राष्ट्रीय आन्दोलन
453. अलगाववाद की राजनीति-1
प्रवेश
साम्प्रदायिकता असल में एक सोच है। 1857 की लड़ाई हिन्दू और मुसलमानों, दोनों ने कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी। अगले 90
वर्षों में क्या हुआ कि देश को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित होना पड़ा। उन्नीसवीं
शताब्दी के अंतिम एक-डेढ़ दशकों को छोड़ दें, तो उस समय हिंदू और मुसलमान को संप्रदाय के रूप में नहीं देखा जाता था, बल्कि सारा ज़ोर हिन्दुस्तानीपन पर था। जब मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने देखा कि आधुनिक शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मुसलमान पिछड़ रहे हैं, तब भी उन्होंने इसका दोष हिन्दुओं पर नहीं दिया, बल्कि सरकारी नीतियों को इसका जिम्मेदार ठहराया। 1875 में सैयद अहमद ख़ान ने अलीगढ़ में वैज्ञानिक शिक्षण संस्थान असंप्रदायिक आधार पर खोले थे। इसके छात्रों और अध्यापकों में हिन्दू भी हुआ करते थे। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद सांप्रदायिकता की पहली झलक दिखाई देने लगी। लोगों में यह विश्वास विकसित होने लगा
कि विभिन्न धर्मों के अनुयायियों या समुदायों के हित एक-दूसरे के विरोधी हैं। यही वह विचारधारा थी जिसके आधार पर अलगाववाद या सांप्रदायिक राजनीति शुरू हुई।
अलगाववाद की राजनीति का उदय और विकास - प्रथम चरण
अलगाववाद की
राजनीति के उदय और विकास के पहले चरण में यह विश्वास विकसित हुआ कि एक ही धर्म मानने वालों के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हित एक जैसे ही होते हैं। इस
विचारधारा से धर्म पर आधारित सामाजिक-राजनीतिक समुदायों की धारणा यानी साप्रंदायिकता का जन्म हुआ। धर्म पर आधारित समुदायों को ही भारतीय समाज की बुनियादी इकाइयों के रूप में देखा जाने लगा। इन
विभिन्न समुदायों के अपने अलग-अलग नेता हुए। ये लोग अपने को सिर्फ राष्ट्रीयतावादी
कहने के बजाय राष्ट्रीयतावादी हिन्दू, राष्ट्रीयतावादी मुसलमान या
राष्ट्रीयतावादी सिख के रूप में देखते थे। वे सांप्रदायिक नेता के रूप में एकताबद्ध होकर
राष्ट्र की सेवा करते थे।
अलगाववादी विचारधारा का दूसरा चरण - नरमपंथी
सांप्रदायिकता
सांप्रदायिक
विचारधारा जिसमें यह माना जाने लगा कि एक धर्म के अनुयायियों के सांसारिक हित यानी
सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और
राजनीतिक हित अन्य किसी भी धर्म के अनुयायियों के सांसारिक हितों से भिन्न है, नरमपंथी
सांप्रदायिकता कहलाता है। 1937 तक अधिकांश सांप्रदायिकता नरमपंथी ही थी। हिन्दू महासभा, मुसलिम लीग, 1925 के बाद अली बंधु, 1922 के बाद मुहम्मद अली जिन्ना, मदनमोहन
मालवीय, लाला लाजपत
राय और एन.सी. कलेकर इसी उदारवादी ढाँचे के तहत काम करते रहे। इस दौर में
यह माना जाता था कि भारत का निर्माण ऐसे विभिन्न धर्मों पर आधारित समुदायों से हुआ है, जिनके अपने अलग-अलग और विशेष हित हैं। उन हितों में कभी-कभी टकराव की नौबत आ जाती है। फिर यह माना जाता रहा कि इन विभिन्न सांप्रदायिक हितों को परस्पर समाहित किया जा सकता है तथा सामान्य राष्ट्रीय हितों से उनकी संगति बैठाई जा सकती है और इस प्रकार भारत को एक नया राष्ट्र बनाया जा सकता है। इस दौर तक जनसाधारण में हिंदू सांप्रदायिकता या मुसलिम सांप्रदायिकता का सामाजिक आधार कोई खास विस्तृत नहीं था।
