बुधवार, 29 अगस्त 2012

तुम सम कौन कुटिल, खल, लम्पट?!!

तुम सम कौन कुटिल, खल, लम्पट?!!

 

लंपटक्या हममें से अधिकांश लंपट हैं???

आज अख़बार में छपे एक रपट पर नज़र पड़ी, जिसका शीर्षक है –

ब्लॉग की दुनिया में लंपटों की कमी नहीं

मेरी मंद बुद्धि ने कमी नहीं को सीधा कर पढ़ा तो उसे लगा अधिकता है

मेरे अंतर्मन ने मुझसे एक प्रश्न किया, जिसे मैं आप ब्लॉगर बंधुओं के सामने रखना चाहता हूं –

क्या ब्लॉग की दुनिया में लंपटों की अधिकता है???

आगे कुछ लिखने से पहले शब्दकोश का सन्दर्भ लेना ज़रूरी समझा। आचार्य रामचन्द्र वर्मा द्वारा रचित और लोकभारती से प्रकाशित  प्रामाणिक हिंदी कोश, के अनुसार –

  • लंपट वि. [सं.] [भाव. लंपटता] व्यभिचारी, विषयी, बदचलन।

इससे संतुष्ट न हो पाने की स्थिति मेँ द पेंगुइन हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी भाग – 3, की शरण मेँ गया जिसके अनुसार –

  • लंपट

कामुक (lecherous)

गुंडा (hooligan)

छलकर्ता (deceiver)

परगामी (पुरुष) (adulterous(male))

लंपट (libertine)

  • लंपटता

अश्लीलता (obscenity)

कामुकता (lechery)

परगमन (adultery)

  • लंपटतापूर्ण

अश्लील (obscene)

  • लंपटा

कुलटा (slut)

परगामिनी (adulterous(female))

  • मित्रों यह वक्तव्य मुझे विचलित करता है, चिंतित करता है, धिक्कारता है और ललकारता है। पिछले तीन सालों की ब्लॉगिंग में मैंने प्रतिदिन लगभग छह से आठ घंटे ब्लॉग जगत को दिए हैं, जिसपर मेरे परिवार के सदस्योँ का अधिकार होना चाहिए। किंतु, मैं इस विशेषण का अधिकारी न तो ख़ुद को मानता/पाता हूं और न ब्लॉग जगत को और ऐसे मेँ कठोर से कठोर शब्दोँ मेँ इसकी भर्त्सना करते हुए अपना विरोध दर्ज करता हूं।
  • आप क्या सोचते हैं?
  • ये उस बिके हुए मीडिया की शालीन भाषा है, जिसकी सोच यह है कि हम (ब्लॉगर) वहां छपने के लिए लालायित हैँ और वहाँ स्थान न पाने की स्थिति मेँ ब्लॉग जगत में आकर लंपटतापूर्ण व्यवहार करने लगे हैँ। वे जो कह रहे हैं तनिक उसपर ध्यान देँ – ‘ब्लॉग की भाषा प्रौढ़ नहीं हुई है’, ‘ब्लॉग लंपटों के हाथों में आ चुका है’, ‘भाषा बेहद ख़राब हो चुकी है’, ‘अशक्त और कमज़ोर लोग – ब्लॉग पर अपनी बातें कह रहे हैं’, ‘चाकू – लंपट के हाथ में’, आदि-आदि।
  • मित्रों! हमारा काम (ब्लॉगिंग) यदि प्रिंट मीडिया के विद्वजनों की दृष्टि में व्यभिचार है, तो ऐसा व्यभिचार मैं सौ बार करूंगा और ऐसे व्यभिचारियोँ की आवश्यकता है वर्त्तमान मेँ।
  • तीन ब्लॉग के ज़रिए 991, 927 और 380 शालीन पोस्ट्स प्रस्तुत करने के उपरांत यदि “लंपट” विशेषण से ब्लॉग जगत के अधिकांश लेखकोँ/प्रस्तोताओँ को अलंकृत किया जाता है, तो यह कम-से-कम मुझे सह्य नहीं हो सकता। मेरी मांग है कि प्रिंट/पल्प मीडिया का वह समाचार-पत्र विशेष इस शब्द पर पुनर्विचार करे और इसे वापस ले। … और अगर उनमें ऐसा न करने का माद्दा है तो उन लंपटों का नाम दें।

  • पहले भी कुछ गण्यमान्य ब्लॉगरों के समक्ष एक प्रिंट मीडिया के अख़बार ने ब्लॉगरों के बारे में अवांछित टिप्पणी की थी, तब मैंने एक पोस्ट लिखी थी - मैं गर्व और शान से ब्लॉगिंग करता हूं! आप चाहें तो एक बार देख लें।
  • उस अखबार के ज़रिए कहा गया था
    • ब्‍लागिंग का मतलब है गालियां खाना और लिखते जाना, ... ब्‍लॉग ठीक उसी तरह है जैसे बंदर के हाथ में उस्‍तरा, ... ब्‍लागिंग ने यदि लिखने की आजादी दी है, तो फिर गाली गलौज तक सुनने के लिए भी तैयार रहना चाहिए, ... ब्‍लॉगिंग एक निजी डायरी है। इसमें आप कुछ भी लिख सकते हैं, ... ब्लॉगर्स को भाषा के प्रति सतर्क रहना चाहिए ....। ....
  • इसके विरोध में उस पोस्ट पर कही गई कुछ बातों को मैं यहां दुहराना चाहूंगा।
    • भाषा के प्रति सतर्क क्‍या हम नहीं रहते? क्‍या प्रिंट मीडिया वाले ही रहते हैं? एक ही दिन के छह सात अखबारोँ को ले लीजिए और उनकी भाषा एक ही विषय पर देखिए ... कोई भड़काऊ ... तो कोई उबाऊ तो कोई झेलाऊ ... तो कोई पकाऊ। सबके अपने प्रिय मत और फिर उस मत पर लिखने वाले प्रिय लेखक हैं।
    • पांच सात साल की हिंदी ब्‍लॉगिंग ने, मुझे लगता है, अठाहरहवीं शताब्‍दी के उत्‍तरार्ध में शुरू हुए हिंदी पत्रकारिता को चुनौती दे दी है। इसे वो पचा नहीं पा रहे। उनकी सीमा रेखा सिमटती जा रही है और यहां (चिट्ठाजगत) SKY IS THE LIMIT .... !!
    • हम ब्‍लॉगर्स को, फिर मैं कहूँगा मुझे लगता है, प्रिंट मीडिया की चालाकी और कोशिशों से बचना चाहिए। यहां (ब्लॉगजगत में) जो हैं उनकी लेखन क्षमता असीम है। ब्‍लॉग जगत में प्रतिदिन अनेकों गीत, ग़ज़ल, आलेख, इतिहास, विज्ञान, समाज, कहानी, संस्‍मरण, सब विधा में लिखा जा रहा है।
    • यहां पर अधिकांश को प्रिंट मीडिया में छपने का लालच नहीं है।
    • यहां पर, यह इनकी आजीविका भी नहीं है। तो डर किस बात का ... इसलिए वे बेलाग लिखते हैं।
    • अब यही सब उनकी आंख की किरकिरी बनी हुई है। उनकी दुनिया के कुछेक लोग, मुझे लगता है, यहां आए, तो जम नहीं पाए, शायद यह भी उन्‍हें सालता है।
    • अगर हम गाली गलौज करते हैं तो उनके भी छह आठ पेज बलात्‍कार, डकैती, लूट-पाट, दुर्घटना के जैसे सनसनीख़ेज़ समाचारों से भरे पडे होते है। ... और आजकल तो चलन सा बन गया है .. नंगी, अधनंगी तस्वीरें डालने का।
    • ब्‍लॉगिंग के जरिए कई गृहणियां, बच्‍चे, कम पढ़े-लिखे लोग भी अपनी भावनाएं, विचार और सृजनात्‍मक लेखन को एक दिशा दे रहे हैं, जिन्‍हें प्रिंटमीडिया वाले घास नहीं डालते।
    • इतिहास गवाह है कि कई कम पढ़े लिखे लोग भी साहित्यिक धरोहर दे गए।
  • ब्लॉगर बंधुओं ब्लॉगिंग पर इस तरह के दुष्प्रचार का तीव्र प्रतिकार करते हुए आपसे आपके विचार का आकांक्षी हूं।

