गुरुवार, 12 मार्च 2026

455. मुस्लिम लीग-1

राष्ट्रीय आन्दोलन

455. मुस्लिम लीग-1

प्रवेश:

अंग्रेजों के आने के पहले बारह-तेरह सौ वर्षों से इस देश में हिन्दू-मुसलमान साथ रहते आए थे। सूफ़ी और हिन्दू संतों ने एक बेहतर सामाजिक सौहार्द्र की दिशा में महत्त्वपूर्ण काम किया था। 1857 की लड़ाई हिन्दू और मुसलमानों, दोनों ने कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी। इनके बीच के आपसी भाई-चारे के बीच कटुता और वैमनस्यता का बीज तो अंग्रेज़ों ने बोया था। उनकी कूटनीति का मूल सिद्धांत ही था, ‘फूट डालो और राज करो’। अंग्रेज़ों ने 1857 की क्रांति का दोष मुसलमान शासकों पर डाला। उनके प्रति भेदभाव का व्यवहार किया जाने लगा। सरकारी नौकरियों और सरकार द्वारा मान्य धंधों से उन्हें वंचित रखा जाता। परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों से उनका रोष बढ़ा। 1857 के 15 वर्षों बाद जब मुसलमानों का अंग्रेज़-विरोध ने भयंकर रूप धारण कर लिया तो ब्रिटिशों को लगा कि मुसलमानों संबंधी ब्रिटिश सरकार की नीति उचित नहीं है। अंग्रेज़ों की यह भावना 1885 के आसपास राष्ट्रवादी आंदोलन के उदय होने के बाद अधिक तीव्र हो गई। कारण यह था कि कांग्रेस की उत्पत्ति के बाद इसमें मुसलमानों का प्रतिनिधित्व साल-दर-साल बढ़ता जा रहा था। यह हिन्दू मुस्लिम लोगों का तालमेल अँग्रेज़ों को अखरने लगा। उन्होंने मुसलमानों को वफ़ादार बनाने की नीति अपना ली। 1906 में भारत का वायसराय लॉर्ड मिंटो ने कांग्रेस की बढ़ती लोकप्रियता कम करने के लिए मुसलमानों को महत्त्व देना शुरू कर दिया। अक्तूबर 1906 में मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मंडल आग खान के नेतृत्व में वायसराय से शिमला में मिला। उसने कहा, मुसलमान क़ौम को एक क़ौम की हैसियत से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। इसके जवाब में मिंटो ने कहा था, मैं आपके साथ पूरी तरह से सहमत हूं। उसके एक महीने के बाद ही वायसराय की शुभकामना और सहयोग से मुस्लिम लीग का गठन हुआ। किसी ने लॉर्ड मिंटो की पत्नी को पत्र द्वारा ख़ुशखबरी दी, हमने एक महत्त्वपूर्ण काम किया है, जो देश का इतिहास बदल सकने की क्षमता रखता है। हमने छह करोड़ मुसलमानों को राजद्रोही कांग्रेस से बचा लिया है। बाद के दिनों की राजनीतिक गतिविधियों ने यह साबित कर दिया कि मुसलिम लीग इस उपमहाद्वीप में मुस्लिम राज्य की स्थापना में सबसे प्रभावशाली शक्ति बनी।

