शनिवार, 28 मार्च 2026

461. ब्रह्मचर्य का आदर्श और प्रयोग

गांधी और गांधीवाद

461. ब्रह्मचर्य का आदर्श और प्रयोग

1947

हेमचर में सामने आए तमाम मुद्दों में से सबसे अहम मुद्दा ब्रह्मचर्य का था। हिन्दू धर्म ग्रन्थों में आत्म-साक्षात्कार के लिए अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अस्तेय और ब्रह्मचर्य जैसे महा व्रतों की सलाह दी गई है। इन आधार स्तंभों पर गांधीजी का सम्पूर्ण जीवन का तत्त्व ज्ञान रचा गया था। ब्रह्मचर्य के प्रति उनका दृष्टिकोण सत्य की वैज्ञानिक खोज करने वाले एक अन्वेषक जैसा था। जीवन भर उनका दृष्टिकोण एक क्रांतिकारी जैसा ही रहा। गांधीजी प्रत्येक वस्तु की कड़ी से कड़ी कसौटी और जांच-पड़ताल का आग्रह रखते थे। नैतिकता, सदाचार, धर्म और यहाँ तक कि आध्यात्मिक अनुभवों को भी उन्होंने जाँच-पड़ताल, प्रयोग और अनुसंधान के लिए एक उपयुक्त क्षेत्र माना। उन्होंने ब्रह्मचर्य को भी उनके सत्य के प्रयोगों में समावेश कर लिया था। गांधीजी के अनुसार ब्रह्मचर्य प्रेम के नियम का एक स्वाभाविक फल था जो सारी कामनाओं और सम्पूर्ण परिग्रह-परायणता का उर्ध्वीकरण कर देता है।

ब्रह्मचर्य का शाब्दिक अर्थ है जीवन जीने का वह तरीका या आचरण का वह मार्ग जो ब्रह्म, यानी सत्य की खोज के लिए अनुकूल हो। ब्रह्मचर्य के आदर्श को गांधीजी ने युवावस्था में अपना लिया था। उनका मानना था, "सत्य के अहिंसक रूप का दर्शन भी केवल वही व्यक्ति कर सकता है जिसमें पूर्ण वैराग्य हो। क्रोध, लोभ, अहंकार और भय—ये सभी चीजें साधक की आँखों पर एक पर्दा डाल देती हैं।" उनके अनुसार ब्रह्मचर्य का अर्थ है सोच, वचन और कर्म की सारी इन्द्रियों पर, विशेषतः जननेन्द्रिय पर, एक साथ नियंत्रण। गांधीजी कहते थे, ब्रह्मचर्य के बिना सत्याग्रही में कोई तेज नहीं होगा, आन्तरिक बल नहीं होगा, सारी दुनिया के सामने निःशस्त्र खड़ा होने की शक्ति नहीं होगी। लेकिन ब्रह्मचर्य के आदर्शों के प्रति गांधीजी की पारंपरिक दृष्टि नहीं थी। वे स्त्रियों के साथ मिलते-जुलते थे। वे यह मानते थे कि जैसे मां-बेटा, भाई-बहन एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं वैसे ही आश्रम के सभी सदस्य एक-दूसरे से मिलते रहें। इसलिए ब्रह्मचर्य के पालन के लिए सामान्यतः जिन प्रतिबंधों की कल्पना की गई है, वे सब आश्रम में नहीं रखे जाते थे। वह मानते थे, जिस ब्रह्मचर्य को हमेशा ऐसी बाहरी सहारे की ज़रूरत पड़ती हो, वह असल में ब्रह्मचर्य है ही नहीं। ब्रह्मचारी विकार-रहित हो जाता है।

स्वतंत्रता की लड़ाई लंबी चली इसलिए गांधीजी को अपनी साधना के आवश्यक अंग के रूप में फिर से ब्रह्मचर्य के प्रयोग करना ज़रूरी मालूम हुआ। गांधीजी का मानना था, सत्याग्रह के सेनापति के शब्द में शक्ति होनी चाहिए। वह शक्ति जीवन की शुद्धि, कठोर जागरूकता और सावधानी और निरन्तर एकाग्र प्रयत्न से उत्पन्न होती है। यह ब्रह्मचर्य के पालन के बिना असंभव है। मैं यह नहीं कह सकता कि मैंने अपनी व्याख्या का पूर्ण ब्रह्मचर्य सिद्ध कर लिया है। परन्तु मैं यह मानता हूं कि उसकी दिशा में मैंने महत्वपूर्ण प्रगति की है। मेरे कुछ प्रयोग अभी इस अवस्था तक नहीं पहुंचे हैं कि उन्हें लाभ की दृष्टि से जनता के सामने रखा जा सके। यदि किसी समय मुझे उसमें संतोषप्रद सफलता मिली, तो मैं उन्हें लोगों के सामने रखने की आशा करता हूं।

