गुरुवार, 5 जनवरी 2012

आँच – 103 काव्य की भाषा – 6


आँच – 103
काव्य की भाषा – 6
काव्य की भाषा विषयक शृंखला के अंक-3 में महाकवि भारवि द्वारा उत्तम भाषा की जो विशेषताएँ बतलाई गई हैं उनमें से अपवर्जितविप्लव पर चर्चा की गई थी। अंक-4 में दूसरी विशेषता शुचौ अर्थात शुचिता पर चर्चा की गई। अंक-5 में तीसरी विशेषता हृदयग्राहिणी पर चर्चा की गई। इस क्रम में, इस अंक में चौथी विशेषता मंगलास्पदे पर चर्चा की जाएगी। महाकवि भारवि द्वारा वर्णित कथित श्लोक के अन्तर्गत यह अंतिम विशेषता है, अतः यह शृंखला यहाँ समाप्त होगी, तथापि महाकवि भारवि ने ‘किरातार्जुनीयम्’ में ही इसी प्रसंग में उत्तम भाषा के सन्दर्म में कुछ और गुणों का उल्लेख किया है, जिनकी चर्चा फिर कभी की जाएगी। 
मंगलास्पदे

मनुष्य ऐसा प्राणी है जो स्वभावतः अशुभ एवं अरुचिकर बातों से सदा बचने का प्रयास करता है। भाषा माध्यम है अपने विचार प्रकट करने का। मूल तो विचार हैं और भाषा में हमेशा शुभ संदेश ही नहीं प्रकट करने होते। जो विचार मनुष्य को अमंगलकारी प्रतीत होते हैं, उनको वह सीधे-सीधे व्यक्त नहीं करता, बल्कि उनको प्रकट करते समय, अर्थात अशुभ एवं अरुचिकर बातों को व्यक्त करते समय वह शब्द चयन  के प्रति अत्यंत सतर्कता बरतते हुए ऐसे शब्दों का प्रयोग करता है जो होते तो शुभ और रुचिकर ही हैं लेकिन प्रयोग की विशिष्टता से वह अपेक्षित अर्थ को ध्वनित करते हैं। उद्देश्य मंगल कामना की है। साहित्य की रचना में समस्त भावों की उपस्थिति हो सकती है। अतएव, अशुभ और अमंगलकारी भावों को प्रकट करते समय बात को अभिधा में व्यक्त करने के बजाय शब्द की व्यंजना शक्ति का आश्रय लेते हुए अर्थ संकेत करना चाहिए। जब अमंगल के परिहार के लिए मंगलसूचक शब्दों के माध्यम से अमंगल की व्यंजना की जाती है, तो ऐसे प्रयोगों में नवीन अर्थ ग्राह्य हो जाता है और ये प्रयोग मुहावरे का रूप धारण कर लेते हैं। अतः ऐसे प्रयोगों में सीधा अर्थ लिया जाना उपयुक्त नहीं होता।

उदाहरण के लिए, मृत्यु अमंगल सूचक है और सभी धर्मों व सम्प्रदायों में अत्यंत बुरी और अशुभ ही मानी जाती है। इसीलिए मृत्यु की सूचना देते समय कभी-भी ' .... मर गए' नहीं कहा जाता। इसके लिए ' ..... नहीं रहे' ' ...... मिट्टी हो गई' ' स्वर्ग सिधारना' आदि प्रयोग किए जाते हैं। अंगरेजी में भी 'पास्ड अवे' या 'ब्रीद हिज/हर लास्ट' आदि प्रयोग होते हैं। इसी प्रकार 'जलाना' से आशय मृतक के शरीर को जलाकर पंचतत्व में विलीन करने से होता है। इसलिए 'जलाना' क्रिया का प्रयोग भी बहुत सजगता से किया जाता है। सायंकाल घरों में प्रकाश आदि करने के लिए 'दीपक जलाना' प्रयोग शायद ही कोई करता हो। इसके लिए 'दीया बत्ती करना' जैसे प्रयोग ही स्वीकार किए गए हैं। 'दुकान बन्द करना' कहने का आशय ऐसा प्रतीत होता है जैसे दुकान हमेशा के लिए बन्द की जा रही हो, अतः यह प्रयोग भी ग्राह्य नहीं है। इसके लिए 'दुकान बढ़ाना' ही चलता है, जिससे वृद्धि या विकास का अर्थ ध्वनित होता है। बिलकुल सकारात्मक। इसी प्रकार, कुछ शब्द ऐसे हैं जिन्हें जनमानस अशुभ मानता है, विशेष रुप से किसी मंगल कार्य, यथा - यात्रा आरम्भ, हवन-पूजन आदि के समय उनके प्रयोग का निषेध करता है, जैसे 'तेल', 'नमक' आदि। कहीं-कहीं 'साँप' और ‘गीदड़’ को लोग अशुभ मानते हैं और उसे उसके नाम से नहीं पुकारते बल्कि उसे 'मामा' और 'पांडे' कह देते हैं और प्रयोग की विशिष्टता से 'विषधर' और 'षडयंत्रकारी' का अर्थ आ जाता है। लोकमानस में ऐसे बहुत से शब्द और प्रयोग प्रचलन में हैं जो भाषा में निहित लोकमंगल की भावना की ही पुष्टि करते हैं।

