गुरुवार, 19 मार्च 2026

457. हिन्दू महासभा

राष्ट्रीय आन्दोलन

457. हिन्दू महासभा

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में देश में हिंदू सांप्रदायिकता का उदय हो रहा था। हिंदी को हिंदुओं की भाषा और उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहा जाने लगा। 1890 से गोवध विरोधी प्रचार शुरू हो गए थे। मुसलमानों की देखा देखी विधायिकाओं और नौकरियों में हिंदू सीट की मांग की जाने लगी। 1905 के बंग भंग और 1906 में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के गठन से और अंग्रेजों ने मॉर्ले मिंटो सुधारों के तहत मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की घोषणा के परिणामस्वरूप, हिंदू नेताओं को एक संगठन बनाने के लिए एक साथ आने की आवश्यकता का एहसास हुआ जो उनके हितों की रक्षा करेगा।  वी.एन. मुखर्जी             और लालचंद ने 1909 में पंजाब हिंदू सभा की स्थापना की और हिंदू संप्रदायिक विचारधारा और राजनीति की नींव रखी। उन्हें भी कांग्रेस से शिकायत रहती थी, कि कांग्रेस हिंदू हितों के बलि दे रही है। लालचंद ने अंग्रेज़ी में एक पुस्तक राजनीति में आत्म-अस्वीकार लिखी थी। इसमें उसने कांग्रेस को हिंदुओं का ऐसा दुर्भाग्य बताया जिसे उन्होंने ख़ुद आमंत्रित किया था। उसका कहना था कि कांग्रेस के कारण हिंदुओं कास्तित्व ख़त्म हो जाएगा इसलिए कांग्रेस का परित्याग किया जाना चाहिए। अगले कुछ वर्षों में पंजाब के बाहर संयुक्त प्रान्त, बिहार, बंगाल, मध्य प्रान्त, बम्बई प्रेसिडेन्सी आदि में अनेक अन्य हिन्दू सभाएँ स्थापित कीं गयीं।

1910 में कांग्रेस के इलाहाबाद अधिवेशन में सभी प्रान्तीय सभाओं के साथ एक राष्ट्रीय सभा बनाने की बात उठी।  इलाहाबाद में ही हिंदू नेताओं के एक अन्य सम्मेलन में भी 1910 में अखिल भारतीय हिंदू सभा की स्थापना की दिशा में प्रारंभिक कदम उठाया गया था। 8 दिसंबर 1913 को पंजाब हिंदू सभा ने अंबाला अधिवेशन में अखिल भारतीय हिंदू सभा बनाने का प्रस्ताव पारित किया। 1915 में मदनमोहन मालवीय के नेतृत्व में हरिद्वार कुंभ में हिंदू राष्ट्रवादी राजनीतिक दल हिंदू महासभा (सर्वदेशक हिन्दू समाज)  की स्थापना की गई। यह मुख्य रूप से हिंदू हितों के संरक्षण और मुस्लिम लीग के प्रभाव के जवाब में बनी थी।  इसका उद्देश्य भारतीय राजनीति में हिंदुओं के हितों की रक्षा और 'हिंदू राष्ट्र' की स्थापना करना था। इस संस्था में  स्वामी श्रद्धानंद, बी.एस.मुंजे एवं लाला लाजपतराय जैसे वरिष्ठ राष्ट्रवादी नेता थे। यह दल 'हिंदुत्व' विचारधारा पर आधारित था, जो हिंदू धर्म को भारतीय राष्ट्रीय पहचान मानती है। शुरुआत में, इसका ध्यान धार्मिक और सामाजिक सुधारों पर अधिक था, लेकिन धीरे-धीरे यह एक राजनीतिक ताकत के रूप में उभरी।  मुख्य रूप से सभा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर से ब्रिटिश राज के समक्ष रूढ़िवादी हिंदुओं के हितों की वकालत करने वाले एक दबाव समूह के रूप में कार्य करती थी। इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन के दौरान मुसलमानों के बढ़ते प्रभाव के बीच हिंदू समुदाय को संगठित करना और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना था। इसने 1916 के कांग्रेस-मुस्लिम लीग समझौते और चेम्सफोर्ड योजना का तीव्र विरोध किया। हिंदू महासभा ने  रौलट ऐक्ट  के भी विरुद्ध आंदोलन चलाया। अप्रैल 1921 में इसका नाम बदलकर अखिल भारत हिंदू महासभा कर दिया गया।