ऑल इंडिया मुसलिम लीग की स्थापना

स्वदेशी आंदोलन के समय काफी मुसलमान कांग्रेस की ओर आकर्षित हुए। सरकार को कुछ राजनीतिक रियायतों की भी घोषणा करनी पड़ी। तब मुसलिम संप्रदायवादियों को लगा कि निष्क्रियता की राजनीति छोड़नी पड़ेगी और सक्रिय राजनीति में आना होगा। ‘मुहम्मदन अकादमिक सम्मेलन’ के वार्षिक सत्र के अंत में, उपमहाद्वीप के विभिन्न राज्यों के मुस्लिम प्रतिनिधियों ने ढाका नवाब सलीम अल्लाह खान के निमंत्रण पर एक विशेष सम्मेलन आयोजित किया। बैठक में निर्णय लिया गया कि मुसलमानों के राजनीतिक मार्गदर्शन के लिए एक राजनीतिक दल का गठन किया जाना चाहिए। परिणामस्वरूप अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का गठन 30 दिसंबर 1906 को में ढाका में हुआ। इसके संस्थापकों में से सलीमुल्लाहआगा ख़ान और नवाब मोहसिन-उल-हक़ जैसे अभिजातवर्गीय लोग थे। इसका चरित्र सरकारपरस्त, सांप्रदायिक और अनुदारवादी था। इसने मुसलमानों के लिए अलग मतदाता मंडल की मांग की थी। इसका उद्देश्य मुसलिम शिक्षित वर्ग को कांग्रेस से विमुख करना था। इसका मूल उद्देश्य ब्रिटिश भारत में मुसलमानों के हितों की रक्षा करना था, लेकिन आगे चलकर यह 'दो-राष्ट्र सिद्धांत' के आधार पर पाकिस्तान के निर्माण का प्रमुख कारक बनी, जिसका नेतृत्व मोहम्मद अली जिन्ना ने किया। सर आगा खान मुस्लिम लीग के पहले अध्यक्ष चुने गये। इसका केन्द्रीय कार्यालय अलीगढ में स्थापित किया गया। सभी राज्यों में शाखाएँ गठित की गईं।

जिन्ना को मुसलिम लीग में शामिल होने का निमंत्रण

1905 के बंगाल विभाजन ने सांप्रदायिक राजनीति को हवा दी थी। मुस्लिम अभिजात वर्ग को डर था कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले स्वराज्य में अल्पसंख्यक मुसलमानों के हितों की उपेक्षा होगी शुरुआत में लीग ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रही इसका मुख्य उद्देश्य मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorate) प्राप्त करना था अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का पहला अधिवेशन 1907 में कराची में हुआ था। प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता आगा खां ने की थी। 1908 में अमृतसर में मुस्लिम लीग का एक अधिवेशन आयोजित किया गया था। इस अमृतसर अधिवेशन में सर सैयद अली इमाम की अध्यक्षता में मुसलमानों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल की मांग की गई थी। इस माँग को अंग्रेजों द्वारा मॉर्ले-मिंटो सुधार 1909 के अंतर्गत स्वीकार कर लिया गया। मॉर्ले-मिंटो सुधार का मुख्य उद्देश्य विधान परिषदों का विस्तार करना था, लेकिन सबसे प्रमुख विशेषता मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की शुरुआत थी, जिसने भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। 1912 में कांग्रेस के नेता मुहम्मद अली जिन्ना को मुसलिम लीग में शामिल होने का निमंत्रण मिला। जिन्ना मुस्लिम राजनीति की मुख्यधारा में शामिल हो गया। उसी वर्ष आग़ा ख़ान ने लीग से इस्तीफ़ा दे दिया था। मुसलिम लीग का राष्ट्रवाद धर्मनिरपेक्ष नहीं था। उनका झुकाव इस्लामी एकतावादी सिद्धांत की तरफ़ था। आगे चलकर यह हानिकारक साबित हुआ क्योंकि वे राजनीतिक सवालों को धार्मिक सवालों के रूप में देखने लगे।

लीग और कांग्रेस में राजनीतिक एकता

लीग और कांग्रेस की राजनीतिक एकता की प्रक्रिया में तिलक और जिन्ना ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1916 के अंत में लीग और कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में हुआ। सम्मिलित कमेटी द्वारा तैयार किया गया स्वराज्य का मसविदा 1916 के लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस और लीग दोनों ने मिलकर पास किया। लखनऊ समझौता में अल्पसंख्यकों के लिए पृथक मतदाता-मंडलों और सीटों के आरक्षण को मान्यता दी गई थी। इसके द्वारा कांग्रेस ने सांप्रदायिक राजनीति को स्वीकार कर लिया था। इसमें ये तय हुआ कि कांग्रेस और मुसलिम लीग को भारत की आज़ादी के लिए साथ-साथ लड़ना चाहिए। आगे आने वाली घटनाक्रमों के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता और कांग्रेस-मुस्लिम लीग सहयोग अपनी कसौटी पर खरा नहीं उतर सका।