भाव व्यंजकता की यह शैली मंगलास्पद कहलाती है, जिसमें अमंगलकारी बात को रुचिकर और शुभता सूचक शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत किया जाता है। अर्थात भाषा में लोकमंगल की भावना निहित होनी चाहिए है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य में आगमन से पूर्व रीतिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता था। किन्तु उन्होंने साहित्य के सृजन के मूल में लोकमंगल की भावना की प्रतिष्ठा करते हुए उद्घोष किया कि भक्तिकाल ही हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग है। वैसे भी, साहित्य शब्द की कुछ विद्वानों ने व्युत्पत्ति करते हुए लिखा है ‘हितेन सहितं साहित्यम्’ अर्थात जो हित के साथ हो वही साहित्य है। जो भाषा लोकमंगल की भावना से विरत है वह गुणहीन वस्तु अथवा दूषित आचरणों से सम्पन्न सुन्दर और आकर्षक रमणी की तरह है - 'विषरस भरा कनक घट जैसे' और ऐसी वस्तु अथवा रमणी को कोई भी अपने समीप नहीं फटकने देना चाहता।

बुधवार, 4 जनवरी 2012

स्मृति शिखर से–1 : घिढ़ारी का मंत्र


आदरणीय ब्लागर वृंद,
नव-वर्ष मंगलमय हो।
“झुलसाता जेठ मास। शरद चांदनी उदास। सिसकी भरते सावन का, अंतर-घट रीत गया। एक वर्ष बीत गया।” मित्रों! अटलजी की इन पंक्तियों के साथ एक और वर्ष बीत गया। कहने का तो साहस नहीं हो रहा किन्तु विगत वर्ष के साथ ही इस ब्लाग पर दो वर्षों से अधिक समय से चली आ रही देसिल बयना की शृंखला को भी मैं अपनी तरफ़ से थोड़ा विश्राम दे रहा हूँ। एक सौ ग्यारह सप्ताह तक चली इस यात्रा के हर कदम पर आपका स्नेह और प्रोत्साहन मिला। मैं यह भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि इसके लिये किस तरह से आपका आभार प्रकट करूँ।
ठेठ हिन्दी पट्टी की लोकोक्तियों की अभिव्यंजना पर परियोजना कई वर्षों से लंबित थी। आदरणीय चाचा जी श्री मनोज कुमार ने अगर “का चुप साधि रहौ बलबाना...!” नही कहा होता तो पता नहीं आज मेरे संचित कहावत-कोष के एक सौ ग्यारह तो असंभव, महज ग्यारह कथाओं का सृजन भी हो पाता यह पता नहीं। देसिल बयना की पहली कड़ी से लेकर आखिरी तक आपने जो निरंतर स्नेह और सम्मान दिया है, उस से उऋण होना शायद इस जन्म में तो संभव नही ही होगा। किन्तु यात्रा में पराव आते ही हैं। किन्तु मैं आपको सुनिश्चित कर देना चाहता हूँ कि देसिल बयना की यात्रा में यह आखिरी पराव नहीं है। हम फ़िर मिलेंगे रेवाखंड में। अभी अभिप्रेत है दो वर्षों से चली आ रही एकरसता से थोड़ा अलग जाना। कुछ नया पाना।
हम नव वर्ष 2012 में प्रवेश कर चुके हैं। तो “नवीन वर्ष के लिये नवीन हर्ष चाहिए। नवीन हर्ष के लिये नया विमर्श चाहिए। नया विमर्श चाहिए कि मन रहे नया-नया। नई पहल, नया सॄजन और गान हो नया-नया। नया विमर्श चाहिए कि मन रहे नया-नया।” नए वर्ष में आपका और हमारा सब का मन रहे नया-नया इसी उद्देश्य से आज मैं इस ब्लाग पर एक नए स्तंभ की शुरुआत करता हूँ, “स्मृति शिखर से...”।
मित्रों ! इस_MG_0281_thumb[3] स्तंभ के अंतर्गत मैं अपने कटु-मधुर संस्मरणों को आपकी नजर करना चाहता हूँ। मेरे अतीत के चलचित्र में आपका स्वागत है। हो सकता है यहाँ साहित्यिक गांभिर्य नहीं हो, सामाजिक दायित्व का निर्वाह न हो, अनुशासन न हो किन्तु रेवाखंड की आंचलिकता, बाल-सुलभ चंचलता, ग्रामीण अल्हड़पन जरूर होगा।
