गुरुवार, 30 अगस्त 2012

आँच – 118 - पहिए


आँच – 118 - पहिए
आचार्य परशुराम राय
आँच के इस वर्तमान अंक को प्रारंभ करने के पहले अमृता जी की कविता पर मेरे द्वारा की गई समीक्षा (आँच-116) में अपने एक वक्तव्य छंद शब्द से छंदित शब्द नहीं बनेगा के लिए मैं उनसे और पाठकों से क्षमा माँगता हूँ। संस्कृत में भी छन्द् धातु का बिरले प्रयोग देखने में आता है। इसलिए यह चूक हो गई। इसका संकेत करने के लिए अमृता जी का आभार। उन्होंने कुछ शंका-समाधान करना चाहा है। इसका उत्तर उन्हें मैं पत्र द्वारा दूँगा। हाँ, यह जरूर कहूँगा कि कविता में जिस ढंग से यह शब्द प्रयोग किया गया है, वह काफी भ्रामक है। क्योंकि छन्द् क्रिया शब्द के विरोधी अर्थ हैं, जैसे प्रसन्न होना, तुष्ट करना, फुसलाना, षडयन्त्र करना, बहकाना आदि। कवयित्री की शब्दयोजना किसी एक अर्थ में उस शब्द को नियोजित करने समर्थ नहीं हो सकी है। दूसरी बात, कि हिन्दी में इस धातु से व्युत्पन्न शब्दों का प्रयोग कहीं नहीं मिलता और जिस शब्द का कदाचित प्रयोग हुआ हो या कभी नहीं हुआ हो, साहित्य में ऐसे शब्दों का प्रयोग वर्जित है। अन्यथा अप्रयुक्तत्व दोष माना जाता है। अमृता जी का एक बार पुनः आभार।     
आँच के वर्तमान अंक पर चर्चा के लिए श्री देवेन्द्र पाण्डेय की कविता पहिये लिया जा रहा है। यह कविता उनके ब्लॉग बेचैनआत्मा पर 29-06-2011 को प्रकाशित हुई थी। वैसे यह समीक्षा के लिए बहुत पहले चुनी गयी थी। पर हरीश जी की व्यस्तता के कारण थोड़ा बिलम्ब हो गया। उन्होंने यह काम मुझे सौंपा है। अतएव आज के लिए आँच की अभीष्ट कविता है पहिये
              इस कविता की भावभूमि अधिक विस्तृत नहीं है, बल्कि गहरी है। शहर की सड़कों पर दौड़ती या दिखाई देनेवाली विभिन्न प्रकार की गाड़ियों और उसी पर पैदल गुजरती बिना पहिए की शवयात्रा के माध्यम से कवि ने इसमें जीवन के यथार्थ को तलाशने का प्रयास किया है। जीवन के निहितार्थ को तलाशने के अनेक साधन हो सकते हैं, पर कवि ने सड़क की हलचल से यह कार्य करने का प्रयास किया है। इस कविता में कुल आठ बन्द हैं। पहले बन्द में तरह-तरह के पहियों से चलनेवाली गाड़ियों का सामान्य उल्लेख है। इसके बाद के छः बन्दों में बस, ट्रक, ट्रैक्टर, ऑटो, रिक्शा, कार आदि गाड़ियों पर चलनेवालों और चलानेवालों के व्यवहारों का रनिंग कमेंट्री की तरह स्वाभाविक वर्णन है। अन्तिम बन्द में पहियों के बिना लोगों के कंधों पर पैदल पूरी की जा रही जीवन की अन्तिम यात्रा (शवयात्रा) देखकर अचानक कवि के ठहर जाने के साथ कविता समाप्त हो जाती है और यहाँ पाठक चमत्कृत हुए बिना नहीं रह पाता। यहाँ सड़क की धक्कमधुक्की जीवन की यात्रा है, जिसका अन्त शवयात्रा में होता है। फिर भी सड़क पर चलनेवाले शव को नमन कर अपन कारोबार में फिर व्यस्त हो जाते हैं। कविता की यही पूरी भावभूमि है।
     किसी टिप्पणीकार ने यक्ष-प्रश्न की ओर संकेत किया है। सम्भवतः यक्ष-प्रश्न के सम्बन्ध में सभी जानते हैं। फिर भी प्रसंगवश यहाँ उल्लेख करना समीचीन होगा। यक्ष ने युधिष्ठर से अनेक प्रश्न किए हैं। उनमें से एक है- किमाश्चर्यम्, अर्थात् आश्चर्य क्या है? धर्मराज युधिष्ठिर उत्तर देते हैं- मनुष्य देखता है कि प्राणी रोज अनेक प्राणियों मरते हुए देखता है, फिर भी जीने की कामना करता है, यही आश्चर्य है। युधिष्ठिर के इस कथन का सर्वमान्य अर्थ यह लिया गया कि एक दिन सभी को मरना है, फिर हाय-तौबा क्यों। पर डॉ.हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसका अलग अर्थ किया है और काफी चौंकानेवाला। कादम्बरी में प्रकाशित एक लेख में उन्होंने लिखा था कि प्रतिदिन अनेक प्राणियों मरते हुए देखकर भी मनुष्य जीना चाहता है, इसके पीछे उसकी जिजीविषा (जीने की इच्छा) है और यही आश्चर्य है। दोनों ही अर्थ की दिशा अलग दिखाई अवश्य पड़ रही है। परन्तु कोई अन्तर नहीं है। लक्ष्य एक है। रोजमर्रे की जिन्दगी में मरने की बात सोच-सोचकर कोई सुखी नहीं रह सकता। यह ईश्वर की सृष्टि बुरी नहीं है। यह सृष्टि मंगलमयी है। लेकिन विवेक से अलग होकर इसे जीना निश्चित रूप से आत्मघाती और दुखद है। दुख-दर्द से भरे जीवन में जिजीविषा ही मानव को अन्तिम लक्ष्य भगवत्ता की ओर प्रेरित कर उसे उपलब्ध कराने में सहायक होती है। ये दोनों तथ्य इस कविता की गहराई को व्यक्त करते हैं। क्योंकि यह देखते हुए भी कि इतनी आपाधापी के बावजूद सबका अन्त होना है, आपाधापी बढ़ी है, कम नहीं हुई। एक अधिकारी मेरे मित्र हैं। वे कहते हैं कि मरने के बाद स्वर्गीय ही सबके लिए प्रयोग किया जाता, नरकीय नहीं। यह अनुदात्त में उदात्त की जिजीविषा है। 
कविता प्रसाद गुण से ओतप्रोत है। पढ़ने के साथ ही पाठकों को इसका अर्थ स्वतः हृदयंगम हो जाता है। शब्द-योजना भी सीधी-सादी है। पहिए का लाक्षणिक अर्थ में प्रयोग अच्छा है। कहने का तात्पर्य कि पहिए का अर्थ विभिन्न प्रकार के पहियों से चलनेवाले वाहनों पर बैठे लोगों से लिया गया है। शैली-विज्ञान की दृष्टि से कविता का स्वरूप आकर्षित करनेवाला है, क्योंकि बस, ट्रक, ट्रैक्टर, ऑटो, रिक्शा, कार आदि में कोई क्रम नहीं रखा गया। जैसे स्वचालित गाड़ियों ट्रक, बस आदि के बाद मनुष्य के द्वारा या जानवरों द्वारा खींचे जानेवाले वाहन या चौपहिया के बाद दुपहिया वाहन। बस और ट्रक के बाद आटो, फिर रिक्शा और फिर कार, स्कूटर, सायकिल आदि का वर्णन किया गया है। सड़क पर गाड़ियों के चलने का भी कोई क्रम देखा नहीं जाता, कम से कम भारतीय उपमहाद्वीप के शहरों में। इस प्रकार पूरी कविता सड़क के प्रतिरूप में दिखाई दे रही है। हाँ, जानवरों को जोतकर चलनेवाले वाहन का उल्लेख नहीं हुआ है। जबकि बनारस में अभी भी ताँगे चलते हैं।
उपर्युक्त विशेषताओं के बावजूद कविता में कुछ कमियाँ है, कई स्थानों पर प्रवाह का अभाव है। अननुशासित जीवन के बावजूद सड़क की सीमा है। वैसे ही कविता के कुछ अनुशासन - प्रांजलता, शब्द-संयम (economy of words) आदि कविता में आवश्यक होते हैं। रस्ते में .......... बस, ट्रक या ट्रैक्टर के तक कविता अपनी गति के साथ प्रवाहमान है लेकिन उसके आगे गिलहरी की तरह ........ छिपकली की तरह......... चींटियों की तरह ......... में पदों में एकरूपता है। इसलिए मध्यभाग .............. बचते-बचाते भागते / कारों के में शब्दों की तुलना में अर्थाल्पता होने के कारण अभिव्यक्ति विरल हो गई है। कुछ स्थानों पर कुछ शब्द कविता के प्रवाह को केवल भंग ही नहीं करते, बल्कि कहीं-कहीं अर्थ में भ्रम भी पैदा कर देते हैं जैसे आटो के / चींटियों की तरह / अन्नकण मुँह में दबाए  में आटो के अपने प्रयोग के कारण यहाँ अनावश्यक-सा है और प्रवाह में बाधक प्रतीत होता है यदि इसके पश्चात पूर्णविराम लगाया गया होता तो इसकी अन्विति पूर्व पद से होकर अर्थ को ग्राह्य बनाती। इसी प्रकार का प्रयोग काँपते/हाँफते/घिसटते/दौड़ते में भी देखने में आता है। हालाँकि इस कविता में अर्थ-भ्रम पैदा करनेवाले अनावश्यक शब्द नहीं हैं तथापि बिखराव तो है ही। इसके अतिरिक्त, बन्द के अन्त में पूर्ण-विराम का अभाव है, जिसे कवि को प्रयोग करना चाहिए था। अल्प-विराम के स्थान पर (/) चिह्न का प्रयोग भ्रम पैदा करता है। क्योंकि इस चिह्न का प्रयोग अथवा एवं और दोनों ही अर्थों में लोग प्रयोग करते हैं। इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ काँधे-काँधे / बड़े करीब से गुजर जाती है / बिन पहिए के ही / अंतिम यात्रा सबसे अधिक आकर्षक और अर्थपूर्ण है।
इस समीक्षा में व्यक्त विचार मेरे अपने हैं। कवि एवं पाठकों का उनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।  
        