जिन्ना ने कांग्रेस से नाता तोड़ा

1920 में होमरूल की अध्यक्षता गांधीजी को दे दी गई थी इसके संविधान में भी फेर-बदल कर इसका उद्देश्य ‘साम्राज्य के अधीन स्वशासन की जगह ‘स्वराज्य हासिल करना घोषित कर दिया गया था जिन्ना इसका विरोध कर रहा था जिन्ना चाहता था कि ‘साम्राज्य के अधीन वाली बात रहने दी जाए गांधीजी इससे सहमत नहीं थे गांधीजी पर तानाशाह जैसा व्यवहार करने वाला व्यक्ति का आरोप लगाते हुए जिन्ना ने इस्तीफा दे दिया कांग्रेस से उसका 14 साल पुराना रिश्ता समाप्त हो गया था

मुसलिम लीग का सक्रिय होना

ख़िलाफ़त समिति के कारण लीग का महत्त्व कम होता जा रहा था। धार्मिक आंदोलन होते हुए भी ख़िलाफ़त आंदोलन ने मुसलिम मध्य वर्ग में साम्राज्यवाद विरोधी भावना जगाया। 1922 में जब असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया, तो चारों ओर निराशा फैल गई। अवसाद के इस माहौल में सांप्रदायिकता ने अपना सिर उठाया। सांप्रदायिक दंगे होने लगे। मुसलिम लीग सक्रिय हो गई। राष्ट्रवादियों को अपने समुदाय का दुश्मन बताने लगी। अनेक शहरों में 1922 से 1927 के दौरान 112 दंगे हुए। 1928 के दौरान साइमन कमीशन का सामना करने के लिए सांप्रदायिक मुद्दों को सुलझाना ज़रूरी था। 1928 के अंत में कांग्रेस के प्रस्ताव नेहरू रिपोर्ट के रूप में सामने आए जिसमें यह व्यवस्था दी गई थी कि केन्द्रीय और प्रांतीय विधायिकाओं में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए उनकी आबादी के अनुपात में सीटें आरक्षित रहें। कलकत्ता सम्मेलन में नेहरू रिपोर्ट पर सहमति नहीं बन सकी। मुसलिम लीग के नेताओं को पृथक मतदाता मंडल की व्यवस्था छोड़ना कतई मंज़ूर नहीं था। नेहरू रिपोर्ट को हिन्दू हितों का दस्तावेज़ कहा गया। जिन्ना ने 14 सूत्री मांग तैयार किया। बाद के दिनों में भी जिन्ना के ये 14 सूत्र सांप्रदायिक प्रचार का आधार बने रहे।

मुस्लिम लीग के लिए विस्तार का अवसर

1924 में मुस्तफा  कमाल अतातुर्क (1881 नवंबर 1938), जिन्होंने तुर्की गणराज्य की स्थापना की  थी, के नेतृत्व में तुर्कों ने ख़ुद ही ख़िलाफ़त को ख़त्म कर दिया था। मुसलमानों को अब हिंदुओं के समर्थन की ज़रूरत नहीं थी। साल के अंत में गांधीजी ने कांग्रेस की राजनीति को अन्य नेताओं के हवाले कर अपना ध्यान छुआछूत, गरीबी और मद्यपान समाप्त करने के कार्यक्रमों में लगाना शुरू कर दिया। उनके इस फैसले से भारतीय राजनीति का मंच एक बार फिर से खाली था जिन्ना और मुसलिम लीग को पैर पसारने के लिए।

