मंगलवार, 17 जनवरी 2012

स्मृति शिखर से… 3 : गोली बंदूक कुछ नहीं समझता है।

- करण समस्तीपुरी
"छौंरी पतरकी गे........ गोरिया खेतबा के आरी.... काहे मारे गजब पिहकारी.... !!" गौर-वर्ण, सुपुष्ट शरीर, जटा-जुटित मस्तक, हाथ मे डिबिया लिए, तुतली आवाज में यही गीत गाते घर से बथान पर जाते हुए जटा झा के प्रति पता नहीं कैसे मेरे मन में लगाव उत्पन्न हो गया था। जटा झा की उम्र मुझसे यही कोई सात-आठ साल अधिक रही होगी। मेरा घर उनके घर और बथान के रास्ते में अभी भी अवस्थित है। वैसे तो जटा झा की यह विशेषता है कि वो कभी भी जुबान को लगाम नहीं देते हैं। भले आवाज तुतली हो, मगर गाने का सुर मद्धिम नहीं होने देते हैं। IMG0485A_thumb
नित्य सायं दूर से आते जटा झा की “छौंरी पतरकी” की आलाप सुनते ही मैं अपने दालान पर आ जाता था और आँखो से ओझल हो जाने के उपरांत भी वहीं खड़े-खड़े तब तक उनकी स्वर-लहरी का आनंद लेता रहता था जब तक कि वो श्रव्य-सीमा से पड़े न हो जाएं।
शनैः-शनैः समय बदलता गया, गीत बदलते गए, किन्तु जटा झा का बेतक्क्लुफ़ अंदाज नहीं बदला। हाँ उनके माथे की जटा की जगह सघन केश राशि ने ले लिया था। डिबिया की जगह हाथों में लालटेन आ गया था और “गोरकी पतरकी की जगह” “छत पे सोया था बहनोई" ने लिया था। इन परिवर्तनों के बावजूद जटा झा की शोखी में कोई कमी नहीं आई थी। कालांतर में वर्ग-प्रोन्नति परीक्षा में बराबर असफ़ल होते-होते जटा झा सप्तम वर्ग में मेरे सहपाठी बन गए। फिर तो नियम से नित्य प्रातः दस बजे विद्यालय जाने के लिये मुझे बुलाने वो मेरे घर पर आ जाते थे और फिर हम साथ ही चार वर्षों तक विद्यालय जाते-आते रहे।
विद्यालय की परीक्षाओं में जटा झा को मेरी उत्तर-पुस्तिका की नकल करने की आधिकारिक छूट प्राप्त थी। कभी-कभी तो अपना प्रश्न-पत्र निपटाकर अपने ही हाथों से आड़े-तिरछे अक्षरों में उनकी उत्तर-पुस्तिका भी भरनी पड़ती थी। इस पुनीत कार्य में शिक्षकों की भी सहमति थी। सो सातवीं के बाद जटा झा नवम वर्ग तक की परीक्षाओं में अबाध उत्तीर्ण होते गए। अब पढाई-लिखाई को गोली मारिए और सुनिए एक मजेदार वाकया।
उन दिनों हम नौवीं कक्षा के छात्र थे। गीत और नाटक से जटा झा का प्रेम जन्मजात था। सावन के झूले में ठाकुरवाड़ी के नाट्यायोजन में तेरहों रात अवश्य जाते थे। राजा भ्रतृहरि से लेकर सुल्ताना डाकू तक अनेक नाटकों के विभिन्न पात्रों के संवाद उन्हें कंठस्थ थे। जटा झा जब तुतली आवाज में साभिनय उन संवादों को बोलने लगते थे तो मुगल-ए-आज़म के पृथ्वीराज कपूर सदृश गंभीर लोगों की हँसी भी छूट जाती थी।