गांधीजी के अनुसार ब्रह्मचारी स्त्रियों के साथ से भागता नहीं है ... उसके लिए स्त्री और पुरुष के बीच का भेद लगभग मिट जाता है। सौंदर्य के प्रति उसकी धारणा बदल जाती है। वह बाहरी रूप को नहीं देखता। जिसका चरित्र सुंदर है, वही उसकी नज़रों में सुंदर होगा। वह नपुंसक नहीं बन जाता, बल्कि... (आंतरिक) स्राव उसके मामले में एक ऐसी जीवन-शक्ति में रूपांतरित हो जाते हैं जो उसके पूरे अस्तित्व में व्याप्त हो जाती है। ऐसा कहा जाता है कि एक नपुंसक व्यक्ति यौन-इच्छा से मुक्त नहीं होता... लेकिन उस व्यक्ति की 'साधी हुई' नपुंसकता—जिसकी यौन-इच्छा जलकर भस्म हो चुकी है और जिसके यौन-स्राव जीवन-शक्ति में परिवर्तित हो रहे हैं—पूरी तरह से अलग होती है। ब्रह्मचर्य के प्रयोग के नतीजे काफ़ी उत्साहजनक रहे थे। पुरुषों और महिलाओं—दोनों को ही इससे फ़ायदा हुआ है। हममें से कुछ लोग गिरे, तो कुछ गिरने के बाद फिर उठ खड़े हुए। उनका मानना ​​था कि इस तरह के सभी प्रयोगों में ठोकर लगने की संभावना अंतर्निहित होती है। जहाँ सौ फ़ीसदी सफलता मिलती है, वह कोई प्रयोग नहीं, बल्कि सर्वज्ञता की निशानी होती है।

गीता के अनुसार, जो व्यक्ति अपनी पाँचों इंद्रियों को भूखा रखता है या उन्हें नियंत्रित करता है, उससे इंद्रिय-विषय तो दूर हो जाते हैं, लेकिन उनके प्रति लालसा बनी रहती है। गीता कहती है कि यह लालसा भी तब समाप्त हो जाती है, जब कोई उस परम सत्ता, सत्य, ब्रह्म या ईश्वर का दर्शन करता है—"न कि... भौतिक आँखों से" या "किसी चमत्कार को देखकर। ईश्वर को देखने का अर्थ है इस तथ्य का बोध होना कि ईश्वर अपने ही हृदय में निवास करते हैं।" जब ऐसा होता है, तो यह उपलब्धि स्थायी हो जाती है, और फिर पतन की कोई संभावना नहीं रहती।

गांधीजी की दृष्टि में स्त्री अहिंसा का प्रतीक थीं। उनकी सत्याग्रह की योजना में स्त्री ने बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था। उनका हृदय मानवता के "दबे-कुचले आधे हिस्से" के लिए तड़पता था। उन्हें भारत की मुक्ति की तब तक कोई उम्मीद नज़र नहीं आती थी, जब तक कि भारत की नारी-शक्ति खुद आज़ाद न हो जाए। वे स्त्री के आत्म-बलिदान और कष्ट-सहन को शक्ति में बदल देना चाहते थे। उन्होंने ऐसी नारियों का स्वप्न देखा था जो भारत का गौरव होंगी और उसके भविष्य की संरक्षिकाएं बनेंगी। भारत की स्त्रियां जब तक बंधन में पड़ी हों तब तक गांधीजी भारत की मुक्ति की कोई आशा नहीं रखते थे। भारत की नारी की करुण स्थिति के लिए वे पुरुषों को काफ़ी हद तक जिम्मेदार मानते थे। गांधीजी कहा करते थे कि समाज में पैठी हुई तरह-तरह की बुराइयों को दूर करके उसे शुद्ध बनाने के लिए अपने हृदय को मां के हृदय जैसा बनाना होगा। उन्होंने एक महिला कार्यकर्ती से कहा था, स्त्रियों की जिस दुर्दशा में पुरुष होने के नाते मेरा भी हिस्सा है, उसका आंशिक प्रायश्चित करने के लिए उनमें से एक लड़की की मैं विशिष्ट अर्थ में मां बन गया हूं, जैसा कि इससे पहले सामान्य अर्थ में मैं हज़ारों लड़कियों की मां बन चुका हूं।