45 टिप्‍पणियां:

  1. कविता आंच पर चढ़कर और खरी हो गई है... बेहतरीन समीक्षा। वाकई कविता की अंतिम पंक्तियां मार्मिक और असरदार हैं।

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  2. आपके बताये सुझावों के अनुरूप संशोधन पर ध्यान देता हूँ। लेकिन अभी वैसे ही रहने देता हूँ ताकि पाठक उसे वैसा ही पढ़ सकें जैसा कि आपने लिखा है। गहन समीक्षा के लिए हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। ब्लॉग जगत के इसी पक्ष से दुखी रहता हूँ कि कोई आलोचना नहीं करता, सुझाव नहीं देता। इस कविता की किस्मत अच्छी थी जो आँच पर चढ़ी।..आभार।

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  3. आचार्य जी,
    मैंने कविता पढ़ी.. देवेन्द्र जी के ब्लॉग 'बेचैन आत्मा' के साथ मेरा आत्मीय सम्बन्ध, मेरे शैशव काल (ब्लॉग लेखन के) से है, वैसे भी इस क्षेत्र में मैं 'ठुमक चालत' वाली अवस्था तक भी नहीं पहुंचा हूँ. यह कविता मेरे स्थानान्तरण और यहाँ नेट कनेक्शन की बहाली के मध्य-काल की है अतः मुझसे छूट गयी. नहीं तो मुझे इनकी सारी रचनाएं जुबानी याद हैं.. (शब्दशः न लें)
    .
    आपकी शास्त्रीय समीक्षा की तो बात ही अलग है.. और आपने जो बातें सुझाई हैं, उनपर देवेन्द्र जी ने भी ध्यान दिया होगा और उनके अपने विचार और प्रतिक्रियाएं होंगी.. किन्तु इस समीक्षा से परे, आपके चरण स्पर्श के उपरांत, मैं अपनी प्रतिक्रया (मैं समीक्षा को प्रतिक्रिया ही कहता हूँ) दो विन्दुओं पर देना चाहता हूँ.. महानगर की सडकों पर, जिस प्रकार हम वाहनों की रेलम-पेल देखते हैं, उसमें वाहनों का कोई विशेष तारतम्य नहीं निर्धारित किया जा सकता.. इसी कारण से, कदाचित रचनाकार ने इतने सारे वाहनों की भीड़ अपने शब्द में चित्रित करने की चेष्टा की है.. यही नहीं आचार्य जी, ऐसा प्रतीत होता है कि कवि अपनी बालकनी में खडा होकर उस सड़क का दृश्य देख रहा है और अपने भावों को ई.ई.जी. की तरह कविता के रूप में रिकॉर्ड करता जा रहा है.. अनुमानतः, उस कालखंड में उस सड़क से कोई पशुचालित वाहन नहीं निकला हो, अतः उनकी दृष्टि से वंचित रह गया.. वरना पाण्डे जी तो पानी के अंदर की मछलियाँ तक धर लाते हैं.. (क्रमशः)

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    1. सलिल भाई, जो आपने कहा है वही शैली विज्ञान की दृष्टि से इस कविता सौन्दर्य है। इसका उल्लेख मैंने निम्नलिखित पंक्तियों में किया है। लगता है कि इस मामले में आज आपकी दृष्टि चूक गई। वैसे इसके पहले मैंने आपकी ऐसी चूक देखी नहीं। अब इन पंक्तियों को देखें- "शैली-विज्ञान की दृष्टि से कविता का स्वरूप आकर्षित करनेवाला है, क्योंकि बस, ट्रक, ट्रैक्टर, ऑटो, रिक्शा, कार आदि में कोई क्रम नहीं रखा गया। जैसे स्वचालित गाड़ियों ट्रक, बस आदि के बाद मनुष्य के द्वारा या जानवरों द्वारा खींचे जानेवाले वाहन या चौपहिया के बाद दुपहिया वाहन। बस और ट्रक के बाद आटो, फिर रिक्शा और फिर कार, स्कूटर, सायकिल आदि का वर्णन किया गया है। सड़क पर गाड़ियों के चलने का भी कोई क्रम देखा नहीं जाता, कम से कम भारतीय उपमहाद्वीप के शहरों में। इस प्रकार पूरी कविता सड़क के प्रतिरूप में दिखाई दे रही है।"
      क्षमा कीजिएगा, हो सकता है कि आपकी ही बात मैं ठीक से समझ न पाया होऊँ।