1923 में हिन्दू महासभा का पुनर्जन्म हुआ। 1923 के बनारस अधिवेशन में, हिंदुओं के धर्मांतरण को रोकने और वापस लाने के लिए 'शुद्धि' आंदोलन को मुख्य एजेंडा बनाया गया। हिन्दू और मुसलमान दोनों के संप्रदायी डर का मनोविज्ञान फैलाने लगे। इसी दरमियान हिन्दुओं में संगठन और शुद्धि और मुसलमानों में तंजीम और तबलीग आंदोलन चले। शुद्धि आंदोलन का उद्देश्य उन हिंदुओं को वापस हिंदू धर्म में परिवर्तित करना था जिन्होंने इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लिया था। इन आंदोलनों का उद्देश्य सांप्रदायिक था। राष्ट्रवादियों को अपने-अपने समुदाय का दुश्मन बताया जाने लगा। इस तरह के माहौल का असर राष्ट्रवादियों पर भी पड़ा और उनका स्वर सांप्रदायिक नहीं तो कम से कम अर्द्ध सांप्रदायिक तो ज़रूर हुआ। लाजपत राय, मदनमोहन मालवीय और एन.सी. केलकर हिन्दू महासभा में शामिल हो गए और हिन्दू एकता की वकालत करने लगे। इस ग्रुप ने धर्मनिरपेक्ष कांग्रेसियों के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया। सन् 1925 में कलकत्ता में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हिंदू महासभा का अधिवेशन हुआ जिसमें प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता मुकुंदराव आनंदराव जयकर भी सम्मिलित हुए। हिंदू महासभा ने पृथक निर्वाचन के सिद्धांत और मुसलमानों के लिए सीटें सुरक्षित करने की विरोध किया।

1930 के दशक में, यह प्रसिद्ध भारतीय स्वतन्त्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर के नेतृत्व में एक अलग पार्टी के रूप में उभरी, जिन्होंने हिंदुत्व की विचारधारा विकसित की।  जब साइमन कमीशन भारत आया, तो हिंदू महासभा ने भी इसका बहिष्कार किया। लाहौर में हिंदू महासभा के अध्यक्ष लाला लाजपत राय स्वयंसेवकों के साथ कमीशन के बहिष्कार के लिए एकत्र हुए। पुलिस ने लाठी प्रहार किया, जिसमें लाला को चोट आई और उनकी मृत्यु हो गई। लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन  में हिंदू महासभा की ओर से डॉ॰ धर्मवीर, मुंजे, बैरिस्टर जयकर आदि सम्मिलित हुए। हिंदू महासभा ने सिंध प्रांत को बंबई से अलग करने का भी विरोध किया।

रत्नागिरि की नजरबंदी से मुक्त होकर आए वीर सावरकर के 1937 में अध्यक्ष बनने के बाद महासभा ने स्पष्ट रूप से 'हिंदू राष्ट्र' की विचारधारा अपनाई। अपने प्रथम अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा कि हिंदू ही इस देश के राष्ट्रीय हैं और आज भी अंग्रेजों को भगाकर अपने देश की स्वतंत्रता उसी प्रकार प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने घोषणा की कि हिमालय से कन्याकुमारी और अटक से क़टक तक रहनेवाले वह सभी धर्म, संप्रदाय, प्रांत एवं क्षेत्र के लोग जो भारत भूमि को पुण्यभूमि तथा पितृभूमि मानते हैं, खानपान, मतमतांतर, रीतिरिवाज और भाषाओं की भिन्नता के बाद भी एक ही राष्ट्र के अंग हैं क्योंकि उनकी संस्कृति, परंपरा, इतिहास और मित्र और शत्रु भी एक हैं - उनमें कोई विदेशीयता की भावना नहीं है।

सावरकर ने हिंदुओं के सैन्यीकरण और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया, जिससे संगठन अधिक मुखर राष्ट्रवादी रुख के साथ सामने आया। 1935 के पूना अधिवेशन में, महासभा ने अस्पृश्यता के अंत का क्रांतिकारी प्रस्ताव पारित किया और इसे हिंदू सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा मानने से इनकार कर दिया। श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1940 में हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने और पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत की। 1950 में उन्होंने नेहरू के मंत्रिमंडल में उद्योग और आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्य किया, हालांकि, मतभेदों के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान , महासभा ने ब्रिटिश युद्ध प्रयासों का समर्थन किया और प्रांतीय और केंद्रीय विधान परिषदों में मुस्लिम लीग के साथ संक्षिप्त गठबंधन  (जैसे सिंध में) किया। उन्होंने रियासतों के भारत में विलय का विरोध किया। हिंदू महासभा ने ब्रिटिश सरकार की उन नीतियों का भी विरोध किया जो हिंदुओं के विरुद्ध थीं। महात्मा गांधी और हिंदू महासभा के बीच संबंध जटिल थे और वैचारिक मतभेदों से भरे हुए थे। हालांकि गांधीजी और हिंदू महासभा दोनों ही हिंदुओं के कल्याण के लिए चिंतित थे, लेकिन इस लक्ष्य को प्राप्त करने के उनके तरीके काफी अलग थे। महात्मा गांधी और हिंदू महासभा के बीच स्वतंत्रता प्राप्ति के तरीकों को लेकर वैचारिक संघर्ष थे। गांधीजी एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र चाहते थे जहाँ हिंदू और मुसलमान सद्भाव से रहें। वहीं हिंदू महासभा हिंदू राष्ट्र की समर्थक थी और मानती थी कि स्वतंत्रता के लिए हिंसा आवश्यक है।

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर

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