शनिवार, 17 मार्च 2012

भारतीय काव्यशास्त्र – 104


भारतीय काव्यशास्त्र – 104
आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में अर्थदोषों पर चर्चा समाप्त हो गयी थी। इस अंक से रसदोषों पर चर्चा प्रारम्भ हो रही है। वैसे, अब तक जिन दोषों पर चर्चा हुई है, वे भी किसी न किसी प्रकार रस की प्रतीति में परोक्ष रूप से व्यवधान उत्पन करते हैं। पर जो दोष प्रत्यक्ष रूप से रस की प्रतीति में बाधक होते हैं, उन्हें रसदोष माना गया है। काव्यप्रकाश में निम्नलिखित 13 दोषों का उल्लेख किया गया है-

व्यभिचारिरसस्थायिभावानां    शब्दवाच्यता।
कष्टकल्पनया     व्यक्तिरनुभावविभावयोः।।
प्रतिकूलविभावादिग्रहो  दीप्तिः  पुनः  पुनः।
अकाण्डे प्रथनच्छेदौ अङ्गस्याप्यतिविस्तृतिः।।
अङ्गिनोSननुसन्धानं   प्रकृतीनां  विपर्ययः।
अनङ्गस्याभिधानं च  रसे दोषाः स्युरीदृशाः।।
1.      व्यभिचारिभावस्वशब्दवाच्यता,
2.      रसस्वशब्दवाच्यता,

3.      स्थायिभावस्वशब्दवाच्यता,
4.      अनुभाव की कठिनाई से प्रतीति,
5.      विभाव की कठिनाई से प्रतीति,
6.      प्रतिकूल विभाव आदि का ग्रहण,
7.      रस की बार-बार दीप्ति,
8.      अनवसर में रस का विस्तार,
9.      अनवसर में रस का विच्छेद,
10. अप्रधान रस का अत्यधिक विस्तार,
11. अङ्गी (प्रधान) रस का अननुसन्धान (त्याग)
12.  प्रकृतियों का विपर्यय अर्थात् पात्रों के स्वभाव का विपर्यय
13. अनङ्ग का कथन अर्थात् प्रधान रस के अपुष्टकारक तथ्यों का कथन।
जहाँ काव्य में व्यभिचारिभावों को नाम से, अर्थात् उनके वाचक शब्द से व्यक्त किया गया हो, वहाँ व्यभिचारिभावस्वशब्दवाच्यता रसदोष होता है। जैसे-

सव्रीडा   दयितानने   सकरुणा   मातङ्गचर्माम्बरे
सत्रासा भुजगे  सविस्मयरसा  चन्द्रेSमृतस्यन्दिनि।
सेर्ष्या   जह्नुसुतावलोकनविधौ  दीना  कपालोदरे
पार्वत्या नवसङ्गमप्रणयिनी दृष्टिः शिवायाSस्तु वः।।

अर्थात् नवसंगम के लिए उत्सुक माँ पार्वती की दृष्टि तुमलोगों के लिए कल्याणकारिणी हो, जो अपने पति (भगवान शिव) के मुख को देखकर लज्जायुक्त, हाथी के चर्म का वस्त्र उन्हें देखकर करुणायुक्त, उनके आभूषण सर्पों को देखकर त्रासयुक्त, अमृत को प्रवाहित करने वाले चन्द्रमा को देखकर विस्मय रस से युक्त, उनके सिर पर गंगा को देखकर ईर्ष्या-भाव से युक्त और उनके द्वारा धारण किए कपाल के भीतर देखकर दीनतायुक्त हो गयी है।

इस श्लोक में व्रीडा, त्रास, ईर्ष्या, दीनता आदि व्यभिचारी भावों के नाम हैं। इनके नाम से इन्हें अभिहित करने के कारण यहाँ व्यभिचारिभावस्वशब्दवाच्यता रसदोषहै।

इसी प्रकार जहाँ काव्य में रस की अभिव्यक्ति रस शब्द से या किसी अन्य रस के नाम से की गयी हो, वहाँ रसस्वशब्दवाच्यता दोष होता है। जैसे-

तामनङ्गजयमङ्गलश्रियं   किञ्चिदुच्चभुजमूललोकिताम्।
नेत्रयोः कृतवतोSस्य गोचरे कोSप्यजायत रसो निरन्तरम्।।

अर्थात् कामदेव की विजय की मंगल-लक्ष्मी और थोड़ी ऊपर को उठी हुई बाहों वाली नायिका को देखकर नायक के अन्दर किसी अनिर्वचनीय और अविच्छिन्न रस का उदय हुआ।

