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सोमवार, 30 दिसंबर 2019

रघुवीर सहाय- नयी कविता के महत्त्वपूर्ण कवि


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रघुवीर सहाय- नयी कविता के महत्त्वपूर्ण कवि 
30 दिसंबर पुण्य तिथि पर
मनोज कुमार
नयी कविता के महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक श्री रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसम्बर, 1929 को लखनऊ के मॉडल हाउस मुहल्ले में एक शिक्षित मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री हरदेव सहाय लखनऊ के बॉय एंग्लो बंगाली स्कूल में साहित्य के अध्यापक थे। दो वर्ष की उम्र में मां श्रीमती तारा सहाय की ममता से वंचित हो चुके रघुवीर की शिक्षा-दीक्षा लखनऊ में ही हुई थी। 1951 में इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। 16-17 साल की उम्र से ही ये कविताएं लिखने लगे, जो ‘आजकल’, ‘प्रतीक’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही। 1949 में इन्होंने ‘दूसरा सप्तक’ में प्रकाशन के लिए अपनी कविताएं अज्ञेय  को दे दी थीं जो 1951 में प्रकाशित हुईं। एम.ए. करने के बाद 1951 में ये अज्ञेय द्वारा संपादित ‘प्रतीक’ में सहायक संपादक के रूप में कार्य करने दिल्ली आ गए। प्रतीक के बंद हो जाने के बाद इन्होने आकाशवाणी दिल्ली के समाचार विभाग में उप-संपादक का कार्य-भार संभाला। 1957 में आकाशवाणी से त्याग-पत्र देकर इन्होंने मुक्त लेखन शुरू कर दिया। इसी वर्ष इनकी ‘हमारी हिंदी’ शीर्षक कविता जो ‘युग-चेतना’ में छपी थी को लेकर काफ़ी बवाल मचा। 1959 में फिर से आकाशवाणी से तीन साल के लिए जुड़े। वहां से मुक्त होने के बाद वे ‘नवभारत टाइम्स’ के विशेष संवाददाता बने। वहां से ये ‘दिनमान’ के समाचार संपादक बने। अज्ञेय के त्याग-पत्र देने के बाद वे 1970 में ‘दिनमान’ के संपादक बने। व्यवस्था विरोधी लेखों के कारण 1982 में वे ‘दिनमान’ से ‘नवभारत टाइम्स’ में स्थानांतरित कर दिए गए। किंतु इस स्थानांतरण से असंतुष्ट होकर उन्होंने 1983 में त्याग-पत्र दे दिया और पुनः स्वतंत्र लेखन करने लगे। 30 दिसंबर 1990 को उनका निधन हुआ था।

रचनाएं :
कविता संग्रह : सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हंसो-हंसो जल्दी हंसो, लोग भूल गए हैं, कुछ अते और कुछ चिट्ठियां
कहानी संग्रह : रास्ता इधर से है, जो आदमी हम बना रहे हैं
निबंध संग्रह : लिखने का कारण, ऊबे हुए सुखी, वे और नहीं होंगे जो मारे जाएंगे, भंवर लहरें और तरंग, शब्द शक्ति, यथार्थ यथास्थिति नहीं।
अनुवाद : मेकबेथ और ट्रेवेल्थ नाइट, आदि।

पर 1960 में प्रकाशित उनकी पहली पुस्तक ‘सीढ़ियों पर धूप में’  में उनकी कविताएं, कहानियां और वैचारिक टिप्पणियां एक साथ संकलित हैं। इस पुस्तक का संपादन सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने किया था। इस पुस्तक की रचनाएं पिछली शताब्दी के साठ के दशक की हैं। वह दौर नये साहित्य के आरंभ का दौर था। सहाय जी नये साहित्य के आरंभकर्त्ताओं में से रहे हैं। इस पुस्तक में दस कहानियां, ग्यारह लेख और अठहत्तर कविताएं हैं। कविता संग्रह 'लोग भूल गए हैं ' के लिए 1984 में रघुवीर सहाय को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
रघुवीर सहाय की विचारधारात्मक दृष्टि
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जो नयी काव्य-धारा उभरकर सामने आई उसमें रचनाकारों का एक समुदाय लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उदासीन था और वह राजनीति-विरोधी होता गया। उस प्रयोगवाद और नयी कविता की संधि के लगभग एकमात्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण कवि रघुवीर सहाय ही थे, जिन्होंने अपनी जनतांत्रिक संवेदनशीलता को क़ायम रखा।  नयी कविता के बाद की युवा विद्रोही कविता का मुहावरा बनानेवालों में भी वे अग्रणी कवि हैं। ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ काव्य संग्रह के द्वारा उन्होंने प्रतिपक्षधर्मी समकालीन कविता को राजनीतिक अर्थमयता और मानवीय तात्कालिकता प्रदान की। वे ‘शिल्प क्रीड़ा कौतुक’ का उपयोग कर रोमांटिक गंभीरता को छिन्न-भिन्न करके नये अर्थ संगठन को जन्म देते हैं, जो जीवन की विडम्बनापूर्ण त्रासदी को प्रत्यक्ष करता है।
देखो वृक्ष को देखो कुछ कर रहा है
किताबी होगा वह कवि जो कहेगा
हाय पत्ता झर रहा है।