मनु गांधी गांधीजी के भतीजे जयसुखलाल अमृतलाल गाँधी की लड़की थी।  मनुबेन ने कराची में पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी जहां उनके पिता, जयसुखलाल सिंधिया स्टीम नैविगेशन कंपनी में काम करते थे। पुणे आने से कुछ दिन पहले ही मनु ने अपनी मां को खोया था इसलिए उन्हें भी मां रूपी सहारे की जरूरत थी। कस्तूरबा ने आगाख़ान महल की नज़रबंदी के दौरान अपनी अंतिम बीमारी में मनु की सेवा की मांग की थी। मनु को आगाख़ान महल भेजा गया। बड़ी ही निष्ठा और भक्ति से उसने कस्तूरबा की सेवा की। बा में मनु को खोई मां मिल गई। मरते समय बा ने मनु को गांधीजी के हाथों में सौंपा। तब से कस्तूरबा की जगह पर गांधीजी मनु की ‘मां’ बन गए थे।

नोआखाली के यज्ञ के दौरान मनु कुछ समय के लिए गांधीजी से अलग थी। जब गांधीजी श्रीरामपुर पहुंचे, तो मनु ने अपनी इच्छा बताते हुए लिखा, मैं आपके पास रहकर आपकी सेवा करना चाहती हूं। उस समय गांधीजी ने अपने पुराने साथियों को अपने से दूर भेजने का निर्णय ले लिया था। परन्तु मनु के मामले में यह अपवाद हो गया। मनु को वे रखने के लिए तैयार हो गए, लेकिन शर्त यह थी, तुम्हें पूर्णतया सत्यवादी रहना होगा और मैं जो भी कसौटी तुमको करूं उसमें से पार होने के लिए सदा तैयार रहना होगा। जिस क्षण मुझे पता चला कि तुमने जान-बूझकर असत्य का आचरण किया है, उसी क्षण हमें अलग होना पड़ेगा। मनु ने कहा, मैं तो अक्षरशः आपको अपनी मां ही समझती हूं। आपमें मैंने केवल मां के ही प्रेम का अनुभव किया है।

28 दिसंबर,1946 को श्रीरामपुर में दर्ज अपनी डायरी की प्रविष्टि में मनुबेन ने लिखा है, ‘‘बापू मेरी माता हैं। वे ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के माध्यम से मुझे ऊंचे मानवीय फलक पर ले जा रहे हैं। ये प्रयोग चरित्र निर्माण के उनके महायज्ञ के अंग हैं। इनके बारे में कोई भी उलटी-सीधी बात सबसे निंदनीय है।’’ इससे नौ दिन पहले ही मनुबेन गांधी के साथ आईं थीं।  उस समय मनु की उमर 19 वर्ष की थी। गांधीजी के सचिव प्यारेलाल ने अपनी पुस्तक महात्मा गांधी: द लास्ट फेज में इस बात की पुष्टि करते हुए लिखा है, ‘‘उन्होंने उसके लिए वह सब कुछ किया जो एक मां अपनी बेटी के लिए करती है। उसकी पढ़ाई, उसके भोजन, पोशाक, आराम और नींद हर बात का वे ख्याल रखते थे। करीब से देख-रेख और मार्गदर्शन के लिए गांधीजी उसे अपने ही बिस्तर पर सुलाते थे। मन से मासूम किसी लड़की को अपनी मां के साथ सोने में कभी शर्म नहीं आती।’’ मनुबेन गांधीजी की प्रमुख निजी सेविका थीं। वे मालिश और नहलाने से लेकर उनका खाना पकाने तक सारे काम करती थीं।

