बुधवार, 4 जनवरी 2012

स्मृति शिखर से–1 : घिढ़ारी का मंत्र


आदरणीय ब्लागर वृंद,
नव-वर्ष मंगलमय हो।
“झुलसाता जेठ मास। शरद चांदनी उदास। सिसकी भरते सावन का, अंतर-घट रीत गया। एक वर्ष बीत गया।” मित्रों! अटलजी की इन पंक्तियों के साथ एक और वर्ष बीत गया। कहने का तो साहस नहीं हो रहा किन्तु विगत वर्ष के साथ ही इस ब्लाग पर दो वर्षों से अधिक समय से चली आ रही देसिल बयना की शृंखला को भी मैं अपनी तरफ़ से थोड़ा विश्राम दे रहा हूँ। एक सौ ग्यारह सप्ताह तक चली इस यात्रा के हर कदम पर आपका स्नेह और प्रोत्साहन मिला। मैं यह भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि इसके लिये किस तरह से आपका आभार प्रकट करूँ।
ठेठ हिन्दी पट्टी की लोकोक्तियों की अभिव्यंजना पर परियोजना कई वर्षों से लंबित थी। आदरणीय चाचा जी श्री मनोज कुमार ने अगर “का चुप साधि रहौ बलबाना...!” नही कहा होता तो पता नहीं आज मेरे संचित कहावत-कोष के एक सौ ग्यारह तो असंभव, महज ग्यारह कथाओं का सृजन भी हो पाता यह पता नहीं। देसिल बयना की पहली कड़ी से लेकर आखिरी तक आपने जो निरंतर स्नेह और सम्मान दिया है, उस से उऋण होना शायद इस जन्म में तो संभव नही ही होगा। किन्तु यात्रा में पराव आते ही हैं। किन्तु मैं आपको सुनिश्चित कर देना चाहता हूँ कि देसिल बयना की यात्रा में यह आखिरी पराव नहीं है। हम फ़िर मिलेंगे रेवाखंड में। अभी अभिप्रेत है दो वर्षों से चली आ रही एकरसता से थोड़ा अलग जाना। कुछ नया पाना।
हम नव वर्ष 2012 में प्रवेश कर चुके हैं। तो “नवीन वर्ष के लिये नवीन हर्ष चाहिए। नवीन हर्ष के लिये नया विमर्श चाहिए। नया विमर्श चाहिए कि मन रहे नया-नया। नई पहल, नया सॄजन और गान हो नया-नया। नया विमर्श चाहिए कि मन रहे नया-नया।” नए वर्ष में आपका और हमारा सब का मन रहे नया-नया इसी उद्देश्य से आज मैं इस ब्लाग पर एक नए स्तंभ की शुरुआत करता हूँ, “स्मृति शिखर से...”।
मित्रों ! इस_MG_0281_thumb[3] स्तंभ के अंतर्गत मैं अपने कटु-मधुर संस्मरणों को आपकी नजर करना चाहता हूँ। मेरे अतीत के चलचित्र में आपका स्वागत है। हो सकता है यहाँ साहित्यिक गांभिर्य नहीं हो, सामाजिक दायित्व का निर्वाह न हो, अनुशासन न हो किन्तु रेवाखंड की आंचलिकता, बाल-सुलभ चंचलता, ग्रामीण अल्हड़पन जरूर होगा।
तो मैं इस नये सफ़र की शुरुआत वहीं से कर रहा हूँ जहाँ एक कदम चल कर रुक गया था। शायद आपको स्मरण न हो किन्तु मेरा एक संस्मरण “घिढारी का मंत्र” इस ब्लाग के आरंभिक काल में ही प्रकाशित हो चुका है। “स्मृति शिकर से...” वहीं से शुरु करता हूँ।
- करण समस्तीपुरी
हंसी मजाक मे भी सीखी गयी बात कभी कभी कितनी मर्मान्तक उपयोगी हो जाती है, इस बात की प्रतीति मुझे स्नाताक के अन्तेवासी छात्र जीवन में हुई। स्कूल में पंडीज्जी माट साब जब शब्द- रूप याद करवाते थे तो पता नही मन ही मन कितने अपशब्द कहता था। 'लट-लकार' महा-बेकार और 'लंग लकार' भंग डकार लगता था। लेकिन 'हर' धातु का क्रिया-रूप ख़ास कर उत्तम पुरुष में - "हरामि हरावः हरामः'' खूब मन से पढता था। शायद अगली पंक्ति की जोरदार आवाज से मास्टर साहेब को लगता था कि छात्र गण को संस्कृत मे बहुत अनुरक्ति है। हम-लोग भी गुरूजी को यह आभाष तक नहीं होने देते थे कि "हरामि हरावः हरामः'' का यह अखंड जाप संस्कृत मे अभिरुचि है कि महज एक स्वांग ! खैर, गुरूजी गए कह ! और चेला गया बह!! लेकिन बहते-बहाते भी विद्या रानी की कुछ कृपा तो हो ही गयी। वैसे तो साहित्य से मुझे तभी भी लगाव था। सो "येनांग विकारे तृतीया" भले नहीं समझे मगर "राजद्वारे श्मशानेच यः तिष्ठति स बान्धवः" वाला फकरा आ "कार्येषु दासी कर्मेषु मंत्री ! भोजेषु माता शयनेषु रम्भा" वाला श्लोक न याद करने में कोई आलस्य ना ही उनके अर्थ समझने में कोई कष्ट।
करत-करत अभ्यास ते संस्कृत के कुछ श्लोक तो ऐसे जुबान पर चढ़ गए जैसे गाँव के झगडे मे औरतों के मुंह पे गाली! इस तरह स्कुलिया शिक्षा को मेट्रिक घाट के पार लगा कालेज मे विज्ञान संकाय मे दाखिल हो गया. फिर तो दो-तीन साल तक संस्कृत से कोई भेंट मुलाक़ात नहीं. किन्तु साहित्य के मोह ने स्नातक मे फिर से अपनी तरफ खींच लिया ! तदुपरांत इसका रसास्वादन कर ही रहा हूँ !!
