बुधवार, 11 जनवरी 2012

"स्मृति शिखर से... 2 : मैं हूँ मोहम्मद सगीर

"स्मृति शिखर से... 2



मैं हूँ मोहम्मद सगीर

_MG_0281_thumb[3]_thumbकरण समस्तीपुरी

ग्रामीण परिवेश में एक अलग ही अल्हड़पन होता है। और यदि गाँव हमारे ‘रेवाखंड’ जैसा हो तो "वृन्दावन बिहारी लाल की जय" ! मेरा बचपन अपने ललित-ललाम गाँव के आनंद-उल्लास में ही बीता। विनोद-प्रियता बालावस्था से ही स्वभाव से अभिन्न रहा उस पर मनोनुकूल बाल-वृन्द का संग। कहावत में भी है कि "जहाँ लड़कों का संग तहाँ बाजे मृदंग ! जहाँ बुड्ढों का संग तहाँ खर्चे का तंग !!”

धीरे-धीरे गाँव के चौपाल की अघोषित स्थायी सदस्यता भी मिल गई। इधर साहित्य (ख़ास कर खट्टर-साहित्य) के अध्ययन से मेरी विनोद-प्रियता मुखर मैं वाक्-पटु होता गया। बाद में ये गुण गाँव के युवक-मंडली की अगुआई में बड़ा काम आया।

हमारी मंडली की एक बहुत बड़ी विशेषता थी। वो यह कि इसमें बलिष्ठ पहलवान से लेकर दिमागी शैतान सब तरह के सदस्य थे। वैद्यनाथ मिश्र यात्री उर्फ़ बाबा नागार्जुन के उपन्यास "नवतुरिया" के युवकों की तरह हम भी गाँव-घर के सब तरह के बात-व्यवहार में बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे। फलस्वरूप हमें गाँव के वरिष्ठ और जिम्मेदार लोगों की मौन मान्यता भी मिली हुई थी। मेरे ऊपर तो गाँव में आने वाले आगत-अभ्यागत, अतिथि-बारात सब के यथाविधि स्वागत सत्कार से लेकर बारातादि में दूसरे गाँव जाकर रेवाखंड का ध्वजारोहण करने की जिम्मेदारी थी। उन्ही दिनों की यह घटना है।

मेरे परोस में कन्यादान की तैय्यारी चल रही थी। हमारी नवयुवक मंडली विवाह की तैय्यारी में मस्त थी। बारात सो... बाबू हो ! मुज़फ्फरपुर जिले से आ रही थी। तैय्यारी भी उसी तरह की। इधर द्वार पर व्यवस्था लगभग पूरी हो चुकी थी और जो बची थी उसमें लोग अस्त-व्यस्त थे। तभी बारात-आगमन की सूचना मिली। साथ ही मास्टर चाचा की कड़कदार आवाज़, “सुन रहे हो न तुम लोग... चलो... चलो...!” अब उधर देखो। इस से पहले कि हम चल पड़ें पंडित जी हमें समझाने लगे, “बाबू! मिथिला के सौरभ का ध्यान रखना। हँसी-मज़ाक तो ठीक है मगर कुछ गड़बड़ न हो।” पंडित जी को भरोसा दिला बारात की अगवानी के लिये जलवासा जाने वाले हुजुम में हम भी शामिल हो गए।

ओह तेरे के... बारात का तो कुछ कहा नहीं जाए। छोटी-बड़ी गाड़ियों से भरा परिसर और ऊपर बड़का ठकुरबारी के दालान मे लोगों की खचा-खच भीड़। उसी भीड़ में मौर पहनकर बैठे दूल्हा सरकार और दूल्हा को घेरे आधुनिक बारात में आई कुछ अत्याधुनिकाएँ। ओ... हो... हो ! उस चित्रित आधुनिक परिधान में चमकते अत्याधुनिकाओं के चंचल चेहरे देखकर तो हमारे होश ही उड़ने लगे। लगन के नशे में मत्त नवयुवक तो दूर प्रौढावस्था की सीमा पर खड़े चाचाओं की नजर भी चकोर की तरह दूल्हा को घेरे चन्द्राननों पर ही अटक गई थी। मौका सचमुच गुदगुदाने वाला था। कहा भी गया है कि स्वर्ण से अधिक सौंदर्य के चोर होते हैं।

अब चुनौती यह थी कि इन रजनीगंधाओं के साथ बारात को मर्यादा सहित द्वार कैसे लगवाएँ? और हाँ, बारात की सबसे आकर्षक टुकड़ी मे रजत सदृश धवल दाढी-केश वाले एक सज्जन भी थे। शायद उन रजनीगंधाओं के सौरभ-रक्षा की जिम्मेदारी उन्ही सज्जन के वृद्ध-स्कंध पर थी। इसीलिए वो हमारे नव-भ्रमर वृन्द को उस तरफ़ मंडराते देख अनायास क्रोध कर रहे थे।

