रात्मक संस्था थी जो कुलीन वंश के उत्तम चरित्र वाले लोग होते थे। क़बीले की रक्षा करना उनका प्रमुख धर्म होता था। बद्दुओं का कोई मज़हब नहीं था। वे किसी देवी-देवता की पूजा-प्रार्थना नहीं करते थे। वे क़िस्मत को मानते थे और क़बीलाई सामूहिकता का पालन करते थे। एक क़बीलाई समाज में व्यक्तिवाद का कोई मूल्य नहीं होता और सामूहिकता का राज होता है। अभी तक इन समाजों में व्यक्तिगत संपत्ति का जन्म नहीं हुआ था। उनकी अपनी नैतिकता और मूल्य थे। उनका मज़हब मानववाद था। वे जीवन का अर्थ मनुष्य के उत्कृष्ट गुणों को व्यक्त करना मानते थे। बद्दुओं की दरियादिली भी काफी मशहूर थी। असग़र अली इंजीनियर अपनी पुस्तक इस्लाम का जन्म और विकास में लिखते हैं, औद्योगिक समाज की तरह घुमक्कड़ समाज भी अपनी ख़ुद की संस्थाओं, आदतों और संस्कृति का विकास करता है। बद्दू सख़्त लोग होते हैं, जूझने और सहने की क्षमता उन का प्रमुख गुण है, जब कि अनुशासन तथा सत्ता के प्रति आदर-भाव का अभाव उनका प्रमुख दुर्गुण है।

अरबों की एक भारी संख्या व्यापार और अपने देवी-देवताओं की पूजा के लिए भी मक्का आती रहती थी। और इस तरह मक्का में धीरे – धीरे व्यक्तीकरण की प्रक्रिया शुरू होने लगी थी। क़बीलाई एकजुटता का महत्व कम हो रहा था। समय के साथ-साथ उनकी दरियादिली का रिवाज़ मक्का में कमज़ोर पड़ने लगा बद्दुओं के बीच कबीलाई समाज का घुमक्कड़ी रस्मो-रिवाज़ व्याप्त था, जबकि मक्का में व्यापारिक समाज का रस्मो-रिवाज़ बद्दू अपनी जीवन शैली को बेहद मामूली ज़रूरतों तक केन्द्रीत रखते थे जबकि मक्का जैसे शहरों के रहने वालों का सरोकार उनके हालात और रस्मो-रिवाज़ की सहूलतों और खुशियों से था

उस समय दक्षिणी अरब प्राचीन सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था दक्षिणी अरब के निवासी धनी और समृद्धिशाली थे वे कुशल व्यापारी और धर्म में आस्था रखने वाले थे मक्का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का केंद्र था और मूर्तिपूजक अरबों का एक धार्मिक केंद्र भी। अरबों की एक भारी संख्या व्यापार और अपने देवी-देवताओं की पूजा के लिए भी मक्का आती रहती थी। वे सोना, मसाले और बहुमूल्य पत्थरों का व्यवसाय करते थे इस्लाम के आविर्भाव के पहले दक्षिणी अरब या तो अवीसिनिया या फारस (ईरान) के बादशाहों के अधीन रहा पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. नगरवासी थे रेगिस्तान की आज़ाद ज़िन्दगी के आदी ये बद्दू पैग़म्बर के द्वारा दिए गए अनुशासन को मानने को राज़ी नहीं हुए थे दक्षिणी अरब की सभ्यता कृषि पर आधारित थी और सामंतवाद का नामो-निशान नहीं था मदीना एक बड़ा समृद्ध कृषि व्यवसाय से जुडा शहर था जबकि मक्का कई आसपास के जनजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय केंद्र था। उत्तर के अरबियों को रेगिस्तानी स्थितियों में अस्तित्व के लिए सदैव संघर्षरत रहना पड़ता था कठोर पर्यावरण और कष्ट पूर्ण जीवनशैली इन जनजातियों को जुझारू बनाए रखता था। सामाजिक एकजुटता का एक महत्वपूर्ण स्रोत था जनजातीय संबंध। वे लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर यात्रा करते थे और अपने क़बीले के लिए पानी और चरागाह मांगते थे बाद में उन्होंने व्यापार और कृषि पर भी ध्यान केंद्रित किया। नए संपत्ति-सम्बन्धों के विकास के साथ वंश, छोटी पारिवारिक इकाइयों में टूट रहे थे अर्थात अब किसी की सम्पति में उन के बच्चों को छोड़ घनिष्ठ सम्बन्धियों का कोई भाग नहीं होता था जब कि एक क़बीलाई समाज में संपत्ति का स्वामित्व सामूहिक होता था। इस नए आर्थिक सम्बन्धों से समाज में एक असंतोष और तनाव पैदा हो रहा था।

