गांधी और गांधीवाद
462. अगला पड़ाव
1947
सत्य और अहिंसा के लिए अपनी तपस्या में वह कहाँ खड़े थे? नोआखाली में उन्होंने बार-बार खुद से यही सवाल पूछा था। गांधीजी ने अब तक नोआखाली
के हिंदुओं के बड़े पैमाने पर पलायन का ज़ोरदार विरोध किया था। उनका मानना था कि
यह उत्पीड़न कुछ ही लोगों का किया-धरा है; मुस्लिम समुदाय का
बड़ा हिस्सा यह नहीं चाहता था कि अल्पसंख्यक समुदाय वहाँ से चला जाए। अगला पड़ाव बिष्काटाली
में था। यहां मुस्लिम विरोध चरम पर था। इस गांव में 4,694 मुस्लिमों के बीच 306 हिन्दू थे। दंगों के दौरान घर-बार छोड़कर चले जाने वाले
हिन्दू अभी तक नहीं लौटे थे। जिस घर में गांधीजी ठहरे थे, उस घर का मालिक गांधीजी के आने की वजह से कुछ समय के लिए वापस लौटा था। वह घर
भी तबाही से बच नहीं पाया था। उस घर में एक शानदार लाइब्रेरी थी, जिसमें धर्म पर लिखी कई हस्तलिखित किताबें थीं — यह उस ज़िले की पुरानी
सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक थी। अशांति के दौरान इस लाइब्रेरी को भी जला दिया गया
था।
जहां गांधीजी ठहरे थे उसके आस-पास के पेड़ों पर बिहार को याद करो और टिपरा छोड़ दो,
पाकिस्तान ज़िन्दाबाद, कांग्रेस मुर्दाबाद के पोस्टर लगे थे। इसके बावज़ूद जिस हिन्दू
के घर में गांधीजी ठहरे थे, उसके ठीक बगल में एक हिंदू परिवार का घर था, उसे दंगों में एक नेक मुसलमान ने ही बचाया था। सबसे
बुरे दंगों के दौरान भी, उनकी रक्षा की थी। शाम की प्रार्थना सभा
में गांधीजी से पूछा गया: "अगर ईश्वर एक ही है, तो धर्म भी एक ही
क्यों नहीं होना चाहिए?" गांधीजी ने उत्तर दिया, "क्योंकि हर किसी की ईश्वर के बारे में अपनी-अपनी धारणा होती है। उदाहरण के लिए, मैं खुद को हिंदू मानता हूँ, लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं ईश्वर की पूजा उस तरह से
नहीं करता, जिस तरह से कई अन्य हिंदू करते हैं।"
दूसरे दिन वह कमलापुर में थे। इसके बाद चर कृष्णपुर गए। चर का अर्थ है एक ऐसा टापू जो नदी का बहाव बदलने
से नदी के पाट में पैदा हो जाता है। यह चर क्षेत्र मेघना नदी की देन था। यहां पर अधिकांश
लोग दलित समुदाय के थे। मुसलमानों की संख्या सिर्फ़ 200 थी। यहां के नामशूद्र दलित जातियों को दंगों में भयंकर कष्ट उठाने पड़े थे। बहुत
दिनों तक यहां आतंक का राज्य क़ायम रहा। एक जले हुए घर की टीन की चादरें निकाल कर उस
पर एक कामचलाऊ छप्पर डाल दिया गया था। गर्मी से बचने के लिए इसे हरी टहनियों से ढक
दिया गया था। फिर भी, इसके अंदर काफ़ी ज़्यादा गर्मी और घुटन थी। गांधीजी वहीं ठहरे। उस गांव में हिन्दुओं का बहिष्कार किया गया था जिससे अनेकों
लोग बेरोज़गार हो गए थे। कुछ समय से अलग-अलग जगहों से रिपोर्टें आ रही थीं जिनसे
पता चल रहा था कि हालात बिगड़ रहे हैं। मुसलमानों की गुप्त बैठकें हो रही थीं, और शिकायत करने वालों पर अपनी शिकायतें वापस लेने का दबाव डाला जा रहा था।