खैर जनवासे का विध-व्यवहार संपन्न होते ही बारात के द्वार लगाई के तैय्यारी शुरू हो गई। बैंड-बाजा और आतिशबाजी के शोर के बीच खिचड़ी बने बराती और सराती और उनके बीच में चीटी की तरह खिसकती एक-आध छोटी-छोटी गाड़ियाँ। उन्ही गाड़ियों में से एक में सारी रजनीगंधा को समेट दाढ़ी वाले सज्जन स्वयं माली की तरह बैठ गए। संयोग से उस गाड़ी की प्रतिरक्षा की ड्यूटी मुझे ही दी गई। अब क्या बताएँ? जनवासा से द्वार-लगाई तक बेचारे सज्जन महोदय पर मिथिला की चिरपरिचित मधुरी-वाणी में सज्जन महोदय पर इतनी रसवर्षा की कि बेचारे जामे से बाहर होने लगे। लेकिन इसी प्रकार से हँसी-खुशी के साथ द्वार-लगाई भी सम्पन्न हो गया।

डाउनलोड करेंउधर दूल्हे के परिकामनि का विध होने और इधर बारात का स्वागत। भाई...! किसी तरह की कसर ना रह जाए...! बारात मुजफ्फरपुर जिला से आई है। सभी लोग सभी दिशाओं में चौकस लग गए और मैं एकनिष्ठ उन्ही रजत सदृश धवल दाढ़ी-केश वाले सज्जन की सेवा में समर्पित। मान लो शिष्टाचार और श्रद्धा का साक्षात् अवतार। एकदम विनम्र हो कातर स्वर मे सज्जन महोदय से रास्ते की बात पर क्षमा-याचना भी किया। मेरी अगाध विनम्रता से प्रसन्न सज्जन महोदय ने क्षमादान करते हुए कहा भी कि वर-बारात में तो इतना चलता ही है। फिर तो मैं दोगुणे श्रद्धा के साथ उस प्रौढ़ सज्जन की सेवा में जुट गया। मैं उन तक किसी और को पहुँचने ही नहीं दे रहा था। इधर जैसे ही उनके मुँह से कोई शब्द निकले, मैं सामने आकर खड़ा हूँ। अब सज्जन महोदय की प्रसन्नता सातवें आकाश पर चढ़ी जा रही है। इसी बीच में उन्होने कहा कि वो पूरी-कचौरी नहीं चूरा-दही खाना पसंद करेंगे। जब तक कोई कुछ सोचे मैं उनके सामने चूरा-दही का पत्तल सजा चुका था।
सज्जन आँख मूँदकर भोग लगाने का मंत्र पढ़ने लगे तब तक मैं किसी के हाथ से कचौरी का चंगेरा लेकर उनसे सिर्फ़ एक कचौरी लेने का आग्रह करने लगा। बारम्बार मेरे सविनय आग्रह से द्रवीभूत सज्जन ने स्वीकृति दे दी तो मैं ने और विनम्रतापूर्वक कहा, “महोदय...! यह कचौरी आप मेरे हाथों से ही ग्रहण कीजिए।” जब तक वो सज्जन हाँ-हाँ करते मैं ने एक कचौरी को तोर हठात उनके मुँह में डाल दिया। सज्जन मुस्कुराते हुए मुँह में पड़ा बड़ा-सा ग्रास चबाने का जतन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक मुझ से मेरा नाम पूछते हैं। मैंने आत्मविश्वास के साथ कहा कि महोदय! मेरा नाम मत पुछिए। लेकिन उनके बल देने पर मैंने कुछ संकोच का अभिनय करते हुए कहा, "मैं हूँ मोहम्म्द सगीर...!”

अरे बाप रे बाप...! मेरे मुँह की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि उन सज्जन पर तुषारापात हो गया। अब तो भई गति साँप-छुछुंदर केरी...! बेचारे से मुँह वाला ग्रास न निगला जा रहा है न उगला जा रहा है। एकदम स्तब्ध। मैं चुप-चाप वहाँ से खिसक गया। वो सज्जन भी उठकर पंडाल के एक कोने में खड़े हो गए।
भोजनोपरांत बारात जब जनवासे पहुँची तब सज्जन ने रहस्योद्घाटन किया कि सब का धर्म भ्रष्ट हो गया है। बारातियों को बची हुई रात में नींद नहीं आई। कोई गंगा-स्नान से शुद्ध होने की बात करने लगा तो कोई गोबर-बालू निगलकर प्रायश्चित की सोच रहा था। बारात में आए पंडितजी भी रात भर में ही इस समस्या के समाधान हेतु अनेक प्रमाण प्रस्तुत कर चुके थे।