71 टिप्‍पणियां:

  1. आपसे पूरी तरह सहमत हूं। कमियां हर क्षेत्र में होती हैं, जैसे कुछ लोभी और लापरवाह डॉक्टरों के कारण लोग बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाना नहीं छोड़ देंगे। तो ब्लॉगिंग के सकारात्मक पहलुओं को क्यों न देखा जाए। कितने सारे ब्लॉग हैं जो बेहद अच्छा काम कर रहे हैं और सिर्फ पारिश्रमिक के लिए बिकने वाली चीज लिखने का मोह कम से कम यहां नहीं है... हां कुछ लोग अच्छा लिखने से अधिक टिप्पणियों की ताक में रहते हैं.. लेकिन यहां आप पसंदीदा ब्लॉग चुन कर पढ़ सकते हैं और फालतू को अनदेखा कर सकते हैं। ब्लॉग पर मेहनत करने के सबसे सटीक उदाहरण तो आप स्वयं हैं जो मुझे लगता है सबसे मेहनती ब्लॉगरों में से एक हैं। ऐसे ब्लॉगरों पर सिर्फ ब्लॉग जगत को ही नहीं, पूरे साहित्य जगत को गर्व होना चाहिए।.... प्रिंट में तो कई बार लिखने वाले को पता नहीं होता कि जो शब्द वह लिख रहा है, उसके मायने क्या हैं। जैसे मुझे नहीं लगता कि लंपट शब्द का इस्तेमाल करने वाले बेचारे अज्ञानी रिपोर्टर को उसके असली मायने पता होंगे। तो उन्हें माफ कर दीजिए, उन्हें पता नहीं वे क्या कर रहे हैं :) हम ब्लॉग जगत को समृद्ध करने का काम जारी रखते हैं...

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    1. हम ब्लॉग जगत को समृद्ध करने का काम जारी रखते हैं...
      यह हमारा घोष-वाक्य है, होना चाहिए!!

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    2. ये क्या किसी सड़ियल अखबार की उतनी ही सड़ियल हेडिंग को लेकर विलाप कर रहे हैं.
      उक्त समाचार के कार्यक्रम में मैं भी उपस्थित था और वहां मैंने यह कहा था -

      "खुदा की कसम खाकर मैं कहता हूँ कि आज तक मैंने ब्लॉग जगत में एक भी घटिया ब्लॉग या घटिया ब्लॉग साइट नहीं देखी है. माउस आपके पास है, क्लिक आप करते हैं, मॉनीटर का स्विच आप ही ऑन करते हैं और घटिया साइटों की बात करते हैं..."

      और पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था.

      अब आप बताइए? :)

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    3. यह हमारे लिए गर्व की बात है। तालियां तो बजनी ही चाहिए।
      लेकिन साथ ही इस तरह की मानसिकता का हमें समय रहते विरोध भी दर्ज़ करना चाहिए, यह मेरा मानना है। इसी लेख में मैंने डेढ़ साल पहले एक अख़बार में छपी इसी तरह की बात का उल्लेख भी किया है, जहां कई नामचीन ब्लॉगर मौज़ूद थे, और वे ख़ुद ब्लॉग जगत की धज्जियां उड़ा रहे थे।

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    4. ... और वह अख़बार सड़ियल भी नहीं था, अगर मेरी याददाश्त मेरा साथ दे रही है,तो जनसत्ता था।

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  2. परिवर्तन प्रकृति का नियम है। प्रकृति का एक और नियम है कि शुरु में परिवर्तन को कोई स्वीकार करना नहीं चाहता। न्यूटन साहब ने गति के प्रथम सिद्धांत से यह सिद्ध भी कर दिया है। पत्रकारिता के इन स्वयंभूव ठेकेदारों को यह परिवर्तन पच नहीं रहा और ब्लाग की बढ़ती लोकप्रियता, व्यापकता और सार्वभौमिकता से इन्हे अपने अस्तित्व पर संकट दिखने लगा है। यही इनकी तिलमिलाहट का राज़ है। जहाँ तक भाषा की प्रौढ़ता की बात है तो ब्लाग-जगत से यह उम्मीद करना बेमानी है। जहाँ नित्य नये लेखकों का जन्म होता है वहाँ प्रौढ़ता की नहीं ‘ताजगी’ की बात करनी चाहिए। दूसरी तरफ़ ’लंपट...’ जैसी टिप्पणी कर के पता नहीं अखबार अपनी भाषा की कौन सी प्रौढ़ता सिद्ध करना चाहता है।

    वह एक युग था जब पत्रकारिता की बागडोर सुधि साहित्यकारों के हाथों में हुआ करती थी। तब भाषिक उत्कर्ष होता था, विचारधारा की दिशा होती थी, चिंतन की गहराई होती थी और देश-काल की चिंता होती थी। मैं व्यक्तिगत तौर पर यह दावा करता हूँ कि भारत से छपने वाले हिंदी के नब्बे प्रतिशत अखबारों की भाषा से मेरी भाषा कहीं सभ्य, सुगढ़ और प्रवाहमान है। मैं पिछले पाँच सालों से ब्लाग पर लिखकर ही खुश हूँ। मुझे अखबारों में छपने का कोई शौक नहीं। यदि कोई सज्जन इसे ’लोमरी के खट्टे’ अंगूर की तरह समझते हैं तो मैं स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि मैं शिक्षा और स्वभाव से पत्रकार हूँ और मेरे कैरियर की शुरुआत भी अखबारों से ही हुई।

    वैसे अच्छा हुआ। इस विचार-गोष्ठी ने मुझे एक नये लेख का विषय दे दिया है। जल्दी ही उपस्थित होउंगा। तब तक के लिये मैं धन्यवाद ! और हाँ, मैं भी उक्त अखबार के कथित ’विचार’ से असहमति जताते हुए निन्दा करता हूँ।

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  3. फोटो भी अच्छी लगी है जब सब ब्लॉगर लम्पट हैं तो मंच पर बैठे लम्पटाधीश :-)
    बहरहाल मुद्रित मीडिया इतना गैर उत्तरदायित्व पूर्ण हो गया है कि पूछिए मत ..
    चटखारा और सनसनी और सतही आलोडन के लिए वे किसी भी स्तर तक आ सकते हैं ..
    सुभाष राय का यह अभिप्राय नहीं था मगर मीडिया को मिसकोट करना था कर दिया ..
    मुझे लगता है ब्लॉगर सम्मेलनों में चुक चुके साहित्यकारों को बुलाना जरुरी नहीं रह गया है -
    एकाध आ जाएँ स्वागत है मगर लखनऊ में तो काफी संख्या में दिखे और अंड बंड बोलते रहे यह कहकर भी
    कि ब्लागिंग के बारे में उन्हें कुछ पता नहीं -आपकी कमी सम्मलेन में खली!

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    1. आपसे सहमत।
      जीवंत भाषा में लिखे जा रहे आलेखों की एक अनूठी मिसाल है .. आपकी आज की पोस्ट। फिर भी लोग कहे जा रहे हैं कि ब्लॉगर्स अधकचरी भाषा का प्रयोग करते हैं।
      (http://mishraarvind.blogspot.in/2012/08/blog-post_29.html)

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  4. यदि प्रिंट मीडिया से जुड़े पत्रकार को नेट वोर्किंग और ब्लागिंग की अच्छी समझ होती तो वह इस तरह की बात नहीं करता . मैं तो खुलेआम कहता हूँ की प्रिंट मीडिया से १२ घंटे पहले पहले ब्लॉगर खबरों को सारी दुनिया में पहुंचा सकता है .ये ही लोग नेट सीखने के लिए ब्लागरों की ही सहायता लेते हैं . आभार

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  5. यह पत्रकार की मूर्खतापूर्ण एवं नकारात्मक रिपोर्टिंग है । लम्पटई तो सब जगह है पर यह क्रान्तिकारी नहीं होते ।

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  6. लम्पट तो वे हैं जो ब्लॉग जगत की सामग्री को अपने अखबारों में छापते हैं .