अलगाववादी विचारधारा का तीसरा चरण - उग्र
सांप्रदायिकता
वह संप्रदायिक विचारधारा, जब यह मान लिया जाता है कि विभिन्न धर्मों के
अनुयायियों के हित एक-दूसरे के विरोधी हैं, उग्रवादी साम्प्रदायिकता कहलाती है। इसके
तौर-तरीके फासीवादी होते हैं। इसके मूल में डर और नफ़रत का निवास होता
है। भाषा, कर्म, आचरण और मिजाज हिंसक होता है। 1937 के बाद सांप्रदायिक विचारधारा का रुख़ उग्र हो गया। भय और घृणा के वातावरण का सृजन हुआ। आचरण हिंसक हो गया। राजनीतिक विरोधियों को दुश्मन माना जाने लगा। एक-दूसरे के धर्म और संस्कृति को अपने धर्म और संस्कृति पर ख़तरा माना जाने लगा। मुसलमान और हिंदू के
लिए अलग राष्ट्र का सिद्धांत सामने आया। यह मान लिया
गया कि इनका
आपसी विरोध हमेशा रहने वाला और सुलझाया नहीं जा सकने वाला है। इस दौर में यह मान लिया गया कि झूठ जितना बड़ा होगा, उतना ही ज़्यादा काम करेगा। इस सांप्रदायिकता ने अपना सामाजिक आधार भी विस्तृत किया। जन भावनाओं को उभारने वाले
मुद्दों को प्रमुखता दी गई।
अलगाववादी राजनीति एक आधुनिक विचारधारा
साम्प्रदायिकता असल में एक ऐसी विचारधारा है
जिस पर साम्प्रदायिक राजनीति आधारित है। साम्प्रदायिक हिंसा साम्प्रदायिक सोच का
मिला-जुला नतीजा है। बिपन चन्द्र कहते हैं, “सच तो यह है कि
हिन्दुओं, मुसलमानों और अन्य समुदायों के आर्थिक
राजनीतिक हित एक ही थे और उस स्तर पर उनके बीच कोई सामुदायिक विभाजन नहीं किया जा
सकता था।” सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से हिंदू और मुसलमान में बहुत सारी समानता थी। झूठे सांप्रदायिक बंटवारे ने भारतीय लोगों के
भाषा-सांस्कृतिक इलाकों और सामाजिक वर्गों में असली बंटवारे के साथ-साथ एक देश के
तौर पर उनकी असली, उभरती और बढ़ती एकता को भी छिपा दिया। इसलिए हम कह सकते हैं कि भारतीय जनता का सांप्रदायिक विभाजन अवास्तविक था और इसका उद्देश्य विकसित हो रही राष्ट्रीय एकता में दरार पैदा कर इसे कमज़ोर करना था। सांप्रदायिकतावादी जिन चीज़ों को समस्याओं के रूप में पेश करते थे, वे वास्तविक समस्याएं थीं ही नहीं। सांप्रदायिकतावादी ने जो जवाब बताया, वह असली जवाब था ही नहीं। वे प्राचीन या मध्ययुगीन विचारधाराओं का इस्तेमाल ज़रूर करते थे, लेकिन सांप्रदायिकता अतीत की विरासत थी ही नहीं, वह मूलतः एक आधुनिक विचारधारा थी। यह आधुनिक सामाजिक समूहों की राजनीतिक, सामाजिक आकांक्षाओं को व्यक्त करती थी। अलगाववाद की
राजनीति को सामाजिक जड़ों में और लक्ष्यों को आधुनिक काल में खोजा जा सकता है। समकालीन
सामाजिक-आर्थिक ढांचे ने न केवल इसे पैदा किया, बल्कि पल्लवित और पुष्पित भी किया।
सांप्रदायिकता का उदय तभी संभव हुआ जब जनता की भागीदारी, जन-जागरण और जनमत के आधार पर चलने वाली राजनीति शुरू हो चुकी थी। जवाहरलाल नेहरू ने 1936 में कहा था: ‘किसी को यह कभी नहीं भूलना
चाहिए कि भारत में सांप्रदायिकता एक नई सोच है जो हमारी आंखों के सामने बढ़ी है।’
सांप्रदायिक चेतना का जन्म उपनिवेशवाद के दबाव
