गांधी और गांधीवाद
448.
नोआखाली में शान्ति यात्रा-2
1946
एकाकी प्रायश्चित
गांधीजी के लिए अहिंसा
सिर्फ़ एक फ़िलॉसफ़ी नहीं थी, यह काम करने का एक तरीका था, बदलाव का एक ज़रिया
था। गांधीजी का कहना था, ‘अगर इंसान में
भगवान का कभी भी और कहीं भी प्रदर्शन न हो तो इंसानियत खत्म हो जाएगी।’ गांधीजी अब पागल इंसान
में भगवान की तलाश में निकल पड़े। नोआखाली के लोगों के
पास जाने की जो इच्छा अचानक उनके अंदर महसूस हुई, उसे दबाने का उनका मन नहीं हुआ। नोआखाली में उनकी बिना हथियार वाली मौजूदगी दंगा पीड़ितों
को क्या सुरक्षा दे सकती थी?
जब एक हफ्ते तक बंगाल
सरकार द्वारा दबा-छिपा कर रखे जाने के बाद नोआखाली की तबाही की खबर फूटी तब
गांधीजी दिल्ली के भंगी बस्ती के मकान में थे। 27 अक्तूबर को उनका
सेवाग्राम लौटने का कार्यक्रम तय था। 26 अक्तूबर को बंगाल के उपद्रवों की सूचना गांधीजी को भी
मिली। नोआखाली में स्त्रियों पर किए गए अत्याचारों की ख़बर ने उन्हें व्यथित कर
दिया। गांधीजी जानते थे कि नोआखाली
एक ऐसी महामारी है जो अगर रोकी नहीं गई तो पूरे भारत को तबाह कर सकती है। उन्होंने
अपने सबसे करीबी दोस्तों से कहा कि वह “करो या मरो” की भावना से वहां जाएंगे।
यह सबसे बड़ा टेस्ट था, और उन्हें लगा कि बहुत
मुमकिन है कि वह मारे जाएंगे। ‘यहां "करो" का मतलब है कि हिंदू और
मुसलमान शांति और भाईचारे से साथ रहना सीखें। नहीं तो, मैं इस कोशिश में मर
जाऊंगा।' उन्होंने अपना सेवाग्राम
जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया और 27 अक्तूबर को उन्होंने
घोषणा कर दी, “कल मैं पूर्वी बंगाल के दंगा ग्रस्त
क्षेत्रों में जा रहा हूं।” उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था। मित्रों ने उन्हें
रोकना चाहा, पर उन्होंने किसी की नहीं सुनी। दिल्ली से निकलने के पूर्व शाम
उन्होंने प्रार्थना सभा में कहा, “लंबी यात्रा पर जा रहा हूं। मेरा स्वास्थ्य भी
ठीक नहीं है। लेकिन सबको अपना कर्तव्य पालन करना ही चाहिए। मैं नहीं जानता कि मैं
वहां क्या कर पाऊंगा? मैं केवल इतना जानता हूं कि वहां गए बिना मैं शांति नहीं पा
सकूंगा। मैं किसी को दोष देने के लिए बंगाल नहीं जा रहा। मैं तो ईश्वर के दास की
तरह वहां जा रहा हूं। हो सकता है यह मेरे जीवन का आख़िरी काम हो। शायद नोआखाली से
मैं कभी लौटूं ही नहीं।”
28 अक्तूबर को ट्रेन से
गांधीजी नई दिल्ली से कलकत्ता के लिए रवाना हुए। उसी दिन कलकत्ता में एक और