मुहम्मद अली जिन्ना लीग का आजीवन अध्यक्ष बना

साम्प्रदायिक समस्या ने भारतीय राजनीति को जो ग़लत मोड़ दिया उसका मुख्य कारक मुसलिम लीग और मुहम्मद अली जिन्ना था। गांधीजी के राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ते प्रभाव को देख जिन्ना इंग्लैण्ड चला गया था1934 में जैसे ही चुनावों का समय आया, जिन्ना भारत लौट आया। अप्रैल 1934 में लीग ने सर्वसम्मति से जिन्ना को अपना आजीवन अध्यक्ष चुना उसने मुस्लिम लीग का मार्गदर्शन करना शुरू कर दिया। अक्तूबर में मुंबई के निर्वाचन क्षेत्र से चुनकर वह सेन्ट्रल एसेम्बली में आ गया यहाँ आकर वह 22 सदस्यों वाली स्वतन्त्र समूह का नेता बन गया इस समूह के 18 सदस्य मुसलमान थे जिन्ना ने बड़ी चालाकी से सरकार और कांग्रेस के बीच अपने पत्ते चलने शुरू किए जो पक्ष जीत रहा होता, वह उसके विपरीत वोट करता कांग्रेसी प्रस्ताव के समय वह सरकारी पक्ष को वोट देकर कांग्रेस को हरा देता इसी तरह सरकारी प्रस्ताव को वह कांग्रेस के साथ वोट देकर सरकार को हरा देता

औपनिवेशिक अधिकारियों की फूट डालो और राज करो की नीति

सांप्रदायिकता औपनिवेशिक अधिकारियों का एकमात्र राजनीतिक औज़ार और फूट डालो और राज करो की नीति शासन चलाने का एकमात्र माध्यम हो गई थी। ब्रिटिश सरकार ने 1937 में सांप्रदायिक निर्णय का अपना हल भारतीयों पर थोप दिया। इस निर्णय के द्वारा मुस्लिम लीग के नेताओं की सभी मुख्य मांगें स्वीकार कर ली गईं, जिनमें जिन्ना के 14 सूत्री फार्मूला भी था। इस निर्णय में सांप्रदायिक मताधिकार (पृथक निर्वाचन) का समावेश कांग्रेसी नेताओं को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था। लेकिन जब तक कोई सर्वसम्मत हल निकले तब तक के लिए कांग्रेस ने इसे स्वीकार कर लिया।

चुनाव में मुस्लिम लीग का बुरा प्रदर्शन

1937 के चुनाव में मुस्लिम लीग की स्थिति अच्छी नहीं रही। लीग को उस चुनाव में मुसलमानों के पांच प्रतिशत से ज़्यादा मत नहीं मिले। 482 सुरक्षित स्थानों (मुस्लिम सीटों) में से सिर्फ़ 109 पर सफलता मिली। मुस्लिम चुनाव क्षेत्रों में कांग्रेस केवल 58 स्थानों पर लड़ी और 26 स्थानों विजयी हुई। पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में लीग को एक भी स्थान नहीं मिला, पंजाब में 84 में से केवल 2, सिंध में 33 में से 3 स्थान मिले। इस चुनाव ने यह साफ कर दिया था कि जनता ने उन्हीं प्रान्तों में लीग को समर्थन दिया था जहाँ मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं से अधिक थी लेकिन इस करारी हार के बावजूद जिन्ना की लीग ने अगले चार वर्षों में कट्टरतावादी नीति से अपनी स्थिति को ऐसा मज़बूत कर लिया कि भारत की संवैधानिक प्रगति की कोई बात उसकी रज़ामंदी के बग़ैर की ही नहीं जा सकती थी।

अलगाववाद की राजनीति में जिन्ना की भूमिका

औपनिवेशिक ताक़तों ने सांप्रदायिकता का भरपूर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। ब्रिटिशों ने जिन्ना की मुसलिम सांप्रदायिकता का साथ देना आरंभ कर दिया। लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रवक्ता मान लिया गया। लीग किसी भी राजनीतिक समझौते के ख़िलाफ़ अपना वीटो लगा सकती थी। चूंकि चुनावों में मुसलिम लीग को कोई खास सफलता नहीं मिली थी, इसलिए लीग को ऐसा लगने लगा कि अगर वे उग्रवादी राजनीति का सहारा नहीं लेंगे, तो धीरे-धीरे ख़त्म हो जाएंगे। उसने घृणा और भय पर आधारित राजनीति को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। मुसलमानों के बीच असुरक्षा की भावना पैदा कर वह उन्हें समझाने लगा कि कांग्रेसी अंग्रेज़ों से मिलकर हिंदू राज क़ायम करना चाहते हैं। वे भारत से इसलाम का नामोनिशान मिटा देना चाहते हैं। जब मुहम्मद अली जिन्ना जैसे नेता ने ऐसी भाषा अपना ली, तो उसके समर्थकों ने तो सारी हदें पार कर दीं।