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    1. जी, सही कहा। यह तर्क मूल आलेख में मुझे देने का मन कर रहा था कि आज शायद ही कोई अख़बार हो जो ब्लॉगर्स के आलेख या समाचार न छापता हो, और वह भी बिना सहमति के। उसके बाद यह तोहमत?!!

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    2. मैं भी सहमत हूँ इस तर्क से.

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  7. 2005 में जब हिंदी ब्लॉगिंग को अखबार/पत्रिकायें घास नहीं डालती थीं अनूप सेठी ने वागर्थ में लिखा था-यहां गद्य गतिमान है। गैर लेखकों का गद्य। यह हिन्दी के लिए कम गर्व की बात नहीं है। जहां साहित्य के पाठक काफूर की तरह हो गए हैं, लेखक ही लेखक को और संपादक ही संपादक की फिरकी लेने में लगा है, वहां इन पढ़े-लिखे नौजवानों का गद्य लिखने में हाथ आजमाना कम आह्लादकारी नहीं है। वह भी मस्त मौला, निर्बंध लेकिन अपनी जड़ों की तलाश करता मुस्कुराता, हंसता, खिलखिलाता जीवन से सराबोर गद्य। देशज और अंतर्राष्ट्रीय। लोकल और ग्लोबल। यह गद्य खुद ही खुद का विकास कर रहा है, प्रौद्योगिकी को भी संवार रहा है। यह हिन्दी का नया चैप्टर है। बीते सात सालों में ये गैर लेखक लेखक भले न बने हों लेकिन इस बीच अखबारों/पत्रिकाओं ने इनके ब्लॉगों से बिना बताये लेख/सामग्री बिना बताये उठाकर अपने पन्ने सजाने शुरु कर दिये। वरिष्ठ पत्रकार भी इस पवित्र काम से अछूते नहीं रहे हैं। जब वे जनसंदेश टाइम्स में प्रधान संपादक थे तो कई ब्लॉग से सामान बिना पूछे उठाकर अपने फ़ीचर के पन्ने का श्रंगार किया करते थे। जब अधिकांश ब्लॉगरों की भाषा लम्पट है तो आप अपने अखबार में उन ब्लॉग से चोरी करके सामग्री क्यों छाप रहे थे। लम्पट भाषा की चोरी करके डबल बुरा काम कर रहे थे तब तो वरिष्ठ पत्रकार साहब।

    पत्रकारों की वर्तमान दशा/मजबूरी से कौन अपरिचित है भला। अखबार मालिक बंधुआ मजूर की तरह धरता है अपने यहां। खुश हुआ तो मजे में रहिये उसके अखबार के गुणगान करिये। चोरी करके लंपट भाषा का प्रचार/प्रसार करिये। जब मालिक का मन ऊब गया तो निकल जाने के लिये कह दिया। आप अचानक क्रांतिकारी होकर उसी अखबार के खिलाफ़ बयानबाजी करिये जिसके कल तलक गुणगान करते थे।

    हिन्दी का वरिष्ठ पत्रकार इतना बेचारा हो गया कि इसी तरह की भाषा उसके इस्तेमाल के लिये बची है। अफ़सोस। डबल अफ़सोस। तरस आता है। बताना चाहिये था पत्रकार महोदय को किन ब्लॉग को पढ़कर उन्होंने निष्कर्ष निकाले ऐसे। कुछ पत्रकारों की हरकतों के चलते हम भी कहें क्या कि पत्रकार दलाल/ब्लैकमेलर हो गया है। सामग्री चुराता है। हम ऐसा नहीं कहना चाहते लेकिन कहने का मन हुआ। लेकिन हमने मन को डपट दिया- वरिष्ठ पत्रकार महोदय की तरह गैरजिम्मेदाराना बात मत कह।

    अच्छा लगा आपने इस मसले को यहां उठाया।

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  8. सच में सम्मलेन में कुछ चुके हुए तथाकथित साहित्यकार क्या बोल रहे थे उन्हें खुद ही नहीं पता होगा . सब अपनी बड़ाई में लगे थे. सबने यही कहा की हम ब्लॉग्गिंग को पहचानते ही नहीं है . भैये फिर यहाँ क्या करने आये हो . रही बात लम्पट वाली तो, ये मीडिया का छोड़ा हुआ एक शगूफा बस है .

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    1. शब्द सिर्फ़ लंपट नहीं, और भी बाते हैं। क्या सारी बातें शगूफ़ा हैं?
      ‘ब्लॉग की भाषा प्रौढ़ नहीं हुई है’, ‘ब्लॉग लंपटों के हाथों में आ चुका है’, ‘भाषा बेहद ख़राब हो चुकी है’, ‘अशक्त और कमज़ोर लोग – ब्लॉग पर अपनी बातें कह रहे हैं’, ‘चाकू – लंपट के हाथ में’, आदि-आदि

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  9. मनोज जी.... भाषा के प्रति जिस तरह अख़बार असंवेदनशील हो गया है उसी तरह वह ब्लॉग मीडिया को साबित करना चाहता है. कुछ लोग प्रिंट मीडिया में जगह पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. ये पुरस्कार(जो है वास्तव में फार्स) उसी का एक हिस्सा है. वास्तव में वे लोग ब्लॉग तो कर रहे हैं लेकिन इसके भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं है. छोटे छोटे अखबारों में छपने के लिए लालायित रहते हैं. न्यू मीडिया अभी शैशव अवस्था में है. हिंदी ब्लॉग भी. ऐसे में इस मीडिया को पारंपरिक मीडिया का विकल्प बनाना है...लेकिन इसमें जो प्रवृतियाँ आ गई हैं या आ रही हैं वे पारंपरिक मीडिया वाली ही हैं. आप जिस रिपोर्ट की बात कर रहे हैं वह उनके मनोविज्ञान को दर्शाता है.. ब्लॉग जगत का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं वे लोग....

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  10. भाई मनोज जी
    जिस किसी ने यह टिप्पणी की है उसने अपने अधकचरे ज्ञान और पूर्वाग्रह का परिचय दिया है. टिप्पणीकार प्रिंट मीडिया में कबसे है और उसे कितना जानता है यह तो पता नहीं लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या होती है इसके माध्यमों की लक्ष्मण रेखाएं क्या हैं.इसके बारे में उसे निश्चित रूप से पता नहीं है.
    मैं स्वयं पिछले 30 वर्षों से प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में रहा हूं. अभी भी हूं. लेकिन जो संतुष्टि ब्लॉग लेखन में होती है वह अखबार या पत्रिकाओं के लेखन में नहीं. उसमें मुझे जरा भी स्थिरता नहीं दिखती है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी वहीँ तक है जहां तक अखबार मालिक के हित बाधित नहीं होते. सिर्फ कमलेश्वर जी मुझे बेलाग संपादक लगे. उनके साथ गंगा में मुझे गंगा स्नान कॉलम लिखने का अवसर मिला था.
    मैं एक गज़लकार हूं. शुरूआत में सारिका, एक तरीका, हिन्दुस्तान और उर्दू की उस ज़माने की तमाम पत्रिकाओं में छपने का मौका मिला. लेकिन क्या कि रचनाएँ भेज कर भूल जाइये. साल-दो साल में उन्हें जगह मिलेगी. यहां तो ब्लॉग पर पोस्ट किया और प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गयीं. जनाब! प्रिंट मीडिया बैलगाड़ी है तो ब्लॉग जेट विमान. आप किसपर सवारी करना पसंद करते हैं यह आपकी रुचि की बात है. रोजी-रोटी के लिए अखबार में काम करना और बात है लेकिन रचनात्मक लेखन या त्वरित टिप्पणियों के लिए तो भाई ब्लॉग से बहतर कोई माध्यम नहीं है.
    कथित पत्रकार की ब्लॉग विरोधी टिप्पणी पर मैं यही कहना चाहूँगा कि "अगले वक्तों के हैं ये लोग इन्हें कुछ न कहो....:"

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    1. आपकी इस टिप्पणि के बाद भी लोग कहते हैं कि समझदानी (नी ही लिखा है) ऐसी वैसी है।

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  11. मै तो हैरान थी जब मैने आयोजको की साईट पर ये पेपर की कटिंग देखी वहाँ क़ोई आपत्ति नहीं थी , मैने भी दर्ज नहीं कराई पर आप ने की इस किये मेरी भी सहमति अपने साथ समझे .