विद्यालय में दशहरे का अवकाश हो गया था। नवमी की रात खादी भंडार पर नाटक आयोजित होने की खबर से प्रसन्न तो हम सब थे मगर जटा झा की खुशी की कोई सीमा नहीं थी। बिना समय गँवाए नाटक के आयोजकों और निर्देशक का पता किए और अनायास अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दे नाटक में भाग लेने की युक्ति लगाने लगे।
निर्देशक महोदय ने IMG0506A_thumb[2]सोचा कि जटा झा तो स्वयं जीवंत कॉमेडी हैं। तो फ़िर क्यों न इन्हें किसी दृश्य में मंच पर उतार दर्शकों को गुदगुदाया जाए। मगर जटा झा उसुलों के बड़े पक्के थे। उनका कहना था कि बिना लिखित संवाद मिले वे अभिनय करेंगे कैसे? आनन-फ़ानन में एक कागज पर दृश्यबद्ध चार पंक्तियाँ लिखकर यह कहते हुए दे दिया गया कि नाटक में यही उनका संवाद होगा। जटा झा बड़े मनोयोग से उसे याद करने में लग गए। अन्य पात्रों को विलंब हो तो हो मगर जटा झा हर रात नियत समय और निश्चित स्थान पर अभ्यास के लिये नियमित पहुँच जाते थे। इस प्रकार नाट्य-निशा भी आ गई।
आज जटा झा की जन्म-संचित अभिलाषा पूरी होने वाली थी। संध्यावतरन होते ही झाजी नित्याराध्या भगवती को प्रणाम कर अपनी सफलता की कामना लिए नाटक स्थल पर पहुँच गए। अविलंब मुख-मंडल पर स्वेत-रक्तिम-दीप्त रंग-रंजक पुतवाकर तैय्यार भी हो गए। अब प्रतीक्षा थी तो बस उस दृश्य की जिसमें स्टेज पर उनका प्रवेश निश्चित था। वैसे जटा झा अपने प्रदर्शन के प्रति पूर्ण आश्वस्त थे और सज्जा-कक्ष में अपने संवाद कई बार बेरोक-टोक सुना चुके थे।
नाटक आरंभ हुआ। यह लो वो दृश्य भी आ ही गया। नाटक के उस दृश्य में डाकू सुरजन सिंह उस मार्ग से आने-जाने वाले सभी मुसाफ़िरों को लूट रहा था। जो व्यक्ति अपना सामान देने में आना-कानी कर रहा था उस पर चरण-मुष्टिका प्रहार भी कर रहा था। तभी जटा झा का जोरदार प्रवेश होता है। बगैर किसी संवाद के ही दर्शकों में हँसी की लहर दौड़ जाती है। हँसी का दौर थमने के बाद संवाद शुरु होता है।
डाकू सुरजन सिंह : अरे कौन है ? मालुम नहीं इस रास्ते से जो भी जाता है वो पहले सुरजन सिंह को चढाबा चढाता है !
जटा झा : अरे ! मारुम त' है ! मगर आपको मारुम नहीं कि हम त गरीब ब्रह्मण हूँ ! पूजता हूँ त' खाता हूँ नै त भुखरे सो जाता हूँ !!
डाकू : अरे बदजात ! सुरजन सिंह से जवान चलाता है ! चल जो भी है रख इधर !
जटा झा : भाई ! हमरा पास त' एहे एगो पोथी आ एगो रोतकी (लोटकी) है। लो, अगर एहे र’ के आपका पेट भर जाए त' ख़ुशी से रे रो ! रेकिन याद रखो एगो गरीब बाभन का करपाना तुमको पड़ेगा !!
डाकू : अरे मुर्ख ! तुम्हारी आह तो मुझे बाद मे लगेगी ! ले पहले मेरी बन्दूक की आह संभाल !