तो मैं इस नये सफ़र की शुरुआत वहीं से कर रहा हूँ जहाँ एक कदम चल कर रुक गया था। शायद आपको स्मरण न हो किन्तु मेरा एक संस्मरण “घिढारी का मंत्र” इस ब्लाग के आरंभिक काल में ही प्रकाशित हो चुका है। “स्मृति शिकर से...” वहीं से शुरु करता हूँ।
- करण समस्तीपुरी
हंसी मजाक मे भी सीखी गयी बात कभी कभी कितनी मर्मान्तक उपयोगी हो जाती है, इस बात की प्रतीति मुझे स्नाताक के अन्तेवासी छात्र जीवन में हुई। स्कूल में पंडीज्जी माट साब जब शब्द- रूप याद करवाते थे तो पता नही मन ही मन कितने अपशब्द कहता था। 'लट-लकार' महा-बेकार और 'लंग लकार' भंग डकार लगता था। लेकिन 'हर' धातु का क्रिया-रूप ख़ास कर उत्तम पुरुष में - "हरामि हरावः हरामः'' खूब मन से पढता था। शायद अगली पंक्ति की जोरदार आवाज से मास्टर साहेब को लगता था कि छात्र गण को संस्कृत मे बहुत अनुरक्ति है। हम-लोग भी गुरूजी को यह आभाष तक नहीं होने देते थे कि "हरामि हरावः हरामः'' का यह अखंड जाप संस्कृत मे अभिरुचि है कि महज एक स्वांग ! खैर, गुरूजी गए कह ! और चेला गया बह!! लेकिन बहते-बहाते भी विद्या रानी की कुछ कृपा तो हो ही गयी। वैसे तो साहित्य से मुझे तभी भी लगाव था। सो "येनांग विकारे तृतीया" भले नहीं समझे मगर "राजद्वारे श्मशानेच यः तिष्ठति स बान्धवः" वाला फकरा आ "कार्येषु दासी कर्मेषु मंत्री ! भोजेषु माता शयनेषु रम्भा" वाला श्लोक न याद करने में कोई आलस्य ना ही उनके अर्थ समझने में कोई कष्ट।
करत-करत अभ्यास ते संस्कृत के कुछ श्लोक तो ऐसे जुबान पर चढ़ गए जैसे गाँव के झगडे मे औरतों के मुंह पे गाली! इस तरह स्कुलिया शिक्षा को मेट्रिक घाट के पार लगा कालेज मे विज्ञान संकाय मे दाखिल हो गया. फिर तो दो-तीन साल तक संस्कृत से कोई भेंट मुलाक़ात नहीं. किन्तु साहित्य के मोह ने स्नातक मे फिर से अपनी तरफ खींच लिया ! तदुपरांत इसका रसास्वादन कर ही रहा हूँ !!
तब मैं स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष मे था और झा जी स्नातक अंतिम वर्ष मे। दोनों जने साहित्य के छात्र। साहित्य, साहित्यकार, पत्रकार, सामाजिक सरोकार आदि विषयक नित्य सायं होने वाली परिचर्चा से मैत्री और प्रगाढ़ होती गयी। हाँ ! हम दोनों में एक और समानता है- आर्थिक रूप से कमजोर पारिवारिक पृष्ठ-भूमि। झा जी के कुछ पूर्ण-कालिक और कुछ सामयिक यजमान भी हैं जहां से पूजा-पाठ, विधि-व्यवहार, संस्कार आदि से आने वाली दक्षिणा झा जी के लिए तो जीवन यापन का बहुत बड़ा संवल है ही प्रायः हम लोगों के लिए भी समोसा-लिट्टी का जोगार है।
लगन के समय मे झा जी की व्यस्तता कुछ विशेष ही बढ़ जाती है। वर्तालाप के क्रम मे मेरे संस्कृत उच्चारण से प्रभावित झाजी पूजा-पाठ में मेरी सहायता लेने लगते हैं! मेरे विनोदी स्वभाव को भी यह काम एक अद्वितीय मनोरंजन लगता है. "ऐंह .... आज का लगन तो एकदम दंगल है।" अहले सुबह अन्गैठी करते हुए झा जी कह रहे थे... दिन मे मगरदही मे एक जनेऊ करवाना है, फिर थानेश्वर थान मे एक व्याह और रात मे फिर काशीपुर मे विवाह !!! कहते हैं न कि, ‘भगवान देते हैं तो छप्पर फार के....’