में
भारत में सांप्रदायिक चेतना का जन्म उपनिवेशवाद के दबाव और उसके ख़िलाफ़ संघर्ष करने की ज़रूरत से उत्पन्न परिवर्तनों के कारण हुआ। जब देश के एकीकरण और आधुनिक राष्ट्र बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी भारतीय जनता का अंतर्विरोध भी बढ़ा। भारतीयों में राजनीतिक चेतना के विकास के साथ-साथ आधुनिक सामाजिक वर्गों का निर्माण हुआ। राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक विकास, भाषाई विकास और वर्ग संघर्ष जैसी आधुनिक धारणाओं का प्रसार हुआ। इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों में अपने साझा हितों को देखने के नए तरीक़े की ज़रूरत हुई। संपर्कों और वफ़ादारियों के व्यापक आयाम की ज़रूरत हुई। देश के कुछ हिस्सों में आम जनता के कुछ वर्गों में धार्मिक चेतना सांप्रदायिक चेतना में बदल गई। इससे समाज के कुछ हिस्सों की ज़रूरतें पूरी हुईं और कुछ राजनीतिक ताक़तों को फ़ायदा मिला।
भारत में अलगाववाद की राजनीति उपनिवेशवादी अर्थव्यवस्था का परिणाम
साम्प्रदायिकता भारतीय अर्थव्यवस्था के औपनिवेशिक
चरित्र और उपनिवेशवाद की भारतीय अर्थव्यवस्था को विकसित
न कर पाने की नाकामी का एक बाय-प्रोडक्ट था। यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि अलगाववादी
राजनीति सिर्फ सत्ता-लोलुप राजनीतिज्ञों या धूर्त प्रशासकों के षड्यंत्र का नतीजा
था। बीसवीं सदी में जिस सांप्रदायिक भावना का विकास हुआ उसकी जड़ें यहां की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों में थीं। भारत में उपनिवेशवादी अर्थव्यवस्था थी। इसके परिणामस्वरूप यहां पिछड़ापन फलता-फूलता गया और उसने सांप्रदायिकता के विकास को बढ़ावा दिया। औपनिवेशिक शोषण के कारण मध्य वर्ग के जीवन पर गहरा असर पड़ा और वह भारतीय समाज के विभाजन और कलह का कारण बना। भारत में न तो औद्योगिक विकास हो रहा था और न ही शिक्षा, स्वास्थ्य या अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक सेवाओं का फैलाव हो रहा था। बेकारी और ग़रीबी एक विकट समस्या तो थी ही। लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति गिरती जा रही थी। 1928 के बाद ग्रेट डिप्रेशन के दौरान ये इकोनॉमिक
मौके और कम हो गए, जब बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी फैल गई। जिनमें व्यापक सामाजिक दृष्टि और राजनीतिक समझदारी नहीं थी, वे अपने संकीर्ण तात्कालिक हितों और समस्याओं के शीघ्र समाधान के लिए संप्रदाय आदि के आधार पर नौकरियों या विधायिकाओं में आरक्षण पाने की कोशिश करने लगे। लोग अपने निजी संघर्ष को एक विस्तृत आधार देने के लिए प्रांत और धर्म जैसी सामूहिक पहचानो का सहारा लेने लगे। कुछ लोगों को इससे तात्कालिक फायदा भी हुआ लेकिन इससे सांप्रदायिक राजनीति को एक तरह से वैधता भी मिली। बाद में शिक्षा का प्रसार जब गांवों तक हुआ तो गांवों के शिक्षित युवक रोज़गार के लिए गांवों से बाहर निकले और सांप्रदायिक आरक्षण के आधार पर उन्हें तात्कालिक सफलता भी मिली। लेकिन इससे सांप्रदायिकता का आधार और व्यापक हुआ और इसने गांवों के उच्च वर्ग को अपनी गिरफ़्त में ले लिया। जब