इतना कह सुरजन सिंह कमर से लटक रही बन्दूक खींचकर जटा झा पर तान देता है।
भयाक्रांत जटा झा लगे चिल्लाने। ले लुत्ती....! आव देखे ना ताव फटाक से स्टेज से कूद पड़े। कूदने के क्रम में पंडीतजी का पैर फ़ँस गया मंचस्थ माइक्रोफ़ोन के तार में और झाजी खुद धराम.... से गिरे अग्रीम पंक्ति के दर्शकों की गोद में। उधर दर्शक-IMG_0584_thumbवृंद हँसते-हँसते लोट-पोट और इधर जटा झा रोते-रोते। जटा झा के पैर अभी भी काँप रहे थे और अधरों से आयोजक-निर्देशक के लिए आशिर्वचन बरस रहे थे... मार सारा... मा........!”
कुछ लोग झाजी को समझाने-पुचकारने लगे। आयोजकों में से एक ने जानना चाहा कि जटा झा मंच से इस प्रकार कूद कर क्यों भागे। जटा झा का कलेजा एक बार फिर फ़ट पड़ा। किसी प्रकार नियंत्रित हो बोलना शुरु किए, “देखे नहीं... वो बुरि (मूर्ख) डकूबा कैसे फ़ट से बंदूक तान दिया सो...! आपरोग (आपलोग) तो जान-बुझ के हमको फ़ाँसी पर चढ़ा दिए न...! अभी अगर इस्तेज से कूद कर जान नहीं बचाते तो उ सार डकूबा गोरिए (गोलिए) न मार देता....!” बोलते-बोलते जटा झा फिर से सुबकने लगे।
लोग बोले, “हौ पंडी जी...! जाइए मरदे...! अरे ई तो नाटक है न....!” मगर जटा झा का तर्क भी कोई कमजोर नहीं। बोले, “ई त हम और आप न बूझते हैं कि ई नाटक है। अगर उ सार डाकुबो ई बात बूझता तब बन्दूक काहे निकारता...? (दरअसल उन दिनों यह अफ़वाह थी कि सूरजन सिंह बना अभिनेता वास्तविक जीवन में पागल हो गया है।) और कनि देर के लिये मान रिजिए कि उ डकूबो बूझ जाता कि ई नाटक है... मगर गोरी-बन्दूक थोड़े बूझता है कि ई नाटक है? अभी अगर बंदूक से गोरी छूट जाता तब तो हमरा प्राण गया था....!” जटा झा अपने अंगोछे से आँसू पोछकर सहज होने का प्रयास करने लगे।
हा..... हा....... हा ....... हा........... हा......... ! जटा झा के जवाब पर नाटक से इतर भी ऐसा ठहाका गूँजा कि नाटक मे मशगूल पात्र और दर्शक सभी चौंक उठे। लोग हँसते-हँसते कहने लगे कि जटा झा भारी बेवकूफ़ हैं। मगर आज मैं सोचता हूँ कि गाँव गँवार-बेवकूफ़ जटा झा को भी यह बात पता था कि गोली -बन्दूक नाटक और खेल नहीं समझता है। काश ई बात आई देश, प्रान्त, भाषा जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर खून की होली खेलने वाले अतिवादी और अत्याचारी भी समझ जाते कि गोली बन्दूक “अयं निजः परोवेति” अपना-पराया नहीं समझता है। काश यह बात व्याभिचार को प्रश्रय देने वाले धर्म और समाज के ठेकेदार तथाकथित नेता लोग भी समझ जाते..... ! लेकिन ये क्यों समझने लगे? ये लोग जटा झा की तरह बेवकूफ़ थोड़े न हैं इन्हे भी यह पता रहेगा कि गोली-बंदूक कुछ नहीं समझता है।