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  12. 'समाचार' पढ़ा.
    पहली बात, इसमें जिस भी संवाददाता ने कवरेज़ की है बहुत ही हल्कापन है.
    दूसरी बात, समाचार का शीर्षक क्या चित्र में दिख रहे लोगों को देखकर रखा गया है... या सुभाष राय जी की व्यक्तिगत राय को ही शीर्षक बनाना कारण बना है?
    डॉ. सुभाष जी की भाषा सुन्दर नहीं.... मनोज जी द्वारा अनुमानित कारण सही हो सकते हैं.
    डॉ. सुभाष जी की सोच ऎसी क्यों बनी? सोचता हूँ तो लगता है शायद उनके इर्द-गिर्द जैसा जमावड़ा है उससे उनकी सोच प्रभावित हुई है.

    एक सच्ची घटना सुनाता हूँ...
    — एक कम्पनी के सीईओ हमेशा अपने ड्राइवर और पीओन की तारीफ़ किया करते. ऑफिस के सभी कर्मचारियों को नाकारा समझकर उनके मोटिवेशन के लिये हमेशा अपने ड्राइवर और पीओन के नाम का उदाहरण दिया करते. उन्हें लगता जो व्यक्ति उने इर्द-गिर्द रहते हैं, केवल वही सबसे ज़्यादा काम करते हैं, बाक़ी हरामखोर हैं. जिनसे बॉस का सबसे अधिक वास्ता पड़े वे अच्छे जिनसे कम पड़े वे हरामखोर.
    — जहाँ तक पत्रकारों और साहित्यकारों कि लम्पटता का प्रश्न है.... सभी शोधार्थी जानते होंगे कि उनके गाइड किस चरित्र के रहे हैं.... मैं भी कुछ की लम्पटता के आधार पर सभी को एक पैमाने से नहीं आकूँगा. व्यक्ति खुद अधिक जानता है कि वह किस स्वभाव का है. मैं अपने दृष्टिकोण को प्रभावी बना दूँ तो न जाने कितने पसंदीदा कवि, लेखक और आलोचक इस कसौटी पर खरे उतरेंगे.
    - कवि विद्यापति, मालिक मुहम्मद जायसी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, डॉ. नगेन्द्र और विश्वविद्यालयों के जीवित तमाम प्रोफेसर्स... योग्यता को किनारे रखकर सेवाभावना, चाटुकारिता और चमकती चमड़ी को ज़्यादा तरजीह देते आये हैं.
    - पत्रकारों में भी शराब कबाब और शबाब का चलन काफी समय से मौजूद है.... बड़े पत्रकार राजनेताओं के टुकड़ों (गिफ्ट्स, मनी और वीवीआईपी इवेंट इनविटेशन) की ललक में रहते हैं.

    ... मनोज जी, मैंने जितनी भी बात की है अपने अनुभव से की है.
    __________________________
    मैं अखबार में छपे उस वक्तव्य की भर्त्सना करता हूँ जो सुभाष जी के मुख से भाषित हुई. इसे राय जी की व्यक्तिगत राय ही माना जाय.

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  13. नारी ब्लॉग की क़ोई भी पोस्ट अब अखबार में नहीं आती हैं क्युकी मैने आपत्ति वहाँ दर्ज करवा दी थी जहां बिना नाम पोस्ट उठा कर छपते थे और लिंक भी नहीं देते थे , मैने कहा था की पैसा देकर छापे अन्यथा ना छापे . खुद तो विज्ञापन के जरिये इतनी कमाई करते हैं , पर इस ब्लॉग में चोरी से छापे गए पोस्ट के लेखक अखबार की कतरन को अपने ब्लॉग पर लगाते हैं , और एक पूरा ब्लॉग इन चोरी से छपी कतरनों को अपने ब्लॉग पर लगा कर ब्लॉग जगत में वाह वही लुट कर पुरूस्कार भी पता हैं और लोग बजाये आपत्ति करने के पीठ ठोंकते हैं
    बस अपना हम सही रखे , इतना ही जरुरी हैं

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  14. मुझे घोर आपत्ति है. मैं बहुत से ब्लॉगर्स को जानती हूँ. हममें से एक में भी मैंने वे गुण नहीं देखे जो लम्पट का अर्थ हैं. शायद वे ही चुन चुनकर लम्पटों के सम्पर्क में आते हैं.इन पत्रकार को ब्लॉगर्स से क्षमा माँगनी चाहिए. समाचार पत्र को भी. काश कोई वकील ब्लॉगर मानहानि की बात करे. तब वे यह अवश्य कहेंगे की उनका यह अर्थ नहीं था. किन्तु किसी न किसी ने तो ये पंक्तियाँ लिखकर कुछ लोगों का फोटो भी डाल दिया है. क्या यह सम्मानित होना था? मुझे लगता है फोटो वाले ब्लॉगर्स को भी आपत्ति करनी चाहिए.
    क्या आप इस समाचार का लिंक दे सकते हैं ताकि अपने ब्लॉगर समाज के अनादर को पूरी तरह से देख पढ़ सकूं.
    घुघूतीबासूती

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  15. मुद्र्ण माध्यम के उस समाचार पत्र रिपोर्ट की जितनी भी भर्त्सना की जाय कम है।
    यह स्वार्थ प्रेरित कुटिलताओं का महारोग है।

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  16. फ़ेस बुक दी गई टिप्पणि
    Ghughuti wrote: "आपसे सहमत . इस समाचार पत्र व उसकी इन पंक्तियों पर घोर आपत्ति."

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  17. What happened to my long angry comment? went up in flames due to the high temperature?Iinstantaneous combustion?
    gb

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    1. वह स्पैम में था निकाल दिया
      मैं भी वायरल से ही पीड़ित था, इसलिए अपना विरोध जज़्ब न कर सका।

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  18. आपके आप्लेख के शीर्षक के साथ ही जब चित्र देखा तो बरबस हँसी निकल गयी मुख से.. तभी पंडित अरविंद मिश्र जी का कमेन्ट भी दिख गया.. तब लगा मेरा लिखना व्यर्थ होगा..
    अनूप शुक्ल जी ने (जो कि इतनी लंबी टिप्पणियों के लिए कदापि कुख्यात नहीं) जो बातें कही हैं उसके बाद कुछ भी कहने को नहीं रह जाता और कमोबेश तमाम टिप्पणीकर्ता "लम्पटों" के वक्तव्य देखने के बाद यही प्रतीत होता है कि आपकी पोस्ट सार्थक रही और मेसेज गया, जहाँ तक जाना था. वैसे भी हम बात मनवाने से ज़्यादा बात कहने में विश्वास रखते हैं.. इत्तेफाकन कुछ ऐसी ही पोस्ट आज मैंने भी लिख डाली है.. सन्दर्भ यह नहीं था, पता होता तो शायद उसका भी रंग कुछ दूसरा होता..
    खैर एक बात जो शायद रह गयी आपकी नजर से वो यह है कि जो लोग प्रिंट मीडिया द्वारा खदेड़ दिए जाते हैं, या निकाले जाते हैं या फ्रस्ट्रेशन की आड़ में उस मीडिया को ठुकराने का महात्याग या महाबलिदान करने का ढोंग करते हैं और ब्लॉग की ओर पलायन करते हैं, वही ऐसी बातें कहते हैं..!!
    भाई साहब, प्रेम गली की तरह ही ब्लॉग गली अति साँकरी, जा में दोऊ न समाये.. चाहे प्रिंट/इलेक्ट्रोनिक मीडिया या सिर्फ ब्लॉग मीडिया!!
    Am I right or am I right??? :)