राजनीतिक राष्ट्रीय आंदोलन ज़ोर पर रहता तो लोग साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलन में जम कर हिस्सा लेते लेकिन आन्दोलन के कमज़ोर पड़ते ही वे व्यक्तिगत लाभ के लिए सांप्रदायिकता जैसी विचारधाराओं के आधार पर की जाने वाली राजनीति की ओर मुड़ जाते। पहली स्थिति में उनके सामाजिक हित राष्ट्रीय हित के साथ जुड़ जाते और दूसरी स्थिति में लोगों की संकीर्णता और स्वार्थपरता प्रमुख हो जाती जिससे साम्राज्यवाद को अलगाववादी
राजनीति को बढाने में मदद मिलती।
सांप्रदायिक संघर्ष की अभिव्यक्ति वर्ग संघर्ष के
रूप में
शोषक और शोषित के अलग-अलग धर्मों के मानने वाले होने के कारण भी सांप्रदायिकता को एक आयाम मिलता था। बिपन चन्द्र
के अनुसार ‘असंतोष या हितों का संघर्ष वास्तविक था और धर्म या संप्रदाय से उनका कुछ भी लेना-देना नहीं था, लेकिन राजनीतिक जागरूकता के अभाव में उन्हें सांप्रदायिक संघर्षों के रूप में अभिव्यक्ति मिलती।’ वास्तविक समस्याओं को सांप्रदायिक समस्याओं के रूप में पेश किया जाता। शोषक वर्ग के अधिकांश ज़मींदार हिंदू थे और जबकि शोषितों में अधिकांश मुसलिम होते तो सांप्रदायिकतावादियों द्वारा यह ऐसे पेश किया जाता मानो हिंदू मुसलिम का शोषण कर रहे हैं या मुसलमानों के कारण हिन्दुओं की सम्पत्ति ख़तरे में है। पूरी तरह ग़लत होने के बावज़ूद यह प्रचार काम कर जाता। इन दोनों वर्गों के बीच के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से निहित स्वार्थों ने सांप्रदायिकता को जान-बूझ कर प्रोत्साहित किया ताकि लक्ष्यों की प्राप्ति में उन्हें आसानी हो।
ब्रिटिश शासकों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति
ब्रिटिश शासकों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई। यह नीति आधुनिक भारत में साम्प्रदायिकता के बढ़ने के
लिए खास तौर पर ज़िम्मेदार थी।
यह भी सच है कि यह सिर्फ़
अंदरूनी सामाजिक और राजनीतिक हालात की वजह से ही कामयाब हो सकी। ब्रिटिश शासकों ने सांप्रदायिकता का इस्तेमाल राष्ट्रीय आंदोलन को रोकने और उसे कमज़ोर करने में किया। इसके पीछे उसने तर्क यह दिया कि अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए सांप्रदायिक विभाजन ज़रूरी था। इस तरह से राष्ट्रीय एकता के उदय को रोकने के लिए इसका भरपूर इस्तेमाल किया गया। भारतीय समाज
में जो भी विभाजन मौजूद थे, उन्हें
प्रोत्साहित किया गया। एक अंचल को दूसरे अंचल के खिलाफ, एक प्रांत को
दूसरे प्रांत के खिलाफ, एक भाषा को
दूसरी भाषा के खिलाफ, एक जाति को दूसरी जाति के खिलाफ, एक वर्ग को दूसरे वर्ग के खिलाफ, सुधारकों को कट्टर लोगों के खिलाफ, नरमपंथियों को मिलिटेंट के खिलाफ, लेफ्टिस्ट को राइटिस्ट के खिलाफ, भिड़ा दिया जाता। आख़िरी दौर में तो यही उपनिवेशवाद का मुख्य स्तंभ बन गया। औपनिवेशिक हुक़ूमत ने सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न करने की नीति ही बना ली। अलगाववाद
का प्रयोग औज़ार के रूप में किया गया। इसे औपनिवेशिक हुकूमत का शक्तिशाली समर्थन
मिला और इसका इस हद तक विकास हुआ कि देश दो टुकड़ों में बंट गया।
राष्ट्रीयतावादी विचारधारा में हिन्दुत्व का पुट