हिंदुओं का बहिष्कार करने के लिए एक जैसी, ज़ोरदार और सुनियोजित
मुहिम चलाई जा रही थी। इसकी वजह से गाँवों में बड़ी संख्या में हिंदू मछुआरे, पान उगाने वाले, बुनकर, छोटे दुकानदार वगैरह बेरोज़गार हो गए थे।
2 जनवरी से अब तक गांधीजी नोआखाली ज़िले के 49 और टिपरा ज़िले के 49 गांवों का दौरा कर चुके थे। इस दौरान बांस की लाठी लिए उन्होंने 116 मील की दूरी तय की थी। गांधीजी यात्रा के दौरान दोनों क़ौमों की स्त्रियों से मिलते।
हिन्दू स्त्रियों के अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ जागरूक करते। मुस्लिम स्त्रियों से पर्दा
छोड़कर बाहर आने की सीख देते। दोनों को डर छोड़कर परिवार के सदस्य की तरह रहने की अपील
करते। अधिकांश मुसलमान गांधीजी की प्रार्थना सभा से दूर ही रहते।
गांधीजी अगली सुबह हैमचर पहुंचे। वहां छह दिनों का पड़ाव था। ठक्कर बप्पा
यहां पर सहायता और पुनर्वास केन्द्र चला रहे थे। उन्होंने गांधीजी को वहां की परिस्थितियों
से अवगत कराया। वहां पर बाल-विवाह, अस्पृश्यता, विधवा आदि बहुत सी सामाजिक कुरीतियां
भरी हुई थीं। उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। आराम की ज़रूरत थी। यहां की प्रार्थना
सभाओं में गांधीजी ने सामाजिक कुरीतियों से लड़ने के लिए लोगों को जागरूक किया। इसके
अलावा उन्होंने कहा, “इसमें ज़रा भी शक नहीं कि निकट भविष्य में अंग्रेज़ भारत छोड़कर जा रहे हैं। मेरा
दृढ़ मत है कि अगर हिन्दू और मुसलमान अपनी फूट को मिटाकर बाहरी दबाव के बिना एक हो जाएं
तो वे भारत के ही नहीं बल्कि समूची दुनिया के भविष्य को प्रभावित करेंगे। इसलिए समय
आ गया है कि हिन्दू और मुसलमान शांति और एकता के साथ रहने का संकल्प लें। नहीं तो दूसरा
रास्ता गृह युद्ध का है। लेकिन उससे तो देश के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।”
इस बीच कुछ ऐसी महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी थीं, जिनका असर पूरे देश पर
पड़ा। मुस्लिम लीग के कराची प्रस्ताव ने, मुस्लिम लीग के
संविधान सभा में शामिल होने की किसी भी आगे की उम्मीद को खत्म कर दिया था। लंदन टाइम्स ने टिप्पणी की: "लीग, जो ज़ाहिर तौर पर
ब्रिटिश घोषणा पर भरोसा कर रही है कि संविधान सभा द्वारा बनाया गया संविधान—जो
पूरी तरह से प्रतिनिधि नहीं है—भारत के अनिच्छुक हिस्सों पर थोपा नहीं जा सकता, शायद इस बात को नज़रअंदाज़ कर बैठी है कि एक और भी कम महत्वपूर्ण वादा यह भी
है कि किसी अल्पसंख्यक को अनिश्चित काल तक बहुमत की प्रगति में बाधा डालने की
अनुमति नहीं दी जा सकती।"
हैमचर में अपनी पहली प्रार्थना सभा के दौरान, गांधीजी ने कहा कि
अतीत में ब्रिटिश शासन का इतिहास चाहे जैसा भी रहा हो, इसमें ज़रा भी संदेह नहीं है कि ब्रिटिश लोग निकट भविष्य में भारत छोड़कर चले जाएंगे। 24 और 28 फरवरी नेहरूजी ने पत्र लिखकर गांधीजी से आग्रह किया कि