झा जी के मुँह की बात ख़त्म भी नहीं हुई थी कि एक और यजमान पहुँच कर लगे अनुनय विनय करने। पंडी जी, कल मेरी बचिया का लगन है और आज पूजा !! लेकिन पूजा कराये कौन ? झा जी तो आज पहले से ही ब्लैक मे बुक हैं। झा जी आशपूर्ण दृष्टि से मुझे देखते हैं। मैं भी मजाक मे ही राजी हो जाता हूँ। शाम को फिर यजमान बुलाने आते हैं। आज मेरे संस्कृत ज्ञान की 'अग्नि-परीक्षा' है। मन में कुछ घबराहट तो है मगर प्रकट नहीं कर रहा हूँ। हाँ, झा जी का डेलबाह सेवकराम को सब कुछ पता है। वो मेरे साथ है। सो कुछ भरोसा भी है।
इधर जब तक मैं कर-पग प्राच्छालन करता हूँ, सेवक उधर सारा जोगार कर के तैयार है। मैं भी झट से यजमान के चुल्लू मे पानी डाल कर, "अपवित्रः पवित्रो वा... पढाते हुए, पान सुपारी कलश-गणेश कर "एकदा मुनयः सर्वे.... से होते हुए 'लीलावती-कलावती कन्या...' की कथा कह "ॐ जय जगदीश हरे...." करवा कर ही सांस लेता हूँ।
जैसे ही मैं अपना पोथी-पतरा समेटना शुरू करता हूँ कि एक झुंड महिलायें आ कर पंडित जी ! उधर चलिए। अब उधर चलिए का शोर शुरू कर देती हैं। मैं पूछ रहा हूँ,"अब उधर क्या है ? पूजा तो हो गयी..." छूटते ही महिला मंडल की मुखिया का उपहासपूर्ण स्वर फूटा, " ओ पंडी जी ! घिढारी नहीं करबाइयेग क्या ? विध-व्यवहार भी पता नही है ? ले बलैय्या के... अब तो बंदा बुरा फंसा... वो तो सत्य-नारायण कथा की पोथी हाथ में थी तो पढ़ दिया... अब घिढारी क्या होता है?
एक बात तो पता है ना... लगन मे उन्मत्त मिथिलानी का सबसे चोटगर निशान पंडित जी पर ही पड़ता है। पंडितजी चूके नहीं कि "अकलेल बभना बकलेल बभना...." के स्वागत मे स्वर-लहरियां मचलने लगती हैं। मुझे मौन देख सभी रमणियां सरस व्यंग्य-बाण छोड़ रही हैं। मुझे झाजी पर गुस्सा आ रहा है। 'उन्होंने बताया क्यूँ नहीं कि यहाँ घिढारी भी है ...!' किन्तु अभी तो सबसे महत्वपूर्ण है इस यजमानी के महाजाल से निकलना। खैर जल्दबाजी का अभिनय करते हुए मैं कहता हूँ, " जल्दी घिढारी की तैय्यारी कीजिये नहीं तो मुझे छुट्टी दीजिये... दूसरे जगह भी जाना है।"
कह तो दिया लेकिन अब क्या... ? मैं तो इस विषय मे ठहरा "ठन-ठन गोपाल" ! फिर ध्यान आया, अरे.... कितना लगन और व्याह का पक्का खिलाड़ी सेवकराम तो मेरे साथ है ही। फिर इसी से मंत्रणा किया जाए। सेवक मुझे घिढारी का रश्म समझाते हुए कहता है, 'धुर्र महराज ! जाइए न कुछ पढा दीजियेगा... कौन बूझता है यहाँ... !! परन्तु मेरे समक्ष यक्ष प्रश्न यह था कि पढाएं क्या ?? मैं इसी उहा-पोह मे था कि महिला-मोर्चा उधर सारी तैय्यारी कर गीत-गाली गाते हुएP5120069_thumb[1] पंडित जी को बुलाने लगी। मुझे ये चार कदम चार कोस जैसे लग रहे हैं। खैर ... मरता क्या नहीं करता....? वहाँ के सिचुएशन पर आधारित चट-पट एक मंत्र गढ़ता हूँ। कन्या और कन्या के माता-पिता हाथों मे घी लिए खड़े हैं। अब गोबर के बने गोसाईं पर घी ढारेंगे। उधर विधि शुरू होती है, इधर मेरा नव-रचित मंत्र, "माता सहित पिता पुत्री! घृत धारम खड़ा-खड़ी!!" यजमान मेरे साथ पाँच बार इसी मंत्र को दोहराते हैं। हतप्रभ गीत-गाईन महिलायें प्रशंसा की दृष्टि से देखती हैं। शायद पहली बार उन्हें घिढारी के मंत्र का मतलब पता चल रहा है.... सब कुछ सकुशल, सानंद संपन्न। मैं भी यथेष्ट दक्षिणा और मान-सम्मान के साथ बिदा होता हूँ। तो अब कहिये... सच मे न... "हंसी मजाक मे सीखी गयी बात कभी कितनी उपयोगी हो सकती है।"