साम्प्रदायिकता के बढ़ने में एक बड़ा योगदान
देने वाला कारण 20वीं सदी की शुरुआत में ज़्यादातर राष्ट्रवादी सोच और प्रोपेगैंडा
में साफ़ तौर पर हिंदू रंगत थी। बहुत से नेताओं ने राष्ट्रीयतावादी विचारधारा में हिन्दुत्व का पुट जोड़ दिया। वे मध्ययुगीन संस्कृति को भुलाकर प्राचीन संस्कृति पर ज़ोर देते। वे भारतीय राष्ट्रीयता को हिंदूवादी रंग देने की कोशिश करते। राष्ट्रीयता का प्रचार करने के लिए गणेश पूजा और शिवाजी जयंती का सहारा लिया गया। बंग-भंग के ख़िलाफ़ आंदोलन की शुरुआत गंगा में डुबकी लगाकर की गई। अक्सर उपन्यास, नाटक, कविताओं और कहानियों में मुसलमानों को विदेशी कहा जाता था। इसमें
मुस्लिम शासकों और अधिकारियों को अक्सर ज़ालिम के तौर पर दिखाया जाता था। इसने सांप्रदायिकता के विकास में सहयोग दिया। शिक्षित मुसलमानों में इससे असंतोष पैदा होता और वे राष्ट्रीय आंदोलन से विमुख हो जाते। सरकार और मुसलिम सांप्रदायिकतावादियों ने इस हिंदू रंगत का उपयोग मुसलमानों की काफी बड़ी संख्या को राष्ट्रीय आंदोलन से अलग रखने में किया। उनका तर्क था कि अगर राष्ट्रीयतावादी आंदोलन सफल हो गया, तो देश में हिंदू राज स्थापित हो जाएगा।
इतिहासकारों द्वारा इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्या
साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने भारत के प्राचीन और मध्ययुगीन इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्या प्रस्तुत कर सांप्रदायिक चेतना का विस्तार किया। गांधीजी ने कहा भी था, “हमारे देश में सांप्रदायिक सौहार्द्र तब तक स्थायी रूप से नहीं लाया जा सकता, जबतक हमारे स्कूल-कॉलेजों में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों के ज़रिए इतिहास की बेहद विकृत व्याख्याएं पढ़ायी जाती रहेंगी।” जेम्स मिल जैसे ब्रिटिश इतिहासकारों ने प्राचीन काल को हिन्दू युग और मध्यकाल को मुसलिम युग की संज्ञा दी थी। अनेक लेखक
अपनी रचनाओं में मुसलमानों का उल्लेख विदेशियों के रूप में किया करते और
राष्ट्रीयता को हिन्दुओं से जोड़कर देखते थे। मुसलमान शासकों को अत्याचारियों के
रूप में चित्रित किया जाता। इन लोगों ने यह साबित करने की कोशिश की शासक मुसलिम था और शोषित हिन्दू।
भारत
में धार्मिक बहुलता
कुछ लेखकों के अनुसार, साम्प्रदायिकता के बढ़ने का एक बड़ा कारण भारत में धार्मिक
बहुलता या कई धर्मों का होना था। यह सच नहीं है कि कई धर्मों वाले समाज में साम्प्रदायिकता
ज़रूर पैदा होगी। धर्म साम्प्रदायिकता का कोई बुनियादी कारण नहीं था। लोग धर्म को
अपने निजी विश्वास के हिस्से के रूप में मानते हैं। हमें धर्म पर आधारित सामाजिक-राजनीतिक पहचान की
विचारधारा, यानी
साम्प्रदायिकता के बीच अंतर करना होगा। धर्म साम्प्रदायिकता का 'कारण' नहीं है। धर्म साम्प्रदायिकता में तब तक आता है
जब तक वह धर्म के अलावा दूसरे क्षेत्रों में पैदा होने वाली राजनीति की सेवा करता
है। साम्प्रदायिकता धर्म से प्रेरित नहीं था, न ही धर्म साम्प्रदायिक राजनीति का मकसद था —
यह तो बस उसका ज़रिया था। साम्प्रदायिक लोगों ने धर्म को एक मोबिलाइज़िंग फैक्टर (संगठित