पतझर में नयी रचना का संकेत उत्पीड़ित-शोषित जीवन में नए बदलाव को भी संकेतित करता है। उनकी कविता में विचार-वस्तु अपनी विविधता में और वैचारिक स्पष्टता में सत्य बनकर उभरती है। उनका मानना था कि विचारवस्तु का कविता में ख़ून की तरह दौड़ते रहना कविता को जीवन और शक्ति देता है, और यह तभी संभव है जब हमारी कविता की जड़ें यथार्थ में हों। उन्होंने कविता की विचारवस्तु को अपने समय और समाज के यथार्थ से तो जोड़ा ही, वे अपने समय के आर-पार देखपाने में समर्थ हुए। वे मानते हैं कि वर्तमान को सर्जना का विषय बनाने के लिए ज़रूरी है कि रचनाकार वर्तमान से मुक्त हो। वर्तमान की सही व्याख्या कर भविष्य का एक स्वप्न दिखा जिसे साकार किया जा सकता हो। ‘सभी लुजलुजे हैं’ में कहते हैं -
खोंखियाते हैं, किंकियाते हैं, घुन्‍नाते हैं
चुल्‍लु में उल्‍लू हो जाते हैं
मिनमिनाते हैं, कुड़कुड़ाते हैं
सो जाते हैं, बैठ जाते हैं, बुत्ता दे जाते हैं
झांय झांय करते है, रिरियाते हैं,
टांय टांय करते हैं, हिनहिनाते हैं
गरजते हैं, घिघियाते हैं
ठीक वक़्त पर चीं बोल जाते हैं
सभी लुजलुजे हैं, थुलथुल है, लिब लिब हैं,
पिलपिल हैं,
सबमें पोल है, सब में झोल है, सभी लुजलुजे हैं।

शोषक वर्ग की चालबाज़ियों को उन्होंने बख़ूबी नंगा किया और दया, सहानुभूति और करुणा जैसे भावों में नाबराबरी और अभिजात्यवादी अहं की गंध महसूस की। मनुष्य और मनुष्य के बीच समानता और सामाजिक न्याय उनके रचनाकर्म का लक्ष्य रहा। नारी के प्रति भी उनका दृष्टिकोण समता का रहा। उनका मानना था कि लोगों के जागते रहने की एक तरकीब यह है कि लोग वास्तविक जनजीवन के विकासोन्मुख तत्वों से अपने को सक्रिय संबंद्ध रखें। उन्होंने मध्यवर्गीय समाज को यह अहसास दिलाया कि अधिनायकवादी ताक़तों का मुक़ाबला संगठित होकर ही किया जा सकता है।
नयी कविता के अन्य कवियों की भांति, रघुवीर सहाय ने प्रतीकों, बिम्बों और मिथकों का सहारा बहुत कम लिया है। इन्होंने बोलचाल की भाषा के साधारण शब्दों का प्रयोग अधिक किया है, जिसे डॉ. नामवर सिंह ‘असाधारण साधारणता’ कहते हैं। भाषा में सहज प्रवाह उनकी कविता की प्रमुख विशेषता है। सहाय जी की भाषा, आधुनिक हिन्दी के काव्य की दृष्टि से सफल और एक अलग स्वाद रखती है। न्याय और बराबरी के आदर्श को बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर कवि सहाय ने अपनी चेतना में आत्मसात किया। ‘हमने देखा’ शीर्षक कविता में कहते हैं,

जो हैं, वे भी हो जाया करते हैं कम
हैं ख़ास ढ़ंग दुख से ऊपर उठने का
है ख़ास तरह की उनकी अपनी तिकड़म
हम सहते हैं इसलिए कि हम सच्चे हैं
हम जो करते हैं वह ले जाते हैं वे
वे झूठे हैं लेकिन सब से अच्छे हैं

रघुवीर सहाय उस काव्यतत्व का अन्वेषण करने पर अधिक ज़ोर देते थे जो कला की सौंदर्य परम्परा को आगे बढाता है। उनकी शुरु की कविताओं में भाषा के साथ एक खिलंदड़ापन मिलता है जो संवेदना के साथ बाद में काव्यगत विडंबना के लिए काम आता है। उनकी एक मशहूर कविता ‘दुनिया’ की भाषा में यही क्रीड़ाभाव देखा जा सकता है,

लोग या तो कृपा करते हैं या ख़ुशामद करते हैं
लोग या तो ईर्ष्या करते हैं या चुग़ली खाते हैं
लोग या तो शिष्टाचार करते हैं या खिसियाते हैं
लोग या तो पश्चात्ताप करते हैं या घिघियाते हैं
न कोई तारीफ़ करता है न कोई बुराई करता है
न कोई हंसता है न कोई रोता है
न कोई प्यार करता है न कोई नफ़रत
लोग या तो दया करते हैं या घमण्ड
दुनिया एक फंफुदियायी हुई सी चीज़ हो गयी है।

इसी तरह के भाषिक खिलंदड़ेपन की एक और कविता है जो मध्यमवर्गीय लोगों के बारे में है, ‘सभी लुजलुजे हैं’ जिसमें ऐसे चुने हुए शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जो कविता में शायद ही कभी प्रयुक्त हुए हों,

खोंखियाते हैं, किंकियाते हैं, घुन्नाते हैं
चुल्लु में उल्लू हो जाते हैं
मिनमिनाते हैं, कुड़कुड़ाते हैं
सो जाते हैं, बैठ रहते हैं, बुत्ता दे जाते हैं।

भाषा का यह खेल उनकी काव्य यात्रा में गंभीर होते हुए अपने जीवन की बात करते-करते एक और जीवन की बात करने लगता है, कविता ‘मेरा एक जीवन है’ में,

मेरा एक जीवन है
उसमें मेरे प्रिय हैं, मेरे हितैषी हैं, मेरे गुरुजन हैं
उसमें मेरा कोई अन्यतम भी है:
पर मेरा एक और जीवन है
जिसमें मैं अकेला हूं
जिस नगर के गलियारों फुटपाथों मैदानों में घूमा हूं
हंसा-खेला हूं
.....
पर इस हाहाहूती नगरी में अकेला हूं