उन्होंने ब्रह्मचारी की एक नई परिभाषा दी : 'जिसमें कभी कोई वासनात्मक भाव न हो और जो हमेशा ही ईश्वर भक्ति में तल्लीन रहता हो, वह किसी भी प्रकार के चेतन या अचेतन में स्खलित नहीं हो सकता है, वह नंगी महिलाओं के साथ नंगा सो सकता है, महिलाएं चाहे जितनी सुंदर हों पर वह किसी भी तरह से सेक्स के प्रति उत्तेजित नहीं हो सकता है...वह व्यक्ति प्रतिदिन और निरन्तर ईश्वर की ओर प्रगति कर सकता है और उसका प्रत्येक कार्य ईश्वर के प्रति किया जाता है और अन्य किसी के लिए नहीं।'

पतंजलि का ‘योगसूत्र’ कहता है, सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य की स्थापना होने पर सारे वासनात्मक विचार नष्ट हो जाते हैं। ठीक इसी तरह, गांधीजी कहते थे, पूर्ण ब्रह्मचर्य की उपस्थिति में समस्त वासनाएँ भी पलायन कर जानी चाहिए। गांधीजी का जीवन इसका एक जीता-जागता उदाहरण प्रस्तुत करता है। जवान लड़कियां और स्त्रियां बिना किसी डर या संकोच के उनके पास आती थीं और अपने मन की गुप्त से गुप्त बातें भी उन्हें बता देती थीं। नोआखाली के इस महा प्रयास को वे यज्ञ कहते थे। इस यज्ञ में कुछ लोगों ने, जिनमें से कई उनके निकटतम सहयोगी भी थे, ब्रह्मचर्य के उनके प्रयोगों को लेकर तूफान खड़ा कर दिया। गांधीजी ने मनु से कहा था, लोग सोचते हैं कि तुम्हारे प्रति किया गया मेरा वार्ताव मेरे मोह की निशानी है। लेकिन मैं उनके अज्ञान पर हंसता हूं। अगर मैं तेरी आदर्श माता बनकर भारत की करोड़ों पुत्रियों में से एक को भी तालीम देकर आदर्श नारी बना सकूं, तो मैं भारत की नारी जाति की अनुपम सेवा करूंगा। संपूर्ण ब्रह्मचारी बनकर ही मनुष्य स्त्री की सच्ची सेवा कर सकता है।

उन्होंने पहले भी ब्रह्मचर्य के क्षेत्र में प्रयोग किए थे। इस बार के प्रयोग को उन्होंने नोआखाली में अपने 'आस्था के प्रयास' का नाम दिया था। लेकिन इस बात ने एक ज़बरदस्त हलचल मचा दी। उनके एक सहयोगी—जिन्हें वे अपने दल के सदस्य के रूप में अपने साथ श्रीरामपुर ले गए थे—ने विरोध जताते हुए अपने कर्तव्यों से मुक्त किए जाने की माँग की; उन्होंने कहा कि जब तक उनके दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं कर लिया जाता, तब तक उन्हें मुक्त कर दिया जाए। गांधीजी ने उनसे कहा कि उन परिस्थितियों में, अपने कर्तव्यों से मुक्त किए जाने की माँग करना बिल्कुल सही था। उन्हें जाने की अनुमति देते हुए लिखे गए एक पत्र में, उन्होंने लिखा: आपने जो मुद्दे उठाए हैं, वे मुझे ज़्यादा प्रभावित नहीं करते... चूँकि मेरी राय यही है और हमारे आदर्शों में टकराव है, और आप खुद भी इस ज़िम्मेदारी से मुक्त होना चाहते हैं, इसलिए आप आज ही मुझे छोड़कर जाने के लिए स्वतंत्र हैं। मुझे आपकी बेबाकी और हिम्मत पसंद आई... मैं आपसे यह कहना चाहता हूँ कि आपको मुझमें या मेरे आस-पास जो भी गलतियाँ नज़र आई हैं, उन्हें आप बेझिझक प्रकाशित कर सकते हैं...