करने वाले कारक) के तौर पर इस्तेमाल किया। जैसे धर्म खतरे में है जैसे भड़काऊ नारों
का अपनाया जाना। हालांकि धर्म साम्प्रदायिकता के लिए ज़िम्मेदार नहीं था, लेकिन धार्मिकता एक बड़ा योगदान देने वाला
फैक्टर थी। धार्मिकता साम्प्रदायिकता नहीं थी, बल्कि इसने व्यक्ति को धर्म के नाम पर साम्प्रदायिकता
की अपील के लिए खोल दिया।
अलगाववाद की जड़
हिन्दू-मुसलमान विवाद की जड़ 1888 से देखा जा सकता है। कांग्रेस हिंदुओं की संस्थान नहीं थी। उसके जनक तो अंग्रेज़ थे। शुरू से मुसलमान भी उसके अध्यक्ष होते रहे हैं। बदरुद्दीन तैयबजी 1887 में हुए कांग्रेस के तीसरे अधिवेशन के अध्यक्ष थे। कांग्रेस के पहले दो-तीन अधिवेशन काफी सफल रहे। धीरे-धीरे
कांग्रेस
के
अधिवेशनों
में
राष्ट्रीय
समस्याओं
को
प्रमुखता
दी
जाने
लगी।
कांग्रेस
के
अधिवेशनों
की
सफलता
ने
ब्रिटिश नौकरशाही के
मन
में
हलचल
पैदा
कर
दी।
जब
यह
ज़ाहिर
हो
गया
कि
कांग्रेस
साम्राज्यवाद
के
विरुद्ध
है,
तो
सरकार
भी
अपने
सरपरस्ती
और
बढ़ावा
देने
के
रुख
में
बदलाव
लाना
शुरू
कर
दिया।
1885 में जिस
डफ़रिन
ने
कांग्रेस
के
जन्म
का
आशीर्वाद
दिया
था,
उसने
ही
तीन
साल
बाद
इसे
‘बहुत छोटा-सा अल्पमत’ कहकर
इसका
निरादर
करना
शुरू
कर
दिया
था।
1884 में “क्या तुम इस ज़मीन पर नहीं रहते? क्या तुम्हें इसमें दफ़नाया या यहीं जलाया नहीं जाता? यकीनन तुम एक ही ज़मीन पर जीते और मरते हो। याद रखें कि हिंदू और मुसलमान धार्मिक
शब्द हैं। नहीं तो इस देश में रहने वाले हिंदू, मुसलमान और ईसाई इस वजह से एक ही कौम
(देश या समुदाय) हैं।” कहने वाले सैयद अहमद ख़ान का भी स्वर बदल गया। जिस सर सैय्यद अहमद ने कभी कहा था कि “हिंदू और मुसलमान हिंदुस्तान की दो आंखें हैं और दोनों में से एक भी न हो तो मां का चेहरा बदसूरत हो जाएगा।” उन्हें अब लगने लगा कि ‘सरकार का साथ दे कर ही मुसलमानों के आर्थिक अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।’ सैयद अहमद और उनके समर्थकों ने यह कहना शुरू किया कि अगर अंग्रेज भारत से चले गए, तो हिंदू अपने संख्याबल के कारण, मुसलमानों पर हावी हो जाएंगे और उनके हितों का गला घोंट देंगे। सैयद अहमद का मानना था कि ‘भारत में मुसलिम हितों की सबसे अच्छी देखभाल अंग्रेज ही कर सकते हैं। अतः मुसलमानों को सरकार के प्रति वफ़ादार रहना चाहिए और कांग्रेस का विरोध करना चाहिए।’ औपनिवेशिक शासक उनके समर्थन और संरक्षण में लग गए।
लॉर्ड कर्ज़न ने
बंगाल विभाजन के द्वारा सांप्रदायिक द्वेष की कलुषित भावना जागृत कर दी थी। 1905-06 के दौरान जब
बंगाल में स्वदेशी आंदोलन छिड़ा, तो मुसलिम संप्रदायवादियों ने सरकार का पक्ष लिया
और स्वदेशी आंदोलन में भाग लेने वाले मुसलमानों को ‘कमीने’, ‘गद्दारों’ और ‘कांग्रेसी दलाल’ की उपाधि दी। उस समय बंगाल
में अधिकतर हिन्दू भूस्वामी थे और मुसलमान खेतिहर मज़दूर। अंग्रेजों ने मुसलमानों
को खूब भड़काया कि हिन्दू मुसलमानों का शोषण कर रहे हैं। अंग्रेजों द्वारा स्वदेशी
आन्दोलन को कमजोर करने के लिए मुल्लाओं और मौलवियों का इस्तेमाल किया गया। जब
स्वदेशी आन्दोलन अपने चरम बिंदु पर पहुँच ही रहा था तभी बंगाल में सांप्रदायिक