हिन्दू-मुस्लिम संकट अपने चरम पर

जिन्ना चाहता था कि प्रान्तों में कांग्रेस और लीग के बीच सत्ता में भागीदारी होपृथक निर्वाचन पर जिन्ना ने इतनी आशाएं लगा रखी थीं, वह एक तरह से बेकार ही साबित हुआ। न तो मुसलमान कांग्रेस में शरीक हो सके, और न उन्हें शासन में मनचाहा हिस्सा मिला। कांग्रेस की तरफ से यह प्रस्ताव आया था कि लीग के विधायक मंत्री बनने से पहले कांग्रेस में आ जाएँ जिन्ना सिर्फ साझेदारी के लिए दो पार्टियों के बीच गठबंधन चाहता था जिन्ना ने कांग्रेस की राजनीति से फायदा उठाया अब वह अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए सक्रिय हो गया। उसने पंजाब के मुख्यमंत्री सिकन्दर हयात ख़ान के साथ समझौता किया और लीग सरकार में शामिल हो गई। बंगाल में भी लीग ने प्रजा पार्टी के साथ गठबंधन कर सरकार में शामिल हो गई। चुनावों में लीग को बुरी तरह पराजित करने वाले हयात और हक़ ने जिन्ना से मेल कर लिया और इस बात पर एकमत हो गए कि अखिल भारतीय मामलों में वे लीग के फैसलों का समर्थन करेंगे जिन्ना ने कांग्रेस के विरुद्ध प्रचार अभियान तेज़ कर दिया। कांग्रेस को उसने हिन्दुओं की संस्था कहना शुरू कर दिया। उसने कांग्रेस सरकारों के अत्याचारों के मनगढ़न्त किस्से लोगों के बीच फैलाना शुरू कर दिया। क्रोधावेश में एक के बाद एक वह ऐसा काम करता गया कि हिन्दू-मुस्लिम संकट अपने चरम बिन्दु को पहुंच गया।

कांग्रेस और लीग अलग-अलग

1938 आते-आते कांग्रेस ने मुसलिम लीग से समझौता करने का प्रयास किया। लेकिन कांग्रेस को इसमें सफलता नहीं मिली। फरवरी, 1938 में जिन्ना ने गांधीजी को लिखा, आप यह स्वीकार करें कि मुस्लिम-लीग भारत के समस्त मुसलमानों की प्रामाणिक तथा प्रतिनिधि संस्था है। आप और कांग्रेस केवल हिन्दुओं के प्रतिनिधि हैं। दिनों-दिन लीग के स्वर तीखे और कड़वे होते गए। अब कांग्रेस और लीग के रास्ते अलग-अलग हो चुके थे। लीग अधिक से अधिक ब्रिटिशपरस्त, पृथकतावादी और कांग्रेस विरोधी नीति अपनाने लगी।

‘मुक्ति दिवस मनाया जाना

विश्व युद्ध में भारत को शामिल कर दिए जाने के विरोध में 28 महीने पुरानी कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने 8 नवम्बर, 1939 को इस्तीफ़ा दे दिया जिन्ना ने ब्रिटिश शासकों को संकेत दिया कि लीग और हिन्दुस्तानी मुसलमान सिर्फ आगे बनने वाले संविधान में अपने हितों की हिफाज़त की शर्त पर युद्ध में मदद को तैयार हैं जिन्ना ने आज़ादी की दिशा में तत्काल कदम उठाने की मांग नहीं की यह जिन्ना द्वारा आज़ादी का अपना लक्ष्य छोड़ना नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक चाल थी 22 दिसम्बर, 1939 को मुस्लिम लीग ने कांग्रेसी शासन के अत्याचारों से मुक्ति पाने के उपलक्ष्य में `मुक्ति दिवस मनाया। जिन्ना ने कहा, कांग्रेस शासन की समाप्ति पर लीग की सभा चैन की सांस लेती है और आज के दिन को अधिनायकवाद, दमन और अन्याय से मुक्ति का दिवस मानती है।