सहाय जी हाहाहूती नगरी जैसे भाषिक प्रयोग से पूरी पूंजीवादी सभ्यता की चीखपुकार व्यक्त कर देते हैं, इसकी गलाकाट स्पर्धा का पर्दाफ़ाश कर देते हैं। कविता के अंत में वो कहते हैं,

पर मैं फिर भी जिऊंगा
इसी नगरी में रहूंगा
रूखी रोटी खाऊंगा और ठंडा पानी पियूंगा
क्योंकि मेरा एक और जीवन है और उसमें मैं अकेला हूं।

सहाय जी की भाषा संबंधी अन्वेषण के बारे में महेश आलोक के शब्दों में कहें तो, “सहाय निरन्तर शब्दों की रचनात्मक गरमाहट, खरोंच और उसकी आंच को उत्सवधर्मी होने से बचाते हैं और लगभग कविता के लिए अनुपयुक्त हो गये शब्दों की अर्थ सघनता को बहुत हल्के से खोलते हुए एक खास किस्म के गद्यात्मक तेवर को रिटौरिकल मुहावरे में तब्दील कर देते हैं।”

उनकी कविताओं में लय का एक खास स्थान हमेशा रहा। उनके लय के संबंध में दृष्टि उनके इस कथन से मिलती है, “आधुनिक कविता में संसार के नये संगीत का विशेष स्थान है और वह आधुनिक संवेदना का आवश्यक अंग है।”
‘भक्ति है यह’ कविता उदाहरण के तौर पर लेते हैं,

भक्ति है यह
ईश-गुण-गायन नहीं है
यह व्यथा है
यह नहीं दुख की कथा है
यह हमारा कर्म है, कृति है
यही निष्कृति नहीं है
यह हमारा गर्व है
यह साधना है – साध्य विनती है।

भाषा में सहज प्रवाह उनकी कविता की प्रमुख विशेषता है। सहाय जी की भाषा, आधुनिक हिन्दी के काव्य की दृष्टि से सफल और एक अलग स्वाद रखती है। न्याय और बराबरी के आदर्श को बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर कवि सहाय ने अपनी चेतना में आत्मसात किया। ‘हमने देखा’ शीर्षक कविता में कहते हैं,

जो हैं, वे भी हो जाया करते हैं कम
हैं ख़ास ढ़ंग दुख से ऊपर उठने का
है ख़ास तरह की उनकी अपनी तिकड़म
हम सहते हैं इसलिए कि हम सच्चे हैं
हम जो करते हैं वह ले जाते हैं वे
वे झूठे हैं लेकिन सब से अच्छे हैं

पत्रकारिता एवं साहित्य कर्म में रघुवीर सहाय कोई फ़र्क़ नहीं मानते थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उन्होंने एक नई और क्रिएटिव भाषा गढ़ी। आधुनिक सभ्य समाज के लिए न्याय, समता, स्वतंत्रता, और बंधुत्व जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर उनकी गहरी आस्था थी। असमानता और अन्याय का प्रतिकार सहाय जी की रचनाओं का संवेदनात्मक उद्देश्य रहा है, उन्होंने जहां भी इसका अभाव देखा, उसके ख़िलाफ़ आवाज उठाई।

निर्धन जनता का शोषण है
कहकर आप हंसे
लोकतंत्र का अंतिम क्षण है
कहकर आप हंसे
सबके सब हैं भ्रष्टाचारी
कहकर आप हंसे
चारों ओर बड़ी लाचारी
कहकर आप हंसे
कितने आप सुरक्षित होंगे मैं सोचने लगा
सहसा मुझे अकेला पाकर फिर से आप हंसे

रघुवीर सहाय की काव्य भाषा बोलचाल की भाषा है। पर इसी सहजपन में यह जीवन के यथार्थ को, उसके कटु एवं तिक्त अनुभव को पूरी शक्ति के साथ अभिव्यक्त करने में समर्थ है। साथ ही यह देख कर आश्चर्य होता है कि अनेक कविताएं पारंपरिक छंदों के नये उपयोग से निर्मित हैं। साठोत्तरी दशक के हिंदी कवियों में रघुवीर सहाय ऐसे कवि हैं, जिन्होंने बड़ी सजगता और ईमानदारी से अपने काव्य में भाषा का प्रयोग किया है। वे जनता और उसकी समस्याओं से सम्बद्ध कवि हैं। उनका उद्देश्य अपने समय की विद्रूपता और विसंगतियों को उद्घाटित करना रहा है। वे विद्रूपता और विसंगतियों का चित्रण इस प्रकार करते हैं कि लोक-चेतना जागृत हो। वे अपनी रचनाओं के माध्यम से न सिर्फ़ आज की सामंती-बुर्जुआ-पूंजीवादी व्यवस्था को, जो लोकतंत्र के नाम पर सत्ता हड़पने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती है, बल्कि जिसके उत्पीड़न-शोषण, अन्याय-अत्याचार के कारण संपूर्ण समाज में दहशत और आतंक छा गया है, को नंगा करते हैं।
***