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    2. आंच का उद्देश्य पूरा होता-सा दिख रहा है। जहां हमारा उद्देश्य था कि किसी अच्छी कविता को आधार बनाकर हम साहित्य के विभिन्न पहलौओं पर विचार-विमर्श करें जिससे हमें लाभ हो।
      शैली विज्ञान पर सर्जनात्मक धरातल पर कथ्य और अभिव्यक्ति की समन्वित इकाई को भाषिक प्रतीक मानता है। आलोच्य कविता में सर्जना और शिल्प के आधार पर अभिव्यक्ति और कथ्य दोनों में अन्विति दिखती है। कवि की सर्जनात्मक शक्ति के कारण उसकी इस काव्यकृति का संसार बाह्य यथार्थ संसार से अलग एक कला प्रतीक के रूप में रूपांतरित हो गया है।

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  4. कविता में प्रांजलता का अभाव है, क्योंकि आजकल ऐसी ही कवितायें लिखी जा रही हैं (पाण्डे जी ने बहुत सी ऐसी भी कविआयें लिखी हैं जिनमें लोकगीत की मिठास भरी प्रांजलता विद्यमान है).. लेकिन यहाँ भी एक अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की धृष्टता कर रहा हूँ.. कविता पढते हुए ऐसा लगता है मानो पाठक सड़क के बीचो बीच खडा हो और वाहनों की गति और कविता में प्रयुक्त शब्दों का आवेग एक दूसरे से स्पर्धा करता प्रतीत होता है.. पाठकों को यह भ्रम होता है कि यदि वह वाहन से न टकराया तो कम से कम शब्दों से तो अवश्य ही टकरा जाएगा..
    और अंत में
    @अल्प-विराम के स्थान पर (/) चिह्न का प्रयोग भ्रम पैदा करता है। क्योंकि इस चिह्न का प्रयोग अथवा एवं और दोनों ही अर्थों में लोग प्रयोग करते हैं।

    आचार्य जी, आपका कथन सर्वथा उचित है.. इस चिह्न के प्रयोग द्वारा भी मेरे विचार में कवि का यही मंतव्य रहा होगा कि जिन शब्द युग्मों अथवा समूहों का प्रयोग उन्होंने किया है, उनमें वे अथवा और तथा दोनों के रूप में प्रयुक्त हो सकें.. आफ्टर ऑल सड़क का दृश्य है जहाँ रिक्शा और ऑटो तथा कार अथवा ट्रक यूं गुजारते हैं कि अथवा एवं तथा का भेद ही समाप्त हो जाता है.

    कविता के अंतिम भाग की ओर तो आपने जो कहा वह लगभग सभी पाठकों की स्थिति होगी. अंत में आपसे अपनी धृष्टता के लिए क्षमा याचना करता हूँ.. आपका छात्र हूँ, आपसे बहुत कुछ सीखा है.. आज अपनी राय व्यक्त करने में आपके चरण स्पर्श के उपरांत ही साहस कर पाया हूँ.. आशा है क्षमा करेंगे तथा अपना आशीष और स्नेह बनाए रखेंगे!!

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    1. इस विषय में मैं अधिक नहीं कहूँगा। बस यही कि फायदे के लिए कायदा अधिक नहीं बिगाड़ना चाहिए। कविता और गद्य को एक नहीं किया जा सकता। साथ ही भाषा का प्रयोग भाषा की तरह होना चाहिए।
      वैसे आपका कहना सही हो सकता है कि (/) के प्रयोग के पीछे कवि तथाकथित मन्तव्य रहा होगा। लेकिन श्लेष आदि अलंकारों के अलावा यदि भाषा का इस ढंग से प्रयोग हो जिसमें ambiguity हो, तो मेरी दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता।
      हाँ, जहाँ तक पशुचालित वाहनों के उल्लेख की बात कही गई है, वह कोई कमी नहीं है। बल्कि उसे हास्य के रूप में लेने की जरूरत है। वह तो इस लिए लिखा कि पाण्डेय जी बनारस के रहनेवाले हैं और मैं भी बनारस में कई वर्षों तक रहा हूँ। यह छूट कैसे गया। यह केवल हास्य के तौर पर लिखा गया है।
      इस प्रकार के विचार को उद्भूत कराने के लिए आभार।