दिल्ली में महत्त्व का काम है, वह दिल्ली आ जाएं। ‘कार्यसमिति की बैठक 5 मार्च को होने वाली है... इस नाज़ुक मोड़ पर आपकी सलाह
हमारे लिए बहुत मददगार साबित होगी।’ गांधीजी ने जवाब दिया, “मेरा स्थान यहां है। वहां तो आप सब महारथी मिलकर जिम्मेदारी
का बोझ उठा ही रहे हैं। परन्तु यहां तो मैं अकेला ही हूं।” मौलाना आज़ाद ने सुझाव दिया, “अगर आप दिल्ली नहीं आ सकते तो कलकत्ते को अपना मुख्य केन्द्र
बना लीजिए।” गांधीजी ने जवाब दिया, “जिस अहिंसा पर मैंने इतने वर्ष तक अमल करने की कोशिश की
है, वह यदि संकट के समय काम नहीं देती तो मेरी दृष्टि में उसका कोई मूल्य महीं रह जाता।
यदि मैं यहां कुछ नहीं कर सकता, तो अन्यत्र कहीं भी उपयोगी नहीं हो सकता।” अपने एक यूरोपियन जानकार को उन्होंने लिखा था, “अपनी पदयात्रा से मुझे अतिशय मानसिक शांति मिलती है। इसका परिणाम न तो मैं जानता
हूं और न जानने की चिंता करता हूं। परिणाम पर मनुष्य का अधिकार नहीं होता।”
गांधीजी पैदल घूमते रहे और वहां के लोगों को समझाते रहे। महिलाओं को गांधीजी से
सांत्वना, शक्ति और रामनाम का महामंत्र मिल गया था। धीरे-धीरे उन महिलाओं का डर दूर
हुआ। हिंदुओं को वे समझाते कि बलात्कार से पीड़ित बहू-बेटियों का तिरस्कार महापाप है।
उनको तो ज़्यादा प्यार और आदर से अपना लेना चाहिए। गांधीजी की बात मानकर उन विस्थापित
लोगों ने उन अत्यंत दुखी महिलाओं को अपने घरों में सादर वापस बुला लिया। धर्म परिवर्तित
हिंदू फिर से हिंदू बन गए। गांधीजी ने अपनी करुणा, हिम्मत और समझदारी से उन पीड़ित और
व्यथित लोगों के घाव भर दिए। ग़रीब मुसलमानों के भी दुख-दर्द दूर करने के उपाय में गांधीजी
लगे रहे।
गांधीजी का दिल्ली आने से लगातार इनकार—जब तक कि नोआखली में उनका मिशन सफल
नहीं हो जाता—कांग्रेस नेताओं के लिए एक दुविधा बन गया था। पंडित नेहरू के एक पत्र में यह बात साफ़ तौर पर ज़ाहिर हुई थी: "मैं
जानता हूँ कि हमें खुद पर भरोसा करना सीखना चाहिए और हर मौके पर मदद के लिए आपके
पास नहीं दौड़ना चाहिए। लेकिन हमें यह बुरी आदत पड़ गई है और हम अक्सर महसूस करते
हैं कि अगर आप तक पहुँचना आसान होता, तो हमारी मुश्किलें कम
होतीं।" लेकिन गांधीजी का रुख़ नहीं बदला: "मैं जानता
हूँ कि अगर मैं आज़ाद होता, तो हमारे देश में उठने वाली अलग-अलग समस्याओं को सुलझाने में अपना हिस्सा निभा
पाता। लेकिन मुझे लगता है कि जब तक मैं यहाँ कुछ कर नहीं लेता, तब तक मैं बेकार ही रहूँगा... हम सब उस शक्ति के हाथों में हैं जिसे हम ईश्वर
कहते हैं।" आखिरकार, न तो उनकी और न ही
पंडित नेहरू की मर्ज़ी चली, बल्कि—जैसा कि उन्होंने पंडित नेहरू से कहा था—"वह शक्ति चली जिसे हम
ईश्वर कहते हैं"। उनके भाग्य में न तो नोआखाली में रहना लिखा था और न ही
दिल्ली में, बल्कि बिहार में रहना लिखा था।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- गांधी और गांधीवाद
संदर्भ : यहाँ पर
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