धार्मिक दंगे में 32 लोग मारे गए। जिन बड़े शहरों में स्पेशल ट्रेन रुकती थी, वहां बहुत सारी भीड़
स्टेशनों को घेर लेती थी और पटरियों पर चढ़ जाती थी। वे स्टेशन की छत पर चढ़ जाते
थे, कांच की खिड़कियां और
लकड़ी के शटर तोड़ देते थे, और कान फाड़ देने वाला
शोर मचाते थे। कई बार कंडक्टर ने ट्रेन निकलने का सिग्नल दिया लेकिन किसी ने
इमरजेंसी कॉर्ड खींच दिया और ट्रेन झटके से रुक गई। एक स्टेशन पर रेलवे अधिकारियों
ने लोगों पर फायर होज़ चलाया लेकिन पानी गांधीजी के डिब्बे में भर गया। गाड़ी
कलकत्ते 5 घंटे देर से पहुंची। स्टेशन से वे सीधे शहर से 10 मील दूर सोदपुर
स्थित सतीशचन्द्र दासगुप्त के खादी प्रतिष्ठान आश्रम गए। उपस्थित लोगों को
उन्होंने कहा, “मैं खाली दिमाग के साथ आया हूं,
आगे भगवान की मर्ज़ी।” दूसरे दिन उन्होंने
बंगाल के गवर्नर सर फ्रेडरिक बरोज़ से मुलाक़ात की। इसके बाद वह पूर्वी कमांड के
प्रधान सेनापति जनरल बुशेर से भी मिले। वह बंगाल प्रांत के मुस्लिम प्रधानमंत्री
एच. एस. सुहरावर्दी से भी लंबी मुलाकात की।
शाम की प्रार्थना सभा
में उन्होंने कहा, “दोनों क़ौमें एक जगह
रहने का निश्चय करें या अलग होने का, ऐसा उन्हें सद्भाव और समझौते की भावना से
करना चाहिए।” एक मुस्लिम मित्र ने पूछा, “आप नोआखाली क्यों जाना चाहते हैं? बंबई,
अहमदाबाद या छपरा तो आप नहीं गए? वहां भी तो दंगे हुए हैं। आप नोआखाली इसलिए जा
रहे हैं क्योंकि वहां हिंदू मारे गए हैं। दूसरी जगह मुसलमान मारे गए हैं। क्या ऐसी
अवस्था में आपके नोआखाली जाने से हिन्दू और मुसलमानों का मौज़ूदा तनाव नहीं बढ़ेगा?” गांधीजी ने कहा, “मैं इन सभी जगहों पर जाने को तैयार हूं, लेकिन
नोआखाली में जो अत्याचार स्त्रियों पर गुजरे हैं उसकी मिसाल दुनिया में कहीं नहीं
मिल सकती। इन प्रताड़ित महिलाओं का आर्तनाद सुनकर मैं नोआखाली जा रहा हूं। मैं
मुस्लिम लीग मंत्रिमंडल के ख़िलाफ़ सबूत जमा करने या किसी समुदाय के बारे में फैसला
सुनाने के लिए बंगाल नहीं आया हूं। बल्कि हिंदुओं के हृदय में साहस का संचार करने
और दोनों समुदायों को सहिष्णुता का पाठ पढ़ाने आया हूं। ताकि वे आगे भी अच्छे
पड़ोसियों की तरह रहें जैसे सदियों से रहते आए हैं।”
एक अन्य मित्र ने पूछा, ऐसी हिंसा और मारा-मारी
में जाने से क्या लाभ होगा? गांधीजी ने जवाब दिया, “मेरी अहिंसा की यह अग्नि-परीक्षा है। भगवान
मुझे मार्ग दिखाएंगे। लेकिन अभी तो नोआखाली पहुंचना मेरा धर्म है। हुआ तो वहीं मर
जाऊंगा, लेकिन वापस नहीं लौटूंगा। अगर कुछ न कर सका तो जीकर भी क्या करना?”