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

रघुवीर सहाय- नयी कविता के महत्त्वपूर्ण कवि

रघुवीर सहाय- नयी कविता के महत्त्वपूर्ण कवि clip_image001

30 दिसंबर पुण्य तिथि पर

नयी कविता के महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक श्री रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसम्बर, 1929 को लखनऊ के मॉडल हाउस मुहल्ले में एक शिक्षित मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री हरदेव सहाय लखनऊ के बॉय एंग्लो बंगाली स्कूल में साहित्य के अध्यापक थे। दो वर्ष की उम्र में मां श्रीमती तारा सहाय की ममता से वंचित हो चुके रघुवीर की शिक्षा-दीक्षा लखनऊ में ही हुई थी। 1951 में इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। 16-17 साल की उम्र से ही ये कविताएं लिखने लगे, जो ‘आजकल’, ‘प्रतीक’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही। 1949 में इन्होंने ‘दूसरा सप्तक’ में प्रकाशन के लिए अपनी कविताएं अज्ञेय को दे दी थीं जो 1951 में प्रकाशित हुईं। एम.ए. करने के बाद 1951 में ये अज्ञेय द्वारा संपादित ‘प्रतीक’ में सहायक संपादक के रूप में कार्य करने दिल्ली आ गए। प्रतीक के बंद हो जाने के बाद इन्होने आकाशवाणी दिल्ली के समाचार विभाग में उप-संपादक का कार्य-भार संभाला। 1957 में आकाशवाणी से त्याग-पत्र देकर इन्होंने मुक्त लेखन शुरू कर दिया। इसी वर्ष इनकी ‘हमारी हिंदी’ शीर्षक कविता जो ‘युग-चेतना’ में छपी थी को लेकर काफ़ी बवाल मचा। 1959 में फिर से आकाशवाणी से तीन साल के लिए जुड़े। वहां से मुक्त होने के बाद वे ‘नवभारत टाइम्स’ के विशेष संवाददाता बने। वहां से ये ‘दिनमान’ के समाचार संपादक बने। अज्ञेय के त्याग-पत्र देने के बाद वे 1970 में ‘दिनमान’ के संपादक बने। व्यवस्था विरोधी लेखों के कारण 1982 में वे ‘दिनमान’ से ‘नवभारत टाइम्स’ में स्थानांतरित कर दिए गए। किंतु इस स्थानांतरण से असंतुष्ट होकर उन्होंने 1983 में त्याग-पत्र दे दिया और पुनः स्वतंत्र लेखन करने लगे। 30 दिसंबर 1990 को उनका निधन हुआ था।

रचनाएं :

कविता संग्रह : सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हंसो-हंसो जल्दी हंसो, लोग भूल गए हैं, कुछ अते और कुछ चिट्ठियां

कहानी संग्रह : रास्ता इधर से है, जो आदमी हम बना रहे हैं

निबंध संग्रह : लिखने का कारण, ऊबे हुए सुखी, वे और नहीं होंगे जो मारे जाएंगे, भंवर लहरें और तरंग, शब्द शक्ति, यथार्थ यथास्थिति नहीं।

अनुवाद : मेकबेथ और ट्रेवेल्थ नाइट, आदि।

रघुवीर सहाय की विचारधारात्मक दृष्टि

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जो नयी काव्य-धारा उभरकर सामने आई उसमें रचनाकारों का एक समुदाय लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उदासीन था और वह राजनीति-विरोधी होता गया। उस प्रयोगवाद और नयी कविता की संधि के लगभग एकमात्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण कवि रघुवीर सहाय ही थे, जिन्होंने अपनी जनतांत्रिक संवेदनशीलता को क़ायम रखा। नयी कविता के बाद की युवा विद्रोही कविता का मुहावरा बनानेवालों में भी वे अग्रणी कवि हैं। ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ काव्य संग्रह के द्वारा उन्होंने प्रतिपक्षधर्मी समकालीन कविता को राजनीतिक अर्थमयता और मानवीय तात्कालिकता प्रदान की। वे ‘शिल्प क्रीड़ा कौतुक’ का उपयोग कर रोमांटिक गंभीरता को छिन्न-भिन्न करके नये अर्थ संगठन को जन्म देते हैं, जो जीवन की विडम्बनापूर्ण त्रासदी को प्रत्यक्ष करता है।

देखो वृक्ष को देखो कुछ कर रहा है

किताबी होगा वह कवि जो कहेगा

हाय पत्ता झर रहा है।

पतझर में नयी रचना का संकेत उत्पीड़ित-शोषित जीवन में नए बदलाव को भी संकेतित करता है। उनकी कविता में विचार-वस्तु अपनी विविधता में और वैचारिक स्पष्टता में सत्य बनकर उभरती है। उनका मानना था कि विचारवस्तु का कविता में ख़ून की तरह दौड़ते रहना कविता को जीवन और शक्ति देता है, और यह तभी संभव है जब हमारी कविता की जड़ें यथार्थ में हों। उन्होंने कविता की विचारवस्तु को अपने समय और समाज के यथार्थ से तो जोड़ा ही, वे अपने समय के आर-पार देखपाने में समर्थ हुए। वे मानते हैं कि वर्तमान को सर्जना का विषय बनाने के लिए ज़रूरी है कि रचनाकार वर्तमान से मुक्त हो। वर्तमान की सही व्याख्या कर भविष्य का एक स्वप्न दिखा जिसे साकार किया जा सकता हो। सभी लुजलुजे हैं में कहते हैं -

खोंखियाते हैं, किंकियाते हैं, घुन्‍नाते हैं

चुल्‍लु में उल्‍लू हो जाते हैं

मिनमिनाते हैं, कुड़कुड़ाते हैं

सो जाते हैं, बैठ जाते हैं, बुत्ता दे जाते हैं

झांय झांय करते है, रिरियाते हैं,

टांय टांय करते हैं, हिनहिनाते हैं

गरजते हैं, घिघियाते हैं

ठीक वक़्त पर चीं बोल जाते हैं

सभी लुजलुजे हैं, थुलथुल है, लिब लिब हैं,

पिलपिल हैं,

सबमें पोल है, सब में झोल है, सभी लुजलुजे हैं।

शोषक वर्ग की चालबाज़ियों को उन्होंने बख़ूबी नंगा किया और दया, सहानुभूति और करुणा जैसे भावों में नाबराबरी और अभिजात्यवादी अहं की गंध महसूस की। मनुष्य और मनुष्य के बीच समानता और सामाजिक न्याय उनके रचनाकर्म का लक्ष्य रहा। नारी के प्रति भी उनका दृष्टिकोण समता का रहा। उनका मानना था कि लोगों के जागते रहने की एक तरकीब यह है कि लोग वास्तविक जनजीवन के विकासोन्मुख तत्वों से अपने को सक्रिय संबंद्ध रखें। उन्होंने मध्यवर्गीय समाज को यह अहसास दिलाया कि अधिनायकवादी ताक़तों का मुक़ाबला संगठित होकर ही किया जा सकता है।