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  19. इसमे कोई दो राय नहीं है की ब्लॉग जगत के लिए कही गई ये बात आपत्ति और निंदा के लायक है किन्तु जिस बात पर आप आपत्ति कर रहे है वो बात तो सम्मलेन में आये अतिथि ने किया है , अखबार ने तो बस एक शब्द को पकड़ कर उसे शीर्षक भर बनाया है निश्चित रूप से उसका इरादा पाठको का ध्यान खीचना था , यदि आपत्ति करनी है तो अखबर की जगह कहने वाले के खिलाफ होना चाहिए | वैसे आप ने तो आपत्ति जता दी किन्तु क्या उस सम्मलेन में आये किसी ने उनकी बात को नकारा उसे गलत कहा उस पर आपत्ति की यदि नहीं की है तो अब उस पर आपत्ति करने का कोई मतलब नहीं है , जवाब देने के लिए वहा कितने की ब्लोगर थे | वैसे लगता है की उनका नीजि अनुभव ख़राब रहा होगा हो सकता है वो कुछ ऐसे ही ब्लोगरो से मिले हो या उन्हें पढ़ा हो |

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    1. कहने वाले को वरिष्ठ पत्रकार के रूप में परिचय दिया गया है।

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  20. कौन लम्पट है इसका निर्णय तो स्वत: दिख रहा है.ब्लॉग में प्रिंट मीडिया से चुराया साहित्य कितना है और ब्लॉगों से चुराया कितना है प्रिंट मीडिया में. हा इसमें दो राय नहीं की हमारे ही ब्लॉगर साथी प्रिंट मीडिया को श्रेष्ठ साबित करने में लगे है अनर्गल टिप्पणी कर.ब्लोग सयम सिखाता है इसमें दो राय नहीं वरना ऐसी टिप्पणी पर मानहानि का केस हो जाता.

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  21. समझ में नहीं आ रहा है कि इस तरह की भाषा प्रयोग करनेवालों पर क्रोध व्यक्त किया जाय या उनकी सोच पर तरस खाया जाय। मैंने सुना है कि किसी की भाषा से उसके सभ्य होने का परिचय मिलता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे कितने सभ्य हैं। वैसे ब्लागर्स इस तरह की भाषा की चिन्ता किए बिना अपनी साधना में लगे रहेंगे। इस प्रकार के दुष्प्रचार उनके इरादों को और मजबूत करेंगे। वैसे सन्त कबीरदास जी की वाणी आज याद आ गयी-
    निन्दक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।

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  22. निंदनीय और असहनीय है , मीडिया अपने गिरेबान में झांके------

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  23. सबके निष्कर्ष जानने के बाद मैं तो अंत में यह भी की आयोजक महोदय( जो खुद ब्लागजगत से जुड़े हैं ) बार बार इस पेपर की कटिंग को फेसबुक में देकर ब्लागरों की टोपी उछालने में लगे हैं ...

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  24. ऐसे पत्रकारों के और ब्लॉगरों के हिंदी शब्द प्रयोग में यही फर्क है। उन्हें हिंदी से कोई प्रेम नहीं। वे सिर्फ इसलिए लिखते-पढ़ते हैं क्योंकि उन्हें अपनी दुकान चलानी है। ब्लॉगर कि कोई मजबूरी नहीं । वह लिखता-पढ़ता है क्योंकि उसे हिंदी से प्रेम है। उन्हें शब्दों का ऐसे प्रयोग करना है कि सभी आकर्षित हों और उनके पत्र को ढूँढकर खरींदे। मालिक को लाभ हो। वे अपने उद्देश्य में सफल हुए। आपकी पोस्ट से शर्मिंदगी नहीं खुशी महसूस कर रहे होंगे।

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  25. मैंने सुभाष राय जी को वहाँ सुना था ... दावे के साथ कह सकता हूँ उनकी ऐसी कोई मंशा नहीं थी ... यह केवल किसी सनकी पत्रकार की सनक ही है और कुछ नहीं ! मैं इस तरह की खबरों का विरोध करता हूँ जो किसी की कही गयी बातों को तोड़ मरोड़ कर केवल बेवजह सनसनी और विवाद उत्पन्न करने के मकसद से लिखी गयी हो !

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  26. अगर समझदानी ऐसी रहेगी
    तो अर्थों के अनर्थ ही आते रहेंगे समझ।

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  27. सार्थक चर्चा, निष्‍कर्ष आ ही गया है, सहमति सहित उपस्थिति.

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  28. ब्लॉग जगत के लिए कही गई ये बात निंदनीय है

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  29. .... पूरा लेख पढ़ कर लगा कि आपको बहुत मर्मांतक पीड़ा पहुंची है । और सही में हर निष्ठावान ब्लॉगर को ऐसी ही पीड़ा पहुंचेगी ऐसा लिखा हुआ पढ़ कर ।

    वरिष्ठ पत्रकार ने अपनी कौन सी भड़ास निकाली यह सब कह कर समझना मुश्किल है .... हर स्थान पर अच्छी सोच के और बुरी सोच के लोग होते हैं ...ब्लॉग जगत भी अछूता नहीं है ....लेकिन ऐसे सामाजिक कार्यक्रम में जहां लोग पुरस्कार पाने और ब्लॉग से जुड़ी गतिविधियों पर विचार विमर्श करने एकत्रित हुये हों वहाँ के मंच से ऐसे वक्तव्य निश्चय ही पीड़ा देने वाले हैं .... मंचासीन ब्लोगर्स को इस कथ्य का विरोध करना चाहिए था ।

    उत्तर देंहटाएं
  30. मनोज जी ,उत्तेजित न हों ,आलोचना (समालोचना ,समीक्षा न सही ) ब्लॉग कर्म के लिए वरदान समझिये .जो सशक्त होता है वही अखरता है .जो पत्रकार पिटता उसकी लेखनी में दम होता है .समाचारों ने हमारा नोटिस लिया यह क्या कम है .ये वही लोग हैं जो सम्पादक बदल जाने पर स्वीकृत रचना भी वापस करते आयें हैं (साप्ताहिक हिन्दुस्तां में शीला झुनझुनवाला ने एक लेख स्वीकृत किया "क्या धूमकेतु ही डायना -सौर के विनाश का कारण बने ,इसे विशेषांक के लिए स्वीकृत किया गया था ,संपादक बदल के साथ लेख मेरे पास वापस आया इस खूब सूरत टिपण्णी के साथ -बन्धु ये बातें अब बहुत पुरानी हो गईं हैं ,मैंने वह लेख पुन :प्रेषित कर दिया विज्ञान प्रगति को जहां उसका नम्बर तकरीबन नौ महीने बाद आया ,मैंने मन में सोचा -बंधू ये बातें उतनी भी पुरानी नहीं हुईं हैं जो पुराण बन जाएँ ,कुछ मुद्दे अनिर्णीत रहें आयें हैं यह भी एक ऐसा ही मुद्दा था जिस पर आज भी शोध ज़ारी है .

    खुन्नस ब्लोगरों से यह है कि न्यू -मीडिया किसी का रिमोट नहीं है .यहाँ सम्पादक ,नाम का नहीं है ,प्रबंधक या प्रबंध सम्पादक के अधीन नहीं है ,वह है और बाकायदा है अपनी एक राय रखता है .