77 वर्षीय वृद्ध, जो अब
कांग्रेसी नेतृत्व से अधिकाधिक कट चुका था, अपने अदम्य साहस के साथ नोआखाली के लिए
निकल चुका था। इन दंगा ग्रस्त इलाक़ों में वह अपना सब कुछ दांव पर लगाने जा रहा था
यह सिद्ध करने के लिए कि अहिंसा और हृदय-परिवर्तन के जिन सिद्धांतों को उसने जीवन-भर
माना है, वे झूठे नहीं हैं। अपने नाम-मात्र के सहयोगियों के साथ वे नोआखाली के
वैमनस्यपूर्ण मुस्लिम-बहुल इलाक़े में रहे और शांति और अमन का पैंग़ाम फैलाया।
गांधीजी के चारित्रिक गुण और सच्ची महानता की यह पराकाष्ठा थी। जीवन के उस क्षण
में, जब भारत स्वतंत्र होने जा रहा था, और लोग जिस राजनीतिक सत्ता को वे आसानी से
प्राप्त कर सकते थे, उसके प्रति उन्होंने तिरस्कार का भाव अपनाया और संप्रदायवाद
का भावपूर्ण विरोध किया।
बक़रीद का त्योहार निकट आ रहा था। उस मौक़े पर
साम्प्रदायिक संघर्ष की संभावना थी। बंगाल के मुख्यमंत्री ने निवेदन किया कि
गांधीजी बक़रीद का त्योहार पूरा हो जाने तक शहर की शांति के लिए कलकत्ता में ही ठहर
जाएं। सुहरावर्दी के आग्रह पर गांधीजी चार दिन कलकत्ता में रह गए। कलकत्ता भी जल
ही रहा था। कलकत्ता की सड़कें लाशों की ढेरों से भरी पड़ी थीं। गांधीजी ने कहा, “ये कैसा पागलपन है जो आम आदमी को जानवर से भी
बदतर बना देता है।”
हमेशा के आशावादी गांधीजी को अभी तक एक उम्मीद
थी कि वे करुणा के आंसुओं के सहारे राजनीतिक आवेश और धार्मिक घृणा के दहकते शोलों
को ठंडा कर सकेंगे। उनका विचार था कि अगर वे भय रहित होकर, बिना किसी सुरक्षा के और दिल में करुणा लेकर
नोआखाली के भयानक जंगल में घूम-फिर सकें तो मुसलमानों के बीच रहकर वे उन्हें
विश्वास दिला सकेंगे कि वे उसी तरह उनके
भी शुभचिंतक हैं जैसे शेष भारत के। उनको अपने बीच पाकर भयभीत और हताश हिन्दू साहस
का अनुभव करेंगे और अपने उजड़े हुए घरों में लौट सकेंगे। उन्होंने अपनी प्रार्थना
सभा में कहा था, 'यह गुस्साई औरतों की चीख थी, जिसने मुझे नोआखाली बुलाया है... मैं बंगाल तब
तक नहीं छोड़ूंगा जब तक मुसीबत की आखिरी चिंगारी बुझ नहीं जाती। मैं यहां पूरे एक
साल या उससे ज़्यादा रह सकता हूं। अगर ज़रूरत पड़ी, तो मैं यहीं मर जाऊंगा। लेकिन मैं हार मानकर नहीं मानूंगा।
अगर मेरे शरीर में होने का एकमात्र असर यह है कि लोग उम्मीद से मेरी ओर देखें, जिसे मैं सही साबित करने के लिए कुछ नहीं कर
सकता, तो यह कहीं बेहतर होगा कि मौत में मेरी आंखें
बंद हों।'
बंगाल में साम्प्रदायिक मेल-मिलाप स्थापित करने
के लिए गांधीजी ने एक योजना बनाई। उस योजना पर हस्ताक्षर करने वाले लोगों ने पूरे
बंगाल के एक शांति-समिति बनाई। उस समिति में हिन्दू और मुसलमान समान संख्या में
लिए गए। मुख्यमंत्री सुहरावर्दी उसके सभापति बने। इस समिति का उद्देश्य प्रान्त
में साम्प्रदायिक शांति पैदा करना था। ऐसी शांति जो सेना और पुलिस की मदद से बाहर
से थोपी हुई न हो, बल्कि स्वाभाविक हार्दिक प्रयत्न से स्थापित की गई हो।
मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि बंगाल सरकार समिति के निर्णयों पर अमल करेगी।
बिहार में क़ौमी दंगे
नोआखाली के लिए अभी गांधीजी कलकत्ता से चले भी
नहीं थे कि 3 नवंबर को बिहार से क़ौमी दंगों के भयानक समाचार आए। बिहार
