फ़ुरसत में … ज़िन्दगी और क्षणिकाएँमनोज कुमार |
| आज फ़ुरसत में … थोड़ी बात करें ज़िन्दगी की! एक बार मैंने उन्हें कह दिया तुम मेरी ज़िन्दगी हो! बहुत ख़ुश हुईं!! खनकती आवाज़ में बोलीं, “शुक्रिया!” ज़िन्दगी में भी जैसे-जैसे महत्व एवं उपयोगिता बढ़ती जाती है, व्यक्ति उत्तेजनारहित और शांत होता जाता है। खनक! सिक्कों की खनक तो सुनी ही होगी आपने। सिक्के, मूल्य वाले तो होते हैं एक, दो, पांच के, पर आवाज़ ज़्यादा निकालते हैं। वहीं दस, बीस, पचास, सौ, पांच सौ और हज़ार के नोट शांत होते हैं, ख़ामोश रहते हैं। क्यूंकि उनका मूल्य अधिक होता है। इसी तरह ज़िन्दगी में भी जैसे-जैसे महत्व एवं उपयोगिता बढ़ती जाती है, व्यक्ति उत्तेजनारहित और शांत होता जाता है। यह स्थिति तो ज्ञान के संचय से ही आती है। इस अवस्था में ज़िन्दगी सुंदर होती है। सुंदर ज़िन्दगी बस यूं ही नहीं हो जाती। इसे रोज़ बनाना पड़ता है अपनी प्रार्थनाओं से, नम्रता से, त्याग से एवं प्रेम से! ज़िन्दगी में हर कोई सफलता की ऊँचाई प्राप्त करना चाहता है। पर हम कितनी ऊँचाई प्राप्त कर सकते हैं, तब तक नहीं जान पाते जब तक हम उड़ान भरने के लिए अपने पंख नहीं फैलाते। जिन्होंने पंख फैलाया, उनके लिए तो अनंत ही सीमा है। ज़िन्दगी का हर हिस्सा एक समान नहीं होता। कुछ करड़-मरड़ की आवाज़ वाला, तो कुछ कड़वे-कसैले स्वाद वाला, वहीं कुछ मुलायम तो कुछ कठोर पल वाला। तो क्यूं ना हम जीवन के हर पल को एन्ज्वाय करें, मज़े लें, आनंद उठाएं। जब वे हमारे पास नहीं होते, ईर्द-गीर्द नहीं होते तो हम बड़ा ख़ाली-ख़ाली महसूस करते हैं, अकेलापन का अनुभव करते हैं। ऐसे लोगों से ज़िन्दगी के मतलब बदल जाते हैं। ऐसे लोग हमारे हृदय तंतुओं को छूते हैं। उनके आस-पास रहने से हममें मधुर भावनाओं का संचार होता है। ज़िन्दगी में हम विभिन्न प्रकार के लोग से मिलते हैं। कुछ लोग अन्य की तुलना में हमारे ज़्यादा प्रिय हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? इसका कारण यह नहीं है कि जब हम ऐसे लोग से मिलते हैं तो हमको अधिक ख़ुशी, प्रसन्नता का अनुभव होता बल्कि जब वे हमारे पास नहीं होते, ईर्द-गीर्द नहीं होते तो हम बड़ा ख़ाली-ख़ाली महसूस करते हैं, अकेलापन का अनुभव करते हैं। ऐसे लोगों से ज़िन्दगी के मतलब बदल जाते हैं। ऐसे लोग हमारे हृदय तंतुओं को छूते हैं। उनके आस-पास रहने से हममें मधुर भावनाओं का संचार होता है। |
और अब क्षणिकाएँ |
(एक)
तुम्हारा पदार्पण जैसे वर्षा से भींगे पल्लवों पर चमक उठी सूरज की पहली किरण। |
| (दो)
अगरबत्ती की सुगंध-सा! उड़ जाता है अवसाद मन का प्रकाश में अंधेरे सा जब तुम आ जाती हो! |
| (तीन)
हम, तुम, नदी का किनारा और मधुमास! नाविक बिन नाव लहरों का उच्छल विलास!! |
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तुम्हारे अभाव में बिखंडित, विघटित, बिखरा जीवन, या रिसते घाव-सा, बाहर से तो कम भीतर से अधिक! |
(चित्र आभार गूगल सर्च) |
शनिवार, 21 अगस्त 2010
फ़ुरसत में … ज़िन्दगी और क्षणिकाएँ
गुरुवार, 22 अप्रैल 2010
22 अप्रैल - विश्व पृथ्वी दिवस
आज है विश्व पृथ्वी दिवस। क्षिति,जल पावक, गगन, समीरा इन पांच तत्वों से मिलकर सृष्टि की रचना हुई है। और हम इस पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी हैं। अगर पृथ्वी के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाए तो इन तत्वों का कोई महत्व रह जाएगा क्या। पृथ्वी है तो सारे तत्व हैं। अतः पृथ्वी अनमोल तत्व है। इसी पर आकाश है, जल, अग्नि, और हवा है। इन सबके मेल से सुंदर प्रकृति है।
अथर्ववेद में कहा गया है –
“माताभूमिः पुत्रोsहं पृथिव्या”
