318. प्रेरक प्रसंग
: नियम भंग कैसे करूं?
1929
1929 की बात है। एक दिन गांधी जी को किसी विशेष कारण से शाम की प्रार्थना में पहुंचने में एक मिनट की देरी हो गई। आश्रम के प्रवेश द्वार पर जब वे पहुंचे तो वहां मौज़ूद व्यक्ति ने छोटा दरवाज़ा खोल दिया। उसने बापू से कहा कि आप प्रवेश कर जाएं। पर गांधी जी भीतर नहीं गए, वहीं खड़े रहे।
जब प्रार्थना समाप्त हुई तो वे प्रार्थना-स्थल पर पहुंचे। उन्होंने अपने भाषण में भाग न ले सकने का कारण बताते हुए
कहा,
“मैं प्रर्थना-सभा में कैसे आ
सकता था? प्रार्थना तो शुरु हो चुकी थी। मैंने ही तो यह नियम बनाया
है कि प्रार्थना शुरु होने के बाद, प्रार्थना-सभा में कोई प्रवेश न करे। इसलिए तीनों प्रवेश द्वार पर
जालीदार छोटे-छोटे दरवाज़े लगवा दिए गए हैं, जिन्हें बंद करने से दूर से ही पता चल जाए किए प्रार्थना
शुरु हो गई है।”
बापू कहा करते थे, “प्रार्थना तो मेरी
खुराक है। मैं पानी और खाने के बिना कई दिनों तक रह सकता हूं, लेकिन प्रार्थना के बिना
एक क्षण भी नहीं रह सकता।”
उनका कहना था, कि जो मनुष्य आखिरी समय में जिसका चिन्तन
करेगा, उसी की गति पाएगा। मतलब अन्त में राम का चिन्तन किया और राम-नाम लिया, तो
वह राम को पाएगा। इस पर किसी ने उनसे पूछा कि जब ऐसा है तो फिर दिन में दो बार आप
प्रार्थना क्यों करते है, बल्कि आखिर की घड़ी में राम-राम शब्द बोलेंगे, तो भी तो
सद्गति हो ही जाएगी न।
गांधी जी ने उसे समझाया, “बात तो तुम ठीक कह रहे हो। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। यह
समझ लेना चाहिए कि जिसने जीवन-भर राम-नाम का जप नहीं किया, उसके मुंह से आखिर में
राम-नाम निकलेगा ही नहीं। आन्तिम समय में मुंह से राम-नाम निकले इसके लिए तो जीवन
राममय बनाना होगा, तभी यह सम्भव है।”
बापू के मुंह से आन्तिम शब्द निकले थे --- हे राम! हे
राम!
कितना राममय था बापू का सारा जीवन!
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ पर
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