तब मैं स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष मे था और झा जी स्नातक अंतिम वर्ष मे। दोनों जने साहित्य के छात्र। साहित्य, साहित्यकार, पत्रकार, सामाजिक सरोकार आदि विषयक नित्य सायं होने वाली परिचर्चा से मैत्री और प्रगाढ़ होती गयी। हाँ ! हम दोनों में एक और समानता है- आर्थिक रूप से कमजोर पारिवारिक पृष्ठ-भूमि। झा जी के कुछ पूर्ण-कालिक और कुछ सामयिक यजमान भी हैं जहां से पूजा-पाठ, विधि-व्यवहार, संस्कार आदि से आने वाली दक्षिणा झा जी के लिए तो जीवन यापन का बहुत बड़ा संवल है ही प्रायः हम लोगों के लिए भी समोसा-लिट्टी का जोगार है।
लगन के समय मे झा जी की व्यस्तता कुछ विशेष ही बढ़ जाती है। वर्तालाप के क्रम मे मेरे संस्कृत उच्चारण से प्रभावित झाजी पूजा-पाठ में मेरी सहायता लेने लगते हैं! मेरे विनोदी स्वभाव को भी यह काम एक अद्वितीय मनोरंजन लगता है. "ऐंह .... आज का लगन तो एकदम दंगल है।" अहले सुबह अन्गैठी करते हुए झा जी कह रहे थे... दिन मे मगरदही मे एक जनेऊ करवाना है, फिर थानेश्वर थान मे एक व्याह और रात मे फिर काशीपुर मे विवाह !!! कहते हैं न कि, ‘भगवान देते हैं तो छप्पर फार के....’
झा जी के मुँह की बात ख़त्म भी नहीं हुई थी कि एक और यजमान पहुँच कर लगे अनुनय विनय करने। पंडी जी, कल मेरी बचिया का लगन है और आज पूजा !! लेकिन पूजा कराये कौन ? झा जी तो आज पहले से ही ब्लैक मे बुक हैं। झा जी आशपूर्ण दृष्टि से मुझे देखते हैं। मैं भी मजाक मे ही राजी हो जाता हूँ। शाम को फिर यजमान बुलाने आते हैं। आज मेरे संस्कृत ज्ञान की 'अग्नि-परीक्षा' है। मन में कुछ घबराहट तो है मगर प्रकट नहीं कर रहा हूँ। हाँ, झा जी का डेलबाह सेवकराम को सब कुछ पता है। वो मेरे साथ है। सो कुछ भरोसा भी है।
इधर जब तक मैं कर-पग प्राच्छालन करता हूँ, सेवक उधर सारा जोगार कर के तैयार है। मैं भी झट से यजमान के चुल्लू मे पानी डाल कर, "अपवित्रः पवित्रो वा... पढाते हुए, पान सुपारी कलश-गणेश कर "एकदा मुनयः सर्वे.... से होते हुए 'लीलावती-कलावती कन्या...' की कथा कह "ॐ जय जगदीश हरे...." करवा कर ही सांस लेता हूँ।
जैसे ही मैं अपना पोथी-पतरा समेटना शुरू करता हूँ कि एक झुंड महिलायें आ कर पंडित जी ! उधर चलिए। अब उधर चलिए का शोर शुरू कर देती हैं। मैं पूछ रहा हूँ,"अब उधर क्या है ? पूजा तो हो गयी..." छूटते ही महिला मंडल की मुखिया का उपहासपूर्ण स्वर फूटा, " ओ पंडी जी ! घिढारी नहीं करबाइयेग क्या ? विध-व्यवहार भी पता नही है ? ले बलैय्या के... अब तो बंदा बुरा फंसा... वो तो सत्य-नारायण कथा की पोथी हाथ में थी तो पढ़ दिया... अब घिढारी क्या होता है?
एक बात तो पता है ना... लगन मे उन्मत्त मिथिलानी का सबसे चोटगर निशान पंडित जी पर ही पड़ता है। पंडितजी चूके नहीं कि "अकलेल बभना बकलेल बभना...." के स्वागत मे स्वर-लहरियां मचलने लगती हैं। मुझे मौन देख सभी रमणियां सरस व्यंग्य-बाण छोड़ रही हैं। मुझे झाजी पर गुस्सा आ रहा है। 'उन्होंने बताया क्यूँ नहीं कि यहाँ घिढारी भी है ...!' किन्तु अभी तो सबसे महत्वपूर्ण है इस यजमानी के महाजाल से निकलना। खैर जल्दबाजी का अभिनय करते हुए मैं कहता हूँ, " जल्दी घिढारी की तैय्यारी कीजिये नहीं तो मुझे छुट्टी दीजिये... दूसरे जगह भी जाना है।"
कह तो दिया लेकिन अब क्या... ? मैं तो इस विषय मे ठहरा "ठन-ठन गोपाल" ! फिर ध्यान आया, अरे.... कितना लगन और व्याह का पक्का खिलाड़ी सेवकराम तो मेरे साथ है ही। फिर इसी से मंत्रणा किया जाए। सेवक मुझे घिढारी का रश्म समझाते हुए कहता है, 'धुर्र महराज ! जाइए न कुछ पढा दीजियेगा... कौन बूझता है यहाँ... !! परन्तु मेरे समक्ष यक्ष प्रश्न यह था कि पढाएं क्या ?? मैं इसी उहा-पोह मे था कि महिला-मोर्चा उधर सारी तैय्यारी कर गीत-गाली गाते हुएP5120069_thumb[1] पंडित जी को बुलाने लगी। मुझे ये चार कदम चार कोस जैसे लग रहे हैं। खैर ... मरता क्या नहीं करता....? वहाँ के सिचुएशन पर आधारित चट-पट एक मंत्र गढ़ता हूँ। कन्या और कन्या के माता-पिता हाथों मे घी लिए खड़े हैं। अब गोबर के बने गोसाईं पर घी ढारेंगे। उधर विधि शुरू होती है, इधर मेरा नव-रचित मंत्र, "माता सहित पिता पुत्री! घृत धारम खड़ा-खड़ी!!" यजमान मेरे साथ पाँच बार इसी मंत्र को दोहराते हैं। हतप्रभ गीत-गाईन महिलायें प्रशंसा की दृष्टि से देखती हैं। शायद पहली बार उन्हें घिढारी के मंत्र का मतलब पता चल रहा है.... सब कुछ सकुशल, सानंद संपन्न। मैं भी यथेष्ट दक्षिणा और मान-सम्मान के साथ बिदा होता हूँ। तो अब कहिये... सच मे न... "हंसी मजाक मे सीखी गयी बात कभी कितनी उपयोगी हो सकती है।"