एक बार गांधीजी ने अपना वर्णन अर्ध नारी के रूप में किया था। श्रीमती पोलाक ने अपने संस्मरण में इस बात का वर्णन भी किया है। साबरमती या सेवाग्राम आश्रम में वे प्रायः स्त्री-रोगियों की सेवा शुश्रुषा का काम पुरुष परिचारकों को और पुरुष-रोगियों की सेवा शुश्रुषा का काम स्त्री परिचारिकाओं को सौंपते थे। आश्रम में कोई दीवालें नहीं थीं। वहां ‘निजी जीवन’ जैसा कुछ नहीं था। व्यक्तिगत कार्य भी एकांत में नहीं किए जाते थे। गांधीजी मालिश लगभग नग्नावस्था में कराते थे। अकसर जवान लड़कियां उनकी मालिश करती थीं। अक्सर मुलाक़ाती या कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य भी इसी अवस्था में उनसे मिलते थे। जल चिकित्सा के समय भी स्त्री या पुरुष कोई भी सहायता के लिए उनके पास आ सकता था। उनके स्नान के समय उनके गुसलखाने में कोई भी जा सकता था। गांधीजी कहते थे, जो मनुष्य जीव मात्र की सेवा को अपना आदर्श मानकर संसार-यात्रा पूरी करना चाहता है, उसी के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य या विवाहित ब्रह्मचर्य के आदर्श का विचार किया जा सकता है।

एक दिन प्रार्थना-प्रवचन में उन्होंने कहा, मेरे आस-पास चल रही कानाफूसी और व्यंग्योक्ति का मुझे पता चला है। मेरे चारों ओर शंका-कुशंकाओं और अविश्वासों का बोलबाला है। मैं नहीं चाहता कि मेरे अत्यंत निर्दोष कार्यों के बारे में लोगों में ग़लतफहमी फैले। मेरे साथ मेरी पोती रहती है। वह मेरे साथ एक बिस्तर पर सोती है। मुहम्मद पैग़म्बर ने ऐसे नपुंसकों का स्वागत किया है, जो प्रार्थना द्वारा ईश्वर के बनाए हुए हैं। मेरी आकांक्षा ऐसा नपुंसक बनने की है। मैं नोआखाली में जो यज्ञ कर रहा हूं, उसका यह प्रयोग एक अभिन्न अंग है। इस प्रयत्न के लिए मैं आपका आशीर्वाद चाहता हूं। मैं जानता हूं कि मेरे इस कार्य ने मेरे अनेकों मित्रों को मेरा आलोचक बना दिया है। मैंने यह कभी नहीं माना कि व्यक्तियों का निजी जीवन सार्वजनिक कार्यों पर असर नहीं डालता। मैं यह भी नहीं मानता कि निजी जीवन में दुराचारी रहते हुए भी मैं कुशल और प्रभावशाली लोक सेवक हो सकता हूं। लेकिन जब मैं अपने जीवन में अहिंसा की सर्वोच्च परीक्षा करने में लगा हूं, तब मैं चाहता हूं कि मेरे निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन के सभी कार्यों के कुल योग से ईश्वर और मानव-जाति मेरा न्याय करे।मीराबेन को लिखे एक पत्र में उन्होंने लिखा: "सत्य का मार्ग कंकालों से भरा होता है, जिन पर चलने का साहस हम करते हैं।"

इन्हीं दिनों उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य कृपलानी को पत्र लिखा था, मनु गांधी मेरी पोती है। वह मेरे यज्ञ के एक भाग के रूप में मेरे साथ बिस्तर साझा करती है। इसकी वजह से मुझे अपने कुछ प्रियतम मित्रों को खोना पड़ा है। मैंने इस बात पर गहनतम विचार किया है। सारी दुनिया मेरा त्याग कर सकती है, परन्तु जिसे मैं अपने लिए सत्य मानता हूं उसका त्याग मैं नहीं कर सकता। उत्तर में आचार्य कृपलानी ने लिखा, मैं केवल इतना कह सकता हूं कि आपमें मेरी पूर्ण श्रद्धा है। जो प्रयोग आप कर रहे हैं, उसे कोई नीतिभ्रष्ट मनुष्य नहीं कर सकता। यदि मेरे मन में कोई शंका हो, तो भी आप पर अविश्वास करने के बजाए मैं अपनी आंखों और अपने कानों पर ही अविश्वास करूंगा।