21 टिप्‍पणियां:

  1. ये पूरा देश ही जटा झा है। बस गड़बड़ यह है कि मानता नहीं कि है।

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  2. मंच पर अभिनय करने और नाटकों के मंचन के मध्य कई ऐसे प्रसंग उपस्थित हो जाते हैं... ऐसे ही जीवंत प्रसंग नाटक में रस पैदा कर देते हैं.. जटा झा जी के माध्यम से इस मनोरंजक घटना की प्रस्तुति का आभार!!

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  3. ek manoranjak naty shaili dwara sunder sandesh deta prasand. aapki is shaili me praveenta aur sugathit shabd vinyas prashansneey hai.

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  4. जटा झा जी के माध्यम से इस मनोरंजक घटना से देश द्रोहियों को समझाने की कोशिस अछि लगी| धन्यवाद|

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  5. हमारे गाँव में लालमोहन जी.... अपने दादा जी से लेके अपने पोते तक के लालमोहन है वे... नाटक प्रेम उनका ऐसा है कि वे दस किलोमीटर चल कर देखने पहुच जाते हैं... उनकी साइकिल की सवारी मैंने भी बहुत की है... जटा झा जी का फोटो नहीं लगते तो और भी अच्छा अच्छा रहता .. बाकी गदाधारी आप अच्छे लग रहे हैं... अंतिम पैरे में आपने दिल को छू लिया... सुन्दर...

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  6. पूरी पोस्ट वाह पर अंत के पैरे पढ़ के तो आह निकल गयी..
    बेहतरीन प्रस्तुति - साधुवाद.

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  7. ऐसे पात्र और ऐसी घटनाएं प्रायः देखने को मिल ही जाती हैं, पर जो विशेष है वह है कि इसके माध्यम से आपने बड़ा ही सही संदेश दिया है जो हम जैसे समझादारों को समझनी चाहिए।
    शैली में देसिल बयना वाली रोचकता है। फुल्ल मार्क्स!

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  8. का करें, बंदूक से निकलने वाला गोरी तो हम पहली बार जाने...

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  9. जटा झा जी के माध्यम से गोली बंदूक कुछ नहीं समझती...संदेश अच्छा लगा!!!प्रस्तुतिकरण बहुत रोचक और शैली जीवंत लगी. आभार

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  10. करण जी... आपकी लेखनी बरबस मुझे प्रेमचंद और फणीश्वर रेणु जी की लेखनी की मिश्रित छवि लगती है. हो सकता है या अतिश्योक्ति लगे पर दिल के उद्गार को प्राकृतिक अवस्था में व्यक्त कर दिया. मेरी शुभकामना आपके साथ है. जहा तक इस आलेख की बात है तो मुझे ये हिस्सा बहुत अच्छा लगा -


    गाँव गँवार-बेवकूफ़ जटा झा को भी यह बात पता था कि गोली -बन्दूक नाटक और खेल नहीं समझता है। काश ई बात आई देश, प्रान्त, भाषा जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर खून की होली खेलने वाले अतिवादी और अत्याचारी भी समझ जाते कि गोली बन्दूक “अयं निजः परोवेति” अपना-पराया नहीं समझता है।

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  11. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. करण जी... आपकी लेखनी बरबस मुझे प्रेमचंद और फणीश्वर रेणु जी की लेखनी की मिश्रित छवि लगती है. हो सकता है या अतिश्योक्ति लगे पर दिल के उद्गार को प्राकृतिक अवस्था में व्यक्त कर दिया. मेरी शुभकामना आपके साथ है. जहा तक इस आलेख की बात है तो मुझे ये हिस्सा बहुत अच्छा लगा -

    गाँव गँवार-बेवकूफ़ जटा झा को भी यह बात पता था कि गोली -बन्दूक नाटक और खेल नहीं समझता है। काश ई बात आई देश, प्रान्त, भाषा जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर खून की होली खेलने वाले अतिवादी और अत्याचारी भी समझ जाते कि गोली बन्दूक “अयं निजः परोवेति” अपना-पराया नहीं समझता है

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  13. बहुत सार्थक प्रस्तुति, सुंदर रचना,बेहतरीन पोस्ट....
    new post...वाह रे मंहगाई...

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