नयी कविता के अन्य कवियों की भांति, रघुवीर सहाय ने प्रतीकों, बिम्बों और मिथकों का सहारा बहुत कम लिया है। इन्होंने बोलचाल की भाषा के साधारण शब्दों का प्रयोग अधिक किया है, जिसे डॉ. नामवर सिंह ‘असाधारण साधारणता’ कहते हैं। भाषा में सहज प्रवाह उनकी कविता की प्रमुख विशेषता है। सहाय जी की भाषा, आधुनिक हिन्दी के काव्य की दृष्टि से सफल और एक अलग स्वाद रखती है। न्याय और बराबरी के आदर्श को बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर कवि सहाय ने अपनी चेतना में आत्मसात किया। ‘हमने देखा’ शीर्षक कविता में कहते हैं,

जो हैं, वे भी हो जाया करते हैं कम

हैं ख़ास ढ़ंग दुख से ऊपर उठने का

है ख़ास तरह की उनकी अपनी तिकड़म

हम सहते हैं इसलिए कि हम सच्चे हैं

हम जो करते हैं वह ले जाते हैं वे

वे झूठे हैं लेकिन सब से अच्छे हैं

रघुवीर सहाय उस काव्यतत्व का अन्वेषण करने पर अधिक ज़ोर देते थे जो कला की सौंदर्य परम्परा को आगे बढाता है। उनकी शुरु की कविताओं में भाषा के साथ एक खिलंदड़ापन मिलता है जो संवेदना के साथ बाद में काव्यगत विडंबना के लिए काम आता है। उनकी एक मशहूर कविता ‘दुनिया’ की भाषा में यही क्रीड़ाभाव देखा जा सकता है,

लोग या तो कृपा करते हैं या ख़ुशामद करते हैं

लोग या तो ईर्ष्या करते हैं या चुग़ली खाते हैं

लोग या तो शिष्टाचार करते हैं या खिसियाते हैं

लोग या तो पश्चात्ताप करते हैं या घिघियाते हैं

न कोई तारीफ़ करता है न कोई बुराई करता है

न कोई हंसता है न कोई रोता है

न कोई प्यार करता है न कोई नफ़रत

लोग या तो दया करते हैं या घमण्ड

दुनिया एक फंफुदियायी हुई सी चीज़ हो गयी है।

इसी तरह के भाषिक खिलंदड़ेपन की एक और कविता है जो मध्यमवर्गीय लोगों के बारे में है, ‘सभी लुजलुजे हैं’ जिसमें ऐसे चुने हुए शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जो कविता में शायद ही कभी प्रयुक्त हुए हों,

खोंखियाते हैं, किंकियाते हैं, घुन्नाते हैं

चुल्लु में उल्लू हो जाते हैं

मिनमिनाते हैं, कुड़कुड़ाते हैं

सो जाते हैं, बैठ रहते हैं, बुत्ता दे जाते हैं।

भाषा का यह खेल उनकी काव्य यात्रा में गंभीर होते हुए अपने जीवन की बात करते-करते एक और जीवन की बात करने लगता है, कविता‘मेरा एक जीवन है’ में,

मेरा एक जीवन है

उसमें मेरे प्रिय हैं, मेरे हितैषी हैं, मेरे गुरुजन हैं

उसमें मेरा कोई अन्यतम भी है:

पर मेरा एक और जीवन है

जिसमें मैं अकेला हूं

जिस नगर के गलियारों फुटपाथों मैदानों में घूमा हूं

हंसा-खेला हूं

.....

पर इस हाहाहूती नगरी में अकेला हूं

सहाय जी हाहाहूती नगरी जैसे भाषिक प्रयोग से पूरी पूंजीवादी सभ्यता की चीखपुकार व्यक्त कर देते हैं, इसकी गलाकाट स्पर्धा का पर्दाफ़ाश कर देते हैं। कविता के अंत में वो कहते हैं,

पर मैं फिर भी जिऊंगा

इसी नगरी में रहूंगा

रूखी रोटी खाऊंगा और ठंडा पानी पियूंगा

क्योंकि मेरा एक और जीवन है और उसमें मैं अकेला हूं।

सहाय जी की भाषा संबंधी अन्वेषण के बारे में महेश आलोक के शब्दों में कहें तो, “सहाय निरन्तर शब्दों की रचनात्मक गरमाहट, खरोंच और उसकी आंच को उत्सवधर्मी होने से बचाते हैं और लगभग कविता के लिए अनुपयुक्त हो गये शब्दों की अर्थ सघनता को बहुत हल्के से खोलते हुए एक खास किस्म के गद्यात्मक तेवर को रिटौरिकल मुहावरे में तब्दील कर देते हैं।”

उनकी कविताओं में लय का एक खास स्थान हमेशा रहा। उनके लय के संबंध में दृष्टि उनके इस कथन से मिलती है, “आधुनिक कविता में संसार के नये संगीत का विशेष स्थान है और वह आधुनिक संवेदना का आवश्यक अंग है।”