दक्षिण अरब वासी अनेक देवी देवताओं की पूजा किया करते थे अस्तर के रूप में शुक्र गृह की और अलमका के रूप में चंद्रदेव की पूजा की जाती थी शम्स देवी के रूप में सूरज की पूजा करते थे मंदिर पत्थर के बने होते थे मक्का में काबा मंदिर में जनजातीय संरक्षक देवताओं की 360 मूर्तियां थीं। दक्षिणी अरब और यमन प्राचीन काल से अपने धन-दौलत की प्रचुरता के लिए मशहूर रहा है मक्का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का एक केंद्र था मूर्तिपूजक अरबों के लिए यह एक धार्मिक केंद्र भी था इस तरह यह भारी आमदनी का एक स्रोत था यह इलाक़ा बेहद उपजाऊ था इसका मुख्य कारण मआरिब का बाँध था इस्लाम के उदय के पहले यह बाँध किसी काम का नहीं रह गया था इससे फलों की पैदावार पर भारी असर पड़ा बैजन्तीनी और फारसी साम्राज्यों के बीच आए दिन होने वाले टकरावों के कारण व्यापारिक मार्ग पर अवरोध उत्पन्न होने लगे थे राजनीतिक दुश्मनियों का दौर बढ़ा और अराजकता फैलने लगी हाँ, दक्षिणी अरब से उत्तर अरब की ओर जाने वाले मसाला मार्ग पर मक्का का उदय ज़रूर हुआ इस नगर में रहने वाले लोग मूलतः बद्दू नस्ल के थे मंगोलों की तरह ही बद्दू भी हमले करते रहते थे

छठी शताब्दी का दूसरा भाग अरब में राजनीतिक विकार की अवधि थी और संचार मार्ग अब सुरक्षित नहीं थे। तत्कालीन अरब समाज में आतंक व्याप्त था। लूटपाट, चोरी-डकैती, हत्या, स्त्रियों का अपहरण बड़ा आम था। धार्मिक विभाजन संकट का एक महत्वपूर्ण कारण था। यहूदी धर्म यमन में प्रमुख धर्म बन गया, जबकि ईसाई धर्म ने फारस खाड़ी क्षेत्र में जड़ जमा ली थी। इस क्षेत्र में बहुसंख्यक संप्रदायों में धर्म और आध्यात्मिकता के प्रति दिलचस्पी में कमी होती जा रही थी। इतिहास गवाह है कि धर्म तभी और वहीं प्रकट होता है, जब और जहां उसकी ज़रूरत होती है। अरबी देशों की तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक अवस्था इस्लाम के उदय और तेज़ी से विकसित होने का कारण बनी। अरब में उस समय अय्याश लोगों का बोलबाला था, भोगवादियों का ज़माना था। जुआ, शराबखोरी, वेश्यागमन आम बात थी। विधवा, अनाथ और कमज़ोर लोगों को बहुत सी मुश्किलों का समाना करना पड़ रहा था। शादी जैसी संस्था का क्षरण हो रहा था। स्त्रियों का समाज में न आदर था और न ही अधिकार या जायदाद में कोई हिस्सा। अंधविश्वास, कुरीतियां और दुराचार ने सारे अरब पर अपना अधिकार जमाया हुआ था। विलासिता और भोगाचार अपनी हदें पार कर रहा था। शराब की महफ़िलों में गाने-बजाने के लिए महिलाएं होती थीं, जिनको क़ीनात कहा जाता था। शराब में डूबे लोगों को महिलाएं सुलभ थीं। अरब क़बीलों के जीवन में युद्ध, लूटमार, वध कर देना, आम बात थी। अरब के बाहर भी, रोमन साम्राज्य और ईरान में स्थिति बेहाल थी। इन दोनों साम्राज्य के बीच लड़ाइयां चलती रहती थीं, जिससे लोगों का बहुत ही बुरा हाल था। जो तत्कालीन धर्म थे, वे भी राजाओं के सहायक बन गए थे। उस समय अरब लोग घोर मूर्ति-पूजक थे। जाफ़र रज़ा ने अपनी पुस्तक इस्लाम के धार्मिक अयाम में बताया है मूर्तिपूजा का प्रारम्भ इस प्रकार हुआ कि अरब जन व्यापार के संबंध में अन्य देशों में भी जाते थे तो काबा का कोई पत्थर महानता और पवित्रता के प्रतीक के रूप में अपने साथ ले जाते थे। जहां रहते उस पत्थर के चारों ओर परिक्रमा करते, मानो काबा का तवाफ़ कर रहे हैं। फिर स्थिति यह हुई कि जहां सुंदर पत्थर देखते, उसकी पूजा करने लगते। एक व्यक्ति उमरू-बिन-लही व्यापार के संबंध में एक बार सीरिया गया। वहां उसने मूर्ति पूजा देखी। लोगों ने उसे बताया कि यह मूर्ति अत्यंत सहायक होती हैं। उन्हीं से मांगकर एक मूर्ति मक्का लाया। इस मूर्ति को उसने काबा में स्थापित कर दिया। यही वह मूर्ति थी, जिसे हुबल कहा जाता है।

अरब के पूर्वी, पश्चिमी और उत्तरी प्रान्तों के विपरीत मरुभूमि वाले हिस्से में रहने वाले अरब अपने आप में मस्त थे। वे स्वतंत्र थे और उन्हें इस बात की बिलकुल ही चिंता नहीं थी कि बाहर क्या चल रहा है। वे निश्चिंतता के साथ घुमक्कड़ी जीवन बिता रहे थे। उनके आपस की प्रतिस्पर्धा, लूट-मार चलते रहते थे। इस पृष्ठभूमि में मक्का में पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. का जन्म होता है। मुहम्मद साहब के जीवन के प्रारंभिक वर्षों के दौरान, कुरैशी जनजाति पश्चिमी अरब में एक प्रमुख शक्ति बन गई थी। हज़रत मुहम्मद साहब के जन्म के क़रीब सौ वर्ष पहले से ही काबा क़ुरैशियों के संरक्षण में था। मक्का भी उन्हीं के अधीन था।

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मनोज कुमार

 

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