22 टिप्‍पणियां:

  1. यह गढा हुआ मन्त्र भी बहुत कारगर होगा ;):)

    बढ़िया प्रस्तुति ... यूँ ही अपनी स्मृति के पन्ने खोलते रहें ..

    देसिल बयना का इंतज़ार रहेगा

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  2. बुधवार का सूनापन टूटा, देर से ही सही सूर्य से दीप्त बाबू करण समस्तीपुरी जी के दर्शन हुए.. मगर कोहरे में म्लान सूर्य की तरह उन्होंने भी आते ही सुना दिया कि "देसिल बयना" कोहरे में गुम हो गया है फिलहाल.. जब सूरज निकलेगा तब देखा जाएगा.. हमको तो लगा कि कोइ अपना बिछड गया है.. खैर ई भी सब्जेक्ट मेरा प्रिय है.
    हम तो जो पढ़े मन लगाकर पढ़े.. मैट्रिक तक संस्कृत ऐसा पढ़े कि आज भी बिना किताब देखे बेटी को ब्याकरण पढ़ा देते हैं.. सहार्थे तृतिया, येनांग विकारः पर तो एक पोस्ट भी लिखी थी मैंने, संबंधे षष्ठी आदि.. सारे धातु रूप,शब्द रूप आज भी याद हैं.
    खैर, अब तो देश में ही संस्कृत को मृत भाषा घोषित करने का षड़यंत्र चल रहा है..
    जाने दीजिए ये सब बात!! आपने जो रास्ता पंडित जी के उद्धार का निकाला उसको पेटेंट करवा लीजिए.. मजेदार संस्मरण है!! आगे भी यही मनोरंजन आप प्रदान करें यही शुभकामना है!!