गांधीजी ने उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में मेटलैण्ड की पुस्तक ‘दि परफ़ेक्ट वे’ (The Perfect Way) पढ़ी थी। इसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा था। इसमें लेखक ने कहा था, ईश्वर की प्रतिकृति बनने के लिए व्यक्ति को अपने में नर और मादा दोनों के गुणों का विकास करना चाहिए और आध्यात्मिक दृष्टि से पुरुष और स्त्री दोनों बनना चाहिए। गांधीजी मानते थे कि सम्पूर्ण ब्रह्मचारी के मन में नग्न स्त्री या पुरुष को देखकर भी कोई विकार पैदा नहीं होता। क्या छोटे लड़के-लड़कियों को हम निर्दोष भाव से एक दूसरे के साथ हिलते-मिलते, खेलते, नहाते और साथ-साथ सोते भी नहीं देखते? इसका कारण यह है कि उनमें अभी काम-वासना पैदा नहीं हुई है। सम्पूर्ण ब्रह्मचारी में, काम का पूर्ण ज्ञान होते हुए भी, बच्चों जैसी सम्पूर्ण निर्दोषिता होगी।

25 फरवरी, 1947 को सत्तर वर्षीय अमृतलाल ठक्कर, जिन्हें लोग 'ठक्कर बापा' के नाम से जानते थे हेमचर पहुंचे। उन्होंने गांधीजी से पूछा, नोआखाली में यह प्रयोग किस लिए।? गांधीजी ने कहा, यह प्रयोग नहीं है। मेरे यज्ञ का अविभाज्य अंग है। मनुष्य प्रयोगों को छोड़ सकता है, यज्ञ को नहीं। ठक्कर बापा ने कहा, लेकिन दुनिया ब्रह्मचर्य के बारे में आपकी तरह विचार नहीं रखती। गांधीजी ने कहा, इसका मतलब यह हुआ कि जिस वस्तु को मैं अपने लिए सत्य और उचित मानता हूं, उसे दुनिया की नाराज़गी के डर से छोड़ दूं। यह मेरा तप है, जिसका अर्थ है सर्वोत्कृष्ट आत्मशुद्धि। ज्यों ही मेरा अनुसंधान पूरा हो जाएगा, मैं स्वयं उसके परिणामों की घोषणा सारी दुनिया के सामने कर दूंगा। बापा  ने कहा, मैं स्वीकार करता हूं कि शुरू में मेरे मन में कुछ शंका थी, आज हमारे बीच चर्चा के बाद आपके प्रयोगों के अर्थ को मैं अधिक गहराई से समझ सका हूं। ठक्कर बापा ने मनु से भी कहा, मैंने रोज़ तुम दोनों की निर्दोष और गहरी नींद  देखी है। तेरी एकाग्र और अथक कर्तव्य निष्ठा भी देखी है। मेरा हृदय परिवर्तन हुआ है। मेरी आशंकाएं दूर हो गईं हैं। तुम्हारे और गांधीजी के आचरण के बारे में कुछ भी ग़लत या अनुचित न होने का मुझे विश्वास हो गया है। लेकिन मेरी विनती है कि, कुछ दिनों के लिए यह प्रयोग स्थगित कर दो। गांधीजी इस प्रस्ताव से सहमत हो गए। कुछ समय के लिए यह प्रयोग स्थगित कर दिया गया।

बादशाह ख़ान (ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान) शांति-स्थापना का काम करने के लिए बिहार आए थे।  वे गांधीजी से मिले, तो उन्होंने कहा, महात्माजी, यह देखकर मुझे अचरज होता है कि कितने विद्वान लोग जड़ और विवेकशून्य हो जाते हैं। ये लोग आपको कभी न ख़त्म होने वाली बहस में लगाए रखते हैं। मनु आपके साथ बिस्तर में सोये, इसमें मुझे कोई ग़लत बात नहीं दिखती। मनु से उन्होंने कहा, इस बेमतलब के तूफान में तेरे साथ मेरी पूरी हमदर्दी है। तू यक़ीन रखना, आख़िर में सब भला ही होगा। बापू की तू जैसी सेवा कर रही है, कोई और नहीं कर सकता। दूसरे लोग जो कुछ कहें उसकी तू ज़रा भी परवाह न करना। हर बात में तू अपने भीतर की आवाज़ को सुनना। बापू जो सलाह-सीख दें उसी पर पूरी तरह चलना। बापू की सेवा करके तू केवल बापू की ही नहीं बल्कि देश के करोड़ों ग़रीबों-अनाथों की सेवा करती है। गांधीजी ही उन दबे-कुचले हुए लोगों की एकमात्र आशा हैं।