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    2. यहां चल रहे विमर्श को मैं धूमिल की बात से शुरू करना चाहूंगा- कविता पढ़ने के पहले ही हमारे मन में यह बात बैठ जाती है कि कविता पढ़नी है और इस प्रकार हम अनजाने ही ‘काव्य भाषा’ के आतंक के शिकार हो जाते हैं।
      आधुनिक युग में महत्व शिल्प को नहीं कथ्य को दिया गया। किस तरह कहा, उस्की जगह क्या कहा को तरजीह दी जाने लगी। इसलिए पच्चीकारी और अनावश्यक बिम्बों और प्रतीकों से कविता को मुक्त कराना लक्ष्य बन गया ताकि काव्य भाषा कविता और पाठक के बीच दीवर बनकर खड़ी न हो जाए। देवेन्द्र जी इस कविता में कई प्रयोगों, जिसमें ‘/’ का प्रयोग भी है, कविता को भाषाहीन करके इसी दीवार को तोड़ते नज़र आते हैं।
      ...ज़ारी है ...

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    3. आगे बढ़ने के पहले मैं धूमिल की कविता की पंक्तियां पेश करना चाहूंगा ...
      छायावाद के कवि शब्दों को तोलकर रखते थे,/ प्रयोगवाद के कवि शब्दों को टटोल कर रखते थे,/ नयी कविता के कवि शब्दों को गोल कर रखते थे,/ सन साठ के बाद के कवि शब्दों को खोलकर रखते हैं।

      ** द्वेन्द्र जी ने इस कविता में पहले तो कठोर और नुकीले शब्द चुने हैं, उन पर धार दी है, उन्हें पैना किया है और फिर पाठकों की तरह जोर से लुढका दिया। अंत तक आते आते कविता पाठकों के मन में अबाध और द्रुत गति से प्रवेश कर जाती है।
      ज़ारी ...

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    4. देवेन्द्र जी ने कविता को जीवंत और प्रासंगिक रखने के लिए बिम्ब मुक्त रखा है। ऐसे में ‘/’ का प्रयोग करने से कविता में गद्य सुलभ जीवंत वाक्य-विन्यास को प्रतिष्ठित करने का सफल प्रयास है। नाववर सिंह जी ने भी बिम्बों की निरर्थकता को स्वीकारते हुए कहा है कि बिम्बों के कारण कविता बोलचाल की भाषा से अक्सर दूर हटी है। अपनी काव्य-भाषा के लिए बिम्ब-योजना से दूर रहते हुए देवेन्द्र जी ने ‘/’ के द्वारा बोलचाल की सहज लय को खंडित नहीं होने दिया है। वाक्य-विन्यास की शक्ति को कमज़ोर नहीं होने दिया है, जिससे इनका पहिया पूरी रफ़्तार से घूमता रहा है।

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    6. मैंने धूमिल को बहुत तो नहीं पढ़ा है, लेकिन पढ़ा है। उनकी कविताएँ मुझे याद तो नहीं। लेकिन जहाँ तक मेरी समझ है, उन्होंने बिम्बों का खुलकर प्रयोग किया है- लोहे का स्वाद घोड़े से पूछो आदि कुछ इस प्रकार का प्रयोग मैंने पढ़े हैं। ऐसे ही उनकी सभी कविताओं में बिम्बों का प्रयोग किया है। यह अपने बचाव पक्ष में कहना मेरा उद्देश्य नहीं है। क्योंकि मानव स्वभाव है कि वह बिम्बों के माध्यम से अपनी रोजमर्रे की जिन्दगी में बात करता है। फिर कवि को एक विशेष द्रष्टा माना जाता है। भाषा में यदि इस प्रकार के (/) आदि का प्रयोग करके ही क्रांति लाने की बात सिद्ध होती है, तो कुछ कहना उचित नहीं है। निर्बन्ध होने या अनुशासनहीता को कविता कहा जाएगा या मनमानी भाषा का प्रयोग करना ही प्रगतिवादी होना होगा या नवीनता का परिचायक समझा जाएगा, विरामों का प्रयोग भाषा के लिए निरर्थक होगा, यह भविष्य में नियत होगा। यहाँ एक वाक्य दिया जा रहा है- उसे रोको मत जाने दो। इस को पढ़कर पाठक क्या अर्थ लगाएंगे, मैं उनपर छोड़ता हूँ कि उसे रोकना है या जाने देना है। मेरी समझ में इसका कोई अर्थ नहीं है। समीक्षा में कविता के लिए ऐसी कोई बात नहीं कही गई है, कवि को या पाठकों को पीड़ा पहुँचे। जब शरद जोशी अपनी एक कहानी में फँफूद लगे सपने आदि का प्रयोग करते हैं, तो वे अपराध करते हैं। वैसे समीक्षा में कहीं बिम्बों को लेकर कोई बात नहीं कही गई है। लगता है हम गलत बिन्दु पर चर्चा या टिप्पणी कर रहे हैं। यह उत्तर देने की जरूरत नहीं थी। पर यह बताना आवश्यक है कि बिम्बों के विरोध करनेवालों ने बिम्बों का विरोध कविता के मानदंड निर्धारित करने में तो किया है, पर अपनी रचनाओं में नहीं। दूसरी बात बिम्बों को काव्य के लिए या साहित्य के लिए मेरी समझ से अछूत मानने की जरूरत नहीं है। दलबन्दी कविता को या साहित्य को आगे ले जाने में बहुत अधिक सहायक नहीं होगी। तुलसी, कबीर आदि को गाली देनेवालों को भले सम्मानित किया जाय, कबीर, तुलसी आदि के सम्मान में कोई कमी नहीं होगी और न ही उनकी महत्ता कम होगी। फिर भी क्षमा-याचना के साथ मैं अपनी पुनः बात दुहराता हूँ कि इस समीक्षा में लिखे गए विचार मेरे अपने हैं। यदि पाठक या कवि आहत महसूस करते हैं, तो इसके लिए क्षमा करेंगे। मनोज कुमार जी से क्षमा-याचना के साथ। उक्त विचार धूमिल आदि के विचारों के उत्तर के रूप में समझें।