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  3. बात हंसी मज़ाक में सीखना चाहिए, सीरियसली सीखने वाले तो बस सीखते रह जाते हैं।

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  4. देसिल बयना पर दो शब्द बनता है यहां ...

    एक अद्भुत काम आपने किया, और ब्लॉगजगत के माध्यम से मिथिलांचल में प्रसिद्ध फकरे से लोगों को परिचय कराने का यह साधुकर्म निश्चित रूप से लोगों के मन में अविस्मरणीय रहेगा।

    मुझे आशा है कि एक नई ऊर्जा के साथ आप इसमें पुनः सक्रिय होंगे, क्योंकि जहां तक मैं जानता हूं, इसतरह का काम किसी भी साहित्य्कार ने आज तक नहीं किया है और आपकी तरकश में अभी भी दो-ढाई सौ तीर तो कम से कम होंगे ही।

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  5. बहुत खूब, लाजबाब.. प्रस्‍तुति ।

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  6. केशव जी हम भी लगन में बहुत वियाह और सरसत्ती पूजा कराये हैं... ललका धोती और एक ठो किताब लेके पहुच जाते थे... ग्यारह रुपया दखिना पा के लगता है बैंक मिल गया हो.... लेकिन ऐसा घीढारी नहीं कराये कभी भी.... बहुत सुन्दर... मज़ा आ गया.... नई श्रंखला के लिए शुभकामना

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  7. हम तो बस इतना ही कहेंगे...नए वर्ष में हमें आपके नए रूप के दर्शन हो रहे हैं...देसिल बयना के लिए धन्यवाद...हमारी शुभ कामनाएं...

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  8. क्या बात है, करन बाबू नये साल के शुरुआते में रूप बदल दिए। अरे यह काम बाद में भी हो सकता था। वैसे यह शृंखला भी मजेदार है। हाँ, एक बात जरूर है कि इसमें भी मजा आ गया। संस्कृत पाठों में टंकणगत अशुद्धियाँ कुछ अधिक हो गयी हैं। बहुत बहुत साधुवाद।

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  9. करण जी की भाषा में एक अद्भुत प्रवाह देखने को मिलता है.. चाहे वह आंचलिक भाषा भाषा में "देसिल बयना" हो या हिन्दी में "स्मृति शिखर से"... भाषा का यह सौंदर्य विरले ही दिखाई देता है... जहाँ 'देसिल बयना' पर लगे विराम (पूर्ण विराम नहीं) का खेद है, वहीं एक अनूठे स्तंभ के प्रारम्भ होने की खुशी भी... पता नहीं कितने विस्मृत मुहावरे या कहावतें हैं जिनसे इन्होंने मिलवाया... अविस्मरणीय!! आज की पोस्ट पर शानदार छोडकर कुछ नहीं कहा जा सकता!! बधाई!!

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  10. स्मृति के अध्यायों में न जाने कितना अमृतरस छिपा होगा।

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  11. आपके संस्मरणों का स्वागत/इन्तजार... नव वर्ष की सादर शुभकामनाएं....

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  12. आगाज से तो लग रहा है कि यह शृंखला भी देसिल बयना की तरह ही रोचक होगी। लेकिन करण भाई यदि तथ्य की बात करें तो आपने यह रूप भी कभी धरा होगा, यह तो मैं कभी सोच भी नहीं सकता। लगता है शृंखला में आपके और भी रूप देखने को मिलेंगे। आपको शुभकामनाएँ।

    हाँ, देसिल बयना को इतना लम्बा सफर तय कराकर इस पड़ाव तक लाने के लिए आपका आभार प्रकट न करूँ तो आपके साथ न्याय नहीं होगा। इस उम्मीद के साथ आभार कि देसिल बयना एक अंतराल के पश्चात पुनः अपने उसी रंग-रूप के साथ हमारे समक्ष उपस्थित होगा। पुनः आभार ।

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  13. सराहनीय प्रस्तुति

    जीवन के विभिन्न सरोकारों से जुड़ा नया ब्लॉग 'बेसुरम' और उसकी प्रथम पोस्ट 'दलितों की बारी कब आएगी राहुल ...' आपके स्वागत के लिए उत्सुक है। कृपा पूर्वक पधार कर उत्साह-वर्द्धन करें

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  14. सराहनीय प्रस्तुति

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  15. "स्मृति शिखर से...." की प्रथम प्रस्तुती पर आपके इस स्नेह और प्रोत्साहन से अभीभूत हूँ। उम्मीद है इस शृंखला को भी वही अपनापन मिलेगा जो ‘देसिल बयना’को मिला।

    अभिनंदन और आभार !

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