दंगे भड़क उठे। स्वदेशी आन्दोलन को अपने लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए आन्दोलनकारियों
ने पारंपरिक रीति-रिवाजों, त्यौहारों और संस्थाओं का सहारा लिया। इसका
चरित्र बहुत हद तक धार्मिक था। लोगों में राजनीतिक चेतना जगाने के लिए इस तरह का
प्रयोग कोई नया नहीं था। लेकिन जब सरकार खुद सांप्रदायिकता भड़का रही हो तो यह
प्रयोग खतरनाक साबित हुआ। सांप्रदायिक ताक़तों ने स्वदेशी आन्दोलन के उद्देश्यों को
विकृत ढंग से पेश किया। सदियों के भाईचारे और मेल-मिलाप से उपजी सांस्कृतिक
परंपराओं की भूमि पर इन सांप्रदायिक ताक़तों ने सांप्रदायिकता का बीजारोपण कर दिया।
इस कारण बंगाल के बहुसंख्यक मुसलमान स्वदेशी आन्दोलन में शरीक नहीं हुए और अलगाववादी
राजनीति के शिकार हो गए। फिर लॉर्ड मिंटो के ज़माने में मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन मंडल की तजवीज़ की थी। यहीं से हिंदू और मुसलमानों के बीच फूट की जड़ें गहरी
हो गईं।
ऑल इंडिया मुसलिम लीग की स्थापना
स्वदेशी आंदोलन से जिस जन राजनीति की शुरुआत हुई थी, उसके प्रवाह में काफी मुसलमान कांग्रेस की ओर आकर्षित हुए। सरकार को कुछ राजनीतिक रियायतों की भी घोषणा करनी पड़ी। तब मुसलिम संप्रदायवादियों को लगा कि निष्क्रियता की राजनीति छोड़नी पड़ेगी और सक्रिय राजनीति में आना होगा। परिणामस्वरूप 1907 में ‘ऑल इंडिया मुसलिम लीग’ की स्थापना हुई। इसके संस्थापकों में से आगा खां और नवाब मोहसिन-उल-हक़ जैसे अभिजात वर्गीय लोग थे। इसका चरित्र सरकार परस्त, सांप्रदायिक और अनुदारवादी थी। इसने बंग-भंग (बंगाल के बंटवारे) का समर्थन किया था। अलग मुस्लिम हितों का नारा लगाया, सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए सुरक्षा उपायों की
माँग की।
मुसलमानों के लिए अलग मतदाता मंडल की मांग भी की थी। इसका उद्देश्य मुसलिम शिक्षित वर्ग को कांग्रेस से विमुख करना था। उसका संघर्ष औपनिवेशिक सत्ता से नहीं कांग्रेस और हिंदुओं से था। इसके बाद से
ब्रिटिश राज ने मुस्लिम लीग को हमेशा महत्त्वपूर्ण स्थान देना प्रारंभ कर दिया।
हिंदू सांप्रदायिकता का उदय
इधर हिंदू सांप्रदायिकता का भी उदय हो रहा था। हिंदी को हिंदुओं की भाषा और उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहा जाने लगा। 1890 से गोवध विरोधी प्रचार शुरू हो गए थे। मुसलमानों की देखा देखी विधायिकाओं और नौकरियों में हिंदू सीट की मांग की जाने लगी। वी.एन. मुखर्जी और लालचंद ने 1909 में पंजाब हिंदू सभा की स्थापना की और हिंदू संप्रदायिक विचारधारा और राजनीति की नींव रखी। उन्हें भी कांग्रेस से शिकायत रहती थी, कि कांग्रेस ‘हिंदू हितों की बलि’ दे रही है। लालचंद ने अंग्रेज़ी में एक पुस्तक ‘राजनीति में आत्म-अस्वीकार’ लिखी थी। इसमें उसने कांग्रेस को हिंदुओं का ऐसा दुर्भाग्य बताया जिसे उन्होंने ख़ुद आमंत्रित किया था। उसका कहना था कि कांग्रेस के कारण हिंदुओं का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा इसलिए कांग्रेस का परित्याग किया जाना चाहिए।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ पर
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