    बहर सूरत यह दुखद प्रसंग है .जबकि दोनों जन -संचार का ज़रिया हैं .सामाजिक सरोकारों से जुड़े होने चाहिए संसदीय (अप -भाषा )भाषा से नहीं यहाँ यह कहने की ज़रुरत नहीं है कई रिसाले सालों साल ब्लॉग से उठाए माल से चल सकतें हैं .हींग लगे न फिटकरी रंग चौखा ही चौखा .जो लेखक सम्पादक की ठसक से मुक्त हुआ है वह ब्लोगर कहलाता है .,सम्पादक पर तो अब तरस आता है ,कोर्पोरेट हाउसिज़ हैं अब अखबार .यहाँ अब कोई प्रभाष जोशी नहीं है ,'पेज थ्री" वाले हैं . कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    बृहस्पतिवार, 30 अगस्त 2012
    आपकी रीढ़ के स्वास्थ्य से ही जुडी है आपकी नितम्ब ,सेक्रोइलियक जोइंट और टांगों की समस्याएं
    आपकी रीढ़ के स्वास्थ्य से ही जुडी है आपकी नितम्ब ,सेक्रोइलियक जोइंट और टांगों की समस्याएं

    Hip ,Sacroiliac Leg problems शीर्षक से आप इसी ब्लॉग पर अंग्रेजी में एक आलेख पढ़ चुकें हैं .अब यह आलेख यहाँ हिंदी में भी प्रस्तुत है .

    पहले कुछ पारिभाषिक शब्दों और उनसे निर्मित संकर शब्दों को लेते हैं .

    Sacrum :रीढ़ की आधार भूमि (जड़ या आधार )पर एक त्रिभुजाकार की हड्डी होती है .यह दोनों तरफ के प्रत्येक नितम्ब से जाके जुडती है तथा श्रोणी (Pelvis )का एक हिस्सा बनाती है .

    Sacroiliac :इसका सम्बन्ध सेक्रम और नितम्ब की हड्डी के ऊपरी हिस्से से होता है .नितम्ब की हड्डी के इसी ऊपरी हिस्से को कहा जाता है ilium.दोनों को संयुक्त करके बना सेक्रोइलियाक .

    चलिए इलियम को अलग से भी जान लेते हैं :यह श्रोणी का चौड़ा और समतल ऊपरी हिस्सा होता है .जो मेरु-स्थम्ब के आधार से जुड़ा होता है .

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    1. विरेन्द्र जी,
      मैं उत्तेजित नहीं विचलित हूं। चिंतित हूं।
      आपके जैसा अनुभव मुझे भी रहा है। आपने तो संपादक बदलने की बात की है, मुझे तो उसी संपादक ने, तीन स्वीकृत रचनाएं वापस कर दीं, जिनके किसी प्रिय लेखिका के आलेख की मैंने अलोचना कर दी थी। चौदह साल पहले की बात है और अब चूंकि संपादक जीवित नहीं हैं, इसलिए नाम नहीं दे रहा। उन रचनाओं में से एक थी, ‘ओ कैटरपिलर’ जिसे जब वागर्थ को भेजा तो उन्होंने बिना देरी के छाप दिया। एक रचना थी, सूफ़ीमत पर जिस आलेख को ब्लॉग (विचार) पर पोस्ट करते करते यह श्रृंखला आज पुस्तकाकार रूप ले रही है।

      हटाएं
  31. पूरी तरह सहमत आपके विचारों से …………विरोध जरूरी है ……… मगर साथ ही ये भी जरूरी है कि यदि कोई ऐसे शब्दो या भाषा का प्रयोग करे तो उसे उसी वक्त टोक दिया जाये ताकि कोई ब्लोगजगत को हल्के से ना ले ।

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  32. अरे अखबार नवीसों! इन मंचासीन और मंचा- रूढ़ लम्पटों का मुंह तो ढक देते आपने तो पुलिसियों को भी मात कर दिया जो मुंह पे कमसे कम कपड़ा ढांक देतें हैं .कल को इन लम्पटों पर सुजानों का हमला हो गया तो कौन जिम्मेवार होगा ?
    मजा आ गया मनोज जी तमाम टिपण्णी मनोयोग से पढ़ी मंचासीन और अन -सीन सभी ब्लोगरों की ,ब्लोगरियों की यकीन मानिए यहाँ कैंटन में इस वक्त रात का पूरा डेढ़ बजा है भारत में दिन के ग्यारह बजे होंगें .शब्बा खैर !हेव ए ग्रेट नाईट .
    वीरुभाई ,४३,३०९ ,सिल्वर वुड ड्राइव ,कैंटन (मिशिगन )यू एस ए
    धूर ध्वनी :००१ -७३४ -४४६ -५४५१

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  33. अरे अखबार नवीसों! इन मंचासीन और मंचा- रूढ़ लम्पटों का मुंह तो ढक देते आपने तो पुलिसियों को भी मात कर दिया जो मुंह पे कमसे कम कपड़ा ढांक देतें हैं .कल को इन लम्पटों पर सुजानों का हमला हो गया तो कौन जिम्मेवार होगा ?
    मजा आ गया मनोज जी तमाम टिपण्णी मनोयोग से पढ़ी मंचासीन और अन -सीन सभी ब्लोगरों की ,ब्लोगरियों की यकीन मानिए यहाँ कैंटन में इस वक्त रात का पूरा डेढ़ बजा है भारत में दिन के ग्यारह बजे होंगें .शब्बा खैर !हेव ए ग्रेट नाईट .
    वीरुभाई ,४३,३०९ ,सिल्वर वुड ड्राइव ,कैंटन (मिशिगन )यू एस ए
    दूर - ध्वनी :००१ -७३४ -४४६ -५४५१

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  34. जहाँ तक मेरा विचार है कि प्रिंट या इलेक्ट्रौनिक मिडिया पर से सबों का भरोसा उठ सा गया है क्योंकि हम तक या तो आधा सच परोसा जाता है या फिर प्रायोजित झूठ .जिसके लिए उन्हें मोटी रकम भी मिलती है. ब्लॉग जगत में अभी वैसा घिनौना कारोबार शुरू नहीं हुआ है और अभिव्यक्ति किसी स्वार्थ या दबाव से नहीं जुडी है . हमारे बीच की सच्चाई को आवाज मिली है जो उन्हें हजम नहीं हो रहा है.. इसलिए आपसे सहमती के साथ घोर आपत्ति ऐसी अभद्र विशेषणों के लिए .

    उत्तर देंहटाएं
  35. भाषा जिसकी भी ऐसी है, वह कितना भी लिख ले .... कलम का अधिकारी नहीं . अर्थ अनर्थ करके कौन सी मंशा पूरी करनी है . ख़ुशी मनाने का यह तरीका मेरी समझ से बाहर था , बाहर है...

    उत्तर देंहटाएं
  36. .

    हिंदी ब्लॉगर्स दुनिया की सबसे शान्तिपूर्ण प्रजाति के हैं ! वे बेख़ौफ़ हर विषय पर अपनी लेखनी चलाते हैं , बिना किसी शोहरत और पैसों के मोह के ! क्या समझेगी इस बात को बिकी हुयी मीडिया ! खुद तो ब्लॉगर्स के बेहतरीन आलेख चोरी करके छापते हैं और उससे मुनाफा कमाते हैं ! चोरी और लूट मचाकर डाका डालते हैं हमारे ब्लॉग्स पर और ऊपर से तुर्रा ये की ब्लॉगर्स लम्पट हैं !

    मीडिया वाले आजकल कामचोरी करते हैं काम करते नहीं केवल तनख्वाह लेते हैं ! ब्लॉग्स और फेसबुक से लेखकों के विचार चुराते हैं और उस पर हल्दी , अजवाईन का तड़का लगाकर अपने नाम से छाप देते हैं !

    मेहनत हमारी , मुनाफा इनका !

    नहीं चलेगा ये अन्याय ! हम सभी स्त्री एवं पुरुष ब्लॉगर्स की तरफ इस घटिया बयान का पुरजोर विरोध करते हैं ! डरपोक हैं ये , डरते हैं ये ब्लॉगर्स से ! ब्लौगिंग की लोकप्रियता ने असुरक्षा पैदा कर दी है इनके दिलों में ! ऐसा बयान व्यक्ति की द्वेषपूर्ण सोच और तंगदिली की तरफ इशारा करता है !