प्रातः बारात में दो मत थे। एक मत कि उस सज्जन को कोई धोखा हुआ है और दूसरा कि –घरातियों-सरातियों ने जान-बूझ कर यह अपराध किया है। हाँ तो, सुबह जब बारातियों को जलपान का निमंत्रण देने के लिये सराती गण गए तो रात वाली बात शुरु हो गई। बूढा बाबा विरोध अभियान का नेतृत्व करते हुए आक्रामक बने हुए थे।

इधर कन्यागत को ज्ञात हुआ तो वह स्वयं घोर सिद्धांतवादी। कहने लगे, “हम सम्पूर्ण खानदान जन्मजात वैष्णव हैं....! हमारे परिवार में यह कदापि संभव नहीं है। उस पर जो नाम और अवस्था बताई जा रही है वैसा तो कोई मुस्लिम युवक पूरे गाँव में ही नहीं है। सो ब्रह्माजी भी आकर कहेंगे तो भी मैं यह बात नहीं मान सकता हूँ।” कन्यागत का अपराजेय उद्घोष।

फिर गाँव के अन्य प्रतिष्ठित लोगों ने सानुनय समधीवर को समझाया। मुस्लिम समाज के मुखिया ने भी इस बात की तस्दीक किया। फिर बारातियों ने यह मानकर कि उस सज्जन को अवश्य कोई गलतफ़हमी हुई है, जलपान-भतखाई सबका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। मगर बूढा बाबा अपनी बात पर अडिग रहे और उन्होने विश्वास के साथ कहा कि वह सब के सामने सच्चाई उजागर कर देंगे। सब को दिखा देंगे कि मोहम्मद सगीर कौन है। मैं प्रातःकालीन समस्त चर्या में जान-बूझ कर अनुपस्थित था। इसीलिए सज्जन महोदय को तभी मोहम्मद सगीर नहीं मिला। लेकिन लाख आग्रह के बावजूद उन्होंने जलपान भी नहीं ही किया।

संध्या में समधी के भतखाई की बेला थी। आबाल-वृद्ध बारात भोजासन ग्रहण कर चुकी थी। उन सज्जन का भी क्रोध शांत हो चुका था। भतखई में समधी के बगल में ही बैठे थे। भोजकों में फिर मैं भी शामिल था। आगे-आगे एक व्यक्ति भात लेकर चल रहा था और पीछे दाल की बाल्टी लिये मैं। मुझे देखते ही वो सज्जन सहभोजियों को आगाह करने लगे। खैर उन सज्जन के पत्तल पर भात पड़ने के बाद जैसे ही मैं दाल देने के लिये उद्धत हुआ कि उन्होंने दोनों हाथों से पत्तल को छुपाते हुए सकोप कहा, “नहीं चाहिए दाल।”

buddhaफिर मैं ने भी योजनानुसार दाल की बाल्टी किसी और को पकड़ा सब्जी ले आकर फिर उन्ही सज्जन को पूछने लगा। उन्होंने फिर सक्रोध कहा, “नहीं चाहिए सब्जी।” इसी प्रकार मैं एक के बाद दूसरा व्यंजन लेकर आता गया और सज्जन महोदय का क्रोध बढ़ता गया। धीरे-धीरे पूरी पंक्ति और फिर दूसरी पंक्तियों में भी यह बात फ़ैल गई। बाराती फ़ुसफ़ुसाने लगे, “अब क्या बोलेंगे कन्यागत? मोहम्मद सगीर तो मोर्चे पर पकड़ा गया !!! उन सज्जन के चेहरे पर विजयी मुद्रा झलक रही थी।

एक प्रौढ़ बाराती की उत्तेजना सहनशक्ति की सीमा को पार कर गई। तमक कर मेरी तरफ़ लपके और क्रोध से काँपते हुए सिर्फ़ इतना बोल पाए, “यही है मुसलमान...!” पहले तो सब भौचक्क फिर एक समवेत ठहाका…. !! सभी घराती-सराती और कुछ बाराती जो मेरी वास्तविकता से परिचित थे हँसते-हँसते दोहरे होने लगे। हा..हा...हा....हा.....!!!! और उन सज्जन को जब मेरी वास्तविकता ज्ञात हुई तो बेचारे के पास अपनी सफ़ेद दाढ़ी खुजलाने के सिवा कोई और चारा नहीं था। आज भी इस घटना को स्मरण कर कभी हँसी तो कभी अपनी शैतानी पर क्षोभ भी होता है। आज तक नहीं समझ पाया हूँ कि यह रूढिवादिता थी या मेरी शैतानी कि बारात में आए एक सज्जन को रात से दिन तक सकोप क्षुधा-पीड़ित रहना पड़ा।

15 टिप्‍पणियां:

  1. हा हा हा ,... आज सुबह सुबह ब्लॉग पढ़ना सार्थक हो गया ... अकेले बैठ कर हंस रहा हूँ... पत्नी जी उचक कर देख रही हैं इन्हें क्या हो गया !!!... हा हा हा ... गज़ब है भाई गज़ब !!