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    7. पुनश्च लगता है कि इस मुद्दे पर आँच के अगले अंक में एक अलग चर्चा की आवश्यकता है। आभार।

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  5. लम्पटता के मानी क्या हैं ?

    कई मर्तबा व्यक्ति जो कहना चाहता है वह नहीं कह पाता उसे उपयुक्त शब्द नहीं मिलतें हैं .अब कोई भले किसी अखबार का सम्पादक हो उसके लिए यह ज़रूरी नहीं है वह भाषा का सही ज्ञाता भी हो हर शब्द की ध्वनी और संस्कार से वाकिफ हो ही .लखनऊ सम्मलेन में एक अखबार से लम्पट शब्द प्रयोग में यही गडबडी हुई है .

    हो सकता है अखबार कहना यह चाहता हों ,ब्लोगर छपास लोलुप ,छपास के लिए उतावले रहतें हैं बिना विषय की गहराई में जाए छाप देतें हैं पोस्ट .

    बेशक लम्पट शब्द इच्छा और लालसा के रूप में कभी प्रयोग होता था अब इसका अर्थ रूढ़ हो चुका है :

    "कामुकता में जो बारहा डुबकी लगाता है वह लम्पट कहलाता है "

    अखबार के उस लिखाड़ी को क्षमा इसलिए किया जा सकता है ,उसे उपयुक्त शब्द नहीं मिला ,पटरी से उतरा हुआ शब्द मिला .जब सम्पादक बंधू को इस शब्द का मतलब समझ आया होगा वह भी खुश नहीं हुए होंगें .

    यूं अखबार वालों की स्वतंत्र सत्ता नहीं होती है.अखबार श्रेष्ठ नहीं होता है औरों से ,अन्य माध्यमों से ,अखबार की एक नियत बंधी बंधाई भाषा होती है उसी के तहत काम करना होता है हमारे मित्र बाबू लाल शर्मा (पूर्व सम्पादक ,माया ,दैनिक भास्कर ,अब स्वर्गीय ) बतलाया करते थे वीरू भाई कुल २२,००० शब्द होतें हैं जिनके गिर्द अखबार छपता है .अखबार की एक व्यावहारिक सी भाषा होती है जिसमें कोई ताजगी नहीं होती .

    ब्लॉग ताज़ी हवा का झोंका है भाषा प्रयोग के मामले में .ब्लोगर जब लिखता है उसमें ताजगी होती है .आतुरता होती है मैं और ब्लोगरों से अच्छा लिखूं .आगे बढूँ .

    सही शब्द था "आतुरता "सम्पादक का यह वक्तव्य ज़रूर लम्पटता है जिसे अखबार ने शीर्षक बनाया है .अभिव्यक्ति की जल्दी में अखबार ऐसा कर गया अब अगर उसे पलट कर कोई लम्पट कहे तो यह उपयुक्त नहीं होगा .

    अब लोभ और लोभी शब्द एक ही धातु "लभ" से बनें हैं लेकिन लोभी शब्द अच्छे अर्थ में नहीं जाएगा .

    लौंडा लौंडिया का अर्थ वैसे तो लडका लडकी ही होता है लेकिन लखनऊ की नवाबी ने इसके अर्थ बदल दिए यह शब्द सामाजिक रूप से वर्जित हो गया .हरियाणा में तो इसे बहुत ही गर्हित मानते हैं ,सोडोटौमी से जोड़ देते हैं .