अर्थात् धरती हमारी माता है और हम इसकी संतान है। आज वहीं संतान अपनी माता को क्षति पहुंचा रही है। फलस्वरूप स्वयं का नुकसान कर रही है। परिणाम हम देख ही रहे हैं। मौसम में कितना परिवर्तन आया है। अनावृष्टि, अतिवृष्टि भयंकर जाड़ा, असह्य गर्मी, मौसम चक्र, का लय टूटना आदि। हमें पृथ्वी के विभिन्न घटकों के साथ साहचर्य एवं सामंजस्य रखना चाहिए। इन दिनों भूकंप, ज्वालामुखी, चक्रवात, बाढ़, तुफान, आदि घटनाएं काफी हो रही है। चारो तरफ हाहाकार मचा हुआ है। हमने स्वयं आमंत्रित किया है इन घटनाओं को। हम अपने स्वार्थ और अंहकार की पूर्ति के लिए पृथ्वी और प्रकृति का अत्यधिक शोषण कर रहे हैं। इससे संतुलन गड़बड़ा गया है। प्रदूषण चरम पर है। इसने प्रकृति के पंच तत्वों को बुरी तरह प्रभावित किया है।
पृथ्वी की पारिस्थितिकी की अपने आप में एक सुव्यवस्था है। पर हमारे ही प्रयासों के कारण आज वह अव्यवस्थित और उजड़ सी गई प्रतीत होती है। हम पर्यावरण को नष्ट कर रहे हैं।आज इस पृथ्वी के ऊपर तरह-तरह का खतरा मंडरा रहा है। पृथ्वी पर की हरियाली नष्ट होती जा रही है। जल के स्रोत प्रदुषित हो रहे हैं। हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है। हमें पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के प्रति चिंता और चिन्तन करना चाहिए।
यह सही है कि विश्व में चतुर्दिक आर्थिक विकास हो रहा है। पर यह भी सच है कि इसके कारयण परिस्थितिकी में भी ह्रास हो रहा है। हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि हम आर्थिक विकास के साथ-साथ अपने प्राकृतिक वातावरण को भी सुरक्षित और संरक्षित रखें।
पर्यावरण के लिए जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से 1970 में उस समय के सीनेटर गेलार्ड नेल्सन ने अमेरिका में हर साल 22 अप्रैल को “अर्थ डे” मनाने की शुरूआत की थी। इसके बाद में हर साल यह दिन विश्व के प्रायः सभी देशों में मनाया जाता है।
आज हमारी पृथ्वी पर जो इतना बड़ा संकट आ खड़ा है यदि समय रहते इसका निदान-निराकरण नहीं हुआ तो हमें बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। अपने-अपने स्वार्थ के लिए पृथ्वी पर अत्याचार किया जाता है और उनके परिणामों के बारे में कोई नहीं सोचता। अगर हमें पृथ्वी को बचाना है तो हमें कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इसके लिए उद्योग जगत के साथ लेकर चलना होगा। उन्हीं के कारण कार्बन उत्सर्जन और दूसरी तरह के प्रदूषण में बढ़ोतरी हुई है। जलवायु संकट के प्रभावों से निपटने के लिए तेयार की गई कार्य योजना को सही मायनों में लागू करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
हम दिवस मना लेते हैं। कहते हैं इससे जागरूकता बढ़ती है। पर सिर्फ जागरूकता से काम नहीं चलेगा। हमें इस विश्व पृथ्वी दिवस पर संकल्प लेना चाहिए कि हम पृथ्वी और उसके वातावरण को बचाने का प्रयास करेंगे। हम पर्यावरण के प्रति न सिर्फ जागरूक हों, बल्कि उसके लिए कुछ करें भी। पृथ्वी को संकट से बचाने के लिए स्वयं अपनी ओर से हमें शुरूआत करनी चाहिए। पानी को नष्ट होने से बचाना चाहिए। वृक्षारोपयण को बढ़ावा देना चाहिए। अपने परिवेश को साफ-स्वच्छ रखना चाहिए। पृथ्वी के सभी तत्वों को संरक्षण देने का संकल्प लेना चाहिए। पृथ्वी हमारी मां है, हमें उसकी सेवा करनी चाहिए – दोहन नहीं।
शनिवार, 14 नवंबर 2009
मुझे चांद चाहिए
उफ़ .... ! रोटी कपडा और मकान का जद्दो-जहद जज़्बात पर भी लगाम लगा देता है। अब देखिये न.... अब देखिये न.... आज सुबह से ही मुझे लग रहा था कि कुछ विशेष अवसर है.... लेकिन इसके लिए भी फुरसत मे बैठना पड़ा. फिर याद आया..... आइला... ! आज तो चाचा नेहरु का बर्थ-डे है... ! अरे वही बच्चों के प्यारे चाचा पंडित जवाहर लाल नेहरु का जन्म-दिवस !! ओये.... ! चाचा नेहरु का जन्म-दिन.... !!! फिर तो आज बाल-दिवस भी है... !! तो चलिए फिर, 'जहां बच्चों का संग, वहाँ बाजे मृदंग !' आज सजाते हैं बालबारी !!! (1)
मुझे चांद चाहिए
नन्हीं इठलाती
मां , व्यस्त काम में
समझ न पाती।
भू पर पटक
खिलौना देती तोड़
क्या मां देगी
कान मरोड़ ?