पृथक राष्ट्र की स्थापना का प्रस्ताव

कांग्रेसी मंत्रिमंडल के इस्तीफ़े ने मुस्लिम लीग को राजनैतिक मंच हथियाने का अवसर दे दिया। 23 मार्च 1940 को सिकंदर हयात ख़ान ने एक प्रस्ताव बनाया और उसे फ़ज़लुल हक़ ने प्रस्तुत किया था। इसमें मांग की गई थी, भौगोलिक रूप से जुड़ी हुई इकाइयों को क्षेत्रों में विभाजित किया जाए जो ऐसे हों, और जिनका आवश्यकतानुसार ऐसा क्षेत्रीय पुनर्गठन किया जा सके कि, संख्यात्मक दृष्टि से मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों, जैसे कि भारत के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों का समूह बनाकर उन्हें स्वतंत्र राज्य बनाया जा सके जिनकी घटक इकाइयां स्वायत्त और सार्वभौम हों। मार्च, 1940 में लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने एक पृथक राष्ट्र की स्थापना का प्रस्ताव (द्वि-राष्ट्र सिद्धांत) पारित किया और उसे अपना लक्ष्य घोषित कर दिया। मुस्लिम लीग ने घोषणा की कि मुसलमानों को भारत के संबंध में ऐसी कोई वैधानिक योजना स्वीकार न होगी जो उत्तर-पश्चिम और पूर्व के मुस्लिम बहुमत वाले प्रदेशों को स्वतंत्र राज्य मानकर तैयार न की गई हो।

अगस्त-प्रस्ताव का स्वागत

सरकार की दुर्बल स्थिति देखते हुए वायसराय लिनलिथगो ने 8 अगस्त, 1940 को औपनिवेशिक स्वराज की स्थापना के लिए जो प्रस्ताव घोषित किया, उस घोषणा में नया विधान बनाने के भारतीय अधिकारों को स्वीकार कर लिया गया था, लेकिन यह भी जोड़ दिया गया था कि युद्ध की समाप्ति के बाद ही सभी दलों के सहयोग से संवैधानिक समस्याओं का हल ढूंढा जाएगा। अल्पसंख्यकों की स्वीकृति के बिना सरकार किसी भी संवैधानिक परिवर्तन को लागू नहीं करेगी। लीग ने प्रस्ताव का स्वागत किया लेकिन कांग्रेस ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। सरकार का उद्देश्य मुस्लिम लीग को रिझाना, कांग्रेस-लीग समझौते को मुश्किल कर देना और ऐसा वातावरण तैयार कर देना था, जिससे सत्ता के हस्तांतरण की आवश्यक शर्त, भारत के सब दलों और जातियों का सर्वसम्मत समझौता, पूरी न हो सके।

मुस्लिम लीग की तेज़ी से प्रगति

युद्ध के अंतिम वर्षों में लीग की तेज़ी से प्रगति हुई। अधिकांश कांग्रेसी नेताओं के जेल में रहने के कारण 1943 तक असम, सिंध, बंगाल और पश्चिमोत्तर प्रांत में लीग के मंत्रिमंडलों का गठन हो चुका था। स्वयं जिन्ना मुसलमानों के एकमात्र प्रवक्ता होने के दावे को सिद्ध करने और कांग्रेस के बराबरी के अधिकार की मांग करने की दिशा में अग्रसर था। मुस्लिम लीग ने कराची अधिवेशन में ‘अंग्रेज़ों बांटो और भागो’ का नारा दिया। लीग ने पाकिस्तान की मांग तेज़ कर दी। प्रमुख लीगी नेता एम.एच. गजदर ने कराची में लीग की के सभा में खुले आम कहा, अगर हिंदू क़ायदे से पेश नहीं आये, तो उन्हें उसी तरह ख़त्म करना होगा, जैसे जर्मनी में यहूदियों को। ख़ुद जिन्ना ने लीग के अध्यक्षीय भाषण में ख़ान अब्दुल गफ्फ़ार ख़ान के लिए ‘जंगी पठानों को नामर्द बनाने तथा उनमें हिंदू प्रभाव फैलाने का इंचार्ज’ कहा था।