    इसी तरह लम्पट शब्द अब एक ख़ास चरित्र के मामले में आ गया है .यह चरित्र नीति का शब्द है ब्लोगर के लिए यह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता .

    वीरुभाई ,४३ ,३०९ ,सिल्वरवुड ड्राइव ,कैंटन ,मिशिगन

    ००१ -७३४ -४४६ -५४५१

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  6. आपकी समीक्षा अच्छी लगी। मेरी समझ में सलील भाई के कथन ने इस समीक्षा को पूर्णता प्रदान किया है। धन्यवाद ।

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  7. समीक्षित कविता का मूल पाठ देने से शुरु या अंत में समीक्षा और कविता दोनों ज्यादा ज़ज्ब हो जातीं हैं वरना कविता पाठ तो पाठक के लिए अनुमेय ही रहता है .बढिया समालोचना के लिए बधाई ,प्रस्तोता और समीक्षक दोनों को . यहाँ भी पधारें -

    बृहस्पतिवार, 30 अगस्त 2012
    लम्पटता के मानी क्या हैं ?
    लम्पटता के मानी क्या हैं ?

    लम्पटता के मानी क्या हैं ?

    कई मर्तबा व्यक्ति जो कहना चाहता है वह नहीं कह पाता उसे उपयुक्त शब्द नहीं मिलतें हैं .अब कोई भले किसी अखबार का सम्पादक हो उसके लिए यह ज़रूरी नहीं है वह भाषा का सही ज्ञाता भी हो हर शब्द की ध्वनी और संस्कार से वाकिफ हो ही .लखनऊ सम्मलेन में एक अखबार से लम्पट शब्द प्रयोग में यही गडबडी हुई है .

    हो सकता है अखबार कहना यह चाहता हों ,ब्लोगर छपास लोलुप ,छपास के लिए उतावले रहतें हैं बिना विषय की गहराई में जाए छाप देतें हैं पोस्ट .

    बेशक लम्पट शब्द इच्छा और लालसा के रूप में कभी प्रयोग होता था अब इसका अर्थ रूढ़ हो चुका है :

    "कामुकता में जो बारहा डुबकी लगाता है वह लम्पट कहलाता है "

    अखबार के उस लिखाड़ी को क्षमा इसलिए किया जा सकता है ,उसे उपयुक्त शब्द नहीं मिला ,पटरी से उतरा हुआ शब्द मिला .जब सम्पादक बंधू को इस शब्द का मतलब समझ आया होगा वह भी खुश नहीं हुए होंगें .
    http://veerubhai1947.blogspot.com/
    ram ram bhai

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    1. लगता है कि टिप्पणीकार श्री शर्माजी ने पिछली पोस्टवाली टिप्पणी यहाँ लगा दी है।

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  8. आचार्य जी द्वारा की गयी समीक्षा दर्शाती है कि साहित्य में उनका अध्ययन गहन है.

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  9. पढ़ते ही आंच -११६ पर ध्यान आकर्षित किया गया -मगर लिंक नहीं दिखा -फिर आंच क्या बला है खोजने के लिए स्क्राल डाउन करता रहा उसका भी कोई अत पता नहीं -ये कुछ सामन्य से ब्लागीय शिष्टाचार हैं जिन्हें व्यवहार में लाये जाने चाहिए -अब मूड तो आफ हो गया है चलता हूँ फिर फुर्सत मिली तो आंच -`११६ पर ध्यान दे सकूंगा !सारी !

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    3. सॉरी की कोई बात ही नहीं है। बगल के आर्काइव में भी आंच ११६ दिख रहा है।

      आँच – 116 – चौंको मत
      आँच – 116 – चौंको मत

      दुख तो हमें है कि ११८ अंक प्रस्तुत कर देने के बाद भी ब्लॉग जगत में आंच क्या बला है - सुनना पड़ रहा है।

      शुरू में हम एक टैग लाइन लगाया करते थे

      “रचनाकार के अन्दर धधकती संवेदना को पाठक के पास और पाठक की अनुभूति की गरमी को रचनाकार के पास पहुँचाना आँच का उद्धेश्य है। ”

      कई अंक प्रस्तुत करने के बाद हमें लगा कि पाठकों तक आंच का उद्देश्य पहुंच गया होगा, इसलिए बंद कर दिया।
      असुविधा और सुबह-सुबह मूड ऑफ कर देने के लिए खेद है।

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    4. मनोज जी .आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक ..आंच को भी :-)

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  10. उत्तर
    1. आप सुस्ताइए पंडित जी.. कल निकालना भी तो है.. जब ११७ तक नहीं आये तो ११८ को भी जाने दीजिए!!
      All the best for new assignment/new placement!!