या फेरेगी
हाथ पीठ पर
बोलोगी दो बोल प्यार के
उर में भर कर।
या करेगी
बात आंख से
पढ़ लेगी
बच्ची वह भाषा।
मां दे-देती आंटे का गोला
बच्ची खुश है चांद को पाकर
गुड़िया फिरसे मगन खेल में ... !!!
-- मनोज कुमार
(२)
गुड़िया रानी बड़ी सयानी
गुड़िया रानी बड़ी सयानी,
बातें करती नयी-पुरानी !
आओ आज सुनाएँ तुमको,
इस गुड़िया की मधुर कहानी !!
गुड़िया रानी बड़ी सयानी !!१!!
है तो यह छोटी सी गुड़िया,
पर बातों से लगती बुढ़िया !
खुश हो तो मिसरी की पुरिया,
वरना बन जाए यह छुरिया !!
आ जाए गर जिद पे अपनी,
याद करा दे सबकी नानी !!
गुड़िया रानी बड़ी सयानी !!२!!
आँगन मे गूंजी किलकारी,
मीठी-मीठी प्यारी-प्यारी !
कलकंठी कोयल के स्वर से,
चाहक उठे जैसे फुलबारी !!
हँसे -हँसाए रोये गाए,
कू-कू कर के मुझे बुलाए !
मैं जाऊं तो वो छुप जाए,
मिले तो हँस के हाथ बजाए !!
करतब अचरज भरे देख कर,
होती है सबको हैरानी !!
गुड़िया रानी बड़ी सयानी !!३!!
कुछ दिन में यह काम करेगी,
माँ इसकी आराम करेगी !
पढ़-लिख कर के जग में रोशन,
पापाजी का नाम करेगी !!
फिर कुछ दिन में बड़ी बनेगी,
सज-धज कर के परी बनेगी !
और ख़ुशी के पंख लगेंगे,
जाने किनके भाग्य जगेंगे !!
फिर गुड्डे राजा आयेंगे,
गुड़िया को संग ले जायेंगे !
हम सब रोते रह जायेंगे,
हो जायेगी ख़त्म कहानी !!
गुड़िया रानी बड़ी सयानी !!४!!
-- करण समस्तीपुरी
मित्रों कविता अगर आपको पसंद आयी तो आप इसका आनंद सुन कर भी ले सकते हैं. http://podcast.hindyugm.com/2008/03/gudiya-rani-badi-sayani.html//
पर क्लीक कीजिये !!!
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गुरुवार, 24 सितंबर 2009
विश्व विटप की डाली पर
मेरा वह प्यारा फूल कहां!
है सुख की शीतल छांव कहां,
चुभते पग-पग पर शूल यहां!
जग में बस पीड़ा ही पीड़ा,
दुख ज्वाला में जलते तारे।
शशि के उर में करुण वेदना,
प्रिय चकोर हैं दूर हमारे।।
बड़ी विचित्र रचना इस जग की,
कांटों में खिलते फूल यहां।
है सुख की शीतल छांव कहां,
चुभते पग-पग पर शूल यहां!
नीर बरसते झम-झम झम-झम,
बादल अम्बर के विरहाकुल।
टकरा-टकरा कर उपलों से,
तट छूने को लहरें व्याकुल।
कैसे पार लगेगी नौका,
हैं धाराएं प्रतिकूल यहां।
है सुख की शीतल छांव कहां,
चुभते पग-पग पर शूल यहां!
सुमनों में अब वह सुरभि नहीं,
कोकिल की कूक में दर्द भरा।
मरघट की सी नीरवता में,
है डूब रही सम्पूर्ण धरा।।
सब देख रहे इक-दूजे को,
कर दी है किसने भूल कहां।
है सुख की शीतल छांव कहां,
चुभते पग-पग पर शूल यहां!
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काश! ....