    .

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  37. मनोज जी,,,, आपका विचलित होना स्वाभाविक,और आपके विचारों से सहमत भी हूँ,,,,,,,

    MY RECENT POST ...: जख्म,,,

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  38. इस समाचार की जितनी भी निंदा की जाय कम है !

    उत्तर देंहटाएं


  39. LUCKNOW: Hindi bloggers are now getting their place in the sun. Drawn from India and the rest of the world, they will be honoured in Lucknow on August 27 for popularising the language in cyberspace.

    Parikalpana, a bloggers' organisation, would confer the awards on 51 persons during an international bloggers' conclave at the Rai Umanath Bali auditorium here, said Ravindra Prabhat, the organising committee's convenor.

    The participants, some of whom also blog in English and Urdu, have made Hindi popular in the United States, the United Kingdom, the United Arab Emirates, Canada, Germany and Mauritius.

    "The blogger of the decade prize would be conferred on Bhopal's Ravi Ratlami who has a huge following," added Prabhat, a noted Hindi blogger.

    The NRI bloggers who have confirmed their participation include Dr Poornima Burman, editor of Abhivyakti (an online book in Hindi published from Sharjah) and the Toronto-based Samir Lal 'Samir' who writes blogs in Hindi and English.

    London-based journalist Shikha Varshneya, a regular blogger who has written a book 'Russia in Memory', is also expected to attend the ceremony. The others include Sudha Bhargava (USA), Anita Kapoor (London), Baboosha Kohli (London), Mukesh Kumar Sinha (Jharkhand) and Rae Bareli's Santosh Trivedi, an engineer who left his job with the Uttar Pradesh Power Corporation Ltd, for blogging.

    Avinash Vachaspati, the author of the first book on Hindi blogging in India and DS Pawala (Bokaro), the first to start Hindi blogging in India would also be there as would multi-lingual blogger Ismat Zaidi, who writes in Hindi, Urdu and English. Her Urdu ghazals are a hit on the web.

    Asgar Wajahat and Shesh Narayan Singh are also expected to participate, but a confirmation is awaited.

    The bloggers would discuss the future of the new media, its contribution to the society, especially the future of Hindi blogging and its role in the days to come.

    ---
    this is the news in ht dated 8th august lucknow edition

    santosh trevedi left his job for bloging REALLY ???

    avinash vachaspati wrote the first book on hindi bloging REALLY ??

    DS Pawala (Bokaro), the first to start Hindi blogging in India REALLY ??


    DONT YOU THINK ITS HIGH TIME WE FIRST PUT THE FACTS RIGHT

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    1. कहीं पढ़ा कि अंग्रेज़ी अख़बार के प्रथम पृष्ठ पर हिंदी ब्लॉगिंग की ख़बर।

      हटाएं
  40. इसकी जितनी भी निंदा की जाय कम है । मंचासीन ब्लोगर्स को इस कथ्य का विरोध करना चाहिए था । और पुरस्कार पाने वाले ब्लागर्स बंधुओं को भी अपना विरोध दर्शाना चाहिए था । व्‍यक्ति के शब्द प्रयोग ही उसके सभ्य और असभ्य होने की पहचान कराते है । इस कथय के जनक अपनी पहचान दे चुके हैं तथापि आदरणीय मनोज कुमार जी क्षमा चाहते हुए कहना चाहूँगा कि यह वह कथन था जिसे एक बंद कमरे में चंद लोगों ने सुना था और एक नासमझ शिशु समाचार पत्र ने अपने पन्नों पर टेप दिया था । लेकिन आपनें उसे न केवल ब्लॉंग बल्कि फेसबुक के जरिए भी सार्वजनिक बना डाला। आपके द्वारा इसे यहां डाल दिए जाने पर जितने लोगों ने पढ़ा है मुझे लगता है उतने तो उस समाचार पत्र के पाठक भी नहीं हैं । शायद इसी लिए इस समाचार पत्र ने इसे छापा है ब्लागर्स इसे अपने अपने ब्लॉग पर भले ही भर्त्स्ना के लिए स्थान देंगें तो नाम व प्रचार तो होगा । शायद यहां यही सोच काम कर रही थी कि बदनाम होगें तो क्या नाम न होगा । देख लीजिए मुझे दिल्ली में और आपकों कोलकता में कैनविज टाइम्स के बारे में पता चल गया है । आज तक तो मैं इससे अनजान ही था ।

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  41. उस समाचार पत्र का रिपोर्टर हीनभावना से ग्रसित लगता है।

    निंदनीय समाचार।

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  42. चर्चा बहुत ही सार्थक हो रही है...
    हिन्दी के कई ऐसे ब्लॉग हैं जिनके लेखों का स्तर हिन्दी के टॉप अखबारों और पत्रिकाओं के स्तर से बहुत ऊपर है... वैसे ऐसे घटिया अखबार के घटिया लेख में लिखी बात को मैं गंभीरता से नहीं लेता...
    बापू ने कहा था 'पहले वो तुमपर हँसेंगे, फिर वो तुम्हारी उपेक्षा करेंगे, फिर वो तुमसे लड़ेंगे.. और फिर तुम जीत जाओगे..... "
    हिन्दी ब्लॉगिंग जीत की ओर अग्रसर है...

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  43. लम्पटता के मानी क्या हैं ?

    कई मर्तबा व्यक्ति जो कहना चाहता है वह नहीं कह पाता उसे उपयुक्त शब्द नहीं मिलतें हैं .अब कोई भले किसी अखबार का सम्पादक हो उसके लिए यह ज़रूरी नहीं है वह भाषा का सही ज्ञाता भी हो हर शब्द की ध्वनी और संस्कार से वाकिफ हो ही .लखनऊ सम्मलेन में एक अखबार से लम्पट शब्द प्रयोग में यही गडबडी हुई है .

    हो सकता है अखबार कहना यह चाहता हों ,ब्लोगर छपास लोलुप ,छपास के लिए उतावले रहतें हैं बिना विषय की गहराई में जाए छाप देतें हैं पोस्ट .

    बेशक लम्पट शब्द इच्छा और लालसा के रूप में कभी प्रयोग होता था अब इसका अर्थ रूढ़ हो चुका है :

    "कामुकता में जो बारहा डुबकी लगाता है वह लम्पट कहलाता है "

    अखबार के उस लिखाड़ी को क्षमा इसलिए किया जा सकता है ,उसे उपयुक्त शब्द नहीं मिला ,पटरी से उतरा हुआ शब्द मिला .जब सम्पादक बंधू को इस शब्द का मतलब समझ आया होगा वह भी खुश नहीं हुए होंगें .

    यूं अखबार वालों की स्वतंत्र सत्ता नहीं होती है.अखबार श्रेष्ठ नहीं होता है औरों से ,अन्य माध्यमों से ,अखबार की एक नियत बंधी बंधाई भाषा होती है उसी के तहत काम करना होता है हमारे मित्र बाबू लाल शर्मा (पूर्व सम्पादक ,माया ,दैनिक भास्कर ,अब स्वर्गीय ) बतलाया करते थे वीरू भाई कुल २२,००० शब्द होतें हैं जिनके गिर्द अखबार छपता है .अखबार की एक व्यावहारिक सी भाषा होती है जिसमें कोई ताजगी नहीं होती .

    ब्लॉग ताज़ी हवा का झोंका है भाषा प्रयोग के मामले में .ब्लोगर जब लिखता है उसमें ताजगी होती है .आतुरता होती है मैं और ब्लोगरों से अच्छा लिखूं .आगे बढूँ .

    सही शब्द था "आतुरता "सम्पादक का यह वक्तव्य ज़रूर लम्पटता है जिसे अखबार ने शीर्षक बनाया है .अभिव्यक्ति की जल्दी में अखबार ऐसा कर गया अब अगर उसे पलट कर कोई लम्पट कहे तो यह उपयुक्त नहीं होगा .