यहाँ रस शब्द का प्रयोग होने के कारण रसस्वशब्दवाच्यता दोष है।

निम्नलिखित उदाहरण में शृंगार रस विशेष कहकर वर्णन करने के कारण रसस्वशब्दवाच्यता दोष है-

आलोक्य  कोमलकपोलतलाभिषिक्तव्यक्तानुरागसुभगामभिराममूर्ति।
पश्यैष बाल्यमतिर्वृत्य विवर्तमानः शृङ्गारसीमनि तरङ्गितमातनोति।।

अर्थात् कोमल कपोलों पर व्यक्त अनुराग के कारण सुन्दर और मोहक रूपवाली नायिका को देखकर बाल्यावस्था का अतिक्रमण करके नवयौवन में प्रवेश करनेवाला यह नायक शृंगार की सीमा में तरंगित हो रहा है।

यहाँ शृंगार रस की अभिव्यंजना न होकर उसका नाम से उल्लेख हुआ है। अतएव इस श्लोक में भी रसस्वशब्दवाच्यता दोष है।

और जहाँ काव्य में स्थायिभावों को उनके नाम से अभिव्यक्त किया गया हो, वहाँ स्थायिभावस्वशब्दवाच्यता रसदोष होता है। जैसे-

सम्प्रहारे   प्रहरणैः   प्रहाराणां  परस्परम्।
ठणत्कारैः श्रुतुगतैरुत्साहस्तस्य कोSप्यभूत्।।

अर्थात् युद्ध में शस्त्रों के आपस में टकराने से उत्पन्न ध्वनि को सुनकर उसमें (वीर में) अनिर्वचनीय उत्साह उत्पन्न हुआ।

यहाँ वीर रस का स्थायिभाव उत्साह का स्वशब्द से कथन होने के कारण स्थायिभावस्वशब्दवाच्यता रसदोष है।

इस अंक में बस इतना ही।

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत कठिन है यह क्लास.पर बहुत महत्वपूर्ण है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बेहतरीन जानने योग्य प्रस्तुति,....

    MY RESENT POST... फुहार....: रिश्वत लिए वगैर....

    उत्तर देंहटाएं
  4. २ बार पढ़ कर भी कुछ समझ नहीं आया...
    शायद शुरुआत कुछ हल्के पाठ से की जाये...
    फिर भी कोशिश जारी है....
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. इस सार्थक पोस्ट के लिए बधाई स्वीकार करें.

      हटाएं
  5. साधुवाद आप दोनों का प्रस्तुतीकरण व आलेख के लिए ,साहित्यानुराग मनुष्य की एक विशिष्ट मानसिक अवस्था है ,जो विचार व अनुशीलन को प्रखरित करती है,साहित्य रचना में गुण व दोषों का अगर ध्यान रखा जाता है ,निश्चित रूप से वह सृजन ,पठनीय ,अनुकरणीय होता है ,किसी साहित्य की समृद्धि का मुख्य करक होता है / मार्गदर्शन का प्रतिदर्श बन रहा है यह आलेख .... आभार जी /

    उत्तर देंहटाएं
  6. यहाँ शृंगार रस की अभिव्यंजना न होकर उसका नाम से उल्लेख हुआ है। अतएव इस श्लोक में भी रसस्वशब्दवाच्यता दोष है.सुन्दर व्याख्या .

    उत्तर देंहटाएं
  7. कुछ पाठकों के लिए यह पोस्ट दुरूह लगा। उसका कारण अब समझ में आ रहा है। इसमें प्रयुक्त परिभाषिक शब्द सम्भवतः कठिनाई उत्पन्न कर रहे हैं और वे हैं- विभाव, स्थायिभाव और व्यभिचारिभाव आदि। रस शब्द और नौ रसों से लगभग पाठक परिचित हैं। रस से जुड़े सभी अंगों पर रस पर विचार करते समय की जा चुकी है। यह शृंखला क्रमशः चल रही है। इसलिए उनकी यहाँ व्याख्या करना उचित नहीं लगा। अतएव पाठकों से अनुरोध है कि एक बार उसे देखें। उसके बाद यह पोस्ट कठिन नहीं लगेगी।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. भारतीय काव्यशास्त्र को समझाने का चुनौतीपूर्ण कार्य कर आप एक महान कार्य कर रहे हैं। इससे रचनाकार और पाठक को बेहतर समझ में सहायता मिल सकेगी। सदा की तरह आज का भी अंक बहुत अच्छा लगा।

      हां जो दुरुह शब्द हैं और जिनका वर्णन पहले किया जा चुका है, उसका लिंक दे देने से पाठकों की प्रेशानी दूर हो सकती है।

      हटाएं

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।