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  2. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

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  3. वाह भाई..............! मोहमद सगीर भाई .........हा हा हा हा हा अभी -अभी सुबह टहल कर आया हूँ और प्रज्ञा पेय पीते हुए लैपटॉप ऑन किया प्रातःकालीन शुभ:संदेश के साथ स्टेटस अपडेट किया ! पहली पोस्ट पदम सिंह जी की देखी और पढ़ कर बहुत अच्छा लगी " मै हूँ मोहम्मद सगीर "
    अभिव्यक्ति ......... हा हा हा ... गज़ब है भाई गज़ब !!
    धन्यवाद !

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  4. वाह ! मजेदार !!
    जोधपुर में हमारे एक मित्र का घरेलु नौकर मुस्लिम था खाना भी वही बनाता था, हमने उसका नाम महेंद्र रख दिया था ताकि कभी कोई पंडावादी तत्व खाना खाने आ जाय तो उसे उसके हाथ का खाना खाने में झिझक ना हो!!

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  5. करण जी का अनुभव तो मजेदार रहा इसमें कोई शक नहीं। पर शायद एक बात का ध्‍यान रखा जाना चाहिए कि इस तरह की घटना के वर्णन से आप एक संप्रदाय विशेष के प्रति अपनी राय भी जाहिर कर रहे हैं।

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  6. आगत-अनागत सभी पाठकों को धन्यवाद। यह संस्मरण लिखते समय लग रहा था कि पात्र का नाम बदल दूँ किन्तु फिर मुझे लगा कि संस्मरण में कृत्रिमता की गुंजाइश शायद नहीं होती है। इसीलिये मैं ने कोशिश की है कि वह घटनाक्रम यथावत उद्धृत हो।

    @ राजेश उत्साही जी,
    सर, संस्मरण बेशक मेरा है किन्तु मैंने किसी सम्प्रदाय विशेष के प्रति कोई निजी राय जाहिर नहीं किया है। मेरा उद्देश्य पोलिटिकली करेक्ट होना नहीं बल्कि वह प्रस्तुत करना है जो मैंने अपने व्यक्तिगत-पारिवारिक-सामाजिक जीवन में देखा है। आखिर महज एक नाम (तथाकथित संप्रदाय) बदल जाने से क्या आफ़त आ जाती है? यही तो मैं आज तक नहीं समझ पाया और आखिर की पंक्ति में लिखा भी है।
    पुनश्च, आपके सुझाव के लिये मैं आपका आभार प्रकट करता हूँ। कोशिश करूँगा कि आगामी लेखन में आपकी सलाह का समायोजन भी हो सके। धन्यवाद !

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  7. अनुभव की मजे दार बेहतरीन प्रस्तुति,...
    welcome to new post --काव्यान्जलि--यह कदंम का पेड़--

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  8. रोचक संस्मरण, एक नाम से ही खलबली मच गयी।

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  9. करण जी! प्रसंग में किये गए मजाक के बारे में बाद में कहेंगे.. लेकिन जो आप स्वागत अऊर मुंह से निकलते ही चूड़ा-दही पेस करने वाला बात लिखे हैं, ऊ सब सुनकर पुराना सादी-बियाह का ज़माना याद आ गया.. आज कल त वर्दी-पेटी में कैटरर सब खिलाता है अऊर ब्यक्तिगत प्रेम का त नामोनिसान नहीं... कौन बराती, कौन सराती.. बराती को खिलाकर खुद खाने का प्रचलन, सब समाप्त!!
    एक बार हम भी सरदार का रूप धरे थे एन.सी.सी. कैम्प में... आज आपका ई नामकरण सुनकर मजा आया!!

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  10. pratham ank bhi padha tha....ye ank bhi padha...bas shuru se ant tak ek hi baat hui jo niyantran se baahar rahi....Honth sukud hi nahi paaye. :-)

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  11. जहां एक ओर इसमें आपने अंचल विशेष की परंपराओं का जीवन्त चित्रण किया है, जो हमें उन विशेष क्षणों से रू-ब-रू कराता है, वहीं दूसरी तरफ़ एक खास मानसिकता को भी दर्शाया है जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या हम आधुनिक कहे जाने लायक हैं?

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  12. केशव भाई आपके इस नयी श्रंखला से एक बेफिक्र ग्रामीण युवा से परिचय होने के साथ साथ लोक संस्कृति की झलक भी मिल रही है... बहुत सुन्दर

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  13. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 12- 01 -20 12 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज... उठ तोड़ पीड़ा के पहाड़

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  14. अभी पोस्ट नहीं पढ़ी है ..फिर आउंगी पढ़ने :)

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