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    2. हाँ आश्चर्य है अब तक नहीं आये ... :-)
      कमी मैं आपनी ही मान लेता हूँ !
      बाकी देवेन्द्र जी की कविता का इतना व्यासीय विवेचन हो गया है कि
      कुछ कहने में भी घबडाहट हो रही है मुझे .
      एक आम पाठक की दृष्टि से कविता बहुत प्रभावित करने वाली लगी थी मुझे ...
      हाँ आप गुण ग्राहियों के सत्संग का प्रभाव कि एक बार फिरत बांच डाला उसे ..
      एकदम परफेक्ट कविता है अंत अचानक ही संघातक प्रभाव डालता है पाठक पर ..
      एक बेहतरीन कविता -अब आप लोग इतना चीर फाड़ कर डाले हैं कि कविता की समझ पर
      एक अलग चिंतन शिविर की जरुरत है -आदरणीय परशुराम राय जी की दृष्टि से मैं सहमत नहीं हूँ
      मगर केवल इतना ही लिखना मेरी धृष्टता है -क्षमाप्रार्थी हूँ -मगर ज्यादा कहूँगा तो वह
      भी कदाचित अनुचित होगा !

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    3. और हाँ शुभकामना तो दिए नहीं बस मना रहे हैं लोग कि पंडित जी बस बनारस छोड़ दें :-)

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    4. मेरी लम्बी टिप्पणी स्पैम में गयी मनोज जी निकाल दीजियेगा !

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    5. स्पैम से निकाल दिया।
      सुना है बिहार के आस-पास आ रहे हैं। स्वागत है।

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  11. इस तरह के विमर्श ही अपेक्षित हैं ! अच्छी रही कविता की आलोचना |

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  12. बेहतरीन समीक्षा।देवेन्द्र जी को बधाई ...

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  13. देवेन्द्र जी बधाई . बेहतरीन समीक्षा

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  14. बहुत बढिया लगी समीक्षा और समीक्षा करने का ढंग. सभी टीपकर्ता का योगदान भी अभिनन्दनीय है.

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  15. देवेन्द्र जी की यह कविता ज़िंदगी के यथार्थ को कहती है .... सलिल जी और मनोज जी ने इस विमर्श को आगे बढ़ाया है ।

    ‘काँपते/हाँफते/घिसटते/दौड़ते’ इसमे ( /) यदि (,) का प्रयोग होता तो ज्यादा अच्छा रहता .... ऐसा मुझे लगता है ।

    आंच पर आ कर यह कविता कुन्दन बन गयी है ।

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  16. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (01-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  17. इस विमर्श को आगे बढ़ाने व साक्षी बनने के लिए सभी को आभारी हूँ। धन्यवाद की गठरी संभाल कर रखता हूँ। बड़े अनमोल हैं ये मेरे लिए। ..आभार।

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  18. समकालीन कविता में , । और अन्य विन्यासपरक संकेतों का चलन समाप्त हो चुका है। हाँ,इनके स्थान पर पंक्ति बदल कर लिखा जाना,या / का प्रयोग किया जाना या किसी वाक्य के आगे के निहित अर्थ के विस्तार के लिए ... का प्रचलन शुरु हो गया है। कविता भाव और प्रवाह की दृष्टि से सशक्त है। सड़क को निहारने से जीवन की बड़ी सच्चाई को इतने कम शब्दों में बयां करना कवि कर्म की श्रेष्ठता है।

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. पहिये" का डिसेक्शन यहाँ देखा, कविता वहाँ पढूँगा। समालोचना बहुत ही अच्छी लगी, सभी ने अपने स्पष्ट मत प्रस्तुत किये। विद्यार्थी की भाँति ही मैंने भी ग्रहण करने का प्रयास किया है। मनोज भैया जी! "आँच" का चिट्ठा जगत में एक अलग ही स्थान है.....दीप-स्तम्भ जैसा। विद्वत्मण्डली के विचारों का मेला और कहाँ मिलेगा! सच कहूँ तो 'आँच' नामक ब्लॉग दीप-स्तम्भ तो है ही ...एक बहुत अच्छा कुम्हार भी है...नई मिट्टियाँ चाहें तो यहाँ आकर स्वयं को आकार दे सकती हैं ...निखार सकती हैं। इस सोद्देश्य चिट्ठे के लिये निश्चित ही आपके प्रयास स्तुत्य हैं।

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  21. कविता तो प्रभावी थी ही ... समीक्षा और फिर समीक्षा और कविता का विश्लेषण और भी लाजवाब रहा ...
    सारगर्भित और स्तरीय आलोचना बनी रही अंत तक ... कौन कहता है हिंदी कविता या सार्थक बहस के लिए स्थान नहीं है ब्लॉग-जगत में ...
    आभार आंच का संतुलित, सार्थक बहस के प्रचलन को बनाए रखने का ...

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