जिन लोगों को ब्रह्मचर्य के प्रयोग के तौर पर गांधीजी के महिलाओं से संबंध अनैतिक लगते हैं, वे लोग महात्मा गांधी के गहराई से अध्ययन और चिंतन से दूर हैं।  महात्मा गांधी ने सत्य के प्रयोग के लिए तमाम टेस्ट किए और उन्हीं में से एक ब्रह्मचर्य के पालन का विषय भी शामिल था। अपनी जीवन यात्रा में गांधीजी अनेक महिलाओं के साथ रहे, लेकिन उनके संबंध कभी भी अनैतिक नहीं कहे जा सकते। केवल स्त्री-संग का त्याग ब्रह्मचर्य नहीं कहा जा सकता। गांधीजी के अनुसार ब्रह्मचर्य में अविवाहित स्थिति का समावेश होता है, परन्तु अविवाहित स्थिति ही सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य नहीं है। कर्मेन्द्रीयों का दमन भी ब्रह्मचर्य नहीं है। ऐसा दमन असुरी क्रूरताओं और आत्म-पीड़न के रूप में फूट पड़ता है। ब्रह्मचर्य इन्द्रियों के कुछ व्यापारों का भाव या लोप नहीं है, परन्तु उनका नियमन, संतुलन और उद्दात्तीकरण है। यह अनेक यम-नियमों और व्रतों के पालन का अंतिम फल है। जो मनुष्य अपने जीवन-व्यवहार में, खान-पान में, सोने और काम करने में मर्यादा का पालन नहीं करता, अपने स्वभाव पर और अपने राग-द्वेष पर नियंत्रण नहीं रखता वह स्थूल अर्थ में भी ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए चित्त और शरीर की सूक्ष्म क्रियायों पर समत्व और संतुलन सिद्ध नहीं कर सकता।  इस विषय पर कुछ लोग हमेशा से भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।

गांधीजी यूं ही महात्मा नहीं थे। उनकी ज़िन्दगी खुली किताब है। वह कहते थे कि उनकी जिंदगी ही लोगों के लिए संदेश है। गांधीजी विकृत आत्म-दमन के दोष से सर्वथा मुक्त थे। उनका हृदय अत्यंत कोमल था, लेकिन उनके संकल्प फौलादी थे। उन्होंने दीन-हीनों और दुर्बलों के प्रति अपनी घोर करुणा को कठोर आत्म-निग्रह और आत्म-त्याग का रूप दे दिया था। कई लोग उनके तपस्या पूर्ण जीवन का मज़ाक़ उड़ाते थे। जो लोग उनके निकट संपर्क में आए उन पर उनका यह गुण अदम्य प्रभाव डालता था। गांधीजी की तपस्या उन्हें बड़े-से-बड़े जनसमुदाय के साथ शुद्ध और उद्दात्त संबंध स्थापित करने का सामर्थ्य प्रदान करती थी। गांधीजी कहा करते थे, उनके भीतर नारी का वास है। श्रीमती पोलाक ने कहा था, अधिकांश स्त्रियां पुरुषों को उनके सामान्यतः पुरुषोचित माने जाने वाले गुणों के कारण प्रेम करती हैं। परन्तु महात्मा गांधी को बहुत सी स्त्रियों का प्रेम उनके स्त्रीत्व के कारण मिला है – उन सारे गुणों के कारण जिनका संबंध स्त्रियों से होता है। ... स्त्रियां तुरंत यह समझ लेती हैं कि हम जिस मार्ग पर यात्रा कर रहे हैं, गांधीजी उसी मार्ग के एक यात्री हैं, परन्तु हमसे बहुत आगे बढ़े हुए सहयात्री हैं। हम उन्हें अपना गहरा, विशुद्ध और काम-वासना से अलिप्त प्रेम बिना किसी डर के दे सकती हैं।

जीवन के प्रति दो सुप्रसिद्ध दृष्टिकोण हैं — एक निषेध या उन्मूलन का, और दूसरा समर्थन या संश्लेषण का। गांधीजी के आलोचक पहले दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते थे, जबकि गांधीजी दूसरे दृष्टिकोण के साक्षात् स्वरूप थे। गांधीजी में आत्म-यातना का कोई भी अंश बिल्कुल नहीं था। वे मानते थे कि जो व्यक्ति 'अनंत' के साथ एकाकार हो जाता है, उसके लिए शांत चित्त और प्रसन्नता ही उसकी स्वाभाविक अवस्था होती है। "जब ब्रह्मचर्य का पालन किसी के लिए स्वाभाविक हो जाता है... तो उस व्यक्ति को क्रोध और उससे जुड़ी अन्य भावनाओं से मुक्त होना चाहिए। जिन तथाकथित ब्रह्मचारियों से हमारा आम तौर पर सामना होता है, वे ऐसा व्यवहार करते हैं मानो उनके जीवन का एकमात्र काम बस अपना गुस्सा दिखाना ही हो।"