में 31,000,000 हिंदू और 5,000,000 मुसलमान रहते थे। 25 अक्टूबर को 'नोआखाली दिवस' घोषित किया गया। कांग्रेसियों
के भाषणों और सनसनीखेज अखबारों की हेडलाइन ने हिंदुओं को पागल कर दिया और हज़ारों
लोग 'खून के बदले खून' के नारे लगाते हुए
सड़कों और गांव की गलियों में परेड करने लगे। नोआखाली और तिप्पेरा की घटनाओं ने
ज़्यादातर समुदाय को गुस्सा दिला दिया था क्रुद्ध हिंदुओं की भीड़ ने कलकत्ता और
नोआखाली के मुसलमानों की पाशविकता को भी पीछे छोड़ दिया था। 'दंगाइयों द्वारा मारे
गए लोगों की आधिकारिक तौर पर पुष्टि की गई संख्या 4580 थी'; गांधीजी ने बाद में
कुल संख्या दस हज़ार से ज़्यादा बताई। वे ज़्यादातर मुसलमान थे। गांधीजी का दिल
दुख और शर्म से कराह उठा। उन्होंने बिहारियों के नाम एक मैनिफेस्टो लिखा: 'मेरे सपनों का बिहार
उन्हें झूठा साबित करता दिख रहा है... बिहारी हिंदुओं के गलत कामों से कई लोग
कायदे-आज़म के इस ताने को सही ठहराते हैं कि कांग्रेस एक हिंदू संगठन है, भले ही वह इस बात का
दावा करती हो कि उसमें कुछ सिख, मुस्लिम, ईसाई, पारसी और दूसरे लोग
हैं... बिहार, जिसने कांग्रेस का नाम
ऊंचा करने के लिए इतना कुछ किया है, उसकी कब्र खोदने वाला
पहला प्रांत न बने।'
बिहार उनके दिल के
क़रीब था। वहां से उन्होंने भारत के अपने पहले सफल सत्याग्रह की शुरुआत की थी।
प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने ने घोषणा की कि वे प्रतिदिन तब तक आधा भोजन ही ग्रहण
करेंगे, जब तक शान्ति बहाल न हो जाए। अगर ग़लती करते बिहारी कोई नया पृष्ठ आरंभ करते हैं, तो यह आधा अनशन
मरणव्रत (आमरण अनशन) भी बन सकता है। गांधीजी ने लोगों से स्पष्ट तौर पर कहा, “ख़ून के बदले ख़ून का
नारा निरा जंगलीपन है। नोआखाली की घटनाओं का बदला आप बिहार में नहीं ले सकते।” पंडित नेहरू, सरदार
पटेल, लियाक़त अली ख़ान और सरदार अब्दुर रब निश्तर पटना पहुंचे और बिहार की स्थिति
यथाशीघ्र संभालने के लिए। उन्होंने गांधीजी को आश्वासन तो दे दिया कि वे स्थिति को
क़ाबू में कर लेंगे, लेकिन तब तक साम्प्रदायिकता का ज़हर बहुत ज़्यादा फैल चुका था। जो
कुछ उन्होंने देखा और सुना, उससे गुस्सा होकर
प्रधानमंत्री नेहरू ने धमकी दी कि अगर हिंदू हत्याओं से बाज नहीं आए तो बिहार पर
हवाई बमबारी कर देंगे। 'लेकिन गांधीजी ने कहा
कि यह ब्रिटिश तरीका था। 'मिलिट्री की मदद से
दंगों को दबाकर वे भारत की आज़ादी को दबा रहे होंगे,' उन्होंने कहा। 'और फिर भी अगर
कांग्रेस लोगों पर कंट्रोल खो देती तो पंडितजी क्या करते?'
नेहरू ने ऐलान किया कि
जब तक राज्य शांत नहीं हो जाता, वे बिहार में ही रहेंगे। 5 नवंबर
को गांधीजी ने उन्हें एक चिट्ठी भेजी, जिसमें लिखा था, 'बिहार से आई खबर ने
मुझे हिलाकर रख दिया है... अगर जो सुना है उसका आधा भी सच है, तो इससे पता चलता है
कि बिहार इंसानियत भूल गया है... मेरी अंदर की आवाज़ मुझसे कहती है, "हो सकता है कि तुम इस
बेमतलब के कत्लेआम के गवाह न बनो... क्या इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हारा दिन
खत्म हो गया है?" इस बात का लॉजिक मुझे
बिना रोक-टोक के उपवास की ओर ले जा रहा है।'
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- गांधी और गांधीवाद
संदर्भ : यहाँ पर
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