सोमवार, 26 मार्च 2012

बंजरों से लड़ते-लड़ते


बंजरों से लड़ते-लड़ते

श्यामनारायण मिश्र

फागुन उनके नाम लिखे हैं,
     अपने  हिस्से  में  है
               रातें माघ की।

उमर पराई हुई
बंजरों से लड़ते-लड़ते
उनके खेत
मेड़ तक जिनके पांव नहीं पड़ते।
झुठलाने पर तुला हुआ है
समय कहावत घाघ की।

औरों की डोली देने को
कंधे हैं अपने
उपवासों के भोगे अनुभव
पारण के सपने।
अपना ही मन रहे रिझाते
दुहराते धुन फाग की।

अपने ओठ
बोल औरों के कहते
हम कुम्हार के चाक हो गए
चक्कर सहते-सहते।
अपने कस्तूरी  मृग पर है
दृष्टि भयानक बाघ की।
***  ***  ***

18 टिप्‍पणियां:

  1. अपने कस्तूरी मृग पर है
    दृष्टि भयानक बाघ की।

    बढ़िया |
    पढवाने के लिए आभार ||

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  2. उनके खेत
    मेड़ तक जिनके पांव नहीं पड़ते।

    बहुत ही बढ़िया नवगीत पढ़वाने के लिए सादर आभार आदरणीय मनोज भईया।

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  3. अपने ओठ
    बोल औरों के कहते
    हम कुम्हार के चाक हो गये...


    सच है, प्रभावी अभिव्यक्ति।

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  4. वाह!धन्यवाद इतनी खूबसूरत कविता पढ़वाने के लिए

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  5. फागुन उनके नाम लिखे हैं,
    अपने हिस्से में है
    रातें माघ की।
    वाह बहुत अच्छी रचना आभार !

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  6. उमर पराई हुई
    बंजरों से लड़ते-लड़ते
    उनके खेत
    मेड़ तक जिनके पांव नहीं पड़ते।
    झुठलाने पर तुला हुआ है
    समय कहावत घाघ की।
    वाह सर बहुत ही सुंदर भाव संयोजन सार्थक रचना आभार....

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    1. अपने ओठ
      बोल औरों के कहते
      हम कुम्हार के चाक हो गए
      चक्कर सहते-सहते।
      अपने कस्तूरी मृग पर है
      दृष्टि भयानक बाघ की।
      PATHOS.

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  7. चमत्कृत करती है इनकी रचनाएं हर बार!! इस बार भी!! बहुत ही मनभावन नवगीत!!

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  8. अपने कस्तूरी मृग पर है
    दृष्टि भयानक बाघ की।

    ... बहुत अच्छी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  9. अपने ओठ
    बोल औरों के कहते
    हम कुम्हार के चाक हो गए
    चक्कर सहते-सहते।
    अपने कस्तूरी मृग पर है
    दृष्टि भयानक बाघ की।
    jiwan ka satya .
    beautiful memorable lines.

    उत्तर देंहटाएं
  10. अपने ओठ
    बोल औरों के कहते
    हम कुम्हार के चाक हो गए
    चक्कर सहते-सहते।

    खूबसूरत गीत .... आभार

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  11. बेहद सुन्दर नवगीत ... नई परिभाषाएँ गड़ता ...

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