फरवरी 1947 में ब्रह्मचर्य संबंधी विवाद चरम पर पहुंच गया था। गांधीजी ने ब्रह्मचर्य के लिए प्रतिज्ञा ली थी और वो देखना चाहते थे कि वह इसमें कितने खरे उतरते हैं। कुछ लोगों को ये बात उस दौर में खटकती होगी कि कैसे वह सामाजिक मान्यताओं से आगे जाकर महिलाओं के साथ संबंध में रहे। दरअसल आम धारणा के हिसाब से महिलाओं के लिए एक सीमा तय कर दी गई है। ऐसे में कोई इस सीमा को कैसे लांघ सकता है? ये सवाल लोगों के मन में उठता होगा। गांधीजी ने प्रयोग किया था, इसके लिए किसी पर कोई दबाव नहीं था। इस दौरान किसी से कोई ऐसा संबंध नहीं था, जो अनैतिक करार दे दिया जाए।

गांधीजी नोआखाली की धर्म यात्रा में थे। इन दिनों हरिजन पत्रों के संपादन का कार्यभार जिन दो साथियों ने उठाया था उन्होंने गांधीजी के ब्रह्मचर्य संबंधी विचारों और उससे असहयोग के चिह्न के रूप में इस्तीफ़ा दे दिया था। गांधीजी जो आलेख छपने के लिए भेजते थे, उसे ज्यों का त्यों प्रकाशित न कर उसके अंशों को संपादित कर दिया जाता था। उन्होंने छह माह तक हरिजन में लिखना बंद कर दिया था। बिहार में आने के बाद ठक्कर बापा के प्रति अपने आदर के कारण गांधीजी ने कुछ समय के लिए ब्रह्मचर्य संबंधी प्रयोग बंद कर दिए थे। जब वे मई में दिल्ली पहुंचे तो फिर से वह प्रयोग शुरू कर दिया, जो जीवन के अंत तक चलता रहा। हरिजन में फिर से लिखना आरंभ किया। 2 जून को उन्होंने हरिजन में लिखा था, ब्रह्मचर्य क्या है? यह जीवन का एक मार्ग है, जो हमें ब्रह्म के पास ले जाता है। उसमें जननेन्द्रिय का पूर्ण संयम आ जाता है। यह संयम मन, वाणी और कर्म से होना चाहिए। जो मनुष्य विचारों पर संयम नहीं रखता, परन्तु वाणी और स्थूल कर्म पर संयम रखता है, वह ब्रह्मचारी नहीं माना जा सकता। यदि मन पर संपूर्ण संयम सिद्ध हो जाए, तो वाणी और कर्म का संयम तो बच्चों का खेल हो जाए।

सुरेंद्र बाबू गांधी ( पूर्व निदेशक, गांधी पीस फाउंडेशन ) कहते हैं, ब्रह्मचर्य के बारे में जो प्रयोग गांधीजी ने किए, इस बारे में लोगों को कहां से पता चला? क्या लोगों के पास कोई अलग से जानकारी आई? नहीं ऐसा नहीं था। इस बारे में भी गांधीजी ने जो लिखा है, उसी को लोगों ने पढ़ा। गांधीजी ने अपने जीवन के बारे में सब कुछ लिखा और वह लोगों के सामने है। उसकी अब ग़लत तरीके से व्याख्या की जा रही है। इस तरह के सवाल उठाना कि महिलाओं से गांधी के संबंध अनैतिक थे, ये बेकार की बातें हैं और सच्चाई से इसका कोई लेना-देना नहीं है। उनकी पूरी ज़िन्दगी संदेश से भरी हुई है और सही मायने में उनकी ज़िन्दगी खुली किताब है।

***     ***  ***

मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांगांधी और गांधीवाद

संदर्भ : यहाँ पर

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।