    अब लोभ और लोभी शब्द एक ही धातु "लभ" से बनें हैं लेकिन लोभी शब्द अच्छे अर्थ में नहीं जाएगा .

    लौंडा लौंडिया का अर्थ वैसे तो लडका लडकी ही होता है लेकिन लखनऊ की नवाबी ने इसके अर्थ बदल दिए यह शब्द सामाजिक रूप से वर्जित हो गया .हरियाणा में तो इसे बहुत ही गर्हित मानते हैं ,सोडोटौमी से जोड़ देते हैं .

    इसी तरह लम्पट शब्द अब एक ख़ास चरित्र के मामले में आ गया है .यह चरित्र नीति का शब्द है ब्लोगर के लिए यह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता .

    वीरुभाई ,४३ ,३०९ ,सिल्वरवुड ड्राइव ,कैंटन ,मिशिगन

    ००१ -७३४ -४४६ -५४५१

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  44. ब्लॉगर्स के लिए ऐसी टिप्पणी एक ब्लॉगर सम्मेलन में स्वयं एक ब्लॉगर द्वारा की गई। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। हम इस प्रकार की टिप्पणी की घोर निंदा करते हैं। आज हिंदी ब्लॉगिंग एक सशक्त माध्यम है भाव और विचार अभिव्यक्ति का। ब्लॉग जगत में लिख रहे लोगों को लंपट कहना न केवल शरारतपूर्ण है बल्कि यह आयोजकों की लापरवाही का भी नतीजा है। ब्लॉगर सम्मेलन में गैर-ब्लॉगर साहित्यकारों को बुलाना है तो कम से कम उन साहित्यकारों को बुलाइए जो ब्लॉग-जगत में लिखे जा रहे साहित्य का अवलोकन करते हों। मुझे लगता है कि जिन ब्लॉगर-बंधु ने यह टिप्पणी दी है,उन्होंने कम से कम अपने ब्लॉग पर आ रही टिप्पणियों की गुणवत्ता का तो मूल्यांकन करना ही था। मुझे ब्लॉग जगत में लगभग चार साल हो गए,लेकिन कभी ऐसी टिप्पणी मैंने अपने किसी ब्लॉग पर नहीं देखी जिसे देख कर कहा जा सके कि लिखने वाला लंपट रहा होगा। यह बेहद भर्तसनापूर्ण वक्तव्य है। हम पुरजोर शब्दों में इसकी कड़ी आलपचना व तीखी भर्तसना करते हैं।

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  45. लम्पट शब्द का प्रयोग उचित नहीं था,मैं आपकी बात से सहमत हूँ.हो सकता है हड़बड़ी में उनसे ये शब्द निकल गया हो जिसका उन्हें भी पछतावा हो.बहरहाल इस पर विरोध दर्ज कराना ठीक था.

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  46. aajkal midiya/print midiya par vishwas karna kathin hai...n jane kis roop me baat ko kaha gaya aur kir roop me parosa gaya. aur agar sach me baat ka sahi roop yahi hai to aapka aur ham un sab bloggers ka vichlit hona swabhavik hai jo sacche man se hindi jagat/blog jagat/saahity jagat ki sewa me lage hain. ye media aur baki log ye kyu bhool jate hain ki ye blog jagat Hindi ko kitna badhava de raha hai aur hindi sarv-sammati se apna sthan paa rahi hai. door-daraj me videsho me baithe hamare bandhu/sathi bhi kitne bhayi-chare me jude hue hain.

    apwad to har jageh hain.... mediya me/print midiya me /pictures me/tv me/serials me / masala books me/ patrikaaon me kahan nahi hain? sabhi ungliya jaise ek samaan nahi aise samaj me har insan ek samaan nahi to soch bhi bhinn hogi hi.

    agar is baat me sacchayi thi to vahan baithe sammanneey/pratishthit baaki k bloggers kya kar rahe the ? bahut se sawal uthte hain....unki pratikriya kuchh saamne na aane par aisa prateet hota hai ki mediya ne is baat ko uchhala hai. sach kahte hain salil ji ' प्रेम गली की तरह ही ब्लॉग गली अति साँकरी, जा में दोऊ न समाये.. चाहे प्रिंट/इलेक्ट्रोनिक मीडिया या सिर्फ ब्लॉग मीडिया!! '

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  47. लखनऊ ब्लॉगर सम्मान पर समाचार पत्रों के शीर्षक:

    "तकनीकी के कलाकारों ने किया मंथन"
    "ब्लॉगर बोले, गलत हाथों में ना पड़े तकनीक"
    "विचारों की स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का माध्यम है ब्लॉग"
    "Govt Regulation not needed"
    "इतिहास बनेगा ब्लॉगर सम्मेलन"
    "ब्लॉग की दुनिया में लम्पटों की कमी नहीं"
    "Bloggers discuss need for setting up Blog Akademi"
    "सामाजिक कुरीतियों से लड़ने का माध्यम है ब्लॉग"
    "देश के ८०% लोग ब्लॉग से अनभिज्ञ"
    "Calling for code of positive net effect"

    अब बताईये आप किस पर विचार विमर्श करना चाहेंगे?

    क्या यही इकलौती बात साबित नहीं करेगी कि लम्पट कौन?

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  48. हूँम्म्म्म्म ! तो प्रिंट मीडिया को चुनौती देने वाली चिट्ठा दुनिया से भयभीत हैं कुछ लोग ...और सहित्य में अब तक रहे अपने एकाधिकार पर आसन्न संकट से विचलित हैं वे। आने वाले समय में प्रिंट मीडिया से कहीं अधिक प्रतिष्ठित होने वाले चिट्ठा जगत के अस्तित्व को स्वीकार करने की उदारता और गुणग्राहकता के अभाव ने प्रिंट मीडिया के बौद्धिकतत्व को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जहाँ तक लम्पटत्व की बात है तो मैं कहना चाहूँगा कि आज जब सभी परिभाषायें उलट-पलट हो रही हैं तो लम्पटत्व की परिभाषा भी बदलनी चाहिये। जैसे सदाचार आज के लिये अव्यावहारिक गुण है, ईमानदारी से जीवन जीने की चाहत व्यव्स्था के विरुद्ध जाना घोषित है उसी तरह जनसत्ता के आदरणीय सम्पादक जी के अनुसार चिट्ठा जगत में एक अच्छा लेखक होना लम्पटत्व गुण का द्योतक हो गया है। सम्पादक हैं तो निश्चित ही विद्वान होंगे ही, हम उनके द्वारा स्थापित इस नव परिभाषा को स्वीकार करते हुये आज स्वयं को लम्पट घोषित करते हैं। ब्लॉग जगत के साहित्यकारों पर माँ सरस्वती की कृपा बनी रहे ..हम साहित्य में नित नव कीर्तिमान स्थापित करते रहें...यही कामना है जिससे हमारे लम्पटत्व गुण में निरंतर वृद्धि होती रहे। प्रिंट मीडिया के लोगों को भी चाहिये कि यदि वे अच्छे लेखक/कवि/चिंतक/विचारक बनना चाहते हैं तो अपने भीतर लम्पटत्व गुण की वृद्धि करें ...उनका कल्याण होगा। हे प्रिंट मीडिया के साहित्यकारो! आप भी लम्पट बन जाइये जिससे उत्कृष्ट साहित्य सेवा का अवसर आपको भी प्राप्त हो जाय...कहीं ऐसा न हो कि हम लम्पट होकर बाजी मार ले जायें और आप सब ब्रह्मचारी रहते हुये इस अवसर से वंचित होकर नर्क के गामी हो जायें।
    प्रेम से बोलिये ब्लॉग जगत ...अमर रहे। चिट्ठाकारों की ...जय हो। ब्लॉग साहित्य की उत्कृष्टता .....बरकरार रहे। अच्छा साहित्यकार होना यदि लम्पटत्व है .....तो समझो हम भी लम्पट हैं।

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  49. बहुत देर से आयी हूँ इसलिए बस इतना ही लिख रही हूँ कि ये मीडियावाले भी अब बौरा गए हैं।

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