गांधी-जिन्ना वार्ता

देश साम्प्रदायवाद के कुचक्र में फंसा हुआ था। जिन्ना और मुस्लिम लीग का रवैया अड़ियल था। देश में कांग्रेस और लीग के बीच गतिरोध बना हुआ था। स्वाधीनता की चर्चा के लिए अंग्रेज़ ने साफ-साफ कह दिया था कि लीग और कांग्रेस के बीच पहले समझौता होना चाहिए। कांग्रेस और लीग समस्या का कोई हल नहीं दिख रहा था। गांधीजी और जिन्ना दोनों में बड़ी चर्चाएं हुईं। गांधी-जिन्ना वार्ता निष्फल रही।

लीग की स्थिति

हालांकि गांधी-जिन्ना वार्ता टूटने से लीग और कांग्रेस की असेंबली पार्टियों के बीच सहयोग पर प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन जनवरी 1945 में लीग की स्थित कमज़ोर पड़ गई। लीग के सरदार औरंग़ज़ेब ख़ा ने भ्रष्टाचार की सारी हदें पार कर दी और लोगों के बीच काफ़ी अप्रिय हो चुका था। भारत छोड़ो आन्दोलन के सिलसिले में जेल में बन्द कांग्रेस के सदस्य जब जेल से छूट कर आए तो विधान सभा में मुस्लिम लीग अल्पमत में आ गई। लीग की सरकार गिर गई। वहां डॉ. ख़ान साहब के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। 1944 में ही पंजाब में ख़िज़्र हयात ख़ान की यूनियनिस्ट पार्टी वालों ने लीग से संबंध तोड़ लिया था। मार्च 1945 में बंगाल में निज़ामुद्दीन सरकार गिर गई। सिंध और असम में भी लीग ने कांग्रेस के समर्थन से जैसे-तैसे सरकार संभाले रखी थी।

शिमला कॉन्फ्रेंस

वेवेल और भारतीय नेताओं के बीच 25 जून से 14 जुलाई, 1945 तक शिमला में संधि-वार्ता की चर्चाएं चलीं। वायसराय ने अपने भाषण में घोषणा कर दी कि हिंदू-मुसलमान दोनों गुटों को एक स्तर (पैरिटी) का महत्त्व दिया जाएगा। यह सरासर अन्याय था। देश की अस्सी प्रतिशत जनता को बीस प्रतिशत के बराबर तौला जा रहा था। कांग्रेस ने वायसराय के पैरिटी वाले सुझाव को स्वीकार कर लिया। कांग्रेस सवर्ण हिंदू संस्था मानी गई और मुस्लिम लीग मुस्लिम प्रतिनिधि संस्था स्वीकार हो गई। अंतरिम सरकार बनाने की घोषणा हुई। यहां पर मुसलिम लीग फिर से अड़ गई। उसने मांग कर दी कि एक ओर अकेले मुसलमान सदस्य और दूसरी ओर अन्य सारे लोगों का प्रतिनिधित्व एक साथ होगा। उसका तर्क था कि मुस्लिम लीग को यदि पचास प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिलेगा तभी मुसलमानों के हितों का रक्षण होगा। लीग की इच्छा नहीं थी कि अंतरिम सरकार में मुस्लिम मंत्री सहयोग दें। उसे आशंका थी कि यदि अंतरिम सरकार सफल हो गई, तो पाकिस्तान की मांग ढीली पड़ जाएगी। लीग की ओर से जिन्ना ने अंतरिम सरकार में मुसलमानों की सूची देने से इंकार कर दिया। शिमला सम्मेलन असफल रहा।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

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