‘भक्ति है यह’ कविता उदाहरण के तौर पर लेते हैं,

भक्ति है यह

ईश-गुण-गायन नहीं है

यह व्यथा है

यह नहीं दुख की कथा है

यह हमारा कर्म है, कृति है

यही निष्कृति नहीं है

यह हमारा गर्व है

यह साधना है – साध्य विनती है।

रघुवीर सहाय की काव्य भाषा बोलचाल की भाषा है। पर इसी सहजपन में यह जीवन के यथार्थ को, उसके कटु एवं तिक्त अनुभव को पूरी शक्ति के साथ अभिव्यक्त करने में समर्थ है। साथ ही यह देख कर आश्चर्य होता है कि अनेक कविताएं पारंपरिक छंदों के नये उपयोग से निर्मित हैं। साठोत्तरी दशक के हिंदी कवियों में रघुवीर सहाय ऐसे कवि हैं, जिन्होंने बड़ी सजगता और ईमानदारी से अपने काव्य में भाषा का प्रयोग किया है। वे जनता और उसकी समस्याओं से सम्बद्ध कवि हैं। उनका उद्देश्य अपने समय की विद्रूपता और विसंगतियों को उद्घाटित करना रहा है। वे विद्रूपता और विसंगतियों का चित्रण इस प्रकार करते हैं कि लोक-चेतना जागृत हो। वे अपनी रचनाओं के माध्यम से न सिर्फ़ आज की सामंती-बुर्जुआ-पूंजीवादी व्यवस्था को, जो लोकतंत्र के नाम पर सत्ता हड़पने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती है, बल्कि जिसके उत्पीड़न-शोषण, अन्याय-अत्याचार के कारण संपूर्ण समाज में दहशत और आतंक छा गया है, को नंगा करते हैं।

***

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

फ़ुरसत में .... एक आत्‍मचेतना कलाकार

फ़ुरसत में ....

एक आत्‍मचेतना कलाकार

रघुवीर सहाय

(पुण्य तिथि ३० दिसम्बर)

मनोज कुमार

दिसम्बर का महीना आते हुए साहित्‍य जगत को एक अनमोल रत्‍न दे गया और जाते-जाते उन्‍हें हमसे लेता भी गया। उनके बारे में अज्ञेय जी का कहना था, ‘उनकी भाषा शिखरों की ओर न ताक कर शहर की चौक की ओर उन्‍मुख थी’ और ‘जो चट्टानों पर चढ़ नाटकीय मुद्रा में बैठने का मोह छोड साधारण घरों की सीढि़यों की धूप में बैठकर प्रसन्‍न रहता था’ और जिसका ‘स्‍वस्‍थ भाव कविताओं को एक स्निग्‍ध मर्मस्‍पर्शिता दे देता है जाड़ों के घाम की तरह उसमें तात्‍क्षणिक गरमाई भी और एक उदार खुलापन भी’ ..... उसी महान साहित्‍यकार को याद करते है आज फुरसत में.....!

9 दिसम्‍बर 1929 को लखनऊ में जन्‍मे रघुवीर सहाय अंग्रेजी साहित्‍य से एम.ए. थे। अपने पत्रकारिता जीवन की शुरूआत उन्‍होंने लखनऊ से प्रकाशित होने वाले “नवजीवन” से किया। फिर दिल्‍ली आकर “प्रतीक” के सहायक संपादक हुए। आकाशवाणी के समाचार विभाग से भी जुड़े। हैदराबाद में “कल्‍पना” के संपादक मंडल के सदस्‍य और 1963-67 तक “नवभारत टाइम्‍स” के विशेष संवाददाता रहे। 1967-82 तक “दिनमान” से समाचार संपादक और प्रधान संपादक के रूप में जुड़े रहे। 82 से 90 तक स्‍वतंत्र लेखन किया। 30 दिसम्‍बर, 1990 को उनका निधन हुआ।

“लोग भूल गए हैं” के लिए साहित्‍य अकादमी से सम्‍मानित रघुवीर सहाय के सीढि़यों पर धूप में, आत्‍महत्‍या के विरूद्ध, हंसो हंसो जल्‍दी हंसो, कुछ पते कुछ चिट्ठियां और एक समय था, उनके द्वारा रचित कविता संग्रह है। रास्‍ता इधर से है, जो आदमी हम बना रहे है, उनके कहानी संग्रह हैं तथा दिल्‍ली मेरा परदेश, लिखने के कारण, ऊबे हुए सुखी, वे और नहीं होंगे जो मारे जाएंगे, भंवर लहरें और तरंग, शब्द शक्ति, अर्थात्, उनके निबंध और टिप्‍पणियां है।

“ कितना संपूर्ण होगा वह व्‍यक्ति जो सुन्‍दर को देख सकता है पर कुरूप की उपस्थिति में विचलित नहीं होता। निश्‍चय ही उसका अस्‍वीकार असुन्‍दर से है, कुरूप से नहीं”। -- रघुवीर सहाय

पत्‍नी विमलेश्‍वरी सहाय का कहना है कि सहाय जी नये साहित्‍य के आरंभकर्त्ताओं में रहे हैं। रघुवीर सहाय नई कविता के महत्‍वपूर्ण कवियों में से एक हैं। अज्ञेय के शब्‍दों में कहें तो – रघुवीर सहाय एक आत्‍मचेतना कलाकार हैं, और यह आत्‍मचेतना उनकी आधुनिकता की बुनियाद है। पत्रकारिता की भाषा को सृजनात्‍मक भाषा में बदलने का संघर्ष उनकी कविताओं की सफलता में साफ दिखाई पड़ता है। उनके विज़न में व्‍यापकता और गहराई है। भोंथरे, घिस चुके यथार्थ भी उनकी लेखनी का स्पर्श पाकर प्रकाश की चकाचौंध की तरह हमारी आंखों के सामने प्रस्‍तुत हो जाते हैं।

सहाय जी का मानना था,

“विचारवस्‍तु की कविता में खून की तरह दौड़ते रहना कविता को जीवन और शक्ति देता है, और यह तभी संभव है। जब हमारी कविता की जड़े यथार्थ में हों।”

कविता की विचारवस्‍तु को समय और समाज के यथार्थ से जोड़ कर प्रस्‍तुत करने के कारण ही उन्‍हें “समय के आर-पार देखता हुआ कवि” कहते हैं तभी तो वे कहते हैं –

घड़ी नहीं कहती ‘डिग’ जा अपने पथ से

डिग जाने पर घड़ी नहीं कहती है ‘धिक’

और यह तो वह कभी नहीं कहती है, साथी “ठीक” है

वह कहती है टिक-टिक-टिक-टिक

और टिक-टिक-टिक-टिक

और टिक और टिक

और टिक

और टिक

टिक्‌

दिन यदि चले गए वैभव के तृष्णा के तो नहीं गये साधन सुख के गये हमारे रचना के तो नहीं गए......... -- रघुवीर सहाय

यह टिकने की टेक है। ध्‍वनियों का खेल मात्र नहीं है यह। समय के आर पार देखने के लिए विचारधारात्‍मक दृष्टि की ज़रूरत पड़ती है। रघुवीर सहाय ने उस विद्या को हासिल किया जो हमें मुक्‍त करती है जो अपने समय के शासक-शोषक वर्गों की सही पहचान करा सके। भारतीय जीवन को गहराई से जानने वाले रचनाकार रघुवीर सहाय ने न सिर्फ वर्तमान की सही व्‍याख्‍या की बल्कि भविष्‍य का एक स्‍वप्‍न भी दे गए, जिसे साकार किया जा सके।

सब कुछ लिखा जा चुका है अतीत में

यह आकर मत कहो मुझ से पंडितजनों

एक बात अभी लिखी नहीं गई बाक़ी है

होने को भी बाक़ी लिखी जाए या न जाय

वह तुम जानते हो क्‍या? ....

यह जो समझ है इतिहास की भ्रष्‍ट है

भय अत्‍याचार को शाश्‍वत रखने की

अन्‍यायी भाषा है कि जिसके प्रतिष्ठान में विद्या बंद है

विद्या जो मुक्‍त हमें करती है

वह विद्या लोग जो भूल गए हैं-(भविष्‍य)

उन्‍होंने समय और समाज को काफी गहराई में उतर कर देखा था। उनका कहना था, ‘अगर इंसान और इसांन के बीच एक गैरबराबरी का रिश्‍ता है और उस रिश्‍ते को कोई आदमी मानता है कि ऐसे ही रहना चाहिए, तो वह कोई रचना नहीं कर सकता।’ “अधिनायक” कविता में वे कहते हैं-

राष्‍ट्रगीत में भला कौन वह

भारत भाग्य विधाता है

फटा सुथन्‍ना पहले जिसका

गुन हरचरना गाता है ,

कौन कौन है वह जनगण मन

अधिनायक वह महाबली

डरा हुआ मन बेमन जिसका

बाजा रोज बजाता है।

कवि और रचनाकार रघुवीर सहाय को दया, सहानुभूति और करूणा जैसे मानवीय भावों में भी कहीं-न-कहीं असमानता और अभिजात्‍यवादी अहं की गंध महसूस होती थी। अपनी संवेदना उन्‍होंने न सिर्फ कहानियों या गध में बयान किया बल्कि कविताओं में भी प्रस्‍तुत किया। “सीढियों पर धूप में” स्‍पष्‍ट रूप से अपनी संवेदना प्रकट करते कविता रची “हमने यह देखा”,

हम ही क्‍यों तकलीफ उठाते जाएं

दुख देने वाले दुख दें और हमारे

उस दुख के गौरव की कविताएं गायें

 

यह भी अभिजात तरीक़े की मक्‍कारी

इसमें सब दुख है, केवल यही नहीं है;

... अपमान, अकेलापन, फाका, बीमारी

 

हमको तो अपने हक सब मिलने चाहिए

हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन

‘कम से कम’ वाली बात न हमसे कहिए

दायित्‍व कभी प्रतिकूल नहीं होता। वह एक निरंतर उद्योग है जो मेरा दायित्‍व है। यह जीवन को उन्नत करेगा; अपनी जिजीविषा को किसी तात्‍कालिक तुष्टि को समर्पित कर देने की भूल नहीं करूँगा। -- रघुवीर सहाय

सामाजिक अन्‍याय का प्रतिकार उनकी रचनात्‍मक आंदोलन का उद्देश्‍य था, तभी तो कहते हैं “गरीबी और बेकारी, युद्ध और गुलामी लेखक के दुश्‍मन हैं और मनुष्‍य के जानी दुश्‍मन है। उनसे ऐसा ही व्यवहार कीजिए जैसा दुश्‍मन दुश्‍मन के साथ करता है।’ शोषण, दमन और अन्‍याय के खिलाफ विद्रोह उनका तेवर था। लोकतंत्र के मूल्‍यों के अवमूल्‍यन से आहत थे। जातिवाद से जकड़े समाज में जो लोग इसके विरूद्ध आवाज उठाते रहे और उनकी कथनी और करनी में भेद पर मर्माहत सहाय जी लिखते हैं।

... बनिया बनिया रहे

बाम्हन बाम्हन और कायथ कायथ रहे

पर जब कविता लिखे तो आधुनिक

हो जाए। खीसें बा दे जब कहो तब गा दे।

आपातकाल के दौरान हुई ज्‍यादतियों पर भी उन्‍होंने कई कविताएं लिखी। अधिनायकवादी ताकतों के विरूद्ध जनता को एक जुट होने का आवाहन करती उनकी कविता “रामदास की हत्‍या होगी”- में लिखा है-

खड़ा हुआ वह बीच सड़क पर

दोनों हाथ पेट पर रखकर

सधे कदम रख कर आये

लोग सिमटकर आंख गड़ाये

लगे देखने उसको जिसकी तय था हत्‍या होगी।

रघुवीर सहाय ता उम्र मनुष्‍य और मनुष्‍य के बीच समानता और न्‍याय की लड़ाई लड़ते रहे। तानाशाही के खिलाफ तो वे लड़े ही, साम्प्रदायिक तत्‍वों और उनकी राष्‍ट्रविरोधी हरकतों का भी पर्दाफाश करते रहे। “फूट” शीर्षक कविता में वे साम्‍प्रदायिकता के माहौल पर टिप्‍पणी करते हुए कहते हैं, कि दंगों में मारे जाने वाले और बचे हुए के बारे में भी हमारे भीतर एक असमानता का बोध काम कर रहा होता है। असमानता की चेतना सिर्फ यह जानने की कोशिश करती है कि जो मारा गया वह हिंदू था या मुसलमान या सिख, वह ऐसा नहीं सोचने देगी की जो मारा गया एक इंसान था।

हिंदू और सिख में

बंगाली और असमियों में

पिछड़े और अगड़े में

पर इनसे बड़ी फूट

जो मारा जा रहा है और जो बचा हुआ

उन दोनों में है।

उनका मानना था की असमानता की चेतना समाज में बुरी तरह से फैली हुई है। जब तक लोग इस भेदभाव को नहीं पहचानते एक सभ्‍य और लोकतांत्रिक समाज की संरचना संभव नहीं है।

एक बड़े होटल के कमरे में बैठकर

सभी खानसमों में ऐसे मुस्कुराता है

जैसे वह शोषित के प्रति करूणाशील है।

वे नारी को भी समतावादी दृष्टिकोण से देखना पंसद करते थे। हिंदी के अधिकांश रचनाकार नारी को अबला समझकर उनके प्रति दया का भाव प्रदर्शित करते रहे हैं, पर सहाय जी इस दया को सामंती मूल्‍य मानते थे। उनका मानना था कि दया का भाव बराबरी के मूल्‍य पर चोट करता है।

माघवी,

या और भी जो कुछ तुम्‍हारे नाम हों,

तुक एक ही दुख दे सकी थीं

फिर भला ये और सब किसने दिये हैं?

जो मुझे हैं और दुख, वे तुम्‍हें भी तो हैं

यही या नहीं काफी तर्क है कि मुझे दया का पात्र मत समझो।

अज्ञेय जी ने कहा है – सहाय जी की कविता में एक भी पंक्ति ऐसी न मिलेगी जिस पर अप्रेषणीयता, क्ल्ष्टिता या दुरूहता का आरोप लगाया जा सकता हो।

इतने अथवा ऐसे शब्द कहां हैं जिनसे

मैं उन आंखों कानों नाक दांत मुंह को

पाठकवर,

आज आप के सम्मुख रख दूं

जैसे मैंने देखा था उनको कल-परसों।

रघुवीर सहाय की काव्‍यभाषा लगभग बोलचाल की भाषा है पर यह अपने सहजपन में जीवन यथार्थ के उलझाव भरे ताने-बाने के, आम आदमी के कटु अनुभवों को पूरी तल्‍खी में अभिव्‍यक्‍त करने में समर्थ हैं। वे ऐसी काव्‍यभाषा रचने का प्रयास कर रहे थे जो ठीक-ठीक वही अनुभव अभिव्‍यक्‍त कर सके जो अभिप्रेय है।

वे मेरे शब्दों की ताक में बैठे हैं

जहां सुना नहीं

उनका ग़लत अर्थ लिया और मुझे मारा।

....

इसलिए कहूंगा मैं

मगर मुझे पाने दो

पहले ऐसी बोली

जिसके दो अर्थ न हों

अच्‍छे घर में रोज काम आनेवाले बर्तन में मंजते रहने के कारण जो चमक होती है- जो उन्‍हें आलमारी में सजाने की प्रेरणा न देकर सहज व्‍यवहार में लाने की प्रेरणा देती है- कुछ वैसी ही प्रीतिकर सहज ग्राह्यता उनकी भाषा में है।

पढिए गीता

बनिए सीता

फिर इन सब में लगा पलीता

किसी मूर्ख की हो परिणीता

निज घरबार बसाइए।

होंय कंटीली

आंखें गीली

लकड़ी सीली, तबियत ढीली

घर की सबसे बड़ी पतीली

भर कर भात पसाइये।

रघुवीर सहाय की कविता में समाज की क्रूर विसंगतियों का लेखा-जोखा है। उसकी आलोचना है। उसके प्रति क्षोभ है। वे मानते थे कि वर्तमान को सर्जना का विषय बनाने के लिए जरूरी है कि रचनाकार वर्तमान से मुक्‍त हो। शोषक और शोषित की न सिर्फ उन्‍हें स्‍पष्‍ट पहचान थी बल्कि वे शोषक वर्ग की कलाबाजियां भी नंगा करने का प्रयास करते रहे। समानता और सामाजिक न्‍याय उनके रचनाकर्म का लक्ष्‍य था और नारी के प्रति दृष्टिकोण समता का रहा। सीढियों की धूप की भूमिका में अज्ञेय उन्‍हें “कुशल